M P Mishra
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M P Mishra
@mpmishravns
Associate Professor School of Computer and Information Sciences, IGNOU, New Delhi
Delhi, India Katılım Mayıs 2015
82 Takip Edilen125 Takipçiler

परमात्मा के अनुग्रह से प्राप्त वस्तु भाव को स्वीकार कर लौकिक-अलौकिक कामनाओं का त्याग अथवा कर्म फलों से मुक्ति प्राप्त होती है। इस दिव्य अनुग्रह को अनुभूत कर योगी ज्ञान और भक्ति की उच्चतम स्थिति में प्रवेश करते हैं—जहाँ से यात्रा जीवनमुक्ति की ओर अग्रसर होती है।
@AvdheshanandG

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कवित्ववाराशि-निशाकराभ्यां
दौर्भाग्य-दावाम्बुद-मालिकाभ्याम् ।
दूरीकृतानम्र-विपत्तिताभ्यां
नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥
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MR

@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya सादर शत शत नमन एवं वंदन गुरुदेव 🌹🙏
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"अपरोक्षानुभूति"
निगमाचार्यवाक्येषु भक्तिः श्रद्धेति विश्रुता।
चित्तैकाग्र्यं तु सल्लक्ष्ये समाधानमिति स्मृतम् ॥ ८
अपरोक्षानुभूति के इस श्लोक में भगवद्पाद भाष्यकार-भगवान् आदि शंकराचार्य श्रद्धा और समाधान इन दोनों को साधन चतुष्टय के अन्तिम, परन्तु सर्वाधिक निर्णायक अंगों के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। विवेक, वैराग्य तथा शम दमादि षट्सम्पत्ति के परिपाक के पश्चात्, यही द्वय ब्रह्मज्ञान के साक्षात् उदय का द्वार खोलता है। इनके अभाव में न तो श्रवण का फल सिद्ध होता है, न मनन का और न ही निदिध्यासन की परिपक्वता।
“निगमाचार्यवाक्येषु भक्तिः” श्रद्धा की शाङ्कर–परिभाषा !
यहाँ निगम का अर्थ - वेद है और आचार्य से तात्पर्य - श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु से है। वाक्येषु भक्तिः अर्थात् उनके वचनों में अविचल, निःसंशय, दृढ़ विश्वास। आदि शंकराचार्य के अनुसार श्रद्धा केवल भावात्मक आस्था नहीं, अपितु ज्ञान साधना का अनिवार्य बौद्धिक आध्यात्मिक निश्चय है।
गीता-भाष्य में उनका स्पष्ट विधान है कि
“श्रद्धा नाम शास्त्रगुरुवाक्येषु विश्वासः।”
अर्थात् वेद और गुरु दोनों सत्य के प्रमाण हैं; इस निर्णय का नाम ही श्रद्धा है। उपनिषद् प्रमाण ! “श्रद्धाभक्तितपःसमाहिताः।”
(मुण्डकोपनिषद्) यहाँ श्रद्धा को ज्ञान योग्यता का प्रथम कारण कहा गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता प्रमाण !
“अश्रद्दधानाः पुरुषाः… न मे यान्ति परन्तप।”
अश्रद्धा आत्मज्ञान के द्वार को ही बंद कर देती है।
ब्रह्मसूत्र सिद्धान्त !
भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि वेदवाक्य का ग्रहण तभी फलदायी होता है, जब साधक श्रद्धान्वित हो।
श्रद्धा की अनिवार्यता भगवद्पाद शंकर का दार्शनिक निर्णय !
श्रद्धा आवश्यक है, क्योंकि ब्रह्म इन्द्रिय और तर्कातीत है। ब्रह्मज्ञान का एकमात्र प्रमाण शब्द-प्रमाण (वेद–वाक्य) है। तर्क अनन्त है, पर श्रद्धा निश्चय प्रदान करती है। श्रद्धा अहंकार-ग्रन्थि को शिथिल कर सद्गुरू वाक्य के लिए चित्त को प्रस्तुत करती है। इसलिए भगवान शंकराचार्य कहते हैं कि “अश्रद्दधानस्य बुद्धिः न अवतिष्ठते।”
"गीता-भाष्य ।
चित्तैकाग्र्यं तु सल्लक्ष्ये" समाधान का तात्त्विक स्वरूप ! सत् अर्थात् ब्रह्म यही सल्लक्ष्य है। उसी में चित्त की अविचल, अखण्ड एकाग्रता का नाम समाधान है। यह केवल ध्यान नहीं, बल्कि चित्त की स्थायी ब्रह्म–निष्ठा है।
विवेकचूडामणि में भगवद्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य का वचन है कि
“समाधानं नाम चित्तस्य स्थिरभावना ब्रह्मणि।” समाधान का आशय - विषय वृत्तियों से निवृत्ति, आत्म वस्तु में अखण्ड प्रवाह और अहं-वृत्ति का ब्रह्म-वृत्ति में लय है।
समाधान - प्रस्थानत्रयी का समर्थन !
उपनिषद् “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।”
(बृहदारण्यक) यह निदिध्यासन ही समाधान का परिपक्व रूप है।
श्रीमद्भगवद्गीता - “यतो यतो निश्चरति मनः… ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।” मन का बार–बार आत्मा में स्थिरीकरण समाधान है।
ब्रह्मसूत्र - ज्ञान का उदय अनन्य चित्तता से ही होता है; चित्त की एकाग्र निष्ठा ब्रह्म में।
श्रद्धा और समाधान - अविभाज्य द्वय !
