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sunil pal
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@sunilpal101 ताजा आम दो तब खाऊँगी ये पुराना आम cold storage का आम मत खिलाओ
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आज एक ऐसा वीडियो देखा जिसने दिल को अंदर तक हिला दिया...
वीडियो खत्म हुआ तो एक साहब की कुछ पंक्तियाँ याद आ गईं -
तुम्हारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावे किताबी हैं!!
कागज़ों में सब कुछ कितना सुंदर दिखता है - सुविधाएं, इलाज, व्यवस्था लेकिन हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है।
इस वीडियो में एक बुजुर्ग दंपत्ति नजर आए - थके हुए, लाचार सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए आए थे,
लेकिन न एम्बुलेंस मिली, न व्हीलचेयर।
आखिरकार, उसी अस्पताल के भीतर बुजुर्ग पति अपनी बीमार पत्नी को साइकिल पर बैठाकर ले जा रहा था। हर पैडल के साथ उसकी सांसें भी जैसे भारी हो रही थीं और पत्नी का झुका हुआ शरीर उस बेबसी की गवाही दे रहा था,
जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
वो सिर्फ एक सफर नहीं था,
वो एक मजबूरी थी, एक दर्द था,
जो इस सिस्टम की खामोशी को चीख-चीख कर बता रहा था।
सोचिए, जिस उम्र में इंसान को सहारे की जरूरत होती है,
उस उम्र में वो खुद सहारा बनकर अपने दर्द को ढो रहा है।
क्या यही है वो गुलाबी मौसम जिसकी तस्वीरें हमारी फाइलों में सजाई जाती हैं?
ये दृश्य सिर्फ आंखों को नम नहीं करता,
बल्कि दिल में एक टीस छोड़ जाता है - कि आखिर कब तक हकीकत और दावों के बीच ये खाई बनी रहेगी?



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