Aeshvarya Thakur

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Aeshvarya Thakur

Aeshvarya Thakur

@mayamatchstick

Architect | Writer | Eternal Student

Katılım Nisan 2014
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
मेरे नए मिनी-व्लॉग में सुनिए मुझे हिमाचल की खूबसूरत 'Australian Valley' में निर्वासित तिब्बती कवि तेनज़िन त्सुंड्यू (Tenzin Tsundue) की कविता पढ़ते हुए.. youtu.be/BiUR10k4mIg?si…
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
Sir, you lost your credibility as an intellectual in public eye when you used a provocative and divisive slogan of "Thakur ko Maaro" in the parliament; no matter how many literary references you give now to justify your statement. This was sad to see how politics of 'todfod' has been appropriated by the faction which once claimed to take the higher road !
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Manoj Kumar Jha
Manoj Kumar Jha@manojkjhadu·
भाजपा से असहमति सिर्फ राजनीतिक नहीं है, बल्कि एक गहरी वैचारिक असहमति भी है। यह असहमति केवल नीतियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उस भाषा और तरीके तक भी जाती है, जिसका इस्तेमाल उनके शीर्ष नेतृत्व द्वारा भी किया जाता है। यही वजह है कि जब जाँच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग की बात आती है, तो नागरिक समाज और विपक्ष अक्सर मिलकर उसका विरोध करते हैं क्योंकि वे संस्थाओं की निष्पक्षता और कानून के राज को संविधान का मूल तत्त्व मानते हैं। ************ लेकिन यहाँ एक बुनियादी सावधानी जरूरी है। अगर भाजपा का विरोध करते-करते हम खुद उसी तरह की तीखी या विभाजनकारी भाषा अपनाने लगें, या सत्ता में होने पर एजेंसियों का इस्तेमाल भी वैसी ही राजनीतिक मंशा से करने लगें, तो हमारे विरोध की नैतिक ताकत कमज़ोर हो जाती है। तब फर्क केवल चेहरों का रह जाता है, तरीकों का नहीं। क्या यह उचित है? ************ अतः असली चुनौती सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि इस देश की राजनीतिक संस्कृति को बेहतर बनाना है, जहाँ भाषा में संयम हो और संस्थाओं के इस्तेमाल में ईमानदारी और पारदर्शिता बरती जाए। तभी कोई भी प्रतिपक्ष खुद को एक विश्वसनीय और नैतिक विकल्प के रूप में पेश कर सकता है। जय हिन्द
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
@yadavtejashwi लेकिन अफ़सोस यह कि अपराधी बहुजन फोल्ड से ही था!
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Tejashwi Yadav
Tejashwi Yadav@yadavtejashwi·
एनडीए सरकार में “बिहारी होना” ही सबसे बड़ा अपराध हो गया है। बीजेपी शासित राज्यों सहित देश की राजधानी दिल्ली में जिस जगह “बिहारी” समझ गोली मारी गई है वहाँ MLA बीजेपी का, MP बीजेपी का, CM बीजेपी का, बिहार CM बीजेपी का, आधा दर्जन निष्क्रिय बड़बोले केंद्रीय मंत्री बिहार के, उपराज्यपाल BJP के, गृहमंत्री BJP के, प्रधानमंत्री BJP के है। बीजेपी बिहारियों के लिए काल बन चुकी है।
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Kshatriya Parishad
Kshatriya Parishad@kshatriya_org·
On this day, Kshatriya Parishad pays heartfelt tribute to Dr Yashwant Singh Parmar (4 August 1906 – 2 May 1981), the visionary leader revered as the Architect of Modern Himachal.
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
साधु का भगवा वस्त्र सिर्फ एक रंग नहीं, त्याग और वैराग्य का प्रतीक है। मगर राजनीति में रंगों की ऐसी व्याख्या होने लगी है कि मूल अर्थ कहीं पीछे छूट जाता है। इसी क्रम में अखिलेश यादव ने भगवाधारी संन्यासी महंत योगी आदित्यनाथ को “छोटा फैंटा” कहकर संबोधित किया। दिलचस्प सवाल यह उठता है कि क्या कुछ देर पहले जिन भगवाधारी बौद्ध भिक्षुओं के साथ वे मंच साझा कर रहे थे, उन्हें भी अखिलेश यादव क्या FANTA MIRINDA ही मानते हैं, जिसे वे पीकर फेंक देंगे SHORT TERM ASSETT की तरह?
