Lokendra Singh Kilanaut

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साधो, ये धोरों का देश @DainikBhaskar की मासिक पत्रिका "अहा! जिंदगी" के जनवरी अंक में प्रकाशित मेरा यह लेख राजस्थान की मांड गायिकी और अल्लाह जिलाई बाई के अनछुए पहलुओं की रोचक पड़ताल करता है। आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है 🙏 #राजस्थान #पधारो_म्हारे_देस
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इन्हीं भाईसाब टाइप नेताओं ने पिछले युवा मोर्चा अध्यक्ष अंकित चेची को टीम नहीं बनाने दी थी। कारण ये था कि अंकित एक बहुत बड़े भाईसाब को खटक रहा था। उसमें भी अंकित चेची की जिद थी कि वह टीम बनायेगा तो खुद की बनाएगा और वो टीम बनायेगा जिसके साथ वह कंफर्ट है। नतीजा ये हुआ कि अंकित की टीम 58 मिनट तक टिक सकी। वैसे, अंकित चेची की एंट्री बहुत धमाकेदार थी और जिस दिन युवा मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष पद का कार्यभार ग्रहण किया उसी दिन अंकित चेची के एक बड़ा कांड कर दिया था। बिना सूचना और प्लान के अंकित की टीम के कोई 35/40 लड़कों ने भीलवाड़ा में हुए तोला गुर्जर बलात्कार कांड का विरोध करते हुए मुख्यमंत्री आवास घेर लिया था। ऐसे किसी प्रदर्शन की पहले कोई सूचना नहीं थी और कोई पुलिस जाब्ता भी मौजूद नहीं था इस कारण ये लड़के मुख्यमंत्री निवास के गेट के ठीक सामने तक पहुंच गए थे। जब वायरलेस हुआ तो अचानक से पूरा सिस्टम हिल गया और IPS कुंवर राष्ट्रदीप ने इन लड़कों की जबरदस्त पिटाई की थी। इस प्रदर्शन ने अंकित की ओपनिंग को ग्रैंड कर दिया लेकिन मैंने उसी दिन कहा था कि अब कुछ भाईसाब अंकित चेची को काम नहीं करने देंगे। और फिर अंकित चेची भाईसाबों से उकता ही गया था। लेकिन शंकर गोरा इसके ठीक उलट है। क्योंकि गोरा जी का लेटर पेड़ पहले से ही एक भाईसाब के पास रखा हुआ है। गोरा जी डिसीजन मेकिंग में उतने ही अध्यक्ष हैं जितना टूथपेस्ट में नमक...
Nirmal Pareek@nirmal_pareek93

राजस्थान भाजपा में युवा मोर्चा जिसे हरावल दस्ता भी कहते थे, उसकी नई टीम आने वाली है लेकिन बताया जा रहा है कि सूची में कई ऐसे चेहरे हैं जिन पर घमासान होना तय है! तमाम आपत्तियों और विरोध के बावजूद बताया जा रहा है उन नामों को हरी झंडी मिल चुकी है, वहीं कई सांगठनिक रगड़ाई वाले चेहरे भाई साबों के यहां कल से चक्कर लगा रहे हैं! #Rajasthan

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गुर्जरों ने रेल और रैबारियों ने "रानी" को रोक दिया _______________________________ 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले वसुंधरा राजे की "विजय संकल्प यात्रा" का रथ राजस्थान नाप रहा था। मारवाड़ में सामराउ कांड के जख्म हरे थे और शेरगढ़ में राजपूतों ने विरोध कर दिया। यात्रा के तमाम प्रबंध पुष्पेन्द्र सिंह राणावत और बाबू सिंह राठौड़ के हाथों में थे इस कारण से बात संभाल ली गई। लेकिन अगले दिन यात्रा पाली पहुंचनी थी। कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने 2006 में ही गुर्जर आरक्षण की मशाल जला डाली थी और रेल रोकने का ऐतिहासिक आंदोलन देश में हुआ। गुर्जरों ने बहुत बार रेल के पहिए थामकर रख दिए लेकिन रानी के रथ का पहिया कभी नहीं रोका। इसी आंदोलन में फिर कुछ नए मुद्दे जुड़ते गए और MBC नाम का नया वर्ग वजूद में