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vinod tyagi
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सोशल मीडिया और विभिन्न विमर्शों में अक्सर यह दावा किया जाता है कि श्रीमद्भगवत गीता धम्मपद से प्रभावित है या उसकी नकल है। डॉ. विलास खरात द्वारा दिए गए इसी चैलेंज को स्वीकार करते हुए 'सनातन समीक्षा' ने अकादमिक, भाषाई और ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ सत्य को सामने रखने का एक सराहनीय प्रयास किया है।
इस वीडियो में मुख्य रूप से इन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर गहराई से चर्चा की गई है:
कालक्रम (Chronology): पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर दोनों ग्रंथों के वास्तविक समय की पड़ताल।
भाषा विज्ञान (Linguistics): गीता की पाणिनीय पूर्व महाकाव्य संस्कृत और धम्मपद की पाली भाषा के विकास क्रम का तार्किक विश्लेषण।
दार्शनिक भिन्नता: गीता के 'निष्काम कर्म' और धम्मपद के 'अत्त दीपो भव' व अनात्मवाद के बीच का मौलिक अंतर, जो यह सिद्ध करता है कि दोनों सर्वथा विपरीत छोरों पर स्थित स्वतंत्र धाराएं हैं।
'निर्वाण' शब्द का सच: क्या निर्वाण शब्द मूल रूप से बौद्ध परंपरा का है या इसका प्राचीन उल्लेख महाभारत के शांति पर्व में भी मिलता है?
किसी की भावना को ठेस पहुँचाए बिना, विशुद्ध रूप से अकादमिक और तार्किक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाली इस बौद्धिक चर्चा को जरूर देखें और अपने विचार साझा करें।
पूरा वीडियो यहाँ देखें: youtube.com/live/lZZA969cS…
आप सभी लोग यह वीडियो शेयर करे और विलास खरात जी को बोले वह सनातन समीक्षा पर अपना पक्ष रखने आए !

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क्या आप जानते हैं कि ग्रीक और सीरियाई रिकॉर्ड्स में आज से करीब 1800 साल पहले ही भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप का अद्भुत वर्णन मिलता है? सनातन समीक्षा के इस नए वीडियो में हमने इसी ऐतिहासिक सच से पर्दा उठाया है कि कैसे तीसरी शताब्दी के विदेशी दार्शनिकों ने हमारी प्राचीन प्रतिमाओं और परंपराओं को अपनी किताबों में गर्व के साथ दर्ज किया था। इतिहास को ठोस सबूतों के साथ समझने के लिए यह वीडियो आप सभी के लिए बेहद जरूरी है। इसे खुद भी देखें, अपने मित्रों के साथ शेयर करें और हमारे इस शोधपूर्ण सफर से जुड़ने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें। वीडियो पर अपनी राय कमेंट में जरूर दीजिएगा, क्योंकि आपका साथ ही हमें और बेहतर काम करने की हिम्मत देता है।
वीडियो का लिंक: youtube.com/live/yAjyYNBeI…

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महाबोधि टेंपल का जो भव्य स्वरूप आज दिखाई देता हैं वह दो ब्राह्मण भाइयों द्वारा तो निर्मित करवाया गया हैं। तो जिसने बनवाया वही था बैठेगा ... सम्राट अशोक ने एक छोटा स्मारक या वज्रासन जैसा ढांचा ही तैयार करवाया था कोई बड़ा भव्य मंदिर नहीं। आज का मंदिर ब्राह्मणों का बनवाया हुआ हैं। ह्वेन त्सांग को पढ़ो अधिक जानकारी के लिए।
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@margdata8705 किसी अच्छे मनोचिकित्सक से अपना इलाज करवा भाई साफ साफ भगवान विष्णु की प्रतिमा को बुद्ध प्रतिमा बता रहा हैं। 🤣🤣🤣
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@nilatkar इसमें यह लिखा लिखा है कि यह बोधिसत्व राम हैं ? और लिखा नहीं तो क्लेम कैसे किया ? क्यों कि तुम लोग तो बस लिखा मानते हो
