Pawan Vasudev

3.6K posts

Pawan Vasudev banner
Pawan Vasudev

Pawan Vasudev

@vasudevpawan7

Gurgaon, India Katılım Ekim 2016
12 Takip Edilen108 Takipçiler
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
1
17
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
अभिरङ्गैः समाकारो राजयोग उदाहृतः। किंचित् पक्वकषायानां हठयोगेन संयुतः।।१४३।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त की साधना में जहाँ ज्ञान का परम लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार है, वहीं उस ज्ञान की सिद्धि के लिए अन्तःकरण-शुद्धि, चित्त-एकाग्रता और वासनाक्षय अनिवार्य साधन माने गए हैं। प्रस्तुत श्लोक में भगवान् आदि शंकराचार्य योग की भूमिका का अत्यन्त सूक्ष्म और समन्वित निरूपण करते हैं - विशेषतः राजयोग और हठयोग के सन्दर्भ में। प्रथम पद “अभिरङ्गैः समाकारो राजयोग उदाहृतः” - यहाँ ‘अभिरङ्ग’ शब्द योग के आन्तरिक अंगों का द्योतक है। यह पतञ्जलि के अष्टाङ्गयोग के अन्तर्गत आने वाले धारणा, ध्यान और समाधि जैसे सूक्ष्म, अन्तरमुखी साधनों की ओर संकेत करता है। ‘समाकार’ का अर्थ है - चित्त का अपने ध्येय के साथ एकरूप हो जाना। जब साधक का मन बाह्य विषयों से निवृत्त होकर भीतर की ओर प्रवाहित होता है और ब्रह्मविचार में तन्मय हो जाता है, तब वह अवस्था राजयोग कही जाती है। अद्वैत वेदान्त के परिप्रेक्ष्य में यह राजयोग कोई स्वतंत्र साधना-पथ नहीं, अपितु ज्ञान की परिपक्वता का साधन है। यहाँ चित्त की वृत्तियाँ ‘ब्रह्माकार’ होकर स्थिर हो जाती हैं यही निदिध्यासन की पराकाष्ठा है। इस अवस्था में साधक का मन न केवल एकाग्र होता है, बल्कि अपने ध्येय शुद्ध चैतन्य में तदाकार हो जाता है। यही ‘समाधि’ का अद्वैतार्थ है, जहाँ ध्यान करने वाला, ध्यान का विषय और ध्यान की प्रक्रिया तीनों का लय हो जाता है। द्वितीय पद “किंचित् पक्वकषायानां हठयोगेन संयुतः” - इस साधना की व्यावहारिक भूमिका को और स्पष्ट करता है। ‘कषाय’ शब्द यहाँ सूक्ष्म वासनाओं, संस्कारों और राग-द्वेषों का बोध कराता है, जो चित्त में गहरे स्तर पर विद्यमान रहते हैं। “किंचित् पक्वकषाय’ वे साधक हैं, जिनकी वासनाएँ पूर्णतः क्षीण नहीं हुई हैं, किन्तु कुछ हद तक परिपक्व (अर्थात् शिथिल) हो चुकी हैं। ऐसे साधकों के लिए भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य ‘हठयोग’ का भी सहायक रूप में स्वीकार करते हैं। हठयोग जिसमें आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा आदि साधन आते हैं - शरीर और प्राण को शुद्ध एवं स्थिर बनाकर चित्त को एकाग्र करने में सहायक होता है। यहाँ हठयोग को प्रधान साधन नहीं, बल्कि सहयोगी साधन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, विशेषतः उन साधकों के लिए, जिनकी अन्तःकरण-शुद्धि अभी पूर्ण नहीं हुई है। अद्वैत वेदान्त का स्पष्ट मत है कि मोक्ष का कारण केवल ज्ञान है - ज्ञानादेव कैवल्यम्।” किन्तु उस ज्ञान की प्राप्ति और स्थिरता के लिए चित्त की शुद्धि और स्थिरता आवश्यक है। इसी सन्दर्भ में यह श्लोक योग के विविध अंगों का समुचित स्थान निर्धारित करता है ! राजयोग : चित्त की अन्तर्मुखता और ब्रह्मतदाकारता के लिए, हठयोग : शरीर-प्राण की शुद्धि और चित्त की तैयारी के लिए; यहाँ भगवद्पाद आदि शंकराचार्य का दृष्टिकोण अत्यन्त संतुलित और समन्वयी है। वे न तो योग का पूर्ण निषेध करते हैं, न उसे परम साधन मानते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि योग विशेषतः राजयोग ज्ञान की साधना में सहायक है, और हठयोग प्रारम्भिक शुद्धि के लिए उपयोगी हो सकता है। इस प्रकार, यह श्लोक साधक को यह शिक्षा देता है कि वह अपने स्तर के अनुसार साधनों का चयन करे; यदि वासनाएँ शेष हैं, तो हठयोग से चित्त को शुद्ध करे और अन्ततः राजयोग अर्थात् ध्यान, समाधि और ब्रह्मतदाकारता के द्वारा ज्ञान को अनुभूति में परिणत करे। अन्ततः, जब चित्त पूर्णतः निर्मल और स्थिर हो जाता है, तब वही ज्ञान जो श्रवण और मनन से प्राप्त हुआ था- निदिध्यासन के द्वारा अपरोक्षानुभूति में परिणत हो जाता है। यही अद्वैत वेदान्त की साधना की परिपूर्णता है, जहाँ योग और ज्ञान का समुचित समन्वय साधक को उसके नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित करता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
78
84
260
1.9K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
1
21
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
दृश्यं ह्यदृष्टितां नीत्वा ब्रह्माकारेण चिन्तयेत्। विद्वान् नित्यसुखे तिष्ठेद् धिया चिद्रसपूर्णया।।१४२।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त के साधना-पथ में यह श्लोक दृष्टि-परिवर्तन (Shift of Vision) की उस चरम प्रक्रिया का निर्देश करता है, जिसके द्वारा साधक दृश्य-जगत् के बन्धन से मुक्त होकर शुद्ध चैतन्य में प्रतिष्ठित होता है। यहाँ भगवान् आदि शंकराचार्य न केवल जगत् के मिथ्यात्व का बोध कराते हैं, अपितु यह भी बताते हैं कि उस बोध को साधना में कैसे रूपान्तरित किया जाए। प्रथम पद “दृश्यं ह्यदृष्टितां नीत्वा” - इस साधना का मूल रहस्य है। ‘दृश्य’ अर्थात् जो कुछ इन्द्रियों द्वारा अनुभव किया जाता है - रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श; शरीर, मन, विचार, भाव ये सब ‘दृश्य’ हैं। सामान्यतः मनुष्य इन दृश्यों को सत्य मानकर उनसे आसक्त हो जाता है, और यही आसक्ति बन्धन का कारण बनती है। किन्तु यहाँ उपदेश है इन दृश्यों को ‘अदृष्टि’ में ले जाओ अर्थात् उनकी स्वतंत्र सत्ता का निषेध करो। यह ‘अदृष्टि’ कोई अज्ञान नहीं, बल्कि ज्ञानजन्य निषेध है - जहाँ साधक यह समझता है कि दृश्य का कोई स्वातन्त्र्य अस्तित्व नहीं है; वह केवल चैतन्य में अधिष्ठित एक आभास मात्र है। यहाँ ‘अदृष्टितां नीत्वा’ का तात्पर्य है दृश्य को इस प्रकार देखना कि वह ‘दृश्य’ के रूप में सत्य प्रतीत न हो; उसकी ‘वस्तुत्व-बुद्धि’ का लोप हो जाए। जैसे स्वप्न के जागने पर स्वप्न-दृश्य अपनी वास्तविकता खो देता है, वैसे ही ज्ञान के उदय पर यह जगत् ‘मिथ्या’ के रूप में ज्ञात होता है - न पूर्णतः असत्, न पूर्णतः सत्, अपितु केवल आभास। द्वितीय पद “ब्रह्माकारेण चिन्तयेत्” - इस निषेध के पश्चात् साधना का सकारात्मक पक्ष प्रस्तुत करता है। जब दृश्य का मिथ्यात्व बोध हो जाए, तब चित्त को ‘ब्रह्माकार’ में स्थित करो अर्थात् ब्रह्म के स्वरूप में ही चिन्तन करो। यह ‘ब्रह्माकार-वृत्ति’ वह मानसिक स्थिति है, जिसमें चित्त की समस्त वृत्तियाँ एक ही तत्त्व शुद्ध, अखण्ड, निराकार चैतन्य में लीन हो जाती हैं। यहाँ साधक निरन्तर यह अनुभव करता है - “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, “अहं ब्रह्मास्मि” मैं ही वह चैतन्य हूँ, जो सबका आधार है। तृतीय पद “विद्वान् नित्यसुखे तिष्ठेत्” - इस साधना की परिणति को दर्शाता है। जब चित्त पूर्णतः ब्रह्ममय हो जाता है, तब साधक ‘नित्यसुख’ अर्थात् उस आनन्द में स्थित हो जाता है, जो न इन्द्रियों पर आश्रित है, न परिस्थितियों पर, न किसी वस्तु की प्राप्ति या अप्राप्ति पर। यह आनन्द आत्मस्वरूप है - नित्य, अविकार, अखण्ड। यह सुख किसी अनुभव का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयं अस्तित्व का स्वभाव है। अन्तिम पद “धिया चिद्रसपूर्णया” - इस स्थिति की आन्तरिक अवस्था को और स्पष्ट करता है। ‘धिया’ अर्थात् बुद्धि या चित्त; ‘चिद्रसपूर्णया’ जो चैतन्य-रस से परिपूर्ण हो गई है। जब साधक की बुद्धि पूर्णतः चैतन्यमय हो जाती है, तब उसमें कोई अन्य विषय, कोई अन्य वृत्ति शेष नहीं रहती। वह ‘चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्’ - इस अनुभूति में स्थिर हो जाता है। यहाँ अद्वैत वेदान्त का एक अत्यन्त सूक्ष्म सिद्धान्त प्रकट होता है - निषेध और अधिष्ठान का समन्वय। पहले दृश्य का निषेध (नेति-नेति), फिर ब्रह्म का अधिष्ठान (सर्वं ब्रह्म) इन दोनों के द्वारा साधक उस स्थिति तक पहुँचता है, जहाँ न निषेध की आवश्यकता रहती है, न अधिष्ठान की केवल शुद्ध चैतन्य का अखण्ड अनुभव रह जाता है। व्यवहारिक दृष्टि से यह श्लोक साधक को यह शिक्षा देता है कि जब वह जगत् को देखे, तो उसकी ‘सत्ता’ को न माने, बल्कि उसे चैतन्य का आभास समझे और साथ ही अपने चित्त को ब्रह्म में स्थिर रखे जहाँ कोई द्वैत नहीं, कोई भेद नहीं। अन्ततः इस साधना के परिपाक से साधक उस अवस्था में पहुँचता है, जहाँ वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मस्वरूप में स्थित रहता है। वहाँ न संसार का बन्धन है, न मोक्ष की आकांक्षा केवल स्वप्रकाश, अखण्ड आनन्द का अनुभव है। यही "अपरोक्षानुभूति" की परिपूर्णता है - जहाँ दृश्य का लोप होकर, ब्रह्म का ही अखण्ड प्रकाश शेष रह जाता है, और साधक उसी में, उसी के रूप में, सदा-सर्वदा स्थित रहता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