आया। गुर्जरों में असंतोष तो था ही लेकिन मारवाड़ में देवासी मचल गए। रानी का रथ पाली पहुंचने के लिए तैयार खड़ा था लेकिन वहां देवासी समाज की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने अपनी पांच मांगो के लिए रानी के रथ को रोकने का ऐलान कर दिया। और इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का चेहरा एक बाईस साल का नौजवान लड़का था जिसका नाम गणेश देवासी था। ऐलान साफ था कि या तो उनकी पांच मांगो को मान लिया जाए वरना रानी के रथ को पाली में नहीं आने दिया जाएगा। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भर ने सरकार के माथे पर शिकन पैदा कर दी। रातोंरात पांच लोगों के प्रतिनिधि मंडल को बात करने के लिए बुलाया गया। गनीमत थी कि गुर्जरों के नेता कर्नल बैंसला अपने 72 आंदोलनकारी साथियों की अर्थी को कंधा देने के बाद रानी से बात करके पहुंचे थे लेकिन पाली में देवासीयों ने ठीक वक्त पर ठीक नब्ज़ को दबा लिया और सरकार बातचीत की टेबल पर खींची चली आई। बातचीत में समाधान निकला और मांग स्वीकार हुई क्योंकि चुनाव के मुहाने पर खड़ा रानी के रथ का पहिया पाली में फंसा हुआ था। इस पूरे घटनाक्रम का नेतृत्व मेरे मित्र गणेश देवासी ने किया था जिसकी उम्र उस वक्त सिर्फ बाईस साल की थी। देवासी समाज के लिए वह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस माइलस्टोन का काम कर गई और अगली RAS भर्ती में प्रजातंत्र की स्थापना के बाद कोई पहला SDM देवासी समाज को मिला। और इसी आंदोलन ने एक अच्छे नेता को तैयार किया जिसका नाम गणेश देवासी है। यह सब घटना मेरी आंखों के सामने का वाकया है। भाई गणेश देवासी अब राजस्थान यूथ कांग्रेस के चुनाव में महासचिव पद के लिए दावा ठोक रहा है। ना कोई धनबल है, जातीय वर्चस्व देवासी जाति का कितना है यह बात तो हम सब जानते ही हैं। लेकिन गणेश को रानी के रथ रोकने का तजुर्बा है और इससे ज्यादा उसके पास कुछ है नहीं... भाई को शुभकामनाएं इस बार किसी का रथ रोकना नहीं बल्कि खुद का रथ दौड़ना है 🌻💥
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अवधेश जी, युवा मोर्चा की बात चली है तो एक बढ़िया ट्रैक रिकॉर्ड बता देता हूँ। युवा मोर्चा के अध्यक्ष जी ने 2014 में यूनिवर्सिटी का चुनाव लड़ा। उससे पहले मनीष यादव, राजेश मीणा और कान्हाराम जाट लगातार ABVP के तीन अध्यक्ष बने। लेकिन 2014 के बाद अध्यक्ष जी ने संगठन की ऐसी बत्ती लगाई कि अब तक ABVP का अध्यक्ष नहीं बन पाया है। आखिर अध्यक्ष जी ऐसी क्या करामात कर आए थे कि संगठन और संगठन का कैडर यूनिवर्सिटी में पाताल तक धंस चुका है। मजेदार बात ये है कि उस वक्त के ABVP के संगठन मंत्री और छात्रसंघ अध्यक्ष पद के प्रत्यासी दोनों पांचों उंगली घी में डुबोए हुए हैं। बीजेपी की चॉइस इंट्रेस्टिंग है
Avdhesh@Zinda_Avdhesh

राजस्थान भाजपा युवा मोर्चा की संभावित टीम - • राकेश यादव • राजवीर बांता • रुघनाथ बिश्नोई • रोशनी शर्मा • शौर्य जैमन • सुदर्शन गौतम • नरेंद्र शर्मा • राकेश कटराथल • होशियार मीणा • ऋषि मीणा #Rajasthan

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"आपणो अग्रणी राजस्थान" में बाकी सब चंगा है लेकिन पगड़ी तो राजस्थानी लगाई जा सकती थी। @BhajanlalBjp जी PR टीम में इतना विवेक तो होना चाहिए कि पंजाबी पगड़ी कौनसी हुई और राजस्थानी कौनसी ?