श्रद्धा चित्त को गुरु वाक्य में स्थिर करती है। और, समाधान चित्त को ब्रह्म-वस्तु में स्थिर करता है।
श्रद्धा, समाधान, समाधि, और ज्ञान से अपरोक्षानुभूति। श्रद्धा चित्त-शुद्धि है।
समाधान चित्त-स्थैर्य है। जहाँ शुद्धि और स्थैर्य का संयोग, वहीं आत्म प्रकाश का उदय है ।
उपसंहार ।
इस श्लोक का भगवद्पाद आदि शंकराचार्य के सिद्धान्तानुसार निर्णायक निष्कर्ष यह है कि वेद-वाक्य और गुरु-वाक्य में दृढ़ विश्वास ही श्रद्धा है। ब्रह्म में चित्त की अखण्ड एकाग्रता ही समाधान है। इन दोनों के बिना आत्मज्ञान का उदय असम्भव है। श्रद्धा ज्ञान का द्वार खोलती है, समाधान उसे स्थायी करता है। दोनों के संयोग से ही अपरोक्षानुभूति आत्मसाक्षात्कार सम्भव होता है। अतः श्रद्धा और समाधान वेदान्त मार्ग के अन्तिम, किन्तु सर्वाधिक प्रकाशमान स्तम्भ हैं; इन्हीं पर मोक्ष मार्ग का सम्पूर्ण भार स्थित है।
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@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @pushkardhami @kishorekaya @FoundationLadli @LtGenGurmit @religionworldIN @epanchjanya श्री गुरु चरणों में शत शत नमन एवं वंदन 🌹🙏
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भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी की परम्परा के संवाहक, वैदिक सनातन धर्म संस्कृति के उन्नायक, आर्षविद्या के प्रखर स्वर, प्रस्थानत्रयी के अनुपम् व्याख्याता, विश्वप्रसिद्ध भारत माता मन्दिर के संस्थापक, श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्त श्रीविभूषित पद्मभूषण निवृत्त-शंकराचार्य ब्रह्मलीन पूज्यपाद गुरुदेव श्री स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज अध्यात्म जगत् की विलक्षण, शीर्षस्थ, शिखरस्थ दिव्य विभूति, सनातन संवेदनाओं के संरक्षक और धर्माचार्य समूह में परम् आदर्श रहे हैं।
ब्रह्मलीन करुणामूर्ति पूज्यपाद परम गुरुदेव श्री स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज के जन्म-जयन्ती के अन्तर्गत दो दिवसीय आध्यात्मिक महोत्सव "स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जयन्ती" श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्त श्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज "पूज्य आचार्यश्री जी" के पावन सानिध्य में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
कार्यक्रम के प्रथम दिवस देश के सुप्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतज्ञ पद्मश्री श्री मधुप मुद्गल जी ने शास्त्रीय गायन कर भावपूर्ण प्रस्तुति से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया ।
महोत्सव के आज "द्वितीय दिवस" पूज्य परम गुरुदेव की पावन स्मृतियों को जीवन्त रखने के लिए "पूज्य आचार्यश्री जी" की अध्यक्षता एवं देश के मूर्धन्य सन्तों की उपस्थिति में "जन्म जयन्ती महोत्सव" मनाया गया।
अपने उद्बोधन में "पूज्य आचार्यश्री जी" ने कहा कि परम् गुरूदेव ब्रह्मसूत्र के प्राण स्वर, समन्वय मंत्र के उद्गाता, उपनिषदों के ज्ञान-आलोक की साकारता और संकल्पसिद्ध सत्पुरुष थे। उन्होंने ब्रह्मलीन परम गुरुदेव जी के दिव्य तपोनिष्ठ - भगवदीय भाव सम्पन्न जीवन का स्मरण करते हुए कहा कि गुरु और परमात्मा उभय रूप में अभेद सत्ता है। शिष्य के कल्याण के लिए स्वयं परमात्मा ही गुरु रूप में अभिव्यक्त होता है। जो सत्य से परिचय करवाए वही "गुरु" है।
"पूज्य आचार्यश्री" ने आगे कहा कि आज सम्पूर्ण वैश्विक समस्याओं का एकमात्र समाधान भारतीय संस्कृति-संस्कारों और आध्यात्मिक जीवनशैली में ही निहित है। परम गुरुदेव जी ने देश-विदेश में वेद पाठशाला, अध्यात्म जागरण के अनेक संस्कार केन्द्र, फिजियोथेरेपी सेंटर, अनेक शिक्षण संस्थाएँ, चिकित्सा केन्द्र एवं अनेकों सेवा के प्रकल्प की स्थापना की। उनके द्वारा वनवासियों - गिरी वासियों के लिए प्रारम्भ की गई अनेक सेवा योजनाएँ, आज भी संचालित हैं। 'पूज्य गुरुदेव' ने शंकराचार्य का पद त्यागकर सेवा का मार्ग अपनाया और अभावग्रस्त बन्धु-भगिनियों के उत्थान हेतु आजीवन कार्य करते रहे।
इस पुण्य अवसर पर "पूज्य आचार्यश्री जी" द्वारा लिखित इंग्लिश की पुस्तक "LIGHT OF THE MASTER" का लोकार्पण हुआ।
इस अवसर पर अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पूज्य श्री स्वामी रविन्द्र पुरी जी महाराज, सोनीपत (हरियाणा) के सांसद श्री सतपाल ब्रह्मचारी जी, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री स्वामी अखिलेश्वरानन्द गिरि जी महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री स्वामी ललितानन्द गिरि जी महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री स्वामी प्रबोधानन्द गिरि जी महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री स्वामी हरिचेतनानन्द गिरि जी महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री स्वामी देवानन्द गिरि जी महाराज, वैष्णव मण्डल के अध्यक्ष पूज्य श्री स्वामी बलराम दास जी (हठ योगी जी महाराज), उदासीन अखाड़ा के पूज्य श्री स्वामी राघवेन्द्र जी महाराज, अवधूत मण्डल के पूज्य श्री स्वामी रूपेन्द्र प्रकाश जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी दुर्गादास जी महाराज, महामण्डलेश्वर पूजनीया स्वामी नैसर्गिका गिरि जी, स्वामीनारायण के पूज्य श्री स्वामी हरिवल्लभ दास जी महाराज, पूज्य आचार्य श्रीचन्द्रभूषण जी, श्री हरिहर आश्रम कनखल हरिद्वार के प्रबन्धक पूज्य श्री स्वामी कैलाशानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी सोमदेव गिरि जी महाराज, की पावन सन्निधि रही।
इस अवसर पर जनहित सेवा ट्रस्ट के सचिव श्री आई.डी. शास्त्री जी तथा देश के विभिन्न नगरों से पधारे संस्था के वरिष्ठ न्यासीगण, श्री मुकेश शुक्ला जी एवं उनकी सहधर्मिणी श्रीमती राधा शुक्ला जी, श्री महेन्द्र लाहोरिया जी, श्री कैलाश गुप्ता जी, श्री ब्रजेन्द्र वाजपेयी जी, श्री मनोज अग्रवाल जी, श्री सुरेश मोड जी, श्रीमती शशि गोयल जी, शहर के अनेक पूज्य सन्तगण, संस्था के वरिष्ठ अधिकारीगण श्री उदय नारायण पाण्डेय जी, श्री हरिहर जोशी जी, श्री विनोद शर्मा जी सहित देश-विदेश से पधारे अनेक साधक, अनेक गणमान्य जन तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु साधकों की उपस्थिति रही।
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सनातन वैदिक संस्कृति में "श्रीगणेश चतुर्थी" के पर्व और श्रीगणपति पूजन का विशेष स्थान है। भाष्यकार भगवान भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित पंचदेवोपासना में श्रीगणेश जी की सर्वप्रथम पूजा होती है, क्योंकि वे विघ्नविनाशक एवं कार्यसिद्धिदाता हैं। किसी भी शुभ कार्य की निर्विघ्न पूर्णता हेतु सर्वप्रथम श्रीगणेश पूजन का विधान है।