81
102
293
3K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
9
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
5
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
“भवैतं गतिवेगेन वस्तु यन्निश्चयात्मना। पुमांस्तद्धि भवेच्छिघ्रं ज्ञेयं भ्रमरकीवत्।।१४०।।” अद्वैत वेदान्त की साधना में चित्त की एकाग्रता, निश्चय और तदाकारता का जो अप्रतिम महत्त्व है, उसका अत्यन्त सुन्दर और सजीव निरूपण इस श्लोक में किया गया है। यहाँ भगवान् आदि शंकराचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य जिस तत्त्व का दृढ़ निश्चयपूर्वक, अखण्ड भाव से और तीव्र वेग के साथ चिन्तन करता है, वह शीघ्र ही उसी का स्वरूप धारण कर लेता है - जैसे भ्रमरकीट न्याय में वर्णित है। इस श्लोक का प्रथम पद “भवैतं गतिवेगेन वस्तु यन्निश्चयात्मना” - यह संकेत करता है कि साधक का मन जब किसी एक तत्त्व में अचल निश्चय (निश्चयात्मना) और अभ्यास की तीव्रता (गतिवेग) के साथ प्रवाहित होता है, तब वह मन उस तत्त्व के साथ अभेदता का अनुभव करने लगता है। यहाँ ‘गतिवेग’ केवल बाह्य तीव्रता नहीं, अपितु अन्तःकरण की निरन्तरता, अनवरतता और तन्मयता का बोध कराता है। यह वही स्थिति है, जिसे उपनिषद् “यद्भावं तद्भवति” जिस भाव में स्थित होता है, वही बन जाता है के रूप में उद्घोषित करते हैं। द्वितीय चरण “पुमांस्तद्धि भवेच्छिघ्रं” - यह स्पष्ट करता है कि यह रूपान्तरण कोई दूरस्थ, कल्पित या विलम्बित प्रक्रिया नहीं है; अपितु यह शीघ्र सम्भव है, यदि साधना में दृढ़ता, श्रद्धा और निरन्तरता हो। यहाँ ‘भवेत्’ शब्द केवल बाह्य अनुकरण का बोध नहीं कराता, बल्कि स्वरूप-साक्षात्कार का सूचक है; अर्थात् साधक अपने ही वास्तविक स्वरूप, ब्रह्मभाव को पहचान लेता है। श्लोक के अन्तिम भाग “ज्ञेयं भ्रमरकीवत्” में ‘भ्रमर-कीट न्याय’ का अत्यन्त सशक्त उपमान दिया गया है। जिस प्रकार एक कीट (लार्वा) भ्रमर (भौंरे) के भय और निरन्तर ध्यान के कारण, उसी का चिन्तन करते-करते अन्ततः भ्रमर के स्वरूप को धारण कर लेता है; उसी प्रकार साधक, जब निरन्तर ब्रह्म का चिन्तन करता है, तब वह ब्रह्मस्वरूप का ही अनुभव करने लगता है। यहाँ ‘भय’ का तात्पर्य शाब्दिक नहीं, बल्कि पूर्ण एकाग्रता और अनन्यता से है - जहाँ मन किसी अन्य विषय की ओर प्रवृत्त नहीं होता। अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से यह रूपान्तरण वास्तव में किसी नये स्वरूप की प्राप्ति नहीं है। जीव कभी ब्रह्म से भिन्न था ही नहीं “अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि” जैसे महावाक्य इसी सत्य का उद्घाटन करते हैं। किन्तु अविद्या के कारण जीव स्वयं को देह, मन और इन्द्रियों से अभिन्न मान बैठता है। अतः यह साधना अध्यारोपित भ्रान्ति के अपवाद की प्रक्रिया है, न कि किसी नये तत्त्व की सिद्धि। निदिध्यासन - अर्थात् बार-बार, निरन्तर, दृढ़ भाव से ब्रह्म का चिन्तन इस श्लोक का केन्द्रीय साधन है। जब साधक “मैं देह नहीं, मैं मन नहीं, मैं शुद्ध चैतन्य हूँ” इस भाव में स्थित होकर, उसी में तन्मय हो जाता है, तब धीरे-धीरे उसके समस्त देहाध्यास क्षीण हो जाते हैं। अन्ततः वह अपने शुद्ध, अखण्ड, निर्विकल्प स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। यह श्लोक यह भी सिखाता है कि साधना केवल बौद्धिक समझ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि ज्ञान केवल शास्त्रों में रह जाए और जीवन में उसका अनुवर्तन न हो, तो वह मुक्तिदायक नहीं बनता। निश्चय, अभ्यास और तन्मयता - ये तीनों मिलकर ज्ञान को अनुभूति में रूपान्तरित करते हैं। अतः इस श्लोक का सार यह है कि साधक को अपने चित्त को ब्रह्म में इस प्रकार स्थिर करना चाहिए कि अन्य सभी वृत्तियाँ क्षीण हो जाएँ। जब मन पूर्णतः ब्रह्ममय हो जाता है, तब जीव-ब्रह्म का भेद स्वतः लुप्त हो जाता है और वही शुद्ध अद्वैत सत्य प्रकट होता है। इस प्रकार ‘भ्रमरकीट न्याय’ के माध्यम से यह श्लोक हमें यह दिव्य संदेश देता है कि निरन्तर, दृढ़ और एकनिष्ठ चिन्तन से साधक अपने ही ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार कर सकता है और यही "अपरोक्षानुभूति" की परम सिद्धि है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
90
100
281
2.2K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
1
32
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
14
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
कार्ये हि कारणं पश्येत् पश्चाचार्यं विसर्जयेत्। कारणत्वं स्वतो नश्येदवशिष्टं भवेनमुनिः।।१३९।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत वेदान्त के सूक्ष्मतम तत्त्व का निरूपण करते हुए यह श्लोक साधक को अनुभूति की उस चरम अवस्था की ओर इंगित करता है, जहाँ समस्त द्वैत-प्रपञ्च का लय होकर केवल ब्रह्मस्वरूप का अवशेष रह जाता है। प्रारम्भ में साधक को उपदेश दिया जाता है कि वह कार्य में कारण का दर्शन करे अर्थात् इस समस्त दृश्य जगत् (कार्य) में उसके कारणरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करे। जैसे मृत्तिका से बने घट में मृत्तिका का ही सत्यत्व है, वैसे ही इस नाम-रूपात्मक विश्व में ब्रह्म ही एकमात्र सत्य तत्त्व है यह दृढ़ बोध साधना का प्रथम चरण है। किन्तु आदि शंकराचार्य की अद्वैत-दृष्टि केवल यहाँ तक सीमित नहीं रहती। वे आगे कहते हैं - “पश्चात् कारणं विसर्जयेत्” अर्थात् जब कार्य में कारण का अभेदबोध सुदृढ़ हो जाए, तब उस कारण-कार्य की संज्ञा का भी परित्याग कर देना चाहिए। यह अत्यन्त गूढ़ संकेत है। यहाँ ‘कारण’ भी एक उपाधि है, एक कल्पना है, जो केवल ‘कार्य’ के सापेक्ष ही अर्थवान् है। जब कार्य (जगत्) का मिथ्यात्व बोध हो जाता है, तब कारण (ब्रह्म) का ‘कारणत्व’ भी स्वतः निरस्त हो जाता है। इस प्रकार, कारणत्वं स्वतो नश्येत् ब्रह्म का कारणत्व भी अपने आप लुप्त हो जाता है, क्योंकि अब उसके लिए कोई कार्य शेष नहीं रहता, जिससे उसका कारणत्व सिद्ध हो। यह अवस्था ‘अवशिष्टं भवेत् मुनिः’ - जिसमें केवल शुद्ध, निरुपाधिक, अद्वय ब्रह्मस्वरूप ही अवशिष्ट रहता है वही मुनि की परम स्थिति है। यहाँ अद्वैत वेदान्त का चरम सत्य उद्घाटित होता है कि ब्रह्म न तो वास्तव में कारण है, न कार्य; वह केवल स्वप्रकाश, स्वयंसिद्ध, निर्विशेष चैतन्य है। कारण-कार्य का सम्पूर्ण व्यापार केवल अविद्या के स्तर पर है। ज्ञान के उदय से यह समस्त कल्पना विलीन हो जाती है, और जो शेष रहता है, वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्म ही है। अतः इस श्लोक का मर्म यह है कि साधना की क्रमबद्ध यात्रा में पहले जगत् में ब्रह्म का दर्शन करो, और अंततः ब्रह्म को भी सभी सम्बन्धों, उपाधियों एवं कल्पनाओं से परे, अपने शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित करो। यही अपरोक्षानुभूति की परम सिद्धि है, जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान का भेद लुप्त होकर केवल एकमेव अद्वितीय ब्रह्म का अनुभव शेष रह जाता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
87
107
310
2.8K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
20
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