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𝐃𝐄𝐄𝐏𝐀𝐊 𝐁𝐈𝐒𝐇𝐍𝐎𝐈 𝐈𝐍𝐂🇮🇳
परिवर्तन की मशाल लेकर, युवा शक्ति के साथ!!✌️ चौहटन विधानसभा क्षेत्र की प्रगति और युवाओं की आवाज़ को मजबूती देने के लिए मैं दीपाराम (दीपक ढाका) सदैव तत्पर हूँ। राजनीति मेरे लिए सेवा का माध्यम है और आपका साथ मेरी असली ताकत। आइए, इस अभियान से जुड़ें और एक सशक्त भविष्य की नींव रखें। 📍 पद: विधानसभा अध्यक्ष प्रत्याशी (युवा कांग्रेस), चौहटन 📞 संपर्क: 7357803192
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तुम्हारी बज्म के बाहर भी एक दुनिया है मेरे हुजूर बड़ा जुल्म है ये बेखबरी आज का दिन राजस्थान यूनिवर्सिटी में दो विचारधाराओं के भीषण टकराव का दिन था। मैं इस पूरी वैचारिक मुठभेड़ का चश्मदीद था। पुलिस, मीडिया, इंटेलिजेंस से लेकर तमाम तामझाम इसलिए कि NSUI वालों का विरोध हो जाए और RSS वालों का कार्यक्रम हो जाए। दो घंटे में ये टंटा भी खत्म हो गया। लेकिन महज दो सौ मीटर की दूरी पर ही यूनिवर्सिटी के दो छात्र पूजा और लोकेंद्र बीते पांच दिन से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। वे किसी विचारधारा का विरोध और समर्थन करने के लिए नहीं बैठे बल्कि अपनी भाषा के लिए बैठे हैं। उनकी मांग है कि राजस्थान यूनिवर्सिटी में राजस्थान भाषा का डिपार्टमेंट बनाया जाए। जब यूनिवर्सिटी उर्दू, अंग्रेजी, अफ्रीकन, जर्मन भाषाओं के विभाग को वित्त स्वीकृति दे रही है तो राजस्थानी भाषा से सौतेला व्यवहार क्यों ? अफसोस देखिए कि अब तक भूखों मरने वाले इन दो आंदोलनकारी छात्रों के पास कोई नहीं पहुंचा। NSUI का लश्कर आया, RSS की फ़ौज आई और सब अपने सिक्के सीधे करके चले गए। पुलिस बैरिकेटिंग से महज 200 मीटर की ही दूरी पर ये दोनों छात्र बैठे हैं। अब तक यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर ने इनकी कोई खैर खबर नहीं ली है, तीन दिन तक इनकी मेडिकल रिपोर्ट नहीं बन पाई, एक अनशनकारी का शुगर लेवल हाई आ रहा है और उसकी हालत कभी भी गंभीर हो सकती है। लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन से लेकर सरकार की कान पर अब तक जूं नहीं रेंगी है। आज छात्र हितों का दंभ भरने वाले NSUI के कितने रंगरूट इन अनशनकारियों के पास पहुंचें ? और महिला सशक्तिकरण की थीम पर इवेंट करने वाले RSS के कितने स्वयंसेवक उस लड़की की खबर लेने पहुंचे जो बीते पांच दिन में अपना पांच किलो वजन खत्म कर चुकी है। NSUI की एक धमकी से आज भारी पुलिस लवाजमा यूनिवर्सिटी पहुंच गया लेकिन दो छात्रों को सरकार ने सिर्फ मरने के लिए छोड़ दिया। क्या सिर्फ इसलिए कि उन्हें धमकी देना नहीं आता ? उनके पास भीड़ और गाड़ियां नहीं है या फिर इसलिए कि ये दोनों छात्र तमाम विचारधाराओं को छोड़कर एक जायज और जरूरी मुद्दे पर गांधीवादी तरीके से आंदोलन का रास्ता अख्तियार किए हुए हैं। @BhajanlalBjp @KumariDiya @GovindDotasra @TikaRamJullyINC @VinodJakharIN @nsui
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How Rajasthan Influenced Bangal - 2 बंगाल में चैत्र मेले का आयोजन हुआ करता था लेकिन राष्ट्रवादी भावनाएं जब बलवती हुई तो यही चैत्र मेला हिंदू मेला बन गया। इस हिंदू मेले में स्वदेशी वस्तु और स्वदेशी साहित्य का प्रदर्शन किया जाता था। लेकिन स्वदेशी साहित्य के नाम पर बंगाल में सिर्फ वह साहित्य मौजूद था जिसकी विषय वस्तु राजस्थान के इतिहास से प्रेरित थी। एक तरह से कहूं तो साहित्य के नाम पर इस हिंदू मेले में राजस्थान के इतिहास की धूम हुआ करती थी। इसी मेले में माइकल मधुसूदन दत्त के नाटक "कृष्णाकुमारी" और "पद्मिनी" का मंचन हुआ था। बंगाल का ऐसा कोई क्रांतिकारी और बुद्धिजीवी नहीं था जो हिंदू मेले में शिरकत नहीं करता था। और इसी मेले में रविन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर का राजस्थान के इतिहास से राब्ता हुआ। ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर को प्रेरणा मिली कि अब उन्हें भी राष्ट्रवादी साहित्य लिखना चाहिए लेकिन माइकल मधुसूदन दत्त के कृष्णाकुमारी नाटक से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भी नाटक लिखने का निश्चय कर लिया। लेकिन विषयवस्तु क्या हो ? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए उन्होंने भी कर्नल टॉड के ग्रंथ को पढ़ डाला और फिर एक ऐतिहासिक नाटक लिखा "सरोजनी" सरोजनी नाटक की विषयवस्तु भी मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णाकुमारी की कहानी ही थी। लेकिन ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर ने इस नाटक में एक नया प्रयोग किया और राजपूत स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले जौहर को बहुत ही मार्मिक ढंग से लिख दिया। पहली बार जब इस नाटक का मंचन हुआ तो एक बड़ा तमाशा हो गया। जब मंच पर जौहर का मंचन किया जा रहा था तो दर्शक भावुक होकर कुर्सियों से खड़े हुए और जौहर में जलती नायिका को बचाने मंच पर पहुंच गए। यह नाटक इतना लोकप्रिय हुआ कि तब बंगाल की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री विनोदिनी इसका मंचन करने लगी थी। एक तथ्य यह भी है कि इस नाटक के अंतिम दृश्य में जलती हुई चिता के सम्मुख स्त्रियां आत्मा हुति देने के लिए जिस गीत को बार - बार गाती हैं, वह विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा था। वह गीत इस प्रकार है - जल - जल चिता, द्विगुन द्विगुन परान सौंपिबे विधवा बाला। जलूक - जलूक चितार आगुन, जुड़ाब एखनि प्रणेर ज्वाला। जब रवींद्रनाथ टैगोर विलायत गए तो उनके भाई ज्योतिंद्रनाथ ने उन्हें यही कृति उपहार में दी थी। खैर, ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर ने कुछ समय बाद ही एक दूसरा नाटक लिखा " अश्रुमति" उनकी इस कृति की विषयवस्तु हल्दीघाटी से ली गई। लेकिन ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर से यहां एक बडी चूक हो गई। इस नाटक में एक तरफ उन्होंने महाराणा प्रताप की वीरता का वर्णन किया लेकिन दूसरी तरफ अश्रुमति नाम से महाराणा प्रताप की बेटी का एक काल्पनिक पात्र परोसा दिया। कहानी को रोमांटिक बनाने के लिए ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर ने अश्रुमति और सलीम के प्रेम प्रसंग की कहानी लिख मारी। यह सब जानकार बंगाली समाज ने ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर का विरोध कर दिया और इस हद तक विरोध किया कि ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर को बार - बार माफी मांगनी पड़ी। कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "भारत मित्र" के संपादक बाबू बालमुकुंद गुप्त ने अपने संपादकीय में ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर को तेज फटकार लगाई और माफी मांगने को कहा। गुप्त जी ने उसके बाद ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर को निजी पत्र लिखकर भेजा कि - हिंदू लोग महाराणा प्रताप की बड़ी इज्जत करते हैं, सबेरे उठकर उनका नाम स्मरण करते हैं, उनका उज्वल यश श्रद्धा से गाते आए हैं। उसे सुनकर इस गिरी दशा (अंग्रेजों की पराधीनता) में भी भारतीयों का हृदय स्फीत हो जाता है। इस पत्र के जवाब में ज्योतिंद्रनाथ ने गुप्त जी को लिखा - "महाराणा प्रताप को मैं अपना आराध्य मानता हूं और देवता की भांति उनके प्रति श्रद्धानत हूँ। उनके चरित्र के इस उज्ज्वल पक्ष को बंगाली समाज के समक्ष रखना ही मेरा उद्देश्य था और अश्रुमति नाम से महाराणा प्रताप की कोई कन्या नहीं थी। घटनाओं की प्रतिध्वनियां लौटकर आती हैं। राजस्थान में एक दौर था जब राजस्थान के इतिहास को लेकर भावनात्मक लोग अपने नायकों को सिनेमा में गलत तरीके से प्रदर्शित करने के कारण फिल्मों का विरोध करते हुए सड़कों पर दिखाई देते थे। लेकिन यह काम बंगाली समाज ने शायद राजस्थान से पहले कर दिया। उन्होंने बंगाली समाज ने ज्योतिंद्रनाथ ठाकुर का बहुत विरोध किया। क्योंकि बंगाली समाज राजस्थान के इतिहास के नायकों के लिए बहुत ही भावुक और श्रद्धानत था। (बंगाल के राष्ट्रवाद के राजस्थान के योगदान को समझने के लिए, लगातार बने रहिए।) ~ लोकेन्द्रसिंह किलाणौत