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पोस्ट चोर भ्रांति कुमार बिना किसी की पोस्ट चोरी किए क्रांति नहीं कर पाता ... और अब इस पोस्ट चोर ने क्रांति करने के उद्देश्य से नया प्रोपेगेंडा रचा हैं वह यह कि भगवान महावीर और बुद्ध के समय वर्ण व्यवस्था का जिक्र नहीं हैं। 🤣 लेकिन यहां अगर हम कल्पसूत्र पढ़े, रचना भद्रबाहु स्वामी ने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी (लगभग 150-170 वर्ष महावीर के निर्वाण के बाद)
इस ग्रंथ की प्रमाणिकता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण साक्ष्य मथुरा के कंकाली टीले से प्राप्त शिलालेखों में मिलता है। कल्पसूत्र के स्थविरावली भाग में जैन संघ के जिन गणों, कुलों और शाखाओं का वर्णन किया गया है, ठीक वही नाम ईस्वी सन् की शुरुआती शताब्दियों (पहली और दूसरी सदी) के मथुरा के शिलालेखों में खुदे हुए मिले हैं। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि कल्पसूत्र में दर्ज वंशावली और ऐतिहासिक विवरण महज कल्पना नहीं, बल्कि एक जीवंत और संगठित परंपरा का हिस्सा थे।
जहां तक इसके सबसे प्राचीन भौतिक अवशेषों या प्रतियों का सवाल है, तो कल्पसूत्र को लिखित रूप में अंतिम बार वल्लभी की जैन सभा (लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी) में संकलित और लिपिबद्ध किया गया था। आज हमें जो हस्तलिखित प्रतियां मिलती हैं, उनमें से कुछ 10वीं से 12वीं शताब्दी तक पुरानी हैं। पश्चिमी भारत, विशेषकर गुजरात और राजस्थान के ज्ञान भंडारों में इसकी ऐसी अनेक प्राचीन प्रतियां सुरक्षित हैं, जो ताड़पत्रों और बाद में कागज पर लिखी गई हैं।
इस ग्रंथ में भगवान महावीर का जन्म वृत्तान्त दिया गया हैं। जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुसार, भगवान महावीर का जीव सबसे पहले एक ब्राह्मण परिवार में, देवानंदा नाम की महिला के गर्भ में आया था। लेकिन जैन शास्त्रों में यह मान्यता है कि कोई भी तीर्थंकर कभी भी किसी निम्न या गैर-राजवंशीय कुल में जन्म नहीं ले सकता उनका जन्म हमेशा एक प्रतापी क्षत्रिय कुल में ही होना चाहिए। जब इंद्र देवों के राजा ने देखा कि महावीर स्वामी का जीव एक ब्राह्मण महिला के गर्भ में है, तो उन्होंने अपने सेनापति हरिणगमेषी को आदेश दिया कि इस गर्भ को बदल दिया जाए।
इसके बाद हरिणगमेषी ने देवानंदा के गर्भ से उस जीव को निकालकर क्षत्रिय रानी त्रिशला के गर्भ में स्थापित कर दिया, और रानी त्रिशला के गर्भ को देवानंदा के गर्भ में रख दिया। यही कारण है कि कल्पसूत्र में शुरुआती वर्णन में उन्हें ब्राह्मण-कुंडग्राम और ऋषभदत्त-देवानंदा की संतान बताया गया है, लेकिन उनका जन्म राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ हुआ, जो इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय थे। इसीलिए इतिहास और परंपरा में उन्हें क्षत्रिय ही कहा जाता है।
अब इस संदर्भ से एक बात स्पष्ट होती हैं। भगवान महावीर का सम्बन्ध दोनों कुल से था ब्राह्मण कुल और फिर क्षत्रिय कुल।।।।
और यह पोस्ट चोर कह रहा हैं उस समय वर्ण व्यवस्था नहीं थी ? तो यह ब्राह्मण और क्षत्रिय कौन थे ? 🤔🤔 अब यह मत बोल देना यह बौद्ध धर्म विद्वानों की उपाधि थी ब्राह्मण .. क्यों कि अगर ऐसा दावों करोगे तो यह ग्रंथ तुम इतिहास चोरों को कही मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगा। इस लिए पोस्ट चोरी कर के इतिहासकार ना बनो पढ़ो और तब जितना बड़ा दावा करना है करो ... बेशर्म भ्रांति कुमार ...