कारणं व्यतिरेकेण पुमानादौ विलोकयेत्। अन्वयेन पुनस्तद्धि कार्ये नित्यं प्रपश्यति।।१३८।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैतवेदान्त में सत्य-असत्य के विवेक हेतु अन्वय-व्यतिरेक की पद्धति अत्यन्त प्रामाणिक और सूक्ष्म साधन मानी गई है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य इसी तत्त्वज्ञान की विधि को स्पष्ट करते हुए साधक को यह उपदेश देते हैं कि वह कारण अर्थात् ब्रह्म का बोध पहले व्यतिरेक से करे और तत्पश्चात् अन्वय से उसे सर्वत्र अनुभूत करे। “कारणं व्यतिरेकेण पुमानादौ विलोकयेत्” - यहाँ ‘पुमान्’ अर्थात् साधक, प्रारम्भ में व्यतिरेक-विचार द्वारा कारण का अवलोकन करे। व्यतिरेक का अर्थ है - जो जहाँ नहीं है, वहाँ भी जो सत्ता बनी रहती है, वही सत्य है। साधक को यह देखना चाहिए कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि ये सब परिवर्तनशील हैं; जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति - तीनों अवस्थाओं में इनका आविर्भाव और तिरोभाव होता रहता है। किन्तु एक साक्षी-चैतन्य ऐसा है, जो इन सबके अभाव में भी बना रहता है। जब शरीर नहीं है (स्वप्न में), जब मन भी लीन है (सुषुप्ति में), तब भी जो ‘मैं हूँ’ का सूक्ष्म बोध शेष रहता है, वही आत्मा, वही ब्रह्म है। इस प्रकार, जो सभी उपाधियों के अभाव में भी अवशिष्ट रहता है, वही कारणतत्त्व है; नित्य, अविनाशी और स्वतःसिद्ध। इसके पश्चात् “अन्वयेन पुनस्तद्धि कार्ये नित्यं प्रपश्यति” - साधक को अन्वय-विचार के द्वारा उसी कारण को कार्य में सर्वत्र देखना चाहिए। अन्वय का अर्थ है - जहाँ-जहाँ कार्य है, वहाँ-वहाँ कारण का अनिवार्यतः होना। जैसे घट में मृत्तिका है, आभूषण में स्वर्ण है, तरंग में जल है उसी प्रकार समस्त जगत् में ब्रह्म ही अन्तःस्थित है। जो भी दृश्य है, जो भी अनुभवगम्य है, वह सब उसी चैतन्य की अभिव्यक्ति है। इस दृष्टि से जगत् ब्रह्म से भिन्न नहीं, अपितु उसी का नाम-रूपात्मक विस्तार है। इस प्रकार व्यतिरेक और अन्वय दोनों दृष्टियों का समन्वय साधक को अद्वैत के परम सत्य तक पहुँचाता है। व्यतिरेक से वह जानता है कि ब्रह्म उपाधियों से परे, निरपेक्ष और स्वतन्त्र है; और अन्वय से वह देखता है कि वही ब्रह्म समस्त नाम-रूप में व्याप्त है। एक ओर ‘नेति-नेति’ द्वारा वह सबको नकारता है, दूसरी ओर ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ के द्वारा सबमें उसी का दर्शन करता है। भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य जी की यह शिक्षण-पद्धति अत्यन्त वैज्ञानिक और अनुभवपरक है। यह केवल तर्क नहीं, अपितु साधक के प्रत्यक्ष अनुभव का मार्ग है। जब साधक इन दोनों प्रकार के विचारों में निपुण हो जाता है, तब उसके लिए जगत् में ब्रह्म का दर्शन सहज हो जाता है; न केवल समाधि में, अपितु जाग्रत अवस्था के प्रत्येक क्षण में। अन्ततः यह बोध दृढ़ हो जाता है कि जो कारण है, वही कार्य के रूप में प्रतीत हो रहा है; और जो कार्य है, वह कारण से भिन्न कुछ भी नहीं। भेद केवल नाम-रूप का है, तत्त्वतः सब एक ही है। अतः निष्कर्षतः व्यतिरेक से ब्रह्म की निर्लेपता का बोध होता है, और अन्वय से उसकी सर्वव्यापकता का अनुभव। इन दोनों के समन्वय से साधक अद्वैत सत्य में स्थित होकर जान लेता है कि वही एक ब्रह्म सर्वत्र, सर्वदा, सर्वरूपेण प्रकाशित है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
83
101
257
2K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
26
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
अथ शुद्धं भवेद् वस्तु यद् वै वाचामगोचरम्। द्रष्टव्यं मृद्घटादृष्टान्तेन पुनः पुनः आरभ्यते ।।१३६।। ("अपरोक्षानुभूति) अद्वैतवेदान्त का परम प्रयोजन उस शुद्ध वस्तु परम ब्रह्म का प्रतिपादन है, जो इन्द्रियों और वाणी के समस्त व्यापार से परे, अनिर्वचनीय, अवाङ्मनसगोचर और स्वप्रकाश चैतन्यस्वरूप है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य यह उद्घाटित करते हैं कि वह शुद्ध तत्त्व वाणी की पहुँच से परे होते हुए भी, उपदेश-परम्परा में दृष्टान्तों के माध्यम से बारम्बार निरूपित किया जाता है, जिससे साधक की बुद्धि उस अप्रमेय सत्य की ओर प्रवृत्त हो सके। “अथ शुद्धं भवेद् वस्तु” - यहाँ ‘शुद्ध वस्तु’ से अभिप्राय उस ब्रह्म से है, जो नित्य, निर्विकार, निरुपाधिक, अखण्ड और सर्वथा स्वतन्त्र है। वह न स्थूल है, न सूक्ष्म; न कर्ता, न भोक्ता; न कारण, न कार्य अपितु केवल साक्षीस्वरूप, शुद्ध चैतन्य है। वही तत्त्व सभी उपाधियों के अतिक्रमण के पश्चात् आत्मरूप से प्रकाशित होता है। “यद् वै वाचामगोचरम्” - वह ब्रह्म वाणी का विषय नहीं है। शब्द-वृत्ति जहाँ तक जाती है, वहाँ तक केवल नाम-रूप का क्षेत्र है। शब्द सीमित हैं, और ब्रह्म असीम है; शब्द द्वैत का आश्रय लेते हैं, और ब्रह्म अद्वैत है। अतः ब्रह्म का प्रत्यक्ष निरूपण शब्दों से सम्भव नहीं। उपनिषद् भी कहती है - “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” जहाँ से वाणी और मन लौट आते हैं, उस ब्रह्म को वे प्राप्त नहीं कर सकते। किन्तु, यह भी सत्य है कि शब्द ही साधन हैं श्रुति के माध्यम से ही ज्ञान का उदय होता है। अतः आचार्य कहते हैं - “द्रष्टव्यं मृद्घटादृष्टान्तेन पुनः पुनः” उस शुद्ध ब्रह्मतत्त्व का बोध कराने के लिए बार-बार मृद्घट (मिट्टी-घट) आदि दृष्टान्तों का आश्रय लिया जाता है। यह शिक्षण-विधि अत्यन्त गूढ़ है। जब साधक को सीधे ब्रह्म की ओर इंगित करना कठिन होता है, तब उसे परिचित उदाहरणों के माध्यम से उस सत्य की झलक दी जाती है। मृद्घट दृष्टान्त में यह प्रतिपादित होता है कि घट नाम-रूप है, और मृत्तिका ही उसका तत्त्व है। घट का नाश हो जाए, तो भी मृत्तिका का नाश नहीं होता। इसी प्रकार जगत् नाम-रूपात्मक है, और ब्रह्म ही उसका तत्त्व है। जगत् के परिवर्तन, उत्पत्ति और विनाश से ब्रह्म अप्रभावित रहता है। इसी प्रकार स्वर्ण-आभूषण, जल-तरंग, लोह-उपकरण आदि अनेक दृष्टान्तों के द्वारा यह समझाया जाता है कि कार्य की सत्ता कारण से पृथक् नहीं है, और कारण का स्वरूप कार्य से कभी विकृत नहीं होता। भगवद्पादाचार्य आदि शङ्कराचार्य की शिक्षण-पद्धति में यह पुनरावृत्ति अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि अविद्या की दृढ़ता को केवल एक बार के उपदेश से भंग नहीं किया जा सकता। मन बार-बार नाम-रूप में ही सत्यत्व का अनुभव करता है; अतः उसे बार-बार यह स्मरण कराना पड़ता है कि जो दृश्य है, वह केवल उपाधि है; तत्त्वतः सब ब्रह्म ही है। इस प्रकार दृष्टान्तों का प्रयोजन ब्रह्म को निर्देशित करना है, न कि परिभाषित करना। वे संकेत हैं, न कि अन्तिम सत्य। जब साधक की बुद्धि परिपक्व होती है, तब वह इन दृष्टान्तों का भी अतिक्रमण कर स्वानुभव में स्थित होता है, जहाँ न शब्द हैं, न विचार केवल शुद्ध, अद्वैत चैतन्य का अविभाज्य प्रकाश है। अतः इस श्लोक का गूढ़ निष्कर्ष यह है कि ब्रह्म वाणी और मन से परे होते हुए भी, उपदेश-परम्परा में दृष्टान्तों द्वारा ही ज्ञेय बनता है। बार-बार के विवेक, मनन और निदिध्यासन से साधक उस शुद्ध वस्तु में स्थित होता है, जो स्वयं उसका ही स्वरूप है। यही अद्वैत का परम निष्कर्ष है; वाणी जहाँ मौन हो जाती है, वहीं ब्रह्म का अनुभव प्रारम्भ होता है; और जहाँ अनुभव पूर्ण होता है, वहाँ केवल शुद्ध, अखण्ड, अद्वितीय चैतन्य ही शेष रहता है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
92
107
273
2.4K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
10
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