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
बीते 24 अप्रैल को हरदोई (UP) के एक स्कूल में प्रिंसिपल और माता-पिता के बीच हुई बहस ने स्कूल प्रशासन के व्यवहार और सामाजिक संवेदनशीलता पर एक नई बहस छेड़ दी है। बताया जा रहा है कि स्कूल की फीस और कॉपियों के पैसों को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि बातचीत में शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन हुआ। किसी भी स्कूल के माहौल में बातचीत का तरीका इज्जतदार और गरिमापूर्ण होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि 'अनपढ़' या 'गंवार' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना न केवल व्यक्तिगत अपमान है, बल्कि इससे स्कूल जैसे संस्थान के प्रति लोगों का भरोसा भी कम होता है। हालात चाहे कितने भी चुनौतीपूर्ण या तनावपूर्ण क्यों न हों, एक टीचर और अभिभावक के बीच हमेशा सम्मानजनक और सहानुभूतिपूर्ण संवाद होना चाहिए ताकि शिक्षा का मूल उद्देश्य बना रहे और बच्चों पर इसका बुरा असर न पड़े। बताया जा रहा है कि वीडियो में साफ़ है कि कोई जातिसूचक शब्द इस बहस में नहीं सुना गया लेकिन इस मामले में जिस तरह SC/ST एक्ट के तहत प्रिंसिपल पर FIR दर्ज हुई है, उसने इस कानून की निष्पक्षता और इसकी बनावट पर भी सवाल उठाए हैं। न्याय का एक वैश्विक और बुनियादी सिद्धांत यह है कि कानून 'तटस्थ' (न्यूट्रल) होने चाहिए, जिसका अर्थ है कि वे मुल्जिम की सामाजिक पहचान या जाति देखने के बजाय उसके जुर्म के आधार पर सब पर बराबर लागू हों। दुनिया के कई हिस्सों में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ बने कानून किसी खास वर्ग तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे हर उस व्यक्ति पर लागू होते हैं जो गलत करता पाया जाता है। लेकिन वर्तमान में भारतीय संदर्भ में यह कानून मुख्य रूप से "आरोपी की पृष्ठभूमि" पर आधारित है, जिसकी वजह से कभी-कभी कानूनी उलझनें पैदा होती हैं और इसके गलत इस्तेमाल या जातीय प्रतिशोध के टूल की तरह इस्तेमाल होने की गुंजाइश भी बनी रहती है। सच्चा न्याय वही है जो समाज के हर व्यक्ति के लिए एक समान पैमाना निर्धारित करे। यदि कानूनी ढांचे को अधिक समावेशी और 'जाति-तटस्थ' (कास्ट-न्यूट्रल) बनाया जाए, तो न्याय का पूरा केंद्र केवल इस बात पर होगा कि 'क्या अपराध हुआ' और 'पीड़ित को कितना नुकसान पहुँचा', न कि इस बात पर कि 'आरोपी किस समुदाय से संबंध रखता है'। कानून को प्रतिशोध के औज़ार के बजाय सुरक्षा का एक मजबूत कवच होना चाहिए। जब न्याय की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष होती है, तभी समाज के हर वर्ग का कानून पर भरोसा मजबूत होता है। एक न्यायसंगत समाज की स्थापना के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम ऐसी व्यवस्था की तरफ बढ़ें जहाँ अधिकारों की रक्षा और सजा का फैसला बिना किसी भेदभाव के सुनिश्चित किया जा सके।
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
