Rolu Shukla 🇮🇳

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Rolu Shukla 🇮🇳

Rolu Shukla 🇮🇳

@shukla32003

वाराणसी Katılım Eylül 2023
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Rolu Shukla 🇮🇳
Rolu Shukla 🇮🇳@shukla32003·
गाँव की दावत... शादियों का मौसम आने वाला है। शहरों मे हर जगह दावतों के दौर शुरू होने ही वाले हैं। जब से इवेंट्स मैनेजमेंट वाले आये हैं, तब से बारात मे बैंड बाजा ठीक से बजा हो या ना बजा हो, खाने की बैंड ज़रूर बज गई है। पता नही क्या बनाते हैं कि इतना पैसा ख़र्चा करने के बाद भी खाने मे कोई स्वाद नही आता है। सभी व्यंजनों मे एक सा स्वाद और वह स्वाद भी केवल तेल मसालों के दम पर। वैसे इन खानों से पाचन क्रिया पर जो भयंकर बोझ पड़ता है वो एक अलग समस्या है। मै तो अमूमन आजकल किसी भी शादी विवाह से बिना खाये ही निकल लेता हूँ। शहर की आपाधापी वाले फ़ंक्शन्स के पहले शादी विवाह एक बेहद ही ख़ुशी का मौक़ा हुआ करता था। महीनों पहले से लोग इनका इंतज़ार करते थे। गाँव मे किसी के यहाँ भी शादी हो, सबके लिये एक उत्सव सा प्रतीत होता था। शादी विवाह का मौका गाँव के लोगो के बीच फैले अगाध प्रेम संबंधों का एक आइना होता था। घर वाले दिल की गहराइयों से सबको निमंत्रण देते थे और जी जान से यह प्रयास करते थे कि किसी को भी निमंत्रण देना भूल ना जायें। शादी विवाह मे दावत और खाने पर हमेशा विशेष ध्यान दिया जाता था। फलाने की शादी मे क्या क्या बना था और किस शादी मे क्या खास बना था, यह हमेशा चर्चा का विषय होता था। एक ही कार्ड मे पूरे गाँव को खाने का निमंत्रण मिल जाता था और निमंत्रण के बाद पूरा गाँव दावतों का बेसब्री से इंतज़ार करते था। मुझे याद है कि गाँव के गाँव पैदल ही चल देते थे दूसरे गाँवों मे दावत उड़ाने के लिये। बड़े बुजुर्ग गांव की भारी भीड़ को साथ लेकर हाथ मे लाठी और कंधे पर कुर्ता रखे हुए बडी शान से दावत मे जाते थे। सभी न्योतहरी ( निमंत्रण पाने वाले ) के हाथ मे चमचमाता हुआ पीतल का लोटा ज़रूर रहता था। दिसंबर जनवरी की कंपाने वाली ठंड मे भी बच्चे बूढ़े सभी कपड़ा उतार कर और जमीन पर पंक्ति मे बैठ कर दोना पत्तल मे खाना खाते थे, और खाना परोसने वाले को भी धोती या गमछा पहन कर ही परोसने की इजाज़त होती थी । दावत का खाना भी अमूमन निश्चित होता था। आलू कोहडा़ (कद्दू) या अरवी का भरता, पूड़ी-कचौड़ी और चक्की मे पीसी हुई चीनी और मट्ठा। पीतल का लोटा खाने के बाद मट्ठा पीने के काम आता था। खाने मे जोश इतना कि यदि परोसने मे थोड़ी सी भी कमी आ जाए तो बुजुर्ग अपना आपा खो देते थे और भरे समाज मे परोसने वालों को अपमानित भी कर देते थे। कई लालची बुजुर्ग तो कम परोसने वालों को धत् सारे, रेरकट, दरिद्री, कह कर गाली भी दे देते थे। वैसे परोसने वाले इस पर कोई प्रतिक्रिया नही देते थे और खाने वाले इन बातों पर खूब मज़ा लेते थे। इस तरह दावतों मे खाने के साथ साथ हास्य विनोद का तड़का भी खूब होता था। क्या शानदार, क्या मजेदार और क्या खाने के लिये उत्साह भरी होतीं थी गांव की दावतें। उसे आज की तारीख मे शब्दों से व्यक्त कर पाना नामुमकिन है। जिसने उन दावतों का मज़ा लिया है, वही उसकी अनुभूति कर सकते हैं। उस दावत मे ना ही फ्रूटचाट दिखता था और ना ही पेप्सी कोला... ना तो मटर पनीर, शाही पनीर ,मलाई कोफ्ता जैसे हाई फ़ाई व्यंजन होते थे ...