


Lokendra Singh Kilanaut
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राजस्थान भाजपा में युवा मोर्चा जिसे हरावल दस्ता भी कहते थे, उसकी नई टीम आने वाली है लेकिन बताया जा रहा है कि सूची में कई ऐसे चेहरे हैं जिन पर घमासान होना तय है! तमाम आपत्तियों और विरोध के बावजूद बताया जा रहा है उन नामों को हरी झंडी मिल चुकी है, वहीं कई सांगठनिक रगड़ाई वाले चेहरे भाई साबों के यहां कल से चक्कर लगा रहे हैं! #Rajasthan



राजस्थान भाजपा युवा मोर्चा की संभावित टीम - • राकेश यादव • राजवीर बांता • रुघनाथ बिश्नोई • रोशनी शर्मा • शौर्य जैमन • सुदर्शन गौतम • नरेंद्र शर्मा • राकेश कटराथल • होशियार मीणा • ऋषि मीणा #Rajasthan













How Rajasthan influenced Bangal 19 वीं सदी के उत्तरार्ध का काल और बंगाली साहित्य पर बंकिम चंद्र चटर्जी का एकतरफा वर्चस्व। इसी काल में उपन्यासों के मोर्चे पर बंकिम चंद्र थे तो दूसरा मोर्चा माइकल मधुसूदन दत्त ने अपने नाटकों से खोल दिया। बंगाली समाज को नाटक देखने का चाव तो पहले से लग गया था। लेकिन ये नाटक कुलीन बंगाली समाज तक पहुंच बना सके थे। एक तरफ बंकिम चंद्र आम जन के लेखक स्थापित हो चुके थे वहीं दूसरी तरफ नाटकों की विषयवस्तु से कुलीन बंगाली समाज एक तरह से ऊब रहा था क्योंकि थियेटर के मंच पर शेक्सपियर, जॉर्ज बर्नार्ड शो के अलावा कुछ गिने चुने संस्कृत नाटक ही थे। इसी समय माइकल मधुसूदन दत्त जो सिर्फ अंग्रेजी भाषा पर एकाधिकार रखते थे, ने नाटकों में रुचि लेना शुरू किया। माइकल मधुसूदन खालिस अंग्रेजी मिजाज के शख्स थे। ईसाई युवती से प्रेम किया और हिंदू से ईसाई बन गए। इस कारण हिन्दू कॉलेज भी छोड़ दिया और बिशप कॉलेज में पहुंच गए। बैरिस्टरी करने लंदन गए और वापस वतन लौट आए। दूसरी शादी एक फ्रांसीसी महिला से करी और फिर ग्रीक साहित्य में रम गए। अंग्रेजी, हिब्रू, जर्मन जैसी तमाम विदेशी भाषाएं माइकल मधुसूदन दत्त ने सीख ली लेकिन उन्हें बंगाली भाषा अब भी नहीं आती थी। इसी दरमियान माइकल मधुसूदन दत्त की मुलाकात केशवचंद्र सेन से हुई और केशवचंद्र सेन ने उन्हें कर्नल जेम्स टॉड की "Annals and Antiquities of Rajast'han" पढ़ने की सलाह दी। केशवचंद्र सेन ने उन्हें कर्नल टॉड के इस महान ग्रन्थ को पढ़ने की सलाह इसलिए दी क्योंकि बंगाल के थियेटरों में घटिया नाटकों को देखकर एक दिन माइकल मधुसूदन दत्त ने ऐलान कर दिया कि अब वे अच्छे और बेहतरीन नाटक लिखेंगे। लेकिन इससे पहले उन्होंने बंगला भाषा सीखी। बंगला भाषा सीखकर माइकल मधुसूदन दत्त किसी नाटक के लिए विषयवस्तु की तलाश कर रहे थे। उन्होंने रजिया सुल्तान पर एक नाटक लिखने का निश्चय किया और काम शुरू भी कर दिया। तब केशवचंद्र सेन ने पत्र लिखकर कहा कि वे कर्नल टॉड के इस महान ग्रन्थ से राजस्थान के इतिहास से कोई वीरता की कहानी को चुनें जिससे कि राष्ट्रवादी विचारों को प्रोत्साहन मिले। मधुसूदन दत्त ने केशवचंद्र सेन की इस सलाह पर काम किया और बड़े ही इत्मीनान से कर्नल टॉड के ग्रंथ को पढ़ा। इस ग्रन्थ को पढ़ने के बाद उन्होंने एक नाटक लिखा - "कृष्णाकुमारी" यानि कि बंगाल के उपन्यासकार और कवियों की भांति ही राजस्थान के इतिहास की कहानियां बंगाली नाटककारों को भी राजस्थान तक खींच लाई। माइकल मधुसूदन दत्त के दो नाटक बंगाली साहित्य में सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए एक मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णाकुमारी पर लिखा गया उनका ऐतिहासिक नाटक और एक नाटक उन्होंने पद्मावती नाम से लिखा। पद्मावती नाम से ही बंगाल के दूसरे प्रसिद्ध नाटककार रंगलाल बंधोपाध्याय ने एक नाटक लिखा लेकिन माइकल मधुसूदन दत्त द्वारा लिखा गया पद्मावती नाटक उस दौर का सर्वश्रेष्ठ नाटक साबित हुआ। केशवचंद्र सेन और डॉ क्षेत्र गुप्त जैसे विद्वानों ने मधुसूदन दत्त के कृष्णाकुमारी नाटक को ही बंगाली भाषा का सर्वश्रेष्ठ नाटक कहा है। खुद मधुसूदन दत्त ने राजनरायन बसु को लिखे एक पत्र में लिखा - " I have been dramatizing writting, a regular tragedy in prose. The plot is taken from Jems Tod." सिर्फ माइकल मधुसूदन दत्त की क्यों ? उसके बाद तो तमाम बंगाली नाटककारों ने राजस्थान के इतिहास से विषय चुन - चुनकर नाटकों की झड़ी लगा दी। द्विजेंद्रपाल, क्षीरोप्रसाद जैसे विख्यात नाटककारों ने अपने बेहतरीन नाटकों के लिए कर्नल जेम्स टॉड के ग्रंथ से विषय उठा - उठाकर नाटकों की झड़ी लगा दी और इन राष्ट्रवादी नाटकों ने बंगाल के थियेटरों में राष्ट्रवाद को डटकर उतार दिया। इसलिए यह कहना समीचीन होगा कि कविता, उपन्यास और कहानियों के सहारे ही नहीं बल्कि नाटकों के विषयों में भी राजस्थान के इतिहास ने बंगाल में राष्ट्रवाद को पनपने में मार्ग प्रशस्त किया। ~ लोकेन्द्रसिंह किलाणौत नॉट - बंगाल में राष्ट्रवाद के पनपने के कारणों में राजस्थान के इतिहास क्या योगदान था, यह पढ़ने के लिए लगातार बने रहिए।