पहलवान आंदोलन के 'फायदे-नुकसान' का त्रिवर्षीय बही-खाता  जनवरी 2023 में जंतर-मंतर से शुरू हुआ पहलवानों का आंदोलन शुरुआत में "महिला सम्मान" और "न्याय की मांग" के लिए उभरा लेकिन तीन साल बीतते-बीतते आंदोलन के मुख्य पात्रों के जीवन ने कई नए मोड़ लिए। इस सफर में जुलाई 2023 एक अहम पड़ाव था, जब आंदोलनरत पहलवानों विनेश फोगाट और बजरंग पुनिया को एशियाई खेलों के लिए "ट्रायल से छूट" दी गई। इस फैसले ने खेल के मैदान में निष्पक्ष चयन और युवा खिलाड़ियों के भविष्य को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी। विनेश फोगाट की पेरिस 2024 ओलंपिक में "तकनीकी अयोग्यता" के बाद उनकी ब्रांड वैल्यू में जबरदस्त उछाल देखा गया, जहाँ वे ₹75 लाख से ₹1 करोड़ तक की डील्स के साथ Nike, Country Delight जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय विज्ञापनों का चेहरा बनीं। इसके बाद उन्होंने सियासी मैदान में कदम रखा और कांग्रेस की टिकट से अक्टूबर 2024 में जुलाना सीट से जीत हासिल की, हालांकि बाद में क्षेत्र में उनकी उपस्थिति को लेकर स्थानीय स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं भी देखने को मिलीं। वहीं दूसरी ओर, आंदोलन से जुड़े अन्य चेहरों ने भी अपने जीवन की नई दिशाएँ चुनीं। संगीता फोगाट ने डांस शो "झलक दिखला जा" और "Rise and Fall" जैसे रियलिटी शो से मनोरंजन की दुनिया का रुख किया। पहलवान साक्षी मलिक ने अपनी आत्मकथा 'विटनेस' (Witness) के जरिए आंदोलन के आंतरिक घटनाक्रमों और कुछ फैसलों के कारण उपजी दिशाहीनता पर बेबाकी से प्रकाश डाला। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ 'करीबी लोगों' की महत्वाकांक्षाओं ने आंदोलन की दिशा प्रभावित की। साक्षी मलिक ने अपने WFI प्रेसिडेंट बनने की महत्वाकांक्षा को भी सार्वजनिक किया। बजरंग पुनिया का सफर खेल, अनुशासन और राजनीति के बीच संघर्षपूर्ण रहा, जहाँ किसान कांग्रेस में जिम्मेदारी मिलने के साथ-साथ उन्हें NADA द्वारा dope test में असहयोग करने के कारण लगाए गए प्रतिबंध और कोच नरेश दहिया पर झूठे आरोप लगाने के चलते कानूनी माफीनामों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अंततः, दिसंबर 2025 तक कानूनी मोर्चे पर भी स्थितियां बदलीं, जहाँ बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ POCSO मामले साक्ष्यों के अभाव में बंद हुए और पहलवानों की WFI चुनाव पर दायर याचिकाएं उनके सुनवाई में कभी हाज़िर न होने के कारण खारिज कर दी गईं। इस पूरे घटनाक्रम ने बृजभूषण शरण सिंह को क्षेत्रीय नेता से बढ़कर एक चर्चित राष्ट्रीय चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया। कुल मिलाकर, आंदोलन ने जहाँ इन पात्रों को नई व्यक्तिगत और राजनैतिक पहचान दिलाई, वहीं भारतीय कुश्ती की गरिमा और चयन प्रक्रिया के भविष्य पर कई गहरे सवाल भी छोड़ दिए हैं।
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
Whether it was my old Yashica, a grainy 2-megapixel Sony Ericsson, or the DSLR I carry today, whenever I’ve chased a shot with true passion, a part of me was always reaching for the spirit of the genius Raghu Rai. To me, he is the ultimate benchmark of 'capturing the moment'. Legends never die.
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
क्या आपने कभी गोवा को 'Slow Travel' के नज़रिए से देखा है? मेरे इस नए मिनीव्लॉग में देखिए कैसे बिताया जाता है एक धीमा दिन उन लोगों के साथ जो इस गोवा तट की जान हैं। सुबह की पहली किरण के साथ अरब सागर की सैर से लेकर घर जैसी कोंकणी थाली तक का सफर। देखिए Goa Without Filters ! youtu.be/0vlPV__GsC0?si…
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Sleepy Classes
Sleepy Classes@SleepyClasses·
Kshatriyisation happening ?? Why ??
