@TMCaTweetAway@CEO_Maharashtra I am a voter with cerebral palsy I am residing in Diva please provide me pickup and drop facility on 15 Jan 2026 with Wheelchair Accessible Vehicle for TMC election
@SVTMumbai I have cerebral palsy and plan to visit the temple on **Friday, November 14th**. I kindly request information regarding the availability of a wheelchair at the temple premises for my use during the visit.
आप सभी को अक्षय तृतीया की अनंत शुभकामनाएं। मानवता को समर्पित यह पावन पर्व हर किसी के लिए सफलता, संपन्नता और प्रसन्नता लेकर आए, जो विकसित भारत के संकल्प को नई शक्ति प्रदान करे।
@kaankit Rashtrapati ko bolna supreme court ke seema me hai ya nahi ye to nahi pata but mera manna hai sabhi kaam 1 time ke andar hona chahiye Rashtrapati ko agar decline karna hai to kare but bahut time tak pending na rakhe I am agree with Supreme Court
न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका!
भारत के संवैधानिक और संसदीय इतिहास में कई बार ऐसे क्षण आए हैं जब न्यायपालिका और कार्यपालिका (या विधायिका) आमने-सामने खड़ी हुई हैं.
‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ जैसे ऐतिहासिक मामलों से लेकर कई ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें संविधान की व्याख्या और सत्ता के संतुलन को लेकर टकराव का लंबा इतिहास रहा है.
इन दिनों भी कुछ वैसा ही दौर चल रहा है.
वक्फ संशोधन विधेयक पर सुप्रीम कोर्ट के आज के अंतरिम आदेश पर गरमागरम बहस चल रही है.
लेकिन आज से लगभग एक सप्ताह पहले, 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट के एक और फैसले ने इस बहस को तेज कर दिया था—यह फैसला तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल आर.एन. रवि मामले में आया था.
इसी फैसले पर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी को तीखी टिप्पणी करनी पड़ी.
पहले समझिए मामला क्या था!!
तमिलनाडु की एम.के. स्टालिन सरकार ने समय-समय पर 10 विधेयक विधानसभा में पारित किए थे. लेकिन राज्यपाल आर.एन. रवि ने इन विधेयकों को न तो मंजूरी दी, न राष्ट्रपति को भेजा, और न ही कोई कारण बताकर उन्हें वापस किया — कुछ विधेयक तो 2020 से लंबित थे.
इस स्थिति को लेकर तमिलनाडु सरकार ने 2023 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
8 अप्रैल 2025 को, सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए फैसला सुनाया - सभी 10 विधेयकों को "स्वीकृत माना गया" , यानी अब ये विधेयक कानून माने जाएंगे, भले ही राज्यपाल ने उन पर हस्ताक्षर न किए हों.
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कुछ टिप्पणी भी की गई:
* राज्यपाल का विधेयकों पर इस तरह लंबा इंतज़ार कराना संविधान के खिलाफ है.
* राज्यपाल “पॉकेट वीटो” का इस्तेमाल नहीं कर सकते। विधेयक पर कोई कार्रवाई न करना असंवैधानिक है.
* राज्यपाल राजनीतिक गेटकीपर नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रमुख हैं — उनकी भूमिका प्रतीकात्मक है, न कि विधायी प्रक्रिया में बाधा डालने की.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों के लिए विधेयक को पास करने के लिए समय-सीमा भी तय कर दी:
▪️मंत्रीमंडल की सलाह पर विधेयक को मंज़ूरी/विचार: 1 महीने
▪️सलाह के खिलाफ अस्वीकृति: कारण बताकर 3 महीने में वापस करें.
▪️पुनः पारित विधेयक की मंज़ूरी: 1 माह के भीतर.
लेकिन असली बहस की जड़ सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी में है जो राष्ट्रपति की भूमिका से जुड़ी है.
कई लोगों का मानना है कि अदालत ने यहां अपनी संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण किया है.
दरअसल, कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा विचार के लिए राष्ट्रपति को भेजा गया है, तो राष्ट्रपति को उस पर बिना अनावश्यक देरी के निर्णय लेना चाहिए—चाहे वह मंजूर हो या अस्वीकृत.
साथ ही, इस प्रक्रिया पर न्यायिक निगरानी संभव है, यानी अदालत यह देख सकती है कि राष्ट्रपति ने निर्णय में अनुचित देरी तो नहीं की.
अब सवाल उठ रहा है—
क्या न्यायपालिका भारत के राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप कर सकती है?
क्या यह संविधान में तय शक्तियों और संतुलन की सीमाओं से बाहर जाना नहीं है?
@dm_puri@JagannathaDhaam@CMO_Odisha I am personal with cerebral palsy I will visit Puri on Feb 21 I need wheelchair accessible vehicle and accommodation facility with english toilet for Feb 21 and 22
करीब एक दर्जन podcast का न्योता अस्वीकार करने के बाद फाइनली इस फॉर्मेट में लंबी बातचीत का साहस जुटा पाया हूं। @carahulmalodia के youtube चैनल पर मेरा पहला podcast का वीडियो आया है।
वीडियो already दो घंटे लंबी है इसलिए यहां और intro नही देता हूं। मेरे काम में अगर थोड़ी भी दिलचस्पी है तो इस वीडियो को देखिए और अपनी राय दीजिए कि इस लोकप्रिय फॉर्मेट में मैं सहज था या नही!
लिंक नीचे है.
youtu.be/WXMjzin1Uw0?si…
एमडीएच और एवरेस्ट के 4 उत्पादों में कीटनाशक एथिलीन ऑक्साइड पाई गई है।
हांगकांग के खाद्य विनियामक संस्था ने एमडीएच और एवरेस्ट के 4 उत्पादों में कैंसर पैदा करने वाले तत्व पाएं हैं।
इन उत्पादों में कीटनाशक एथिलीन ऑक्साइड की उच्च मात्रा पाई गई है।
इन संस्थाओं का यह भी कहना है कि इन पदार्थों के लंबे समय तक संपर्क में रहने पर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती है।
सिंगापुर के अधिकारियों ने भारत से आयातित एवरेस्ट फिश करी मसाला को वापस भी मंगा लिया है।
आजकल एक बाद एक इस तरह की खबरें आ रही हैं। बहुत से विश्वसनीय ब्रांड इस तरह की खबरों की वजह से चर्चा में हैं।
@CEO_Maharashtra@ECISVEEP I am physically disabled in our area voting schedule on 20 May please provide pickup and drop facility to me or provide vote from home facility
अभी कुछ दिन पहले अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट आई ।
इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में विश्वविद्यालय स्नातकों में बेरोजगारी दर 29.1% है, जबकि जो पढ़ या लिख नहीं सकते उनमें यह दर 3.4% है।
और अब यह खबर कि IIT BOMBAY जैसे प्रीमियम संस्थान में 36% छात्रों का कैंपस प्लेसमेंट नही हुआ है।
क्या "UPSC समय की बर्बादी है" ?
इस विषय पर पिछले पोस्ट पर कई लोगों के बेहद तार्किक कॉमेंट्स आएं हैं।
आपके टिप्पणियों और अपने अनुभव को शामिल करते हुए ,आज इतवार के youtube लाइव सेशन में इसी विषय पर बातचीत होगी।
जुड़िए!!
youtu.be/KtPAH_qBFGM