Stew
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Exercise works for depression. 92% of clinicians get zero training on how to recommend it. If this were medication, it would be malpractice.

बाथरूम का दरवाजा हमेशा बंद रखना चाहिए। खुला दरवाजा घर में नकारात्मक ऊर्जा फैलाता है

Paanch minute ruko main dulhe ka dress pehen ke aaya

Aap log ko kya lagta hai agar main Sydney Sweeney ke ghar ke bahar amaran anshan karu toh woh bhi mujhe nadda ji jaise juice pilane aayegi ?

“मेरा ज़्यादा नंबर था, मगर मुझसे कम नंबर वाले बच्चे का सेलेक्शन हो गया। ये मेरिट की हत्या है।” आपने भी यह तर्क बार-बार सुना होगा। पहली नज़र में यह शिकायत न्यायसंगत लग सकती है, लेकिन ज़रा ठहरकर पूरी चयन-प्रक्रिया की संरचना को समझिए। मान लीजिए 100 पदों की वैकेंसी है। उनमें 40 पद सबके लिए खुले हैं। 10 पद आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए हैं। यानी सामान्य वर्ग का अभ्यर्थी कुल 50 पदों पर प्रतिस्पर्धा कर सकता है। फिर भी यदि वह इन 50% सीटों में जगह नहीं बना पाता और अपनी असफलता का कारण आरक्षण को बताता है, तो यह तर्क कहाँ तक तार्किक है? सच्चाई यह है कि ओपन कैटेगरी में प्रतिस्पर्धा सबके लिए होती है — अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग, सभी के लिए। अनेक बार आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार भी ओपन मेरिट में चयनित होते हैं। ऐसे में जो अभ्यर्थी चयनित नहीं हो पाया, वह प्रायः अपने ही सामाजिक-शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिस्पर्धियों से पीछे रह जाता है, लेकिन दोष आरक्षण को देता है। यह भी समझना होगा कि “मेरिट” कोई निर्वात में पैदा होने वाली चीज़ नहीं है। वह सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संसाधनों की उपज होती है। सदियों तक ज्ञान, शिक्षा और सत्ता संस्थानों पर जिन वर्गों का वर्चस्व रहा, उन्हें पुस्तकालय, ज़मीन, सामाजिक सम्मान, शिक्षित परिवेश और नेटवर्क — सब कुछ सहज रूप में उपलब्ध था। दूसरी ओर जिन समुदायों को सामाजिक अपमान, शैक्षणिक वंचना और सांस्कृतिक बहिष्कार झेलना पड़ा, उनके लिए प्रतिस्पर्धा की शुरुआती रेखा ही अलग थी। ऐसे असमान प्रारंभ बिंदुओं को नज़रअंदाज़ करके केवल अंतिम अंकतालिका को “शुद्ध मेरिट” घोषित कर देना वस्तुतः इतिहास को मिटा देना है। कैम्पसों में अव्वल रहने की जो लालसा “सर्वोच्च मेरिट” की अपेक्षा करती है, उसमें नाकाम रहने वाले अक्सर अपनी हार को स्वीकार करने के बजाय आरक्षण को दोषी ठहराते हैं। जबकि वस्तुतः वे ओपन कैटेगरी की प्रतिस्पर्धा में पराजित हो चुके होते हैं। आरक्षण उनकी सीट नहीं लेता; वह उन लोगों को अवसर देता है जिन्हें सदियों तक अवसर से दूर रखा गया। दरअसल इस देश में “मेरिट” और “आरक्षण” को किसी वैकल्पिक बहस की तरह नहीं, बल्कि अनिवार्य पाठ की तरह पढ़ाया जाना चाहिए। हर कैंपस में, हर सार्वजनिक मंच पर यह समझ विकसित होनी चाहिए कि समान अवसर का अर्थ क्या है और ऐतिहासिक अन्याय का प्रतिकार कैसे किया जाता है। जब तक यह बौद्धिक स्पष्टता नहीं आएगी, तब तक वर्चस्वशाली समूह अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए आरक्षण को ही कठघरे में खड़ा करते रहेंगे — और दुनिया की एक ज़रूरी सामाजिक न्याय व्यवस्था का अपमान करते रहेंगे। Via Shri @DrLaxman_Yadav #reservation #ISupportReservation @nethrapal

@chatterup5 आप में एक बलतकारी इंसान बसता है

So excited to share that I’m starting a PhD in Mathematics at @Cambridge_Uni this October! I’ll be joining the Department of Applied Mathematics and Theoretical Physics (DAMTP) specifically in the Astrophysics group. This group carries out research into a wide range of topics involving astrophysical fluid dynamics (my favourite!) and nonlinear dynamics. This includes the dynamics of astrophysical discs, planetary formation and evolution, extrasolar planetary systems and stellar magnetohydrodynamics! So excited to finally share this, and even more excited to start!