गणपति अथर्वशीर्ष में श्रीगणेश को “त्वं आनन्दमयः”, “त्वं ब्रह्ममयः”, “त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम्” कहकर वेदों ने उन्हें परब्रह्म स्वरूप आत्मसत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया है। वे मूलाधार चक्र के अधिष्ठाता देवता हैं, जो पृथ्वी तत्व का प्रतीक है। इसी कारण गणपति उपासना में प्रकृति और उसके अवयवों का उपयोग ही श्रेयस्कर माना गया है।
उत्सव सनातन संस्कृति की जीवन-शक्ति हैं। श्रीगणेश चतुर्थी भगवान श्रीगणेश के प्राकट्य महोत्सव के रूप में उल्लासपूर्वक मनाई जाती है। किन्तु वर्तमान समय में बड़ी संख्या में "प्लास्टर ऑफ पेरिस" अथवा "सिंथेटिक प्रतिमाओं" का निर्माण एवं उनका जल में विसर्जन पर्यावरण पर गंभीर दुष्प्रभाव डालता है। ये प्रतिमाएँ जल में न घुलने के कारण जल-प्रदूषण, मृदा-क्षरण तथा जलीय प्राणियों के लिए संकट उत्पन्न करती हैं और जल में प्राणवायु (ऑक्सीजन) की मात्रा को भी घटाती हैं।
सनातन परम्परा प्रकृति के सूक्ष्म संवेगों से निरन्तर एकीकृत रही है। पृथ्वी को ‘भगवद्भार्या’ और जल को आदिपुरुष भगवान नारायण तथा माता लक्ष्मी का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। अतः इन जीवनदायिनी तत्त्वों को प्रदूषित करना अधार्मिक और अहितकारी है।
श्रीगणेश, जो मूलाधार और पृथ्वी तत्त्व के अधिष्ठाता हैं, उनके पूजन में मिट्टी की प्रतिमाएँ ही आध्यात्मिक और पर्यावरणीय दृष्टि से श्रेष्ठ हैं। पूजनोपरान्त उन प्रतिमाओं की पवित्र मिट्टी का उपयोग वृक्षारोपण अथवा अन्य कल्याणकारी कार्यों में किया जा सकता है। इससे श्रीगणेश पूजन का आध्यात्मिक महत्त्व तो बढ़ता ही है, साथ ही प्रकृति और पर्यावरण भी सुरक्षित रहते हैं।
"श्रीगणेश चतुर्थी" केवल एक धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि प्रकृति-सम्मिलित उपासना का महापर्व है। यदि हम मिट्टी की प्रतिमाओं से पूजन कर, विसर्जन के बाद उस पावन मिट्टी का सदुपयोग करें, तो यह न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी, बल्कि सनातन संस्कृति का वास्तविक सन्देश भी जीवन्त होगा।
"वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।"
संकटमोचक विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक आदि समस्त तापों और अज्ञानजन्य दु:खों को दूर कर हमारा श्रेयस् पथ प्रशस्त करें।
"श्रीगणेश चतुर्थी" की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ।। ११ ।।
(ईशावास्योपनिषद)
•"विद्यां च" – विद्या अर्थात् देवताओं की उपासना, सूक्ष्म जगत का ज्ञान (अपरा विद्या)।
•"अविद्यां च" – अविद्या अर्थात् यज्ञ, दान, व्रत, लौकिक-भौतिक कर्म।
•"यः तद् वेद उभयं सह" – जो दोनों का यथार्थ ज्ञान और समुचित प्रयोग करता है।
•"अविद्यया मृत्युम् तीर्त्वा" – अविद्या के माध्यम से संसाररूपी मृत्यु को पार करता है (कर्म से चित्तशुद्धि)।
•"विद्यया अमृतम् अश्नुते" – विद्या के माध्यम से अमृतत्व (आत्मज्ञान और मोक्ष) को प्राप्त करता है।
भगवद्पाद आदि शंकराचार्य बताते हैं कि विद्या और अविद्या दोनों का समन्वय आवश्यक है।
•अविद्या (कर्म) से अज्ञानजन्य पाप और अशुद्धियाँ नष्ट होती हैं; यह संसार-संक्रमण के बन्धनों को काटने का आरम्भिक साधन है।
•विद्या (उपासना) से अन्तःकरण की एकाग्रता होती है, जिससे आत्मज्ञान का उदय होता है।
जो साधक इन दोनों को संतुलित रूप से अपनाता है, वह पहले अविद्या के साधन से मृत्यु (संसार-बन्धन) को पार करता है और फिर विद्या के साधन से अमृतत्व (मोक्ष) का अनुभव करता है।
यह मंत्र पिछले दो मंत्रों (९ और १०) का समाधान देता है।
•केवल अविद्या या केवल विद्या – दोनों अधूरे हैं।
•दोनों का संगठित प्रयोग ही मुक्ति की पूर्ण तैयारी है। अद्वैत वेदान्त कहता है कर्म और उपासना केवल साधन हैं; उनका अन्तिम उद्देश्य आत्मज्ञान है। जैसे नदी पार करने के लिए पहले नाव चाहिए (अविद्या – कर्म) और फिर तट तक पहुँचने के लिए नाव से उतरकर सीधा मार्ग (विद्या – उपासना), वैसे ही दोनों क्रमबद्ध रूप से आवश्यक हैं।
जीवन के महासागर को पार करने के लिए दो चरण हैं –
1. अविद्या रूपी बाहरी साधन – जो पाप-बन्धन और अशुद्धि को धो देता है।
2. विद्या रूपी आंतरिक साधन – जो हमें अमर तत्त्व के साक्षात्कार तक ले जाता है।मात्र एक चरण पर रुकना यात्रा को अधूरा छोड़ना है; दोनों का समन्वय ही पूर्णता का मार्ग है।
जो साधक विद्या और अविद्या – दोनों का यथार्थ ज्ञान रखता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार करता है और विद्या से अमृतत्व को प्राप्त करता है।
Īśāvāsya Upaniṣad – Mantra 11
“Vidyāṁ cāvidyāṁ ca yas tad vedobhayaṁ saha;
Avidyayā mṛtyuṁ tīrtvā vidyayāmṛtam aśnute.”
Word-by-Word Meaning
•Vidyām ca – Vidya: worship of deities, knowledge of the subtle worlds (apara-vidyā).
•Avidyām ca – Avidya: ritual action, charity, vows, and worldly/material disciplines.
•Yah tad veda ubhayam saha – One who understands and applies both together.
•Avidyayā mṛtyum tīrtvā – Crosses over death (worldly bondage) through Avidya (karma purifying the mind).
•Vidyayā amṛtam aśnute – Attains immortality (Self-realisation/liberation) through Vidya.
Ādi Śaṅkara explains that Vidya and Avidya must be integrated:
•Avidya (karma) removes impurities born of ignorance and prepares the ground for higher pursuit.
•Vidya (upāsanā) concentrates the mind and leads to the dawn of Self-knowledge.
The seeker who balances both first crosses the ocean of mortality with the help of Avidya, and then, through Vidya, realises the immortal Self.
This mantra resolves the warnings of the previous two (9 & 10):
•Neither Vidya alone nor Avidya alone suffices.
•Both serve as preparatory means, but liberation is attained only when they culminate in Self-knowledge. Advaita Vedānta likens this to a journey across a river: Avidya is the boat that carries you across the currents of death; Vidya is the final path from the shore to the summit of liberation.
The voyage to liberation has two stages:
1.Outer discipline (Avidya) – purifies and frees from gross bondage.
2.Inner refinement (Vidya) – reveals the deathless reality of the Self. Stopping at either stage leaves the journey incomplete; both must be harmonised to reach the goal.