और ना ही खाने के अंत मे रसमलाई और आइस्क्रीम जैसे डेज़र्ट होते थे। फिर भी उन दावतों मे स्वाद बेहिसाब होता था। फिर भी उस दावत के लिए बच्चे,बड़े बुजुर्ग सभी लालायित रहते थे। फिर भी लोग मीलों पैदल चलकर दावत खाने जाते थे। वजह थी कम्यूनिटी फीलिंग। एक के यहाँ का उत्सव सबके घर का उत्सव था। सभी मिलकर इन प्रयोजनों की तैयारी भी करते थे और इनका आनंद भी मिलकर उठाते थे। सामुदायिक जीवन प्रणाली का जीवंत उदाहरण थे पहले के शादी विवाह। खाने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता था साथ मे खाना, और यह साथ की भावना ही उन तमाम मौक़ों को यादगार और स्वादिष्ट बनाती है। समाज मे एक आपसी प्रेम था। जीवन ऑरगैनिक हुआ करता था, आर्टिफीसियल नही । एक जुड़ाव था आपस मे और इसीलिये शादी विवाह एक कम्यूनिटी इवेंट के रूप मे स्थापित था। सबका शामिल होना ही शादी की सफलता थी और यह ध्यान रखा जाता था कि कोई छूट ना जाये। शायद इसीलिये दावत मे उत्साह था और भोजन मे स्वाद। और हाँ दावत से लौटते वक़्त यह चर्चा ज़रूर होती थी कि क्या अच्छा बना और क़िसमे स्वाद कम था। गाँव के लोगों को दशकों तक याद रहता था कि किस व्यक्ति की शादी मे क्या कमी रह गई थी और किसकी शादी मे क्या खास था। ग्राम सभ्यता के इतिहास मे शादी की दावतों का एक अपना ही स्थान है। जिन लोगों ने ऐसी दावतों का मज़ा लिया है उनके चेहरे पर ज़रूर एक मुसकान आयेगी और वह बरबस ही ऐसी किसी दावत की यादों मे डूब जायेंगे। शेष फिर कभी ... @DrKumarVishwas सर आप की प्रतिक्रिया क्या है!
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Rolu Shukla 🇮🇳@shukla32003·
The spiritual moment when you go out to eat alone at night in another country…
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Rolu Shukla 🇮🇳
Rolu Shukla 🇮🇳@shukla32003·
@ravikishann रवि भैया, सच कहूँ तो वहाँ का एक साधारण कैब ड्राइवर भी आपसे ज़्यादा समझदार निकला। उसे साफ दिख रहा है कि धर्म के नाम पर लोगों को बाँटने की कोशिश हो रही है, जबकि वह खुद सिर्फ विकास की बात कर रहा है। जनता अब इतनी भी भोली नहीं है कि हर बार बहक जाए। इसलिए हाथ जोड़कर निवेदन है, कृपया लोगों को भटकाना बंद कीजिए और इस वीडियो को ध्यान से देखिए।
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Abhinav Pandey
Abhinav Pandey@Abhinav_Pan·
धर्म के नाम पर खुला वोट माँगना आचार संहिता का उल्लंघन है
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Prakash Dadlani
Prakash Dadlani@prakdadlani·
I used to import batteries from China. It was a nightmare: * dangerous cargo * BIS issues * cash flow blocked for months Then my China supplier told me: There's a guy in India buying BIG from us. Contact him. His name was Paaras: 🧵👇🏻
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Rolu Shukla 🇮🇳@shukla32003·
बचपन में कॉपी पर जिनका स्टिकर लगाते थे, आज भी दिल में वही हीरो हैं ❤️ Happy Birthday, God of Cricket 🐐 @sachin_rt Sir!
