Rinku Meena - Johar Army
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Rinku Meena - Johar Army
@irinkusantha
Physics Student || Nature Lover 💚 || Tribal || Social & Environmental Activist ||Disciple Of Birsa Munda & Jaipal Singh Munda || Founder of @JoharArmy 🏹
मत्स्य प्रदेश Katılım Mart 2020
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किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़, उसके जीवन के किरदार और लोगों के दिलों में उसकी जगह को बयां करती है !
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जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ने वाले बिरसा मुंडा अंग्रेजों की नजर में विद्रोही व देशद्रोही थे, लेकिन हमारी नजर में क्रांतिकारी और भगवान है। आज वही हिडमा आपकी नजर में नक्सलवादी है लेकिन हो सकता है भविष्य में आने वाली पीढ़ी उसे बिरसा के रूप में ही जानने लगे।
देश के उन आदिवासी युवाओं को इस सदन के माध्यम से मेरी अपील है कि जल जंगल जमीन की लड़ाई हथियार से नही, बल्कि कलम और कागज से लड़ने की जरूरत है।
उलगुलान जोहार
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*26 सालों से पेंडिंग आदिवासियों के हितो से जुडे मेसा कानुन को लागू करने हेतु सांसद राजकुमार रोत ने आज संसद में नियम 377 के तहत उठाई माँग ।*
नई दिल्ली। डूंगरपुर। बांसवाड़ा।
लोकसभा में शून्यकाल के दौरान बांसवाड़ा-डूंगरपुर– सांसद राजकुमार रोत ने देश के पाँचवीं अनुसूची वाले 10 राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों में शहरी निकायों के विस्तार को लेकर सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल खड़े किए। सांसद ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 244(1) और पाँचवीं अनुसूची कोई सामान्य प्रावधान नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के ऐतिहासिक संघर्ष और बलिदान की देन है।
उन्होंने सदन का ध्यान दिलाया कि संविधान स्पष्ट करता है कि अनुसूचित क्षेत्रों में नगर पालिका, नगर परिषद या UDA जैसे शहरी निकायों का गठन सामान्य प्रक्रिया से नहीं किया जा सकता। ऐसी किसी भी व्यवस्था के लिए संसद द्वारा विशेष कानून बनाना अनिवार्य है, ताकि आदिवासियों के अधिकार, संस्कृति और स्वशासन सुरक्षित रह सकें।
सांसद ने याद दिलाया कि वर्ष 2001 में “नगरपालिका (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) विधेयक” राज्यसभा में पेश किया गया था और स्थायी समिति ने 2003 में अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी थी, लेकिन सरकारों का आदिवासियों के प्रति रवैया ठीक नहीं एव राष्ट्रीय पार्टियो में आदिवासी हितैषी मजबूत लीडरसीफ़ नहीं होने के कारण 26 वर्ष बीत जाने के बाद भी सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने इसे आदिवासी समाज के प्रति गंभीर संवैधानिक उपेक्षा बताया।
सांसद ने कहा कि इस लापरवाही का सीधा असर पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों में देखने को मिल रहा है, जहाँ शहरीकरण के नाम पर आदिवासियों की जमीन, घर और आजीविका छीनी जा रही है। विशेष रूप से उदयपुर UDA, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जैसे क्षेत्रों में हजारों आदिवासी परिवार इस असंवैधानिक विस्तार से प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने सरकार से मांग की कि मेसा कानून को शीघ्र पारित किया जाए और जब तक यह कानून नहीं बनता, तब तक अनुसूचित क्षेत्रों में नगर निकायों के किसी भी प्रकार के विस्तार पर तत्काल रोक लगाई जाए। सांसद के इस हस्तक्षेप को सदन में आदिवासी अधिकारों की संवैधानिक रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण और गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जबकि सरकार की लंबे समय से चली आ रही चुप्पी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
Via @roat_mla

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दिल्ली में कई दशकों से 20-22 लाख आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज तक उन्हें ST की सूची में सम्मिलित नही किया गया है।
वर्ष 2011 की जनगणना में NCR दिल्ली में ST की संख्या शून्य दर्शायी एवं यहां दशको से रहने वाले आदिवासी समुदाय के लोगों की गणना सामान्य वर्ग में कर उनके साथ अन्याय किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री @gupta_rekha से अनुरोध है कि दिल्ली में रहने वाले 20-22 लाख आदिवासी समुदाय के लोगों के हित में आप केन्द्र को प्रस्ताव भिजवाकर आगामी जनगणना में ST कॉलम निर्धारित करवाकर ST की मान्यता दिलवाने का कार्य करें।

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भंवरलाल परमार ने जन जागरण के माध्यम से आदिवासियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मुख्य बिंदु बनाकर अंधविश्वास-पाखंडवाद को खत्म करने से पाखंड के आधार पर राजनीतिक करने वालों की राजनीति हिल गई है..!!
मैं दादा @Bhilraj11 जी के साथ हूं
#भंवरदादा_निलंबन_वापस_लो

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आदिवासी परिवार के मार्गदर्शक आधुनिक बिरसा भंवरलाल परमार दादा(@Bhilraj11) को सरकार द्वारा निलंबित करना निंदनीय हैं!!
एक शिक्षक अपने की जिम्मेदारी होती अपने समाज को मार्गदर्शन देना!!
#IStandWithBhanwarLalParmar
@RajCMO @BJP4Rajasthan @BhajanlalBjp

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