He who knows both Vidya and Avidya together crosses death through Avidya and attains immortality through Vidya.
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स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरम् शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूयथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥८॥
(ईशावास्योपनिषद)
ईशावास्योपनिषद का यह अष्टम मंत्र, वेदान्त का हृदय है। यहाँ उपनिषद् ब्रह्म के निर्गुण-निराकार स्वरूप का परम आश्रय रूप में उद्घाटन करता है। श्रीमद् आदिशंकराचार्य अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि यह मंत्र साधक को बाह्य दृश्य जगत से हटाकर उस एक अद्वितीय सत्य की ओर ले जाता है, जो नित्य, निष्कलंक और सर्वव्यापक है।
पदान्वय और भावार्थ -
•"सः पर्यगात्" — वही (ब्रह्म) सब ओर व्याप्त है, सबका आच्छादन करता है, किन्तु किसी में लिप्त नहीं होता।
•"शुक्रम्" — ज्योतिर्मय, चेतनस्वरूप, शुद्ध प्रकाश के समान।
•"अकायम्" — जिसका कोई स्थूल-सूक्ष्म शरीर नहीं; देहधर्म से रहित।
•"अव्रणम्" — जिसमें कोई दोष या खोट नहीं।
•"अस्नाविरम्" — नस-रक्तादि से रहित; भौतिक रचना का अंश नहीं।
•"शुद्धम्" — माया और उसके उपाधियों से सर्वथा परे।
•"अपापविद्धम्" — पाप के स्पर्श से अतीत, पुण्यापुण्य से परे।
•"कविः" — सर्वज्ञ, कालत्रयदर्शी।
•"मनीषी" — अनन्त चैतन्य में स्थित, तत्वबुद्धि से युक्त।
•"परिभूः" — सबका अतिक्रमण करने वाला, सभी के ऊपर स्थित।
•"स्वयम्भूः" — स्वयंभू, किसी कारण से उत्पन्न नहीं।
•"यथातथ्यतः अर्थान् व्यदधात्" — जैसे हैं वैसे ही, सब पदार्थों की व्यवस्था करता है।
•"शाश्वतीभ्यः समाभ्यः" — शाश्वत कालों से यही सत्य प्रतिष्ठित है।
भगवद्पाद आदि शंकराचार्य कहते हैं कि
यह मंत्र ब्रह्म की निर्दोष, निरुपाधिक सत्ता का प्रतिपादन करता है। ब्रह्म का पर्यगत होना इस तथ्य का बोध कराता है कि वह सर्वव्यापक है, किन्तु वस्तुओं की भाँति सीमित नहीं। “अकाय” शब्द से यह निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्म न जन्म लेता है, न बदलता है, और न ही विनष्ट होता है। “शुद्ध” और “अपापविद्ध” से संकेत है कि उसमें संसार का संसर्ग भी नहीं है—न पुण्य, न पाप, न बन्धन, न मुक्ति; ये सब केवल जीव के अज्ञानजन्य उपाधि में हैं।
आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि “कवि” और “मनीषी” शब्द ब्रह्म के सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान स्वरूप को व्यक्त करते हैं, किन्तु यह सर्वज्ञता किसी मानसिक क्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि स्वभावतः नित्य है।
अद्वैत में ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है—"सत्यं ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म"। इस मंत्र में जो विशेषण आए हैं—शुद्ध, अपापविद्ध, अकाय, अव्रण—ये सभी जगत में किसी भी वस्तु पर लागू नहीं हो सकते, केवल ब्रह्म पर ही लागू होते हैं।
•सर्वव्यापकता (पर्यगत) यह दर्शाती है कि ब्रह्म ‘यहाँ’ और ‘वहाँ’ का भेद रहित है।
•निर्दोषत्व (अव्रण, अपापविद्ध) यह सिद्ध करता है कि ब्रह्म किसी कर्मफल से बंधा नहीं।
•निराकारत्व (अकाय, अस्नाविर) यह बताता है कि ब्रह्म इन्द्रियगोचर नहीं, केवल आत्मानुभव से ही जाना जा सकता है। अद्वैत का साधक इस मंत्र को श्रवण-मनन-निदिध्यासन में रखते हुए यह अनुभव करता है कि मैं ही वह शुद्ध, ज्योतिर्मय, निर्लेप ब्रह्म हूँ—शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार सब मुझ पर आरोपित हैं, किन्तु मैं उनसे परे हूँ।
इस ज्ञान के द्वारा साधक का अहंकार लय को प्राप्त होता है। पुण्य-पाप, सुख-दुःख, जीवन-मरण—ये सब केवल उपाधियों में हैं, आत्मा में नहीं। जब साधक “अहं ब्रह्मास्मि” का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेता है, तब उसके लिए समस्त जगत केवल ब्रह्मस्वरूप ही दिखता है, और यही मोक्ष है।
That all-pervading Brahman is pure, self-luminous, formless, flawless, without sinews, untouched by virtue or vice; the all-seeing, all-knowing, supreme, self-existent Lord who has, from eternity, ordered all things as they are.
Śaṅkara explains that Brahman pervades all without limitation, has no body, is beyond change, and remains untouched by karma. “Pure” and “untouched by sin” mean free from all dualities of merit and demerit, bondage and liberation. Its omniscience is natural, not acquired, and it transcends all while being the cause of all.
In Advaita, this is the Self—satyam jñānam anantam—ever free, formless, and stainless. Meditation on this truth dissolves the ego’s false identity. One realizes: “I am not body or mind; I am the pure, infinite, stainless Brahman—eternal, self-existent, and one without a second.”