निमेषार्द्धं न तिष्ठन्ति वृत्तिं ब्रह्ममयीं विना। यथा तिष्ठन्ति ब्रह्माद्याः सनकाद्याः शुकादयः।।१३४।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में ब्रह्मनिष्ठा की चरम अवस्था का दिव्य चित्र प्रस्तुत करते हैं। यहाँ वे उन सिद्ध महापुरुषों की स्थिति का वर्णन करते हैं, जिनके लिए ब्रह्म-वृत्ति कोई साधन मात्र नहीं रह जाती, अपितु उनका स्वाभाविक, अखण्ड और नित्य अनुभव बन जाती है। “निमेषार्द्धं न तिष्ठन्ति वृत्तिं ब्रह्ममयीं विना” अर्थात् वे महात्मा एक निमेष के आधे क्षण के लिए भी ब्रह्ममयी वृत्ति से रहित नहीं होते। यह कथन साधना की पराकाष्ठा का संकेत है। यहाँ ब्रह्म-वृत्ति क्षणिक चिन्तन या अभ्यासजन्य स्थिति नहीं, बल्कि अखण्ड आत्मनिष्ठा का रूप ले चुकी है। जैसे दीपक का प्रकाश स्वाभाविक रूप से प्रकाशित रहता है, वैसे ही इन महापुरुषों की चेतना निरन्तर ब्रह्मस्वरूप में ही स्थित रहती है। यह स्थिति निदिध्यासन के परिपाक का फल है, जहाँ “अहं ब्रह्मास्मि” का बोध इतना दृढ़ हो जाता है कि अन्य कोई वृत्ति उसके स्थान पर उदित नहीं हो पाती। यहाँ मन का स्वरूप ही रूपान्तरित हो जाता है - वह अब विषयों की ओर प्रवृत्त होने वाला चञ्चल उपकरण नहीं, बल्कि ब्रह्मस्वरूप का ही प्रतिबिम्ब बन जाता है। यह वही अवस्था है, जिसे अद्वैत में अखण्डाकार-वृत्ति की पूर्णता कहा जाता है। “यथा तिष्ठन्ति ब्रह्माद्याः” - भगवत्पाद आदि शंकराचार्य इस स्थिति की तुलना ब्रह्मा आदि देवताओं से करते हैं, जो सृष्टि के उच्चतम स्तर पर स्थित होकर भी ब्रह्मतत्त्व में ही प्रतिष्ठित हैं। यहाँ यह संकेत है कि ब्रह्मनिष्ठा केवल मानव साधकों तक सीमित नहीं, बल्कि दिव्य चेतना के उच्चतम स्तरों तक व्याप्त है। “सनकाद्याः शुकादयः” - विशेषतः सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार- ये सनकादि ऋषि और श्रीशुकदेव जैसे महात्मा इस ब्रह्मनिष्ठा के मूर्त उदाहरण हैं। ये वे महापुरुष हैं, जिन्होंने बाल्यावस्था से ही संसार-वासनाओं का परित्याग कर, निरन्तर आत्मस्वरूप में स्थित होकर जीवन व्यतीत किया। उनके लिए ब्रह्म-वृत्ति कोई अभ्यास नहीं, बल्कि सहज अवस्था थी। दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक जीवन्मुक्ति की परिपूर्ण अवस्था का निरूपण करता है। यहाँ साधक और साध्य का भेद लुप्त हो जाता है; ब्रह्म-वृत्ति और ब्रह्मस्वरूप में कोई भिन्नता नहीं रहती। यह वही स्थिति है, जहाँ वृत्ति भी अन्ततः लीन होकर केवल स्वरूपावस्थान रह जाती है। उपनिषद् भी इसी अवस्था का वर्णन करती हैं- “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति” ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। अतः उसकी चेतना में कोई अन्तराल नहीं, कोई विच्छेद नहीं; वह निरन्तर उसी सत्य में स्थित रहता है। इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि साधना का लक्ष्य केवल क्षणिक समाधि या अनुभव नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी ब्रह्मनिष्ठा है, जहाँ साधक का सम्पूर्ण जीवन उसी सत्य में प्रतिष्ठित हो जाए। जब यह अवस्था प्राप्त होती है, तब साधक का प्रत्येक क्षण, प्रत्येक श्वास, प्रत्येक अनुभव सब ब्रह्मस्वरूप की ही अभिव्यक्ति बन जाते हैं। अतः भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य यहाँ साधक को यह प्रेरणा देते हैं कि वह ब्रह्म-वृत्ति का इतना गहन अभ्यास करे कि वह क्षणिक प्रयास से उठकर, सहज और अखण्ड स्थिति बन जाए। यही अद्वैत वेदान्त की चरम साधना है- जहाँ ब्रह्म केवल जाना नहीं जाता, बल्कि निरन्तर जिया जाता है। निष्कर्षतः जो महापुरुष एक क्षण के लिए भी ब्रह्म-वृत्ति से विचलित नहीं होते, वही वास्तविक सिद्ध, मुक्त और ब्रह्मनिष्ठ हैं। उनका जीवन ही वेदान्त का सजीव प्रमाण है - अखण्ड, अनवरत और दिव्य ब्रह्मानुभूति का। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
90
99
281
2.4K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
26
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
कार्ये कारणताता कारणे न हि कार्यता। कारणत्वं स्वतो गच्छेत् कार्यभावे विचारतः।।१३५।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैतवेदान्त के सूक्ष्मतम तत्त्वों में कार्य-कारण-सम्बन्ध का विवेचन अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही विवेक जीव को नाम-रूपात्मक जगत् की आभासिक सत्ता से परमार्थतत्त्व ब्रह्म की ओर उन्मुख करता है। प्रस्तुत श्लोक में भगवत्पादाचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि कारण और कार्य का सम्बन्ध वस्तुतः नित्य, स्वतन्त्र और परमार्थतः सत्य नहीं, अपितु केवल अविद्योपाधि से उपपन्न एक व्यवहारिक कल्पना मात्र है। “कार्ये कारणताता” अर्थात् कार्य में ही कारणता का अध्यास होता है। जब हम किसी वस्तु जैसे घट को देखते हैं, तब उसके भीतर कारण - मृत्तिका का बोध करते हैं। यहाँ कारणता घट में आरोपित होती है, न कि कारण में कार्य का कोई वास्तविक प्रवेश होता है। “कारणे न हि कार्यता” कारण में कार्य की सत्ता नहीं होती; मृत्तिका स्वयं घटरूप नहीं हो जाती, अपितु घट केवल नाम-रूपात्मक उपाधि है, जो मृत्तिका पर आरोपित है। आदि शङ्कराचार्य की अद्वैतदृष्टि में यह प्रतिपादन अत्यन्त सूक्ष्म है; कारण कार्य से अभिन्न होते हुए भी कार्य की सत्ता से रहित है, और कार्य कारण से पृथक् प्रतीत होते हुए भी तत्त्वतः कारण के अतिरिक्त कुछ नहीं। यह अध्यारोप-अपवाद की पद्धति का अनुपम उदाहरण है, जहाँ पहले कार्य-कारण का स्वीकार कर शिष्य की बुद्धि को स्थिर किया जाता है, और तत्पश्चात् विचार द्वारा उस सम्बन्ध का अपवाद कर दिया जाता है। “कारणत्वं स्वतो गच्छेत् कार्यभावे विचारतः” - जब सूक्ष्म विवेक द्वारा कार्य की स्वतंत्र सत्ता का अभाव ज्ञात होता है, तब कारण का ‘कारणत्व’ भी स्वतः ही लय को प्राप्त हो जाता है। कारण केवल कार्य की अपेक्षा से कारण है; यदि कार्य ही मिथ्या सिद्ध हो गया, तो कारण का कारणत्व भी निरर्थक हो जाता है। इस प्रकार कारण भी अपने कारणत्व-धर्म से रहित होकर शुद्ध ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होता है। यहाँ अद्वैत का परम रहस्य उद्घाटित होता है न कार्यं न कारणं, केवलं ब्रह्मैव सत्यं। कार्य-कारण-प्रपञ्च केवल अविद्याजन्य दृष्टि में है; ज्ञानोदय होने पर यह सम्पूर्ण द्वैत-व्यवहार लीन हो जाता है, जैसे जागरण में स्वप्न का सम्पूर्ण व्यापार विलीन हो जाता है। उपनिषदों का यही प्रतिपाद्य है - “सदेव सोम्य इदं अग्र आसीत्” (छान्दोग्योपनिषद्) यह सम्पूर्ण जगत् प्रारम्भ में केवल सत् (ब्रह्म) ही था। अतः जो कुछ कार्यरूप में दृश्य है, वह केवल नाम-रूप का विस्तार है; तत्त्वतः वह कारण ब्रह्म से भिन्न नहीं। अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कार्य-कारण का यह समस्त सम्बन्ध केवल अविद्योपाधि-कल्पित है। जब विवेक से कार्य का अभाव ज्ञात होता है, तब कारण का कारणत्व भी निवृत्त हो जाता है, और शुद्ध, निर्विशेष, अद्वितीय ब्रह्म ही शेष रहता है; जो न कर्ता है, न कारण, न कार्य अपितु केवल साक्षीस्वरूप, निरुपाधिक, नित्य चैतन्य है। यही अद्वैत वेदान्त का परम निर्णय है - “ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।” #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
89
95
261
2.8K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
16
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
कुशला ब्रह्मनामकरणे वृत्तिहीनाः। तेऽप्यज्ञानितमा नूनं पुनरायान्ति यान्ति च ।।१३३।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के प्रखर भाष्यकार भगवत्पाद भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के एक अत्यन्त सूक्ष्म, किन्तु गम्भीर भ्रान्ति का उद्घाटन करते हैं। यहाँ वे उन लोगों की ओर संकेत करते हैं, जो ब्रह्मतत्त्व के विषय में वाचाल, तर्ककुशल और नाम-रूप के स्तर पर प्रवीण तो होते हैं, किन्तु जिनमें ब्रह्म-वृत्ति का वास्तविक उदय नहीं हुआ है। इस प्रकार वे ज्ञान और ज्ञानाभास के मध्य के भेद को अत्यन्त स्पष्ट कर देते हैं। “कुशला ब्रह्मनामकरणे” अर्थात् जो लोग ब्रह्म के नामों, परिभाषाओं, तत्त्वचर्चाओं और शास्त्रीय पदावली में अत्यन्त दक्ष हैं। वे वेदान्त के गूढ़ सिद्धान्तों का सुन्दर निरूपण कर सकते हैं, भाषण दे सकते हैं, शास्त्रों का उद्धरण कर सकते हैं; किन्तु यह कुशलता केवल वाणी और बुद्धि तक सीमित है। यह शब्दज्ञान है, न कि स्वानुभव। “वृत्तिहीनाः” ऐसे साधक ब्रह्म-वृत्ति से हीन हैं। अर्थात् उनके अन्तःकरण में वह अखण्डाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं हुई है, जो “अहं ब्रह्मास्मि” इस सत्य को जीवित अनुभव के रूप में प्रकट करती है। उन्होंने ज्ञान को केवल बौद्धिक स्तर पर ग्रहण किया है, उसे आत्मनिष्ठ अनुभूति में रूपान्तरित नहीं किया। इसीलिए उनका ज्ञान परिवर्तनकारी नहीं बन पाता; वह उनके जीवन, व्यवहार और अन्तःकरण को रूपान्तरित नहीं करता। दार्शनिक दृष्टि से यह स्थिति श्रवण और मनन के स्तर पर ही रुक जाने का द्योतक है। जब तक निदिध्यासन द्वारा उस ज्ञान को अन्तःकरण में दृढ़ नहीं किया जाता, तब तक वह अविद्या-नाशक नहीं बनता। जैसे केवल औषधि का नाम जान लेने से रोग दूर नहीं होता, वैसे ही केवल ब्रह्म