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Marcel Münch
Marcel Münch@_mm85·
400+ Robotics Companies here in Shenzhen today! If you are here, let me know!
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Chubby♨️
Chubby♨️@kimmonismus·
Day Three in China: Future Technology for the World I'm on my third day in China and, as a German, I'd like to share my completely subjective but neutral perspective and impressions with you, without any preconceptions. After getting a good overview of the situation in China on days 1 and 2, I was able to examine the technology on day 3. Days 1 and 2 showed me that the infrastructure in China is very well developed. The roads, at least in the major cities, have no potholes; everything is digitized and works. This is quite unlike Germany, where there seem to be construction sites everywhere that drag on for years. We visited the XPeng production facilities. While it's primarily about car production, and that exists in other countries as well, something else impressed me completely: flying cars. Yes, that's right. In China, they believe that flying cars will be the next big thing. And that got me thinking: creativity and the courage to try things out. Whether flying cars will catch on, I don't know. However, it's the experimentation and testing, the creativity, that has been lost in Germany and Europe. I remember that in Germany, such ideas were also pursued, but quickly abandoned. In that respect, China is bolder in taking such new paths and, yes, in trying out new technologies. The Xpeng headquarters, in turn, had a minimalist look, reminiscent of Apple in Cupertino. The highlight, of course, was the humanoid robots. High technology now comes from China and competes directly with the USA. To what extent Germany can still compete is questionable. In short: day three showed me what I miss in Germany: creativity, courage, and the desire to try things out and develop technology in all directions.
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Sunil Gurjar, CFTe
Sunil Gurjar, CFTe@sunilgurjar01·
The Backbone of Indian Stock Market You Can’t Ignore 📊 -MCX -BSE -CDSL -NSDL
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Marnix_B.
Marnix_B.@Marnix_Belgium·
Chinese drivers licence is renewed again. NIO ES9, i am coming!
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Rolu Shukla 🇮🇳@shukla32003·
POV:@AudiIN looking for a new Brand Ambassador Me: already posing with invisible Audi 😌😂
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Jackson Hinkle 🇺🇸
Jackson Hinkle 🇺🇸@jacksonhinklle·
🇨🇳 China spends BILLIONS on development, NOT WAR!
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Rolu Shukla 🇮🇳
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हम विश्वगुरु थे या नहीं पता नहीं, लेकिन 2011 से पहले सवाल पूछने की आज़ादी जरूर थी — क्या वही असली golden time था?
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Ravi Prakash Official
Ravi Prakash Official@raviprakash_rtv·
मैं एक दक्षिण भारतीय हूँ। तेलुगु मेरी मातृभाषा है। मैंने अपना पूरा जीवन तेलुगु भाषा और तेलुगु टेलीविजन के लिए काम करते हुए बिताया है। लेकिन आज जीवन में पहली बार मैंने हिंदी में एक वीडियो बनाया। क्यों? क्योंकि मैं अपने उत्तर भारतीय भाइयों और बहनों से दिल से बात करना चाहता था। आज जिस परिसीमन की बात हो रही है, उससे दक्षिण भारत के राज्यों को कितना नुकसान हो सकता है, यह समझाना जरूरी लगा। यह सिर्फ राजनीति का विषय नहीं है, यह हमारे देश के संतुलन और न्याय का सवाल है। मैं आपसे सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि यह महान भारतवर्ष हम सबका है। जितना अधिकार उत्तर भारत का है, उतना ही अधिकार दक्षिण भारत का भी है। और अगर दक्षिण भारत के साथ कोई नाइंसाफी होती है, तो यह सिर्फ दक्षिण की नहीं, पूरे भारत की चिंता होनी चाहिए। इसलिए मैंने आज पहली बार हिंदी में बात करने की कोशिश की, ताकि हम एक-दूसरे को बेहतर समझ सकें और एक-दूसरे के साथ खड़े हो सकें। उम्मीद है आपको मेरी हिंदी समझ आई होगी, और अगर कहीं कोई त्रुटि रह गई हो तो दिल से क्षमा चाहता हूँ। आइए, भाषा से नहीं, भावना से जुड़ें। क्योंकि हम सब मिलकर ही भारत हैं। 🇮🇳❤️
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