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अनेजदेकं मनसो जवीयो
नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्
तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ।। ४ ।।
(ईशावास्योपनिषद्)
यह मंत्र ब्रह्म की परमार्थसत्ता, उसकी सर्वव्यापकता और गति से परे स्थित नित्यत्व को प्रकट करता है। शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में यह मंत्र ब्रह्म की निराकार, निरविकारी एवं अद्वितीय प्रकृति का मार्मिक निरूपण है।
"अनेजत् एकम्" — ब्रह्म “अनेजत्” है — अचल, अडोल, जिसे कोई गति नहीं; वह कहीं से आता नहीं, कहीं जाता नहीं। वह “एकम्” है — अद्वितीय, निर्विशेष, समस्त भेद से रहित। न तो वह किसी से भिन्न है, और न उसमें कोई आन्तरिक भिन्नता है।
“मनसः जवीयः” — यह ब्रह्म, गति में भी मन से अधिक तीव्र है। मन, जो सबसे सूक्ष्म और शीघ्रगामी तत्त्व है, वह भी ब्रह्म की पूर्णता को नहीं पा सकता। यहाँ “गति” प्रतीक है - ज्ञान-गमन का — यह इंगित करता है कि ब्रह्म इन्द्रियों या मन-बुद्धि के द्वारा जानने योग्य नहीं है।
“नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वम् अर्षत्” — “देवाः” अर्थात् इन्द्रियाँ — वे भी ब्रह्म को पकड़ नहीं पातीं, क्योंकि ब्रह्म तो पहले ही सबकी पहुँच से परे है। वह सभी ज्ञानेन्द्रियों से परात्पर है, ज्ञेय नहीं है, केवल अनुभवगम्य है। जो जानने वाले हैं, वे भी जब जानने का प्रयत्न करते हैं, वह पहले ही अगोचर हो चुका होता है।
“तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्” — वह स्थिर है, फिर भी वह सब गतिशीलों से आगे निकल जाता है। यह विरोधाभास केवल अद्वैत के परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है — ब्रह्म स्वयं अकिंचित होता हुआ भी सर्वगामी है; वह गति नहीं करता, फिर भी सब गतियों की अधिष्ठान-चेतना वही है।
“तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति” - मातरिश्वा अर्थात् वायु — वह भी उसी ब्रह्म में स्थित होकर ही कार्य करता है। समस्त प्रकृति और पंचमहाभूत उसी ब्रह्म में निहित हैं; उसी की सत्ता में उनका आधार है।
आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यह ब्रह्म न तो इन्द्रियों से ज्ञेय है, न मन-बुद्धि से ग्राह्य। केवल शुद्ध आत्मबोध द्वारा — श्रद्धा, ध्यान और गुरु-शास्त्रोपदेश के माध्यम से — इसका साक्षात्कार संभव है। ब्रह्म समस्त गति का अधिष्ठान है, स्वयं गति नहीं करता, क्योंकि वह ही सबका मूलस्वरूप है। ब्रह्म न दृश्य है, न दृश्यकर्ता; न वह अनुभव का विषय है, न अनुभव करने वाला — वह ‘साक्षी’ है, परमार्थ में एकमेव तत्त्व है जो स्वयं को ही प्रकाशित करता है।
यह मंत्र जीवन की दृष्टि को भीतर की ओर मोड़ता है। ब्रह्म बाहर नहीं, भीतर स्थित वह अचल ज्योति है, जो सभी गतियों को संभव बनाती है। जो मन से भी परे है, इन्द्रियों से अगोचर है, और फिर भी सर्वत्र है — वही ब्रह्म है। उसका अनुभव ही जीवन का परम प्रयोजन है।
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः, न मेधया न बहुना श्रुतेन – यमेवैष वुते तेन लभ्यः” — यही वेदान्त का मर्म है। ब्रह्म को जानना नहीं, बन जाना होता है।
संक्षेप में, यह मंत्र अद्वैत दर्शन के उस सत्य की ओर संकेत करता है जहाँ गति और अचलता, भिन्नता और अभिन्नता, ज्ञाता और ज्ञेय — सब विलीन होकर एक अखण्ड ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। यही परा दृष्टि है — यही आत्म-साक्षात्कार।
Īśāvāsya Upaniṣad – Mantra 4
“Anejad ekam manaso javīyo
nainad devā āpnuvan pūrvam arṣat।
tad dhāvato’nyān atyeti tiṣṭhat
tasminn apo mātariśvā dadhāti ॥”
This mantra reveals the paradoxical nature of Brahman — unmoving, yet swifter than the mind; beyond the senses, yet the basis of all motion.
Though still, it outpaces all that moves, as it is the very source of existence. Senses and thoughts cannot grasp it, for it is ever beyond their reach.
All cosmic forces, including air and water, function within it.
Brahman is changeless, all-pervasive, and ever-present — not to be reached, but to be realized as the Self.
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"दक्षिणामूर्ति स्त्रोत - ध्यानम्"
ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये।निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ।। ५।।
भारतीय अद्वैत वेदान्त की दृष्टि में गुरु वह नहीं जो केवल शब्द देता है, वरन् वह है जो शब्दातीत तत्त्व में प्रतिष्ठित होता है। शब्द वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ ब्रह्म नहीं होता; पर जहाँ ब्रह्म है, वहाँ मौन है।
इस श्लोक में आदि शंकराचार्य ने दक्षिणामूर्ति को प्रणव (ॐ) का अर्थ, शुद्धज्ञान की एकमात्र मूर्ति, निर्मल चैतन्य, और प्रशान्त तुरीय ब्रह्म के रूप में वंदित किया है। यह कोई वैयाकरणीय स्तुति नहीं, अपितु उपनिषदों में संचित ज्ञान की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।
“ॐ नमः प्रणवार्थाय” — दक्षिणामूर्ति: प्रणव का तात्त्विक अर्थ
माण्डूक्योपनिषद् उद्घोष करता है — “ॐ इत्येतदक्षरं इदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वम् ॐकार एव।”
अर्थात् यह सम्पूर्ण विश्व- भूत, भविष्य, वर्तमान यह सब ‘ॐ’ में ही स्थित है।
भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य माण्डूक्य भाष्य में लिखते हैं - “प्रणवः सूचकः ब्रह्मणः, न तु वर्णमात्रम्” ॐ कोई ध्वनि मात्र नहीं है, अपितु निर्गुण ब्रह्म का सघन सूचक है। दक्षिणामूर्ति प्रणव के अर्थ हैं — वे न केवल ‘ॐ’ का उच्चारण हैं, अपितु उसके तत्त्व हैं। प्रणव के अ, उ, म् तीनों वर्ण जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं का संकेत करते हैं, और चतुर्थ-तुरीय- जो अविभाज्य, शब्दातीत, शान्त और अद्वैत है, वही दक्षिणामूर्ति का वास्तविक स्वरूप है।
शुद्धज्ञानैकमूर्तये” — केवल ज्ञानस्वरूप मूर्ति
तैत्तिरीयोपनिषद् (2.1.1) कहता है -
“सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म”
यहाँ ‘ज्ञान’ कोई ज्ञेय वस्तु नहीं, अपितु ब्रह्म का स्वरूप है।
भगवद्पाद शंकराचार्य इस पर भाष्य करते हैं -