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How Rajasthan influenced Bangal 19 वीं सदी के उत्तरार्ध का काल और बंगाली साहित्य पर बंकिम चंद्र चटर्जी का एकतरफा वर्चस्व। इसी काल में उपन्यासों के मोर्चे पर बंकिम चंद्र थे तो दूसरा मोर्चा माइकल मधुसूदन दत्त ने अपने नाटकों से खोल दिया। बंगाली समाज को नाटक देखने का चाव तो पहले से लग गया था। लेकिन ये नाटक कुलीन बंगाली समाज तक पहुंच बना सके थे। एक तरफ बंकिम चंद्र आम जन के लेखक स्थापित हो चुके थे वहीं दूसरी तरफ नाटकों की विषयवस्तु से कुलीन बंगाली समाज एक तरह से ऊब रहा था क्योंकि थियेटर के मंच पर शेक्सपियर, जॉर्ज बर्नार्ड शो के अलावा कुछ गिने चुने संस्कृत नाटक ही थे। इसी समय माइकल मधुसूदन दत्त जो सिर्फ अंग्रेजी भाषा पर एकाधिकार रखते थे, ने नाटकों में रुचि लेना शुरू किया। माइकल मधुसूदन खालिस अंग्रेजी मिजाज के शख्स थे। ईसाई युवती से प्रेम किया और हिंदू से ईसाई बन गए। इस कारण हिन्दू कॉलेज भी छोड़ दिया और बिशप कॉलेज में पहुंच गए। बैरिस्टरी करने लंदन गए और वापस वतन लौट आए। दूसरी शादी एक फ्रांसीसी महिला से करी और फिर ग्रीक साहित्य में रम गए। अंग्रेजी, हिब्रू, जर्मन जैसी तमाम विदेशी भाषाएं माइकल मधुसूदन दत्त ने सीख ली लेकिन उन्हें बंगाली भाषा अब भी नहीं आती थी। इसी दरमियान माइकल मधुसूदन दत्त की मुलाकात केशवचंद्र सेन से हुई और केशवचंद्र सेन ने उन्हें कर्नल जेम्स टॉड की "Annals and Antiquities of Rajast'han" पढ़ने की सलाह दी। केशवचंद्र सेन ने उन्हें कर्नल टॉड के इस महान ग्रन्थ को पढ़ने की सलाह इसलिए दी क्योंकि बंगाल के थियेटरों में घटिया नाटकों को देखकर एक दिन माइकल मधुसूदन दत्त ने ऐलान कर दिया कि अब वे अच्छे और बेहतरीन नाटक लिखेंगे। लेकिन इससे पहले उन्होंने बंगला भाषा सीखी। बंगला भाषा सीखकर माइकल मधुसूदन दत्त किसी नाटक के लिए विषयवस्तु की तलाश कर रहे थे। उन्होंने रजिया सुल्तान पर एक नाटक लिखने का निश्चय किया और काम शुरू भी कर दिया। तब केशवचंद्र सेन ने पत्र लिखकर कहा कि वे कर्नल टॉड के इस महान ग्रन्थ से राजस्थान के इतिहास से कोई वीरता की कहानी को चुनें जिससे कि राष्ट्रवादी विचारों को प्रोत्साहन मिले। मधुसूदन दत्त ने केशवचंद्र सेन की इस सलाह पर काम किया और बड़े ही इत्मीनान से कर्नल टॉड के ग्रंथ को पढ़ा। इस ग्रन्थ को पढ़ने के बाद उन्होंने एक नाटक लिखा - "कृष्णाकुमारी" यानि कि बंगाल के उपन्यासकार और कवियों की भांति ही राजस्थान के इतिहास की कहानियां बंगाली नाटककारों को भी राजस्थान तक खींच लाई। माइकल मधुसूदन दत्त के दो नाटक बंगाली साहित्य में सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए एक मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णाकुमारी पर लिखा गया उनका ऐतिहासिक नाटक और एक नाटक उन्होंने पद्मावती नाम से लिखा। पद्मावती नाम से ही बंगाल के दूसरे प्रसिद्ध नाटककार रंगलाल बंधोपाध्याय ने एक नाटक लिखा लेकिन माइकल मधुसूदन दत्त द्वारा लिखा गया पद्मावती नाटक उस दौर का सर्वश्रेष्ठ नाटक साबित हुआ। केशवचंद्र सेन और डॉ क्षेत्र गुप्त जैसे विद्वानों ने मधुसूदन दत्त के कृष्णाकुमारी नाटक को ही बंगाली भाषा का सर्वश्रेष्ठ नाटक कहा है। खुद मधुसूदन दत्त ने राजनरायन बसु को लिखे एक पत्र में लिखा - " I have been dramatizing writting, a regular tragedy in prose. The plot is taken from Jems Tod." सिर्फ माइकल मधुसूदन दत्त की क्यों ? उसके बाद तो तमाम बंगाली नाटककारों ने राजस्थान के इतिहास से विषय चुन - चुनकर नाटकों की झड़ी लगा