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
आप लोग राघव चड्ढा या स्वाति मालीवाल के दल-बदल को लेकर इतने आहत क्यों हैं? क्या इसलिए कि उन्होंने AAP छोड़ी, या इसलिए कि वे भाजपा में चले गए? अगर वे कांग्रेस या किसी अन्य क्षेत्रीय दल में जाते तो क्या प्रतिक्रिया अलग होती? या फिर क्या उनसे यह उम्मीद की जा रही थी कि वे इस्तीफ़ा देकर घर बैठ जाते, अपनी क्षमताओं को जंग लगने देते और जीवन भर कुंठा में रहते, तभी इसे ‘सिद्धांतवादी स्टैंड’ माना जाता? सवाल यह भी है कि क्या इन चेहरों के पास इतना स्वतंत्र जनाधार था कि वे अपनी अलग पार्टी खड़ी कर लेते? यदि होता, तो उन्हें राज्यसभा के रास्ते राजनीति में लाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। राघव चड्ढा ने अब तक दो बड़े प्रत्यक्ष चुनाव लड़े; एक जीता, एक हारा। 2019 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण दिल्ली से हार का सामना किया, जबकि 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में राजेंद्र नगर से जीत दर्ज की। इसके बाद मार्च 2022 में वे पंजाब से राज्यसभा सांसद बने। यह भी सच है कि वे एक सक्षम रणनीतिकार रहे हैं, लेकिन 2020 की जीत में झाड़ू के सिंबल और आप की लहर ही वजह रही।  वैसे ही स्वाति मालीवाल ने अब तक कोई प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ा। जनवरी 2024 में AAP द्वारा राज्यसभा के लिए नामित होकर वे सांसद बनीं। ‘दिल्ली महिला आयोग’ में उनकी भूमिका भी पार्टी के समर्थन से ही संभव हुई। ऐसे में, जब पार्टी के भीतर ही उनके साथ कथित दुर्व्यवहार की बातें सामने आईं, तो उनसे क्या अपेक्षा थी? To bend the knee? दूसरी ओर, पप्पू यादव जैसे नेताओं द्वारा महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ भी सामने आती रही हैं। जब लगभग हर विचारधारा में महिलाओं के लिए जगह सीमित दिखती हो, तो क्या किसी “आदर्श” महिला-हितैषी दल का इंतज़ार व्यावहारिक विकल्प होता? बाकि सांसद जैसे अशोक कुमार मित्तल जैसे शिक्षा-उद्यमी, हरभजन सिंह जैसे पूर्व क्रिकेटर और संदीप पाठक जैसे पर्दे के पीछे काम करने वाले रणनीतिकार; इन सभी का पारंपरिक जनाधार या प्रत्यक्ष चुनावी अनुभव नहीं रहा; इनमें से कुछ को 2022 में AAP द्वारा राज्यसभा के लिए नामित या निर्विरोध चुना गया। इसी तरह विक्रमजीत साहनी और राजेंद्र गुप्ता भी उद्योग जगत से आए ऐसे नाम हैं, जिन्होंने कभी प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ा। ऐसे में, खासकर राघव और स्वाति से यह अपेक्षा रखना कि वे “Higher Road” लेते हुए या तो अपनी स्वतंत्र पार्टी खड़ी कर लेते या किसी कथित सेकुलर दल में शामिल होकर ही नैतिक ठहराए जाते, यह कितना यथार्थवादी है? सच यह भी है कि AAP की अपनी विचारधारा कितनी सुसंगत रही है, यह बहस का विषय है। जिस पार्टी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आंदोलन से जन्म लिया, यदि वही आज उन दलों के साथ मंच साझा करती दिखे जिन पर कभी आरोप लगाती थी, तो सवाल केवल व्यक्तियों पर नहीं, पूरी राजनीतिक संस्कृति पर उठते हैं। आखिर इस दलदल में किसका दामन पूरी तरह पाक-साफ़ है?
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
वैसे इन दोनों फिल्मों को देखकर मेरी आँख नम हुई थी पर फ़िल्म-विश्लेषकों से पूछना था कि क्या इस genre की फिल्में और फिल्मकार भी propaganda की श्रेणी में आते हैं?