“न तु इदं ज्ञानं गुणः, किं तु स्वरूपम्” - ज्ञान कोई ब्रह्म का अतिरिक्त गुण नहीं, उसकी स्वाभाविक सत्ता है। दक्षिणामूर्ति ज्ञान देने वाले नहीं, वे स्वयं ज्ञानस्वरूप ब्रह्म हैं। उनकी “एकमूर्ति” दर्शाती है कि वे सर्वविकल्परहित, केवल ज्ञानरूप हैं - जो “द्वैतस्य अभावात् केवलं ज्ञानम् इति”
“निर्मलाय”- अविद्या, राग, द्वेषादि से रहित ब्रह्म ।
श्वेताश्वतर उपनिषद् कहती है —
“एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः”
वह रुद्र (शिव / ब्रह्म) अकेला ही है, उसके अतिरिक्त कोई नहीं।
निर्मलता का तात्पर्य है - मलरहित स्थिति।
“मल’ (अविद्या) है: अहंकार, ममता, राग, द्वेष, और देहबुद्धि। दक्षिणामूर्ति उस निर्मल चैतन्य का मूर्त रूप हैं, जो “अविद्या कल्पितोपाधि रहितः आत्मा” है।
शंकराचार्य आत्मबोध ग्रन्थ में कहते हैं —
“निर्मलं परमं शान्तं ज्ञानस्वरूपं निःस्पृहं”
यह वर्णन दक्षिणामूर्ति के इसी शुद्ध, निर्विकारी स्वरूप को उद्घाटित करता है।
“प्रशान्ताय” — तुरीय ब्रह्म की निःशब्द शान्ति
माण्डूक्योपनिषद् में तुरीय की परिभाषा है - “नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं… न प्रज्ञानघनं, शान्तं शिवं अद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते।”
यह चतुर्थ अवस्था दक्षिणामूर्ति का प्रत्यक्ष स्वरूप है। वे न जाग्रत हैं, न स्वप्न, न सुषुप्त — वे हैं तुरीय, जो प्रशान्तम् है- कर्मरहित, चिन्तारहित, विकल्परहित चैतन्य।
शंकराचार्य, गीता भाष्य में कहते हैं — “प्रशान्तरूपं आत्मानं विविक्तदेशसेवी भव” ब्रह्म वह है, जो शान्त है - आन्तरिक, सदा साक्षीभाव में स्थित। दक्षिणामूर्ति की यह प्रशान्ति उपासना की सिद्धि नहीं, आत्मा की सहज स्थिति है।
दक्षिणामूर्ति - उपनिषदों में प्रतिपादित ब्रह्म का मूर्तिमान स्वरूप है। उपनिषदों में जिन विशेषणों से ब्रह्म का वर्णन किया गया है, वे सब दक्षिणामूर्ति के इस एक श्लोक में समाहित हो जाते हैं।
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अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात् स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।
अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥
- मुण्डकोपनिषद् २.१.९
मुण्डकोपनिषद् के इस गूढ़ मंत्र में उपनिषद् के ऋषि हमें सृष्टि के उस अद्वितीय सत्य के दर्शन कराते हैं, जो हमारी कल्पना से परे है, पर हमारे हृदय के समीप है। अर्थात् वही अद्वितीय ब्रह्म है, जिससे समुद्र, पर्वत, नदियाँ; सृष्टि के अनन्त रूप उत्पन्न होते हैं। उसी से उत्पन्न होती हैं - औषधियाँ, रस, और वही अन्तरात्मा है, जो समस्त प्राणियों के भीतर स्थित है।
भगवद्पादाचार्य आद्य शंकराचार्य अपने भाष्य में इस मंत्र के गूढ़ अर्थ को उजागर करते हैं - कहते हैं कि उपनिषद् यहाँ सृष्टि के हर एक आयाम में उस एकमात्र सत्-तत्त्व की सत्ता दिखा रहा है। समुद्र से लेकर पर्वतों तक, नदियों से लेकर औषधियों के रस तक — सृष्टि के रंगमंच पर विविध रूप जिनका सृजन और संहार होता है, उस एक ही चेतना से अंकुरित होते हैं।
सबसे सुन्दर इस मंत्र में है - इसका अंतिम उपदेश “येनेष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा,” वही अद्वितीय ब्रह्म प्रत्येक प्राणी के भीतर अन्तरात्मा रूप से स्थित है। आद्य शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि जिस चेतना से यह विशाल सृष्टि साकार होती है, वही हृदयगुहा में दीपक के समान प्रज्वलित है - नित्य, निर्विकार, अविनाशी।
इस उपनिषद् मंत्र में अद्वैत वेदान्त का मूल सन्देश गूँजता है - “एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक रूपों में देखते हैं। इस दृश्य जगत में जितना विस्तार है, उतना ही गहरा है, भीतर स्थित साक्षी। सृष्टि का प्रत्येक रूप उसी अद्वितीय सत्ता से उपजा है, प्रत्येक रस उसी के अमृत से सिंचित है, प्रत्येक चेतना उसी से प्रकाशित है।
अन्त में इस मंत्र के सन्देश में उपनिषद्कार हमें उस एकत्वबोध की ओर बुलाते हैं, जहाँ समुद्र, पर्वत, औषधि, रस- सब केवल बाहरी अभिव्यक्तियाँ हैं। उनका मूल कारण वही अन्तरात्मा है, वही सत्यम्, वही शिवम्, वही सुन्दरम् है । इस उपदेश में वेदान्त का सार निहित है — “अयमात्मा ब्रह्म” यह आत्मा ही ब्रह्म है।
- Muṇḍaka Upaniṣad 2.1.9
“From That alone all oceans and mountains flow forth; rivers pour and take countless shapes. From That emerge all herbs and their essence, for it is That which dwells as the Inner Self in all beings.”
“The Infinite Self Within”
In this profound verse, the sage reveals the very heart of Advaita the Supreme Brahman as the source of all that is. Adi Śaṅkarācārya, in his commentary, lovingly reminds us that the ocean and the mountain, the river and its every winding path, the forest with its countless herbs and juices — all originate from this one indescribable Reality.
It is this One, eternal and unborn, that manifests as the world of names and forms, giving birth to every leaf, every drop of rain, and every breath of life. But the most exquisite teaching lies in the final words of the mantra — “That which dwells in all beings as the Inner Self.” Śaṅkara tells us that the Supreme Reality is not distant, not confined to the clouds or the ocean, but present in the very depths of our own hearts as the ever-radiant witness.
This is the heart of Advaita: the essence that pervades every atom of creation also shines quietly within you as the eternal Ātman — untouched by time, beyond sorrow and joy, forever pure.
The Message of Oneness !
In these sacred words, the Upaniṣad gently reveals a profound and liberating insight — though creation appears manifold and diverse, all things rise from, live by, and return to That one Brahman. The universe is a grand play of forms, yet its essence is singular and sublime.
When one truly contemplates this teaching, one realizes that we are never apart from this ocean of Being. The very life we feel surging within us is That — the immortal, formless Supreme — dwelling as our own true Self.
As Śaṅkarācārya expounds, liberation is found in knowing this eternal Self. Beyond all duality and change, the soul returns to its source, resting forever in the ocean of pure Consciousness.
