
sunil joshi
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sunil joshi
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योगेंद्र यादव का यह कहना कि “देश का भविष्य संसद से नहीं, सड़क से तय होगा” और “चुनाव से नहीं, resistance से होगा” सिर्फ़ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की संवैधानिक चेतावनी के ठीक विपरीत खड़ा है। 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में बाबासाहेब ने स्पष्ट कहा था कि जब संवैधानिक रास्ते खुले हों, तब civil disobedience, non-cooperation और ऐसे असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने इन्हें “Grammar of Anarchy” कहा था और चेताया था कि लोकतंत्र को बचाना है तो ऐसे तरीकों का त्याग करना होगा। भारत में सरकारें संसद और चुनाव से बनती हैं, सड़क पर हिंसा, अराजकता और दबाव की राजनीति से नहीं। विडंबना देखिए, जो लोग हर बात पर संविधान बचाने का दावा करते हैं, वही आज खुलेआम संविधान द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक प्रक्रिया को चुनौती दे रहे हैं। बाबासाहेब की सबसे बड़ी सीख यही थी कि असहमति का अधिकार है, लेकिन उसका मार्ग संविधान के भीतर होना चाहिए। जो लोग चुनावों के बजाय “resistance” और सड़क को सत्ता परिवर्तन का माध्यम बताते हैं, वे दरअसल उसी “Grammar of Anarchy” का समर्थन कर रहे हैं, जिसके ख़िलाफ़ बाबासाहेब ने देश को आगाह किया था. लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु मतपत्र नहीं, बल्कि वह सोच है जो जनादेश को सड़क की अराजकता से पलटना चाहती है।
