Kranti Kumar@KraantiKumar
जैसे भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे. उसी तरह भगवान बुद्ध बौद्ध भी धर्म के 28वें बुद्ध थे. बौद्ध धर्म की तरह जैन धर्म भी भारत का प्राचीन धर्म है. भगवान बुद्ध और भगवान महावीर दोनों समकालीन थे. दोनों का धार्मिक कार्य क्षेत्र पूर्वी यूपी का गंगा मैदान और बिहार में बिता. भगवान महावीर गांव गांव जाकर अहिंसा, सत्य और संयम का संदेश देते. जैन धर्म में जाति वर्ण व्यवस्था का उल्लेख नही है. जैन धर्म में जात पात नही है. भगवान महावीर जयंती के अवसर पर सभी साथियों को शुभकामनाएं.
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आज बात होगी उस महान सम्राट की, जिसके नाम का इस्तेमाल तो सब करते हैं, लेकिन जिसके विचारों को आज उन्हीं के तथाकथित वंशजों ने सबसे ज्यादा पैरों तले रौंदा है। मैं बात कर रहा हूँ चक्रवर्ती सम्राट अशोक की।
आजकल सोशल मीडिया पर एक अजीब सी लहर चल रही है। कुछ लोग खुद को सम्राट अशोक का वारिस बताते हैं और फिर उसी जुबान से ब्राह्मणों के प्रति जहर उगलते हैं, अभद्रता करते हैं और घृणा फैलाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गिरनार के उन पत्थरों को पढ़ने की जहमत उठाई है, जिन पर सम्राट ने अपने विचार खुदवाए थे? अगर आप गिरनार अभिलेख (विशेषकर शिलालेख ९ और ४) को ध्यान से पढ़ें, तो आपको पता चलेगा कि सम्राट अशोक आज की इस नफरत भरी मानसिकता से कितने आहत थे।
अशोक ने अपने अभिलेखों में स्पष्ट रूप से 'धम्म' की व्याख्या करते हुए लिखा है:
Bramana-Samananam sampatipati (ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति उचित व्यवहार/सम्मान)
सम्राट ने यह स्वीकार किया था कि उनसे पहले के समय में भी समाज में इन विद्वानों और तपस्वियों के प्रति अभद्रता और अनादर की स्थिति रही थी, जिसे देखकर उन्हें पीड़ा हुई। इसीलिए उन्होंने शासन संभालते ही इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया कि समाज में शांति और सुव्यवस्था तभी बनी रह सकती है जब लोग ब्राह्मणों और श्रमणों का समान रूप से सम्मान करें। सम्राट कितने दूरदर्शी थे! वे जानते थे कि बौद्धिक और आध्यात्मिक चेतना के इन दो स्तंभों के बिना राष्ट्र का पतन निश्चित है।
मगर आज की परिस्थिति देखिए। खुद को सम्राट का रक्त बताने वाले कुछ लोग आज ब्राह्मणों को अपमानित करना अपना धर्म समझ बैठे हैं। इसे ही कहते हैं ऐतिहासिक विकृतिकरण। जिन लोगों का किसी भी प्रामाणिक अभिलेख या इतिहास के पन्ने में वंशज के तौर पर उल्लेख तक नहीं मिलता, वे आज नकली पहचान ओढ़कर असली इतिहास पर अतिक्रमण कर रहे हैं। सोचिए, अगर वाकई उनकी रगों में मौर्य वंश का महान रक्त होता, तो क्या वे अपने पूर्वज के सबसे बुनियादी आदेश सम्मान की धज्जियां उड़ाते? असली वारिस वह होता है जो विचारों को आगे बढ़ाए, न कि वह जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए इतिहास के पन्नों को ही फाड़ दे।
सत्य तो यह है कि जिनका अपना कोई गौरवशाली इतिहास नहीं होता, वे दूसरों के इतिहास पर 'मूर्ख तांडव' करते हैं। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने जिस अखंड भारत की नींव रखी और सम्राट अशोक ने जिस नैतिक सत्ता को संभाला, उसका मूल संदेश ही सर्वधर्म समभाव और पारस्परिक सम्मान था। आप किसी का अपमान करके अपना सम्मान कभी नहीं पा सकते।