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@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @myogiadityanath @ParmatmanandJi @epanchjanya @davidfrawleyved @kishorekaya @EkatmaDham सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरन्ये त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏
MR

गुप्त नवरात्र सनातन धर्म संस्कृति परंपरा का एक गहन, गूढ़ और आत्म-संनादति पर्व है, जो साधक को माँ आदिशक्ति के नौ स्वरूपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्री- के माध्यम से परम तत्व की साधना में संनिमग्न करता है। यह नौ रात्रियों का पावन काल मात्र बाह्य उपासना का अवसर नहीं, अपितु आत्मा के अद्वैत भाव में संनादति शिव-शक्ति के अभिन्न स्वरूप का साक्षात्कार है। भगवद्पादाचार्य जगद्गुरु शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत के आलोक में यह साधना और भी गहन, साहित्यिक, और वेदांतपरक हो उठती है, जहाँ शक्ति और शिव का एकत्व ही परम सत्य के रूप में उद्घाटित होता है।
भगवद्पादाचार्य आद्य शंकराचार्य ने सौन्दर्यलहरी में कहा है ;
“शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि।”
इस श्लोक में अद्वैत वेदांत का मूल मंत्र निहित है — शिव चेतना का शाश्वत तत्व है, किन्तु शक्ति के बिना वह निष्क्रिय, निस्पंद है। शक्ति ही वह गतिशीलता है, जो विश्व की सृष्टि, स्थिति, और संहार को संनादति करती है। अद्वैत में शिव और शक्ति का यह संनादन एक ही परम तत्व के दो पहलू हैं — जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति, जैसे सूर्य और उसका प्रकाश। गुप्त नवरात्रि में माँ भगवती की साधना साधक को इस अभिन्नता का साक्षात्कार कराती है, जहाँ सगुण और निराकार का भेद मिट जाता है।
माँ भगवती, जो साक्त परंपरा में विश्व की जननी, रक्षिका, और संहारिणी हैं, वही अद्वैत के दृष्टिकोण से निराकार ब्रह्म का सगुण स्वरूप हैं। आद्य शंकराचार्य ने अपने दर्शन में स्पष्ट किया है कि यह विश्व मायाशक्ति का प्रपंच है, और माया ही वह शक्ति है, जो ब्रह्म को सगुण रूप में प्रकट करती है। गुप्त नवरात्रि की साधना में साधक इस मायाशक्ति को आत्मसात् करता है, और माँ के स्वरूपों में निहित उस ब्रह्म-तत्व को अनुभव करता है। प्रत्येक स्वरूप-शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक उस परम तत्व का एक पहलू है, जो साधक को स्थूल से सूक्ष्म, और सूक्ष्म से परम की ओर ले जाता है।
गुप्त नवरात्रि का विशेष महत्व इसके रात्रिकाल में निहित है। रात्रि वह काल है, जब इंद्रियाँ शांत होती हैं, मन का कोलाहल थमता है, और आत्मा का आलोक प्रखर हो उठता है। प्राचीन ऋषियों ने इस रहस्य को जानकर गुप्त नवरात्रि को शक्ति साधना का विशेष काल माना। यह वह समय है, जब साधक का मन बाह्य जगत से मुक्त होकर अंतर्मुखी होता है, और वह माँ भगवती के स्वरूप में स्वयं के चैतन्य को दर्शन करता है। रात्रि की नीरवता में मंत्र, ध्यान, और तप की गहनता साधक के अंतःकरण को शुद्ध करती है, और उसे उस अद्वैत भाव की ओर ले जाती है, जहाँ “अहं ब्रह्मास्मि” का साक्षात्कार होता है।
गुप्त नवरात्रि की साधना केवल बाह्य अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह परम कल्याणकारी यात्रा है, जहाँ साधक माँ के प्रत्येक स्वरूप में निहित दार्शनिक मर्म को आत्मसात् करता है। उदाहरणार्थ, शैलपुत्री स्थिरता और मूलाधार की प्रतीक हैं, जो साधक को स्थूल शरीर से जोड़ती हैं; वहीं सिद्धिदात्री वह परम सिद्धि हैं, जो आत्मा को ब्रह्म में विलीन कर देती हैं। यह क्रमिक यात्रा वेदांत के उस सिद्धांत को रेखांकित करती है, जो स्थूल से सूक्ष्म, और सूक्ष्म से कारण की ओर ले जाता है।
अद्वैत भाव में शक्ति का साक्षात्कार
गुप्त नवरात्रि का अंतिम लक्ष्य है साधक का अपने भीतर के शिव-शक्ति संनादन में संनादति होना। भगवद्पादाचार्य के अनुसार, यह विश्व मायाशक्ति का खेल है, किन्तु इस माया का आधार ब्रह्म है। जब साधक माँ भगवती की साधना करता है, तो वह इस माया को पार करता है और उस ब्रह्म का साक्षात्कार करता है, जो सर्वदा एक, अखंड, और शाश्वत है। माँ भगवती का प्रत्येक स्वरूप इस सत्य का एक दर्पण है, जो साधक को स्वयं के स्वरूप का बोध कराता है।
भगवद्पादाचार्य आद्य शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत के आलोक में, यह साधना हमें उस परम सत्य की ओर ले जाती है, जहाँ साधक, शक्ति और शिव का भेद मिट जाता है। अतः इस गुप्त नवरात्रि में माँ भगवती के चरणों में हमारी श्रद्धा और साधना अर्पित हो, ताकि उनके कृपाप्रसाद से हम उस चिदानंदलहरी में लीन हो सकें, जो जीवन को ऊर्जा, आनंद, सिद्धि, और मुक्ति से संनादति करती है।
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English

यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं
मनः सह प्राणैश्च सर्वम्।
तं वै विदित्वा न बिभेति कस्माच्चित्
न तस्य कश्चित् जनिता न चाधिपः॥”
- मुण्डकोपनिषद् २.१.५
यह मंत्र उस परम ब्रह्म का बोध कराता है, जिसमें यह सम्पूर्ण जगत-स्वर्ग, पृथ्वी, आकाश, मन, प्राण सहित समस्त जीव ओत-प्रोत हैं। यह ब्रह्म अजन्मा, निराकार, स्वतन्त्र और सर्वव्यापक है। जिसने इसे जान लिया, वह भय से मुक्त हो जाता है।
भगवद्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार, यह सारा जगत मायिक-प्रपञ्च है, जो ब्रह्म पर स्वप्नवत आरोपित है। ब्रह्म ही सबका अधिष्ठान है, और “ब्रह्मैव इदं सर्वम्” — यही अद्वैत वेदान्त का मूल तत्त्व है। जहाँ ब्रह्म का अनुभव होता है, वहाँ न द्वैत रहता है, न भय। न उसका कोई जनक है, न स्वामी वह स्वयंप्रकाश चैतन्य है।
भगवद्पाद शंकराचार्य इस मंत्र को निर्भयता का वेदान्तीय घोष मानते हैं। ब्रह्मज्ञान से “आत्मबोधात् मुक्तिः” होती है और भय, बन्धन और अज्ञान का नाश होता । “तम् वै विदित्वा न बिभेति कस्माच्चित्” — जो ब्रह्म को जानता है, वह किसी से भय नहीं करता; क्योंकि अब कोई “अन्य” नहीं रह जाता ।
यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं
मनः सह प्राणैश्च सर्वम्।
तं वै विदित्वा न बिभेति कस्माच्चित्
न तस्य कश्चित् जनिता न चाधिपः॥”
Muṇḍaka Upaniṣad 2.1.5
This mantra reveals the Supreme Brahman in whom all existence — heaven, earth, sky, mind, prāṇas, and all beings — is woven like pearls on a thread. This Brahman is eternal, formless, unborn, independent, and all-pervading. One who realizes this truth becomes completely free from fear.
According to Ādi Śaṅkarācārya, the visible world is a projection (māyika prapañca) superimposed on Brahman — like a dream upon consciousness. Brahman is the substratum of all forms, and “Brahmaiva idaṁ sarvam” — all this is indeed Brahman.