दी। द्विजेंद्रपाल, क्षीरोप्रसाद जैसे विख्यात नाटककारों ने अपने बेहतरीन नाटकों के लिए कर्नल जेम्स टॉड के ग्रंथ से विषय उठा - उठाकर नाटकों की झड़ी लगा दी और इन राष्ट्रवादी नाटकों ने बंगाल के थियेटरों में राष्ट्रवाद को डटकर उतार दिया। इसलिए यह कहना समीचीन होगा कि कविता, उपन्यास और कहानियों के सहारे ही नहीं बल्कि नाटकों के विषयों में भी राजस्थान के इतिहास ने बंगाल में राष्ट्रवाद को पनपने में मार्ग प्रशस्त किया। ~ लोकेन्द्रसिंह किलाणौत नॉट - बंगाल में राष्ट्रवाद के पनपने के कारणों में राजस्थान के इतिहास क्या योगदान था, यह पढ़ने के लिए लगातार बने रहिए।
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Hemanshu Shekhawat (Happy Banna)
@crosschat_wala बहुत खूब लोकसा,अपने ज्ञान के भंडार से हम तक यह सब पहुंचाते रहे
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Adhiraj Singh Kotwad
Adhiraj Singh Kotwad@Adhirajrathore2·
Nowadays, while most of the young journalists and intellectuals want to maintain their credibility only through viral audio and video, there are dynamic journalists like @crosschat_wala who are touching those aspects of the society which were hitherto untouched. Kudos loksa!🙌
Lokendra Singh Kilanaut@crosschat_wala

How Rajasthan influenced Bangal 19 वीं सदी के उत्तरार्ध का काल और बंगाली साहित्य पर बंकिम चंद्र चटर्जी का एकतरफा वर्चस्व। इसी काल में उपन्यासों के मोर्चे पर बंकिम चंद्र थे तो दूसरा मोर्चा माइकल मधुसूदन दत्त ने अपने नाटकों से खोल दिया। बंगाली समाज को नाटक देखने का चाव तो पहले से लग गया था। लेकिन ये नाटक कुलीन बंगाली समाज तक पहुंच बना सके थे। एक तरफ बंकिम चंद्र आम जन के लेखक स्थापित हो चुके थे वहीं दूसरी तरफ नाटकों की विषयवस्तु से कुलीन बंगाली समाज एक तरह से ऊब रहा था क्योंकि थियेटर के मंच पर शेक्सपियर, जॉर्ज बर्नार्ड शो के अलावा कुछ गिने चुने संस्कृत नाटक ही थे। इसी समय माइकल मधुसूदन दत्त जो सिर्फ अंग्रेजी भाषा पर एकाधिकार रखते थे, ने नाटकों में रुचि लेना शुरू किया। माइकल मधुसूदन खालिस अंग्रेजी मिजाज के शख्स थे। ईसाई युवती से प्रेम किया और हिंदू से ईसाई बन गए। इस कारण हिन्दू कॉलेज भी छोड़ दिया और बिशप कॉलेज में पहुंच गए। बैरिस्टरी करने लंदन गए और वापस वतन लौट आए। दूसरी शादी एक फ्रांसीसी महिला से करी और फिर ग्रीक साहित्य में रम गए। अंग्रेजी, हिब्रू, जर्मन जैसी तमाम विदेशी भाषाएं माइकल मधुसूदन दत्त ने सीख ली लेकिन उन्हें बंगाली भाषा अब भी नहीं आती थी। इसी दरमियान माइकल मधुसूदन दत्त की मुलाकात केशवचंद्र सेन से हुई और केशवचंद्र सेन ने उन्हें कर्नल जेम्स टॉड की "Annals and Antiquities of Rajast'han" पढ़ने की सलाह दी। केशवचंद्र सेन ने उन्हें कर्नल टॉड के इस महान ग्रन्थ को पढ़ने की सलाह इसलिए दी क्योंकि बंगाल के थियेटरों में घटिया नाटकों को देखकर एक दिन माइकल मधुसूदन दत्त ने ऐलान कर दिया कि अब वे अच्छे और बेहतरीन नाटक लिखेंगे। लेकिन इससे पहले उन्होंने बंगला भाषा सीखी। बंगला भाषा सीखकर माइकल मधुसूदन दत्त किसी नाटक के लिए विषयवस्तु की तलाश कर रहे थे। उन्होंने रजिया सुल्तान पर एक नाटक लिखने का निश्चय किया और काम शुरू भी कर दिया। तब केशवचंद्र सेन ने पत्र लिखकर कहा कि वे कर्नल टॉड के इस महान ग्रन्थ से राजस्थान के इतिहास से कोई वीरता की कहानी को चुनें जिससे कि राष्ट्रवादी विचारों को प्रोत्साहन मिले। मधुसूदन दत्त ने केशवचंद्र सेन की इस सलाह पर काम किया और बड़े ही इत्मीनान से कर्नल टॉड के ग्रंथ को पढ़ा। इस ग्रन्थ को पढ़ने के बाद उन्होंने एक नाटक लिखा - "कृष्णाकुमारी" यानि कि बंगाल के उपन्यासकार और कवियों की भांति ही राजस्थान के इतिहास की कहानियां बंगाली नाटककारों को भी राजस्थान तक खींच लाई। माइकल मधुसूदन दत्त के दो