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रात भर का है मेहमां अंधेरा,
किसके रोके रुका है सवेरा?
रात जितनी भी संगीन होगी,
सुबह उतनी ही रंगीन होगी,
ग़म न कर गर है बादल घनेरा,
किसके रोके रुका है सवेरा?
लब पे शिकवा न ला अश्क़ पी ले,
जिस तरह भी हो कुछ देर जी ले,
अब उखड़ने को है ग़म का डेरा,
किसके रोके रुका है सवेरा?
यूं ही दुनिया में शामें ढली हैं,
यूं ही मुश्किल की राहें चली हैं,
होगा हर दिल में कल फिर बसेरा,
किसके रोके रुका है सवेरा?
- साहिर लुधियानवी
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