नकली वाले तो खैर थेथर हैं, उन्हें समझाना मुश्किल है, लेकिन जो वास्तविक हैं वो क्यों अपनी ही जड़ों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं, उन्हें जागने की जरूरत है। मौर्यवश परस्पर सम्मान और सहयोग पर टिका साम्राज्य था नफ़रत अगर सर पर चढ़ जाए तो सामने वाले से ज्यादा पहले खुद को बर्बाद कर देती हैं। जय हो सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की और उसकी विरासत पर सत्ता पाने वाले सम्राट अशोक की ! 🙏🚩🚩


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देखिये भाई मुंह खोलने से पहले होमवर्क कर लिया करे आप जो बोल रहे हैं वह सरासर झूठ हैं।, मोहनजोदड़ो के उस ऊंचे टीले पर जो स्तूप खड़ा है, उसे लेकर आपलोगों में ये जो भ्रम रहता है कि वो भी उतना ही पुराना होगा जितनी पुरानी वो पूरी सभ्यता है तो पुरातत्व विभाग की खुदाई और वहां से मिले सबूतों ने इस बात को बहुत पहले ही साफ कर दिया था कि ये निर्माण दूसरी शताब्दी यानी कुषाण काल का है।
सबसे बड़ा और पक्का सबूत तो वो सिक्के हैं जो वहां खुदाई के दौरान मिले। ये सिक्के कुषाण राजा हुविष्क के समय के हैं। अब आप खुद सोचिए कि अगर ये स्तूप हज़ारों साल पुराना होता, तो इसके अंदर दूसरी शताब्दी के राजा के सिक्के कैसे मिलते? सिक्के कभी झूठ नहीं बोलते और वे इस बात की सीधी गवाही देते हैं कि ये निर्माण हुविष्क के शासनकाल के दौरान या उसके आसपास हुआ था।
दूसरी अहम बात है इसे बनाने की जगह और इसकी बनावट। ये स्तूप सिंधु घाटी के उन घरों के मलबे के ठीक ऊपर बना है जो पहले ही पूरी तरह खंडहर हो चुके थे। इसे पुरातत्व की भाषा में स्तर-विज्ञान कहते हैं, जहाँ पुरानी सभ्यता के ऊपर नई परत का होना ये बताता है कि दोनों के बीच एक बहुत लंबा समय बीत चुका था। सिंधु घाटी की वो मशहूर पक्की ईंटें और इस स्तूप में इस्तेमाल हुई कच्ची ईंटों के बीच जमीन-आसमान का फर्क है। उस समय जो गांधार शैली की वास्तुकला चल रही थी, उसकी साफ झलक इस स्तूप और इसके पास बने मठ के कमरों में दिखाई देती है।
रही बात इसे और ज्यादा प्राचीन या सम्राट अशोक के समय का मानने की, तो वहां ऐसा कोई सबूत नहीं मिला। अशोक के समय की जो खास पहचान थी, जैसे उनकी पॉलिशदार पत्थर की कला या उनकी लिपि वाले स्तंभ, वैसा वहां कुछ भी नहीं है। वहां बुद्ध की जो मूर्तियां या कला के अवशेष मिले हैं, वे पूरी तरह से कुषाण कालीन गांधार शैली के हैं। तो कुल मिलाकर सिक्के, मिट्टी की परतें और ये खास बनावट ये सब मिलकर ये साबित कर देते हैं कि ये स्तूप दूसरी शताब्दी का ही है। ये किसी प्राचीन सभ्यता का हिस्सा नहीं है, बल्कि उसके अवशेषों को एक चबूतरे की तरह इस्तेमाल करके बनाया गया एक बाद का धार्मिक केंद्र है।
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@dromsudhaa कहा का जाना माना इतिहासकार हैं राजेंद्र प्रसाद ... थोड़ा बताना ? 🤣🤣
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हमारे आराध्य हमारे आदर्श हमारे प्रभु श्री राम चंद्र जी को बारम्बार नमन ..
"नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्।
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥
जिनका शरीर नीलकमल के समान श्याम वर्ण और कोमल है, जिनके वाम भाग (बाईं ओर) साक्षात् भगवती सीता जी विराजमान हैं, जिनके हाथों में अमोघ बाण और सुंदर धनुष है, उन रघुकुल के स्वामी भगवान श्री राम को मैं नमस्कार करता हूँ।
श्रीराम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं!