नाटक बंगाली साहित्य में सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए एक मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णाकुमारी पर लिखा गया उनका ऐतिहासिक नाटक और एक नाटक उन्होंने पद्मावती नाम से लिखा। पद्मावती नाम से ही बंगाल के दूसरे प्रसिद्ध नाटककार रंगलाल बंधोपाध्याय ने एक नाटक लिखा लेकिन माइकल मधुसूदन दत्त द्वारा लिखा गया पद्मावती नाटक उस दौर का सर्वश्रेष्ठ नाटक साबित हुआ। केशवचंद्र सेन और डॉ क्षेत्र गुप्त जैसे विद्वानों ने मधुसूदन दत्त के कृष्णाकुमारी नाटक को ही बंगाली भाषा का सर्वश्रेष्ठ नाटक कहा है। खुद मधुसूदन दत्त ने राजनरायन बसु को लिखे एक पत्र में लिखा - " I have been dramatizing writting, a regular tragedy in prose. The plot is taken from Jems Tod." सिर्फ माइकल मधुसूदन दत्त की क्यों ? उसके बाद तो तमाम बंगाली नाटककारों ने राजस्थान के इतिहास से विषय चुन - चुनकर नाटकों की झड़ी लगा दी। द्विजेंद्रपाल, क्षीरोप्रसाद जैसे विख्यात नाटककारों ने अपने बेहतरीन नाटकों के लिए कर्नल जेम्स टॉड के ग्रंथ से विषय उठा - उठाकर नाटकों की झड़ी लगा दी और इन राष्ट्रवादी नाटकों ने बंगाल के थियेटरों में राष्ट्रवाद को डटकर उतार दिया। इसलिए यह कहना समीचीन होगा कि कविता, उपन्यास और कहानियों के सहारे ही नहीं बल्कि नाटकों के विषयों में भी राजस्थान के इतिहास ने बंगाल में राष्ट्रवाद को पनपने में मार्ग प्रशस्त किया। ~ लोकेन्द्रसिंह किलाणौत नॉट - बंगाल में राष्ट्रवाद के पनपने के कारणों में राजस्थान के इतिहास क्या योगदान था, यह पढ़ने के लिए लगातार बने रहिए।

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Lokendra Singh Kilanaut
Lokendra Singh Kilanaut@crosschat_wala·
यह मामला इतना फर्जी और प्रोपेगेंडा टाइप है कि मैं प्रतिक्रिया देना नहीं चाहता। यक़ीनन मैं रविन्द्रसिंह भाटी के राजनीतिक तौर तरीकों से असहमति रखता हूं लेकिन उलट देखा जाए तो छोटू सिंह रावना भी फ्रॉड टाइप बन्दा ही लगा मुझे। मामला दोनों का व्यक्तिगत था, घटना दो व्यक्तियों के बीच थी ना कि दो समाजों के बीच। इस घटना के किरदार दो व्यक्ति हैं ना कि दो समाज। फिर छोटू सिंह रावना खुद बलात्कार का आरोपी है तो उसकी ओट में मैं इस मुद्दे पर क्यों ही कोई प्रतिक्रिया दूं। घटना पर प्रतिक्रिया दी भी जा सकती थी लेकिन छोटू सिंह यहां एक टूल्किट की तरह प्ले कर रहा है इसका मेरे पास पुख्ता इनपुट है। इसलिए मैंने यहां प्रतिक्रिया न देना अधिक उचित समझा... सादर 🌻🙏
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प्रताप प्रजापति
@crosschat_wala आदरणीय लोकसा क्या मैं जान सकता हूं कि आपका रविन्द्र सिंह भाटी व छोटू सिंह रावणा के बारे में की गई टिप्पणी गायब क्यों है? क्या आपका विचार और वक्तव्य बदल गए हैं या कुछ और कारण थे।
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Lokendra Singh Kilanaut
Lokendra Singh Kilanaut@crosschat_wala·
@itsrealritu @Tharist_Boy आपने मुझे एक विषय को ज्यादा गहराई से समझने का मौका दिया, उसके लिए आभार 💥🌻
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Ritu Shaw
Ritu Shaw@itsrealritu·
पहले से कहीं अधिक संतुलित और परिपक्व टिप्पणी है- बंगाल में राष्ट्रवाद के पनपने के कारणों में राजस्थान के इतिहास क्या योगदान था, यह पढ़ने के लिए लगातार बने रहिए। लोकेंद्र जी ने कम से कम दो किताबें नई खरीदी होंगी, यह जानकारी जुटाने के लिए. लोग रंजिश और कुंठा पालकर बैठ जाते हैं. लेकिन उन्होंने न हमारे कंटेंट को देखना छोड़ा और ना खुद बैठ गए. रहा सवाल तर्कों का तो उनका क्या है? तमाम दिए जा सकते हैं. लेकिन नहीं. क्योंकि एक तो आज मन नहीं है. पूरा चांद खिड़की से सीधा दिख रहा है. उसकी ब्राइटनेस के आगे इस स्क्रीन की ब्राइटनेस फीकी है. और दूसरा लोकेंद्र जी की मेहनत का सम्मान रखना है.