का नाम और स्वरूप जान लेने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। “तेऽपि अज्ञानितमाः नूनम्” - भगवद्पादाचार्य यहाँ अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि ऐसे लोग, यद्यपि बाह्य रूप से विद्वान् प्रतीत होते हैं, वस्तुतः अज्ञानियों में भी अत्यन्त अज्ञानी हैं। यह कथन कठोर प्रतीत हो सकता है, किन्तु इसका उद्देश्य साधक को जागरूक करना है; क्योंकि यहाँ अज्ञान केवल जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप के प्रति अपरिचय है। “पुनरायान्ति यान्ति च” अर्थात् ऐसे साधक पुनः-पुनः जन्म-मरण के चक्र में आते-जाते रहते हैं। कारण यह है कि उनके भीतर देहाभिमान, कर्तृत्व-भोक्तृत्व और वासनाएँ अभी भी विद्यमान हैं। जब तक ये संस्कार नष्ट नहीं होते, तब तक संसरचक्र से मुक्ति सम्भव नहीं है। शास्त्रज्ञान, यदि वह अनुभूति में परिणत न हो, तो इस बन्धन को नहीं काट सकता। उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन” यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से, न अधिक श्रवण से प्राप्त होती है। वह उसी को प्राप्त होती है, जो उसे अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से अपनाता है। अतः केवल वाणी की कुशलता या तर्क की तीक्ष्णता आत्मज्ञान का प्रमाण नहीं है। इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि अद्वैत वेदान्त केवल बौद्धिक दर्शन नहीं, बल्कि अस्तित्वगत अनुभूति है। जब तक ब्रह्म-वृत्ति का उदय होकर वह साधक के अन्तःकरण को रूपान्तरित नहीं करती, तब तक ज्ञान अधूरा है। और जब यह वृत्ति उदित होकर स्थिर हो जाती है, तब साधक स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। अतः भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य यहाँ साधक को सावधान करते हैं कि वह केवल शब्दों में न उलझे, केवल तर्क और चर्चा में संतुष्ट न हो, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारे- उसे जीए, उसे अनुभव करे, और उसी में स्थित हो जाए। यही वेदान्त का वास्तविक उद्देश्य है। निष्कर्षतः, जो केवल ब्रह्म के नामों और तत्त्वों का उच्चारण करते हैं, किन्तु ब्रह्म-वृत्ति से हीन हैं, वे अभी भी अज्ञान के अधीन हैं और संसार-चक्र में बँधे रहते हैं। केवल वही साधक मुक्त होता है, जो ज्ञान को अनुभव में रूपान्तरित कर, ब्रह्मस्वरूप में अचल स्थित हो जाता है। यही इस श्लोक का सार और अद्वैत वेदान्त का परम उपदेश है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
81
94
276
3K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
14
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
येषां वृत्तिः समावृद्धा, अन्या च सा पुनरारम्भः। ते वै सद्ब्रह्मतां प्राप्ता, नेतरे शब्दवादिनः ।।१३२।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त की साधना में यह श्लोक अत्यन्त सूक्ष्म और निर्णायक सत्य का उद्घाटन करता है। यहाँ भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य उस अवस्था का निरूपण करते हैं, जहाँ ब्रह्म-वृत्ति केवल क्षणिक चिन्तन न रहकर, साधक के अन्तःकरण में परिपक्व, सुदृढ़ और अखण्ड रूप से प्रतिष्ठित हो जाती है। “येषां वृत्तिः समावृद्धा” - जिन साधकों में यह ब्रह्म-वृत्ति सम्यक् रूप से विकसित और परिपुष्ट हो गई है, अर्थात् जिनका अन्तःकरण निरन्तर “अहं ब्रह्मास्मि” इस अखण्ड बोध में स्थित रहता है, उनकी वृत्ति अब साधारण मानसिक प्रक्रिया नहीं रह जाती। वह अखण्डाकार-वृत्ति के रूप में अविद्या का पूर्ण निवारण कर, आत्मस्वरूप के प्रकाश को स्थायी बना देती है। यहाँ “समावृद्धा” का अर्थ है न केवल उत्पन्न होना, बल्कि परिपक्व होकर सहज स्वभाव बन जाना। “अन्या च सा पुनरारम्भः” - ऐसे साधकों के लिए अन्य वृत्तियों का पुनरारम्भ नहीं होता। अर्थात् संसार-विषयक संकल्प-विकल्प, देहाभिमान, राग-द्वेष, कर्तृत्व-भोक्तृत्व की वृत्तियाँ अब पुनः उदित नहीं होतीं। यदि बाह्य रूप से वे प्रकट भी हों, तो वे केवल व्यवहारिक स्तर तक सीमित रहती हैं; वे साधक के आत्मबोध को स्पर्श नहीं कर पातीं। यह वही अवस्था है जहाँ वासनाक्षय और मनोनाश का चरम परिणाम प्रकट होता है। दार्शनिक दृष्टि से यह स्थिति निदिध्यासन के परिपाक का फल है। श्रवण और मनन से उत्पन्न ज्ञान, जब बारम्बार चिन्तन और आत्मनिष्ठा से दृढ़ होता है, तब वह वृत्ति स्थायी होकर अन्य सभी वृत्तियों का लय कर देती है। यह स्थिति जीवन्मुक्ति का सूचक है - जहाँ साधक संसार में रहते हुए भी उससे असंग रहता है। “ते वै सद्ब्रह्मतां प्राप्ताः” - ऐसे साधक ही वास्तव में “सद्ब्रह्मतां” प्राप्त होते हैं अर्थात् वे ब्रह्मस्वरूप में ही स्थित हो जाते हैं। यहाँ “प्राप्ति” का अर्थ किसी नये तत्त्व की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने नित्य स्वरूप का आविर्भाव है। वे जानते हैं कि वे कभी बन्धन में थे ही नहीं; केवल अज्ञान के कारण ऐसा प्रतीत होता था। अब वह भ्रान्ति निवृत्त हो चुकी है। “नेतरे शब्दवादिनः” - इसके विपरीत, जो केवल शास्त्रों के शब्दों में ही उलझे रहते हैं, जो केवल तर्क-वितर्क और वाक्चातुर्य में ही तुष्ट होते हैं, वे इस सत्य को प्राप्त नहीं कर सकते। “शब्दवादिनः” वे हैं जो ज्ञान को केवल बौद्धिक स्तर तक सीमित रखते हैं, परन्तु उसे आत्मानुभूति में रूपान्तरित नहीं करते। उनके लिए वेदान्त केवल विचार है, अनुभव नहीं। उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं - “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन” यह आत्मा न प्रवचन से, न केवल बुद्धि से, न अधिक श्रवण से प्राप्त होती है; वह उसी को प्राप्त होती है, जो उसे अपनी सम्पूर्ण सत्ता से अपनाता है। अतः शास्त्र का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि साधक को उस ज्ञान में स्थित करना है। इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि आत्मज्ञान केवल बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि अस्तित्वगत परिवर्तन है। जब तक ब्रह्म-वृत्ति परिपक्व होकर अन्य सभी वृत्तियों का अतिक्रमण नहीं कर लेती, तब तक ज्ञान अधूरा है। और जब यह परिपक्वता प्राप्त हो जाती है, तब साधक स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में स्थित हो जाता है - निरन्तर, सहज और अखण्ड रूप से। निष्कर्षत: भगवद्पादाचार्य यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि सच्चा वेदान्त वही है, जो जीवन में उतरे, जो वृत्ति को रूपान्तरित करे, और जो साधक को ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित कर दे। केवल शब्दों का ज्ञान पर्याप्त नहीं; अनुभव की परिपक्वता ही वास्तविक सिद्धि है। यही अद्वैत वेदान्त की चरम साधना और परम फल है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
89
104
278
1.9K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @yogrishiramdev @VHPDigital @RSSorg @narendramodi @AmitShah @myogiadityanath @rajnathsingh @SureshChavhanke 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
2
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