जय श्रीराम 🚩🚩🙏🙏

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मतलब अगर धर्मांतरण के बाद भी तुम्हारा शोषण धर्मांतरित समुदाय में हो रहा हैं 😂😂 मतबल बौद्ध होने से भी कोई फायदा नहीं और और ईसाई बन कर भी कोई फायदा नहीं हर जगह हर धर्म में लोग तुम्हारे साथ भेद भाव ही कर रहे हैं। जातिविहीन समाज और धर्म में जा कर भी तुम अपनी जाति का त्याग नहीं करना चाहते तो, असल में जातिवाद तुम्हारे अंदर भरा हैं खुद का मूल्यांकन करो। कोर्ट ने बिल्कुल सही निर्णय लिया हैं ... इसका अनुपालन होना चाहिए।
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This is probably the best answer I've ever heard to the question, "Why did God create evil?"
A professor at the university asked his students the following question:
“Everything that exists was created by God?”
One student bravely answered:
“Yes, it was created by God.”
The professor asked :
“If God created everything, then God created evil, since it exists. And according to the principle that our deeds define ourselves, then God is evil.”
The student became silent after hearing such an answer. The professor was very pleased with himself. He boasted to students for proving once again that faith in God is a myth.
Another student raised his hand and said:
“Can I ask you a question, professor?”
"Of course," replied the professor.
“Professor, is cold a thing?”
“What kind of question is this? Of course it exists. Have you ever been cold?”
Students laughed at the young man's question.
The young man answered:
“Actually, sir, cold doesn't exist. According to the laws of physics, what we consider cold is actually the absence of heat. A person or object can be studied on whether it has or transmits energy.
Absolute zero (-460 degrees Fahrenheit) is a complete absence of heat. All matter becomes inert and unable to react at this temperature. Cold does not exist. We created this word to describe what we feel in the absence of heat.”
The student continued:
“Professor, does darkness exist?”
“Of course it exists.” said the professor.
“You're wrong again, sir. Darkness also does not exist. Darkness is actually the absence of light. We can study the light but not the darkness. We can use Newton's prism to spread white light across multiple colors and explore the different wavelengths of each color. You can't measure darkness. A simple ray of light can break into the world of darkness and illuminate it. How can you tell how dark a certain space is? You measure how much light is presented. Isn't it so? Darkness is a term man uses to describe what happens in the absence of light.”
In the end, the young man asked the professor:
“Sir, does evil exist?”
This time it was uncertain, the professor answered:
“Of course, as I said before. We see him every day. Cruelty, numerous crimes and violence throughout the world. These examples are nothing but a manifestation of evil.”
To this, the student answered:
“Evil does not exist, sir, or at least it does not exist for itself. Evil is simply the absence of God. It is like darkness and cold—a man-made word to describe the absence of God. God did not create evil. Evil is not faith or love, which exist as light and warmth. Evil is the result of the absence of Divine love in the human heart. It’s the kind of cold that comes when there is no heat, or the kind of darkness that comes when there’s no light.”
🙏🏻❤️🙏🏻
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क्या सम्राट अशोक के समय जाति व्यवस्था (Caste System) थी या नहीं? 🤔🚩
अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि प्राचीन भारत में जातियां थीं या नहीं। हाल ही में एक कॉलर ने दावा किया कि अशोक के समय जातियां बिल्कुल नहीं होती थीं। लेकिन जब हमने भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण और उनकी अस्थियों के बंटवारे से जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्यों (Historical Evidence) पर बात की, तो सच्चाई कुछ और ही निकली! 📚✨
इतिहास को तथ्यों के साथ समझना जरूरी है, सुनी-सुनाई बातों से नहीं। इस दमदार बहस में देखें कि कैसे ऐतिहासिक प्रमाणों के सामने झूठे दावों का पर्दाफाश हुआ और कॉलर को अपनी गलती मानकर माफी मांगनी पड़ी।
सच्चा इतिहास जानने के लिए यह पूरी डिबेट जरूर देखें! 👇
🎥 वीडियो लिंक: youtu.be/Sdty9DNvBqM
आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं? कमेंट्स में अपनी राय जरूर बताएं! 💬👇
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@manishagandhii लेकिन अपने भाई देवदत्त के समय सुधार काम नहीं आया खुद का घर नहीं सम्हाला मगर पूरा मोहल्ला सुधारने का दावा किया गया ! शाक्यों ने राजा प्रसेनजीत के साथ रक्त शुद्धता के नाम पर भेद भाव किया बुद्ध उनको भी नहीं सुधार पाए मगर अंगुलिमाल को जरूर सुधार दिए थे ! कितनी शानदार कहानी हैं।
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