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
यूपी में का बा? मैं सच में दुविधा में हूँ। समझ नहीं पा रही कि यूपी के हालात पर बुद्धिजीवियों, इन्फ्लूएंसर्स, फेसबुक टिप्पणीकारों, कॉलमिस्ट्स, पत्रकारों, शंकराचार्यों, एक्टिविस्ट्स और विपक्षी नेताओं की बात मानूँ, जो कहते हैं कि बुलडोज़र राज में अल्पसंख्यकों पर ज़्यादतियाँ हो रही हैं, या फिर खुद अल्पसंख्यक समाज के कुछ लोगों की बात पर भरोसा करूँ जो कहते हैं कि “बाबा के राज” में कानून-व्यवस्था बेहतर हुई है। आप ही बताइए, मित्रों! 🙏🏼
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
कल The Hindu में छपा लेख वही बात दोहराता है, जिसे मैं पिछले 4 साल से कह रही हूँ; ‘Kshatriyasation’ या 'राजपूतिकरण' कोई अचानक उभरा ट्रेंड नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया है। आज भाजपा-आरएसएस अलग-अलग क्षेत्रों के ऐतिहासिक योद्धाओं (जैसे सुहेलदेव, वेलु नाचियार, लाचित बोरफुकन) को जोर-शोर से celebrate कर रहे हैं। सवाल है, अभी क्यों? इतिहास बताता है कि 19वीं-20वीं सदी में कई जातियों (यादव, जाट, गुज्जर, कुर्मी आदि) ने खुद को ‘क्षत्रिय’ साबित करने की कोशिश की, लेकिन मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद वही समुदाय OBC पहचान के लिए भी संघर्ष करते दिखे; यानी सामाजिक सम्मान और राजनीतिक लाभ, दोनों साथ-साथ। डॉ. आंबेडकर ने ‘Castes in India’ में लिखा था कि कथित निचली जातियाँ अक्सर कथित ऊँची जातियों की नकल करके अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश करती हैं यानि "the infection of imitation". इतिहासकार इसे ‘क्षत्रियकरण’ (या राजपूतिकरण) कहते हैं जहाँ अलग-अलग समुदाय खुद को राजपूत योद्धा परंपरा से जोड़कर ताकत हासिल करना चाहते हैं। आज यही प्रक्रिया एक नए राजनीतिक रूप में दिख रही है। ‘योद्धा गौरव’ के ज़रिए अलग-अलग जातियों को एक बड़े हिंदू राष्ट्रवादी नैरेटिव में जोड़ा जा रहा है जिससे एक मजबूत वोट बैंक तैयार होता है और ‘हिंदू पहचान’ को और आक्रामक बनाया जाता है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का एक दूसरा पहलू भी है। राजपूत यानी पारंपरिक क्षत्रिय समुदायों में इस “पहचान की बंदरबांट” को लेकर असंतोष साफ दिखता है। उन्हें लगता है कि उनकी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से फैलाया और पुनर्परिभाषित किया जा रहा है, जिससे उनकी पहचान की विशिष्टता कमजोर होती है। मुद्दा यह है: क्या इस अभ्यास से जाति खत्म हो रही है? या फिर एक नए राजनीतिक रूप में और मजबूत हो रही है? और साथ ही क्या समुदायों के बीच नए तनाव पैदा नहीं हो रहे हैं?
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
'विश्व पुस्तक दिवस' पर 'हिन्दुस्तान' अखबार के कॉलम 'अनुलोम-विलोम' में रील के दौर में किताबों की एहमियत पर मेरी टिप्पणी छपी है। पढ़िएगा!
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Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
After the Pahalgam attacks in 2025, Outlook magazine published a photo story on its page on 26 April 2025, which showed the demolished houses of those suspected terrorists who were believed to be linked to the Pahalgam attack. These photographs, taken through the camera of photographer Yasir Iqbal, highlighted the grief and helplessness of the families of those suspected terrorists. Outlook editor Chinki Sinha made this decision at a time when the entire country was immersed in mourning the innocent tourists killed in the attack, in order to bring forward the human side of the suspects’ relatives and “their story.” The very next day, a similar report on the same demolished houses appeared on the pages of Pakistan’s newspaper Dawn, which compelled one to think why the coverage such subjects appears so similar even across different places. When I presented my opinion on this to Chinki Sinha on social media, she dismissed my argument by calling it my ‘misplaced expectations.’ Recently, Outlook’s photographer Yasir Iqbal received the ‘World Press Photo Award’ for his cover photo (“A daughter’s grief in Kashmir”) published in the 11 May 2025 issue. This photo depicted the damage to civilians caused by Pakistani shelling in Uri following the Pahalgam attack. Outlook editor Chinki Sinha and her team are celebrating this achievement. Chinki Sinha says, “The photo should have not been there. The girl should not have lost her mother.” However, in an interview, photographer Yasir Iqbal explained how, amid heavy shelling along the LOC, it was editor Chinki Sinha herself who had contacted him to capture such a cover photo so that the “human cost” of the war could be shown through the victims. This instruction to look for images that bring forward a “particular kind of perspective” amid scenes of devastation raises some important questions about the nature of editorial decisions. At the same time, this also raises a larger ethical question: in such cases, does an excessive focus on the families of the accused unintentionally lead to the secondary victimization of innocent relatives? And does this sometimes blur the line between presenting facts and showcasing private tragedy? This recalls Outlook editor’s past decisions as well, where the coverage particularly focused on the suffering of attackers’ families, or efforts were made to capture specific visuals in extremely sensitive situations for impactful images. Magazines like Outlook are often known for their liberal and anti-war perspective, which is necessary in its own place. But does this very commitment sometimes come into conflict with sensitivity toward the primary victims? Immediately after any major tragedy, is showing every connected aspect alone considered balance, or are timing and context equally important? As a reader and as a human being, are these our "misplaced expectations" from Outlook magazine, that the mention of suspected terrorists’ families could have been delayed a little, so that the country could first mourn the deaths of its innocent people?