वैदिक सनातन संस्कृति, भारतीय अध्यात्म और मानवीय मूल्यों के वैश्विक प्रचार-प्रसार में निरंतर समर्पित, करुणा, सेवा और साधना के दिव्य संवाहक आदरणीय श्री श्री रविशंकर जी के आविर्भाव दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ एवं अभिनन्दन। जन्मदिवसस्य हार्दिकाः शुभाशयाः।। “पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्। श्रुणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतम्॥ अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥” आदरणीय श्री श्री रविशंकर जी ने “Art of Living” के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व में सनातन संस्कृति, योग, ध्यान, प्राणायाम और मानवीय चेतना के उत्थान का अद्वितीय कार्य किया है। उन्होंने “जीवन जीने की कला” को केवल उपदेश नहीं, बल्कि एक वैश्विक जनआन्दोलन का स्वरूप प्रदान किया। उनके मार्गदर्शन में सेवा, साधना और सत्संग के माध्यम से करोड़ों लोगों के जीवन में शांति, संतुलन और आध्यात्मिक जागरण का संचार हुआ है। मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना, विश्वशांति, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामोदय, युवा जागरण तथा आपदा राहत जैसे विविध क्षेत्रों में उनके प्रेरणादायी कार्य अत्यंत प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि आदरणीय श्री श्री रविशंकर जी स्वस्थ एवं दीर्घायु के साथ सदैव लोकमंगल के पथ पर मानवता का मार्गदर्शन करते रहें। Warm greetings and heartfelt salutations to revered Sri Sri Ravi Shankar Ji on his sacred birthday. Through Art of Living, he has inspired millions across the world with Sanatana values, yoga, meditation, service, peace and human upliftment. May he be blessed with good health, long life and continued strength to guide humanity on the path of harmony and universal welfare. @Gurudev @ArtofLiving #श्रीश्रीरविशंकरजी #srisriravishankarji #Art_of_Living #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet mediaSwami Avdheshanand tweet mediaSwami Avdheshanand tweet mediaSwami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
50
208
534
4.3K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
1
17
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
ये हि वृत्तिं जहत्येनां ब्रह्माख्यां पावनीं पराम्। वृथैव ते तु जीवन्ति पशुभिश्च समा नराः ।।१३०।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के एक अत्यन्त निर्णायक और गम्भीर पक्ष का उद्घाटन करते हैं। यहाँ वे “ब्रह्मवृत्ति” उस परम पावन, आत्मप्रकाशक और मुक्तिदायिनी वृत्ति के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि जो मनुष्य इस दिव्य वृत्ति का परित्याग करता है, उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है। “ये हि वृत्तिं जहति” - जो साधक इस वृत्ति को त्याग देते हैं, अर्थात् जो “अहं ब्रह्मास्मि”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इस अखण्ड बोध से विमुख होकर पुनः संसार-वृत्तियों, विषयासक्ति और देहाभिमान में प्रवृत्त हो जाते हैं - वे वास्तव में अपने जीवन के परम उद्देश्य से च्युत हो जाते हैं। यहाँ त्याग का अर्थ केवल बाह्य उपेक्षा नहीं, बल्कि उस आन्तरिक उपेक्षा से है, जिसमें साधक आत्मज्ञान की दिशा में प्राप्त हुई प्रगति को स्थिर नहीं रखता। “ब्रह्माख्यां पावनीं पराम्” - यह वृत्ति “ब्रह्माख्या” है, क्योंकि यह ब्रह्मस्वरूप का ही बोध कराती है; “पावनी” है, क्योंकि यह समस्त अविद्या, वासनाओं और संस्कारों का परिमार्जन करती है; और “परा” है, क्योंकि यह साधना की पराकाष्ठा है। यही वह वृत्ति है, जो जीव को बन्धन से मुक्त कर, उसे अपने नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित करती है। इस ब्रह्मवृत्ति का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि यही “अखण्डाकार-वृत्ति” अज्ञान का निवारण करती है। जब यह वृत्ति स्थिर होती है, तब समस्त द्वैतबोध का लय हो जाता है, और केवल ब्रह्मस्वरूप सत्य ही शेष रहता है। अतः इसका त्याग करना, वस्तुतः आत्मस्वरूप से विमुख होना है। “वृथैव ते तु जीवन्ति” - ऐसे लोग, यद्यपि बाह्य रूप से जीवित प्रतीत होते हैं, किन्तु उनका जीवन आध्यात्मिक दृष्टि से निरर्थक हो जाता है। वे जीवन के परम प्रयोजन आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त किए बिना ही कालक्षेप करते हैं। उनका जीवन केवल इन्द्रिय-तृप्ति, विषय-भोग और क्षणिक सुखों की खोज में व्यतीत होता है। “पशुभिश्च समा नराः” - भगवद्पादाचार्य यहाँ एक अत्यन्त कठोर, किन्तु सत्य कथन करते हैं कि ऐसे मनुष्य पशुओं के समान हैं। यह उपमा निन्दा के लिए नहीं, बल्कि जागरण के लिए है। पशु भी केवल आहार, निद्रा, भय और मैथुन में ही संलग्न रहते हैं; यदि मनुष्य भी केवल इन्हीं प्रवृत्तियों में लीन रहकर अपने विवेक, आत्मचिन्तन और ब्रह्मबोध की क्षमता का उपयोग नहीं करता, तो वह अपने मानवीय गौरव को खो देता है। उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं - “इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः” यदि इस जीवन में आत्मा का ज्ञान हो जाए, तो जीवन सफल है; अन्यथा महान् हानि है। भगवद्गीता में भी कहा गया है - “आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्” ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य और पशु दोनों में समान हैं; किन्तु मनुष्य का विशिष्टत्व विवेक और आत्मबोध में है। अतः, इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि मानव जीवन अत्यन्त दुर्लभ और मूल्यवान है, और इसका परम प्रयोजन आत्मज्ञान की प्राप्ति है। ब्रह्मवृत्ति जो इस ज्ञान का साधन है का परित्याग करना, इस दुर्लभ अवसर को व्यर्थ गंवाना है। निष्कर्षतः भगवद्पादाचार्य साधक को यह प्रेरणा देते हैं कि वह ब्रह्मवृत्ति को दृढ़तापूर्वक धारण करे, उसका निरन्तर अभ्यास करे, और उसे अपने जीवन का केन्द्र बनाए। यही वृत्ति जीवन को पवित्र, सार्थक और मुक्तिदायी बनाती है। इसके बिना जीवन केवल बाह्य गतिविधियों का प्रवाह है, जिसमें न सत्य का बोध है, न परम आनन्द की अनुभूति। अतः, साधक को चाहिए कि वह सजग, सतर्क और दृढ़ संकल्प के साथ इस ब्रह्मवृत्ति का पालन करे; क्योंकि यही मानव जीवन की सच्ची सार्थकता और परम सिद्धि का मार्ग है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
92
106
273
2.8K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
22
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
भववृत्त्या हि भवत्वं शून्यावृत्ति हि शून्यता। ब्रह्मवृत्त्या हि पूर्णत्वं तथा पूर्णत्वमभ्यसेत् ।।१२९।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के अत्यन्त सूक्ष्म, किन्तु निर्णायक सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं कि वृत्ति का स्वरूप ही अनुभव की दिशा निर्धारित करता है। साधक का अन्तःकरण जिस भाव, जिस वृत्ति, जिस चिन्तन में स्थित होता है, वही उसकी अनुभूति का आधार बन जाता है। अतः साधना का सार मन की वृत्तियों का रूपान्तरण है। “भववृत्त्या हि भवत्वं” - जब मन संसार-सम्बन्धी वृत्तियों में प्रवृत्त होता है, तब “भवत्वं” अर्थात् संसारबद्धता, जन्म-मरण का चक्र, कर्तृत्व-भोक्तृत्व की भावना प्रकट होती है। “भव” यहाँ केवल बाह्य जगत् नहीं, बल्कि उस समस्त अनुभूति-क्षेत्र का द्योतक है, जिसमें “मैं” और “मेरा” का भेद विद्यमान रहता है। जब मन विषयों, इच्छाओं, स्मृतियों और संकल्पों में निरन्तर रत रहता है, तब साधक उसी के अनुरूप अनुभव करता है - वह स्वयं को सीमित, अस्थिर और आश्रित मानने लगता है। “शून्यावृत्ति हि शून्यता” - यदि साधक सभी विषयों का निषेध करते-करते शून्यता की वृत्ति में स्थित हो जाता है, तो उसे शून्यता का ही अनुभव होता है। यह एक प्रकार का नास्तित्वबोध है, जिसमें सब कुछ रिक्त, निरर्थक या शून्य प्रतीत होता है। आचार्य यहाँ अत्यन्त सूक्ष्म चेतावनी देते हैं कि यह अवस्था भी अन्तिम सत्य नहीं है। शून्यता, यद्यपि विषय-निषेध का परिणाम है, किन्तु यह ब्रह्मस्वरूप की सकारात्मक अनुभूति नहीं, बल्कि एक मध्यवर्ती स्थिति है, जहाँ साधक रिक्तता में ठहर सकता है। “ब्रह्मवृत्त्या हि पूर्णत्वं” - किन्तु जब मन “ब्रह्मवृत्ति” में स्थित होता है अर्थात् “अहं ब्रह्मास्मि”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इस अखण्ड बोध में तब “पूर्णत्वं” का अनुभव होता है। यहाँ “पूर्णत्व” का अर्थ है - नित्य, अखण्ड, अनन्त, सर्वव्यापक चैतन्य में अपनी अभिन्नता का साक्षात्कार। यह न शून्य है, न सीमित; यह परिपूर्णता है - जहाँ कुछ भी अभाव नहीं, कुछ भी अपेक्षित नहीं। उपनिषद् कहती हैं - “पूर्णमदः पूर्णमिदम्” वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है। यही अद्वैत का परम सत्य है। दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक “अखण्डाकार-वृत्ति” के सिद्धान्त को स्पष्ट करता है। जब शास्त्र और गुरु के उपदेश से मन में वह वृत्ति उत्पन्न होती है, जो सम्पूर्ण प्रपञ्च का अपवाद कर केवल ब्रह्मस्वरूप को प्रकाशित करती है, तब वही वृत्ति साधक को पूर्णत्व की अनुभूति कराती है। यह वृत्ति अन्य सभी सीमित वृत्तियों का लय कर देती है और अन्ततः