Where there is Brahman-realization, there is no duality; and where there is no duality, fear ceases. Brahman has no creator, no ruler — it is pure, self-revealing Consciousness.
Śaṅkarācārya regards this mantra as a declaration of Vedantic fearlessness. Through Brahma-jñāna, one attains “ātmabodhāt muktiḥ” — liberation through Self-realization.
“taṁ vai viditvā na bibheti kasmāc” — He who knows Brahman fears nothing, for in that realization, no “other” remains.
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तं ह ब्रह्मा विद्याम् ब्रह्मविद्यां श्रेष्ठां
प्रोवाच नित्यम् यया आत्मा विमृश्यते।
तां चापि तत्सत्यपरा ऋषयः विद्यां
वदन्ति तां निःश्रेयसं।।
- मुण्डकोपनिषद् २.१.२
यह मंत्र उस शाश्वत ब्रह्मविद्या की महिमा गाता है, जिससे आत्मा का साक्षात्कार होता है। यह विद्या ब्रह्मा ने अपने योग्य शिष्य को दी और सत्यनिष्ठ ऋषियों ने इसे निःश्रेयस — परम कल्याण का मार्ग कहा।
आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं — “सा च विद्या परा या आत्मा अधिगम्यते”, अर्थात् वही परा विद्या है, जिससे आत्मा का ज्ञान होता है। यह केवल पठन-पाठन नहीं, वरन् अनुभूति का विषय है — गुरु से प्राप्त होने वाली जीवन-परिवर्तनकारी दीक्षा।
यह ज्ञान कर्मकाण्ड से परे है — यह मुक्ति की कुंजी है। ऋषियों ने इसे अनुभव से जाना है, केवल तर्क से नहीं। इसका उद्देश्य है — निःश्रेयस, न कि केवल सुख या पुण्य। यह ज्ञान तभी फलता है, जब शिष्य पात्र हो और गुरु श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ।
यह मंत्र वेदान्त का हृदय है। यह बताता है कि सबसे बड़ी विद्या वही है, जिससे आत्मा का बोध हो। शेष सभी विद्याएँ उसकी भूमिका हैं। स्वयं को जानने वाली विद्या ही 'ब्रह्मविद्या' है — वही जीवन का चरम लक्ष्य है।
“Taṁ ha brahmā vidyām brahmavidyāṁ śreṣṭhāṁ
provāca nityam yayā ātmā vimṛśyate;
tāṁ cāpi tat-satyaparā ṛṣayaḥ vidyām
vadanti tāṁ niḥśreyasam.”
— Muṇḍaka Upaniṣad 2.1.2
This profound mantra from the Muṇḍaka Upaniṣad glorifies Brahmavidyā — the supreme spiritual knowledge by which the Self (Ātman) is realized. It is the timeless wisdom that Brahmā taught to worthy disciples and which enlightened seers, rooted in truth, call the path to niḥśreyasa — ultimate liberation.
Adi Śaṅkarācārya, in his commentary, emphasizes:
“Sā ca vidyā parā yā ātmā adhigamyate” —
That alone is parā vidyā (higher knowledge) by which the Self is known. Unlike ritualistic or scriptural knowledge (apara vidyā), Brahmavidyā leads directly to mokṣa (freedom), transcending karma, rebirth, and duality.
This vidyā is not an intellectual pursuit, but a lived inner realization transmitted through the guru-śiṣya tradition. The ṛṣis who spoke of it had experienced Brahman — they didn’t merely describe it, they became one with it.
Eternal and timeless, rooted in experience.
Transmitted through qualified teachers, not mere texts.
Aims at niḥśreyasa — supreme spiritual well-being.
Enables direct inquiry into the Self, not external rituals.
This mantra reorients the goal of life — from outer achievement to Self-realization. It affirms that among all types of knowledge, the one that reveals the Self is paramount. All other disciplines are merely its auxiliaries. Know that one truth by which everything is known — the Self. That alone is "Brahmavidyā".
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स यद् ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति ।
तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ।।
- मुण्डकोपनिषद् १.१.४
मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र वेदान्त दर्शन का सार प्रस्तुत करता है, जो आत्मज्ञान-ब्रह्मज्ञान की महत्ता को रेखांकित करता है। यह मंत्र ब्रह्मज्ञान के गहन आध्यात्मिक और प्रायोगिक निहितार्थों को स्पष्ट करता है। प्रथम, यह बताता है कि परम ब्रह्म का ज्ञान व्यक्ति को उससे एकरूप कर देता है। यह वेदान्त का मूल सिद्धान्त “तत्त्वमसि” तू वही है, को प्रतिपादित करता है। ब्रह्मज्ञान द्वारा व्यक्ति अपनी सीमित अहंता को त्यागकर शुद्ध चैतन्य स्वरूप को पहचान लेता है। दूसरा, मंत्र कहता है कि ब्रह्मज्ञानी के कुल में अज्ञान नहीं रहता। यह दर्शाता है कि व्यक्तिगत ज्ञान का प्रभाव परिवार और समाज के आध्यात्मिक उत्थान तक विस्तारित होता है। तीसरा, यह मंत्र शोक (दु:ख) और पाप (कर्म-बन्धन) से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। अज्ञान और आसक्ति से उत्पन्न होने वाले दु:ख और कर्मों के बन्धन ब्रह्मज्ञान द्वारा समाप्त हो जाते हैं। चौथा, यह हृदय की ग्रंथियों—अज्ञान, इच्छा और अहंकार—से मुक्ति की बात करता है, जो व्यक्ति को अपनी शाश्वत प्रकृति से जोड़ती है। अंततः, यह अमृतत्व की प्राप्ति अर्थात् जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) का वर्णन करता है।
इस मंत्र का प्रायोगिक महत्व भी अत्यन्त गहरा है। यह साधक को श्रवण, मनन और निदिध्यासन के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। आत्मानुशासन, सत्संग और गुरु मार्गदर्शन द्वारा व्यक्ति ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर हो सकता है। साथ ही, यह मंत्र यह भी सिखाता है कि व्यक्तिगत आध्यात्मिक प्रगति समाज और परिवार के कल्याण का आधार बन सकती है। इस प्रकार, मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र आत्मज्ञान के माध्यम से परम मुक्ति और सामाजिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है, जो साधक को न केवल व्यक्तिगत शान्ति, बल्कि सामूहिक कल्याण की ओर भी ले जाता है।
“The Path to Liberation” !
This mantra encapsulates the essence of Vedanta, emphasizing the transformative power of Brahman-knowledge. It teaches that realizing the Supreme Brahman unites the individual with the ultimate truth, dissolving the ego and aligning with the principle of “Tat Tvam Asi” (You are That). Such knowledge not only liberates the individual but also uplifts their family and society, ensuring no one remains ignorant. It frees one from sorrow and the bondage of karma, untying the heart’s knots—ignorance, desires, and ego. Ultimately, it leads to moksha, liberation from the cycle of birth and death, granting spiritual immortality.
Practically, the mantra urges spiritual discipline through study, reflection, and meditation. It highlights that personal enlightenment fosters collective welfare, guiding individuals and society toward lasting peace and liberation.
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