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
"अगली बार जब आप पुरानी दिल्ली की सैर पर निकलें, तो इन गलियों में खड़ी पुरानी हवेलियों की दहलीज़ पर एक पल ज़रूर ठहरें। गौर से देखें कि कैसे ये पत्थर आज भी कल की कहानियाँ सुना रहे हैं।" पढ़िए मेरा कॉलम 'विरासतनामा'👉🏼 bolebharat.in/havelis-of-old… via @BoleBharatHindi
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
महिला आरक्षण में OBC महिलाओं की हिस्सेदारी की मांग को लेकर अक्सर "अंग्रेज़ीदां" या आधुनिक महिलाओं को नकारात्मक रोशनी में पेश किया जाता है, जैसा कि मुलायम सिंह यादव ने 2010 में कहा था कि "वर्तमान स्वरूप में महिला आरक्षण विधेयक पास हुआ तो संसद में उद्योगपतियों और अधिकारियों की ऐसी-ऐसी लड़कियां आ जाएंगी जिन्हें देखकर लड़के पीछे से सीटी बजाएंगे," या शरद यादव का वह बयान जिसमें उन्होंने पूछा था कि "ये परकटी (छोटे बालों वाली) महिलाएं हमारी ग्रामीण महिलाओं का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगी।" लेकिन सवाल यह है कि क्या पढ़ी-लिखी महिलाओं को नीचा दिखाए बिना पिछड़ों के हक की बात नहीं की जा सकती? हमें यह समझना होगा कि क्या भगवती देवी और फूलन देवी का अनपढ़ होना उनके संसदीय कार्यों में बाधक नहीं बना होगा और क्या इससे सांसदों की सरकारी बाबुओं (bureaucrats) पर निर्भरता नहीं बढ़ जाती? हम एक तरफ नरेंद्र मोदी की डिग्री या उनके फाइलों को न पढ़ने वाले बयान का मज़ाक उड़ाते हैं, सम्राट चौधरी, तेजस्वी यादव और भजनलाल शर्मा की शिक्षा पर तंज कसते हैं, वहीं दूसरी तरफ शशि थरूर, महुआ मोइत्रा, असदुद्दीन ओवैसी और राघव चड्ढा जैसे शिक्षित सांसदों की तर्कशक्ति की सराहना भी करते हैं। बेशक ज़मीनी तजुर्बे की अपनी अहमियत है, लेकिन राजनीति में अनपढ़ और पढ़े-लिखे दोनों का सही तालमेल ज़रूरी है। असल में 20 साल पहले उच्च शिक्षण संस्थानों में OBC आरक्षण लागू होने के बाद अब तक सुशिक्षित पिछड़ों की एक ऐसी खेप तैयार हो जानी चाहिए थी जो संसद में प्रतिनिधित्व कर सके, ताकि हमें आरक्षण के लिए काबिलियत को नकारात्मक बताने वाली "शिक्षित बनाम अनपढ़" की इस बहस की ज़रूरत ही न पड़ती। लेकिन सबको तो "तोड़फोड़" की राजनीति ही करनी है!
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Aeshvarya Thakur
Aeshvarya Thakur@mayamatchstick·
क्रान्ति अनिश्चितकाल के लिए स्थगित है! 😉
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