स्वयं भी ब्रह्मस्वरूप में विलीन हो जाती है। “तथा पूर्णत्वमभ्यसेत्” - अतः भगवद्पाद का उपदेश है कि साधक को इसी “पूर्णत्व-वृत्ति” का निरन्तर अभ्यास करना चाहिए। यह अभ्यास केवल बौद्धिक चिन्तन नहीं, बल्कि सतत आत्मनिष्ठता है हर स्थिति में, हर अनुभव में, स्वयं को उसी पूर्ण चैतन्य के रूप में जानना। यह “निदिध्यासन” का सार है बारम्बार, दृढ़तापूर्वक, अखण्ड भाव से ब्रह्मस्वरूप में स्थित रहना। यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि यह अभ्यास किसी कृत्रिम कल्पना का नहीं, बल्कि शास्त्रसम्मत सत्य का है। साधक कोई नया सत्य उत्पन्न नहीं करता, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है। जैसे सूर्य बादलों के हटने पर प्रकट होता है, वैसे ही अज्ञान के निवृत्त होने पर आत्मस्वरूप का पूर्ण प्रकाश होता है। अतः, इस श्लोक का मर्म यह है कि साधना का लक्ष्य केवल संसार से निवृत्ति या शून्यता में स्थिर होना नहीं, बल्कि उस परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होना है, जो स्वयंप्रकाश, अनन्त और आनन्दरूप है। वृत्ति का रूप ही अनुभूति का रूप बनता है; अतः साधक को ब्रह्मवृत्ति का अभ्यास कर, पूर्णत्व की अनुभूति में स्थित होना चाहिए। निष्कर्षतः, “भववृत्ति” बन्धन का कारण है, “शून्यावृत्ति” मध्यवर्ती रिक्तता है, और “ब्रह्मवृत्ति” ही परम पूर्णत्व की प्राप्ति कराती है। इसी पूर्णत्व का निरन्तर अभ्यास ही अद्वैत वेदान्त की साधना का सार और परम सिद्धि का मार्ग है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
92
108
301
3K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @SwSwaroopananda @SwMitrananda @ChinmayaMission @davidfrawleyved @RSSorg @VHPDigital @EkatmaDham @yogrishiramdev 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
2
52
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
“चिन्मय अमृत महोत्सव : चेन्नई में साधु-संगम का दिव्य एवं ऐतिहासिक आयोजन” ! चेन्नई, तमिलनाडु। मद्रास चिन्मय सेवा ट्रस्ट एवं चिन्मय मिशन चेन्नई द्वारा चिन्मय आंदोलन के 75 गौरवपूर्ण वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में “चिन्मय अमृत महोत्सव” के अंतर्गत “साधु संगम” का भव्य एवं दिव्य आयोजन कल 10 मई 2026 को तपोवन हॉल, चिन्मय हेरिटेज सेंटर, चेतपेट, चेन्नई में सम्पन्न हुआ। इस पावन अवसर पर आदरणीय पूज्य श्री स्वामी मित्रानन्द जी महाराज, प्रमुख “चिन्मय मिशन चेन्नई एवं उत्तर-पूर्व, के स्नेहिल आमंत्रण पर श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, जूनापीठाधीश्वर, आचार्यमहामण्डलेश्वर, अनन्तश्रीविभूषित स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” विशेष रूप से पधारे और साधु-संगम की दिव्य गरिमा को अभिवर्धित किया। इस महोत्सव में इस्कॉन बेंगलुरु के अध्यक्ष तथा “अक्षय पात्र” के संस्थापक आदरणीय पूज्य श्री मधु पंडित दास जी, रामकृष्ण मिशन चेन्नई के प्रमुख पूज्य श्री स्वामी शाशिशेखरानन्द जी महाराज, अमृता विश्व विद्यापीठ के अध्यक्ष पूज्य श्री स्वामी अमृतस्वरूपानन्द जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी अनुकूलानन्द जी महाराज तथा पूज्य श्री स्वामी मित्रानन्द जी महाराज सहित अनेक संत-विभूतियों की पावन उपस्थिति रही। इस महोत्सव में अपने प्रेरक उद्बोधन में पूज्य “आचार्यश्री जी” ने ब्रह्मलीन परम वन्दनीय पूज्यपाद श्री स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती जी महाराज के तप, त्याग, ज्ञान-यज्ञ, वेदान्त-प्रचार और विश्वव्यापी अध्यात्म-जागरण का भावपूर्ण स्मरण किया। उन्होंने कहा कि “गीता ज्ञान यज्ञ प्रचारकाय नमः” केवल एक स्तुति-वाक्य नहीं, अपितु पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज के सम्पूर्ण जीवन-संदेश का सार है। पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा कि पूज्यपाद श्री स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती जी महाराज ने भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य जी के शंकर-भाष्य के आलोक में अद्वैत वेदान्त, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों के गूढ़ ज्ञान को सरल, सुबोध और जीवनोपयोगी भाषा में जन-जन तक पहुँचाया। उन्होंने चिन्मय मिशन के माध्यम से अध्यात्म की ऐसी दिव्य अलख जगाई, जिससे भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में वैदिक सनातन धर्म-संस्कृति, अद्वैत वेदान्त-दर्शन और गीता-ज्ञान की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाई प्राप्त हुई। पूज्यपाद श्रीस्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज ने ज्ञान-यज्ञों, प्रवचनों, ग्रंथ-व्याख्यानों, साधना-शिविरों और सतत राष्ट्र-जागरण के माध्यम से असंख्य जिज्ञासुओं को आत्मबोध, कर्तव्यनिष्ठा, चरित्र-निर्माण और राष्ट्रधर्म की प्रेरणा प्रदान की। चिन्मय मिशन आज विश्वभर में विद्यालयों, महाविद्यालयों, वेदान्त अध्ययन-केंद्रों, बालविहार, युवा-सेवा, ग्रामोन्नति, चिकित्सा, शिक्षा, संस्कार-निर्माण और मानवीय सेवा के विविध प्रकल्पों द्वारा ज्ञान, करुणा और सेवा का दिव्य प्रकाश फैला रहा है। यह भी अत्यन्त गौरवपूर्ण है कि विश्व हिन्दू परिषद की संस्थापना भी पूज्यपाद श्रीस्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज के मुंबई स्थित सान्दीपनि आश्रम में हुई थी। इस दृष्टि से उनका जीवन केवल वेदान्त-प्रचार तक सीमित नहीं रहा, अपितु धर्म-जागरण, समाज-सेवा, राष्ट्र-चेतना और वैश्विक हिन्दू एकता का प्रेरक एवं तेजस्वी अध्याय बन गया। अद्वैत वेदान्त की मूल भावना यही है कि समस्त प्राणियों में एक ही परमात्म-चैतन्य की अभिव्यक्ति है। पूज्य श्रीस्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज ने इसी अद्वैत-दृष्टि को ज्ञान, सेवा, साधना और राष्ट्र-समर्पण के रूप में जीवन्त किया। उनका सम्पूर्ण जीवन “गीता ज्ञान यज्ञ प्रचारकाय नमः” की साक्षात् अभिव्यक्ति था। Chinmaya Amrit Mahotsava, Chennai ! On 10 May 2026, Chinmaya Mission Chennai organised a divine Sadhu Sangam at Chinmaya Heritage Centre, celebrating 75 glorious years of the Chinmaya Movement. Pujya Acharyashri Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj graced the occasion and paid heartfelt tribute to Pujya Swami Chinmayananda Saraswati Ji Maharaj, remembering his great contribution to Vedanta, Gita wisdom, Dharma, service, and global spiritual awakening. #चिन्मय_मिशन #ChinmayaMission #ChinmayaAmritMahotsava #AvdheshanandG_Qoutes
Swami Avdheshanand tweet mediaSwami Avdheshanand tweet mediaSwami Avdheshanand tweet mediaSwami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
50
67
232
3.4K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
19
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
समाधौ क्रियमाणे तु विघ्ना आयान्ति वै बलात्। अनुशासनराहित्यम् आलस्यं भोगलालसम् ।।१२७।