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Lokendra Singh Kilanaut
Lokendra Singh Kilanaut@crosschat_wala·
SSC प्रोटेस्ट के वक्त मैंने ठीक यही लिखा था कि सरेआम सड़क पर ठुकते शिक्षकों के लिए देश सहानुभूति और सम्मान ना दिखाए और एक बार ढंग से ठुक जाने दे। क्योंकि इस महादेश को गर्त में लेकर जाने वाले सिर्फ और सिर्फ शिक्षक हैं। रजनीश ओशो भी ये बात बोलते थे कि समाज शिक्षकों का सम्मान इसलिए करता है कि शिक्षक क्रांति न कर दे। इसलिए उसे अनचाहा सम्मान देता है। इसलिए मैं इस पक्ष में हूँ कि अगर देश में क्रांति चाहिए तो सरेआम इस देश के शिक्षकों को जलील करना शुरू कर दो। जब तक इस निकम्मी कौम को सम्मान मिलता रहेगा तब तक वह ना तो सुधरेगी और ना क्रांति करेगी। एक तो इन लोगों ने इस देश की बत्ती लगाकर छोड़ दी ऊपर से इन्हें सम्मान ओर दो, मैं तो कहता हूँ दो चार मास्टरों को लाल किले की दीवार पर लटकाकर जलील करो। थोड़ा ज्यादा हो गया लेकिन ये नस्ल इसी लायक है 😎🤣
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Ritu Shaw
Ritu Shaw@itsrealritu·
'लिखने योग्य बनाने' वाली बात पर एक बड़ी दिलचस्प एप्लीकेशन याद आ गई, जो किसी व्याख्याता ने एक मामले में पुलिस में दी थी. उस व्याख्याता का नाम याद नहीं. लेकिन अपने सुंदर लेख और उम्दा व्याकरण की वजह से वो अर्जी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी. ऐसे अध्यापक बच्चों को क्या खाक सिखाते होंगे? और रहा सवाल भ्रष्टाचार का तो सबसे कम भ्रष्ट नौकरी अध्यापक की सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि इस प्रोफाइल के दायरे में वित्त से जुड़े काम होते ही नहीं हैं... अन्यथा जो लोग 15 किलो रद्दी की रकम भी गबन कर जाएं, उन्हें कुछ वित्त संबंधी अधिकार मिल जाएं तो जाने क्या करें... और किसने कह दिया कि भ्रष्टाचार सिर्फ आर्थिक होता है? कुछ लोग नैतिक तौर भी भ्रष्ट होते हैं. सबसे अहम बात ये कि कोई दूसरे पेशों में मौजूद भ्रष्टाचारियों के दुष्परिणाम का दायरा सीमित होता है. लेकिन अपने पेशे में भ्रष्ट अध्यापक एक पूरी नस्ल और देश के भविष्य को बर्बाद कर छोड़ता है. शास्त्रों में असली नमक हराम इसे कहा गया है.
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Bhera ram
Bhera ram@JATbera1·
मैंने social media पर सबसे ज्यादा नफरत किसी के लिए देखी है तो वो अध्यापक के लिए🙏 बल्कि ईमानदारी से कहूं तो सबसे कम भ्रष्ट इस देश में कोई नौकरी है तो वो अध्यापक की है और जो कुछ भी लिखते हो इस योग्य भी किसी न किसी अध्यापक ने ही बनाया। खैर इसे शास्त्रों में नमक हराम बोला जाता है
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Lokendra Singh Kilanaut
Lokendra Singh Kilanaut@crosschat_wala·
@DrKirodilalBJP जी पर जल्दी ही एक किताब आने वाली है...🌻🙏 बेसब्री से इंतजार
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