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भगवान् श्री आदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना-पथ के अत्यन्त सूक्ष्म, किन्तु अनिवार्य पक्ष विघ्नों का विशद विवेचन प्रस्तुत करते हैं। जहाँ पूर्ववर्ती श्लोकों में उन्होंने ध्यान, धारणा और समाधि की परा अवस्थाओं का निरूपण किया, वहीं यहाँ वे साधक को सावधान करते हैं कि उस उच्चतम स्थिति की ओर अग्रसर होते समय मन और अन्तःकरण में विविध प्रकार के अवरोध स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं। यह चेतावनी केवल व्यावहारिक नहीं, अपितु गहन दार्शनिक आधार से युक्त है। “समाधौ क्रियमाणे तु” - जब साधक समाधि का अभ्यास करता है, अर्थात् चित्तवृत्तियों को ब्रह्माकार बनाकर आत्मस्वरूप में स्थित होने का प्रयत्न करता है, तब “विघ्नाः आयान्ति वै बलात्” विघ्न बलपूर्वक, तीव्रता से उत्पन्न होते हैं। यह “बलात्” शब्द अत्यन्त अर्थगर्भित है; यह संकेत करता है कि ये विघ्न आकस्मिक या दुर्बल नहीं, बल्कि संस्कारजन्य, दीर्घकालीन वासनाओं के रूप में शक्तिशाली होते हैं, जो साधना को बाधित करने का प्रयास करते हैं। इन विघ्नों का मूल कारण है - अविद्या और उससे उत्पन्न वासना-समूह। उपनिषद् कहती हैं कि “पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः” इन्द्रियाँ स्वभावतः बहिर्मुख हैं; अतः मन बाह्य विषयों की ओर प्रवृत्त होता है। भगवद्गीता में भी भगवान् ने अर्जुन से कहा - “चञ्चलं हि मनः कृष्ण” मन अत्यन्त चञ्चल और दुष्प्रवृत्त है। अतः जब साधक उसे अन्तर्मुख करने का प्रयास करता है, तो पुरानी प्रवृत्तियाँ विरोध के रूप में उभरती हैं - यही विघ्न हैं। भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इन विघ्नों को तीन प्रमुख रूपों में निर्दिष्ट करते हैं - (१) “अनुशासनराहित्यम्” - यह आत्मनियन्त्रण, नियम और संयम का अभाव है। साधना में नियमितता और व्रतशीलता अत्यन्त आवश्यक हैं। गीता में कहा गया है - “युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु” साधक को अपने आहार, विहार और आचरण में संयम रखना चाहिए। अनुशासन के अभाव में मन स्थिर नहीं हो सकता, और बिना स्थिरता के समाधि असम्भव है। यह विघ्न साधक को अनियमित, असावधान और शिथिल बना देता है। (२) “आलस्यं” - आलस्य केवल शारीरिक जड़ता नहीं, बल्कि मानसिक प्रमाद है; एक प्रकार की जड़ता, जिसमें साधक साधना के प्रति उत्साह खो देता है। कठोपनिषद् में कहा गया है - “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” यह आत्मा निर्बल, आलसी या प्रमादी के लिए उपलब्ध नहीं होती। आलस्य साधक की प्रगति को भीतर ही भीतर रोक देता है; वह जानता है कि साधना करनी है, किन्तु करने की प्रेरणा नहीं जुटा पाता। (३) “भोगलालसम्” - यह विषयभोगों के प्रति सूक्ष्म आकर्षण है। बाह्य त्याग के पश्चात् भी अन्तःकरण में वासनाएँ शेष रह सकती हैं। गीता में कहा गया है कि “विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः, रसवर्जं” विषय तो हट जाते हैं, किन्तु उनका “रस”, उनकी सूक्ष्म आसक्ति बनी रहती है। यही भोगलालसा है, जो साधक को पुनः संसार की ओर खींचती है। यह विघ्न अत्यन्त सूक्ष्म और गूढ़ है, क्योंकि यह प्रकट रूप में नहीं, बल्कि अन्तःकरण की गहराई में कार्य करता है। दार्शनिक दृष्टि से ये तीनों विघ्न अनुशासन का अभाव, आलस्य और भोगलालसा अविद्या के विविध रूप हैं। ये मन को ब्रह्माकार वृत्ति में स्थिर होने से रोकते हैं और साधक को पुनः नाम-रूपात्मक जगत् की ओर प्रवृत्त करते हैं। ब्रह्मसूत्र में भी यह संकेत मिलता है कि बिना अभ्यास और वैराग्य के ज्ञान स्थिर नहीं होता - “अभ्यासोपदेशात्” इन विघ्नों का निवारण भी भगवद्पाद की शिक्षाओं में निहित है - नियमित अभ्यास, वैराग्य, विवेक और गुरु-शास्त्र के प्रति श्रद्धा। साधक को चाहिए कि वह निरन्तर सजग रहे, अपने अन्तःकरण का निरीक्षण करे, और जैसे ही कोई विघ्न उत्पन्न हो, उसे पहचानकर विवेकपूर्वक उसका निराकरण करे। अन्ततः, यह श्लोक साधना के मार्ग में एक यथार्थ चेतावनी है कि आत्मसाक्षात्कार की यात्रा केवल उच्च आदर्शों से नहीं, बल्कि सूक्ष्म आत्मसंयम, जागरूकता और निरन्तर अभ्यास से पूर्ण होती है। विघ्नों का आगमन असफलता का संकेत नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि साधक सही दिशा में अग्रसर है। उन्हें पहचानकर, उनसे ऊपर उठकर ही साधक समाधि की स्थिरता और ब्रह्मनिष्ठा की पूर्णता को प्राप्त करता है। अतः भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य का यह उपदेश साधक को केवल सावधान ही नहीं करता, बल्कि उसे दृढ़ता, सजगता और आन्तरिक अनुशासन की ओर प्रेरित करता है; यही साधना का वास्तविक तप है, और यही आत्मसाक्षात्कार की अनिवार्य सीढ़ी। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
82
99
261
2.6K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @HariharAshram @AcharyaSabha @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
13
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
ततः साधननिर्मुक्तः सिद्धो भवति योगिराट् । तत्स्वरूपं न कैकस्य विषयः मनसो गिराम् ।।१२६।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना की पराकाष्ठा तथा उसके परम फल का दिव्य निरूपण करते हैं। पूर्ववर्ती श्लोकों में उन्होंने अभ्यास, ध्यान, धारणा और समाधि के क्रमिक उत्कर्ष को स्पष्ट किया; यहाँ वे उस अन्तिम अवस्था का उद्घाटन करते हैं, जहाँ साधक समस्त साधनों से परे होकर, सिद्धत्व को प्राप्त करता है और आत्मस्वरूप में पूर्णतः प्रतिष्ठित हो जाता है। “ततः साधननिर्मुक्तः” - यहाँ “ततः” शब्द उस क्रम का बोध कराता है, जो निरन्तर अभ्यास, ब्रह्मनिष्ठ चिन्तन और अन्तःकरण-शुद्धि के पश्चात् प्राप्त होता है। जब साधक “कृतिमानन्द” से “सहजानन्द” की ओर अग्रसर होकर मन को पूर्णतः वश में कर लेता है, तब वह साधनों की आवश्यकता से मुक्त हो जाता है। साधन जैसे - ध्यान, जप, उपासना, चिन्तन ये सभी प्रारम्भ में आवश्यक होते हैं; किन्तु जब लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती है, तब ये साधन स्वतः ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। जैसे - नदी समुद्र में मिलकर अपनी पृथक् धारा को खो देती है, वैसे ही साधन आत्मसाक्षात्कार में लीन होकर अपना प्रयोजन पूर्ण कर लेते हैं। “सिद्धो भवति योगिराट्” - ऐसा साधक “सिद्ध” हो जाता है अर्थात् वह पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। यहाँ “योगिराट्” शब्द विशेष महत्त्वपूर्ण है, जो योगियों में श्रेष्ठ, आत्मनिष्ठ, पूर्णतया जागृत पुरुष है। यह सिद्धि कोई अलौकिक चमत्कार या योगसिद्धि नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप में अचल प्रतिष्ठा है। यह वही अवस्था है, जहाँ साधक जान लेता है - “नाहं कर्ता, न भोक्ता, केवलं साक्षी चैतन्यरूपः ब्रह्मास्मि।” इस बोध के साथ वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है। “तत्स्वरूपं” - अब भगवद्पादाचार्य उस आत्मस्वरूप की ओर संकेत करते हैं, जो इस सिद्धावस्था में प्रत्यक्ष होता है। यह स्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, स्वप्रकाश चैतन्य है, जो न जन्म लेता है, न नष्ट होता है, न परिवर्तित होता है। यह न तो विषय है, न वस्तु; यह सबका अधिष्ठान, सबका प्रकाशक है। “न कैकस्य विषयः मनसो गिराम्” - यहाँ भगवत्पाद एक अत्यन्त सूक्ष्म सत्य का उद्घाटन करते हैं। यह आत्मस्वरूप न तो मन का विषय है, न वाणी का। मन, जो संकल्प-विकल्पात्मक है, केवल सीमित वस्तुओं को ही ग्रहण कर सकता है; वाणी भी केवल नाम-रूपों का ही वर्णन कर सकती है। किन्तु आत्मा अनन्त, निराकार और अव्यवहित है। अतः वह न मन द्वारा कल्पित हो सकता है, न वाणी द्वारा व्यक्त। यह वही तत्त्व है, जिसे उपनिषद् कहते हैं - “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” जहाँ वाणी और मन दोनों ही पहुँच नहीं पाते। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मा अज्ञेय है; अपितु यह कि वह विषय रूप से ज्ञेय नहीं है। वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है जिसके प्रकाश में मन और वाणी कार्य करते हैं। अतः उसे जानना वस्तुतः “स्वयं होना” है, न कि किसी अन्य वस्तु की भाँति उसे जानना। दार्शनिक दृष्टि से यह अद्वैत का परम निष्कर्ष है। जहाँ द्वैत है, वहाँ विषय-ज्ञान सम्भव है - ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का त्रिपुटी-भेद रहता है। किन्तु जहाँ अद्वैत है, वहाँ यह त्रिपुटी लीन हो जाती है। आत्मा न ज्ञाता है, न ज्ञेय; वह स्वयं ज्ञानस्वरूप है अखण्ड, निरवच्छिन्न चैतन्य। इस अवस्था में साधक न तो किसी साधन का आश्रय लेता है, न किसी अनुभव का आग्रह करता है। वह न कुछ प्राप्त करना चाहता है, न कुछ त्यागना; वह पूर्णतः तृप्त, पूर्णतः मुक्त और पूर्णतः शान्त होता है। यही “जीवनमुक्ति” की अवस्था है जहाँ जीवन्मुक्त पुरुष संसार में रहते हुए भी उससे असंग रहता है, जैसे कमलपत्र जल में रहकर भी जल से अछूता रहता है। अतः, भगवत्पाद आदि शंकराचार्य इस श्लोक में यह प्रतिपादित करते हैं कि साधना का परम फल है - साधनातीत स्थिति, जहाँ साधक स्वयं ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होकर, मन और वाणी की सीमाओं से परे उस अनिर्वचनीय सत्य का अनुभव करता है। यही अद्वैत वेदान्त की चरम सिद्धि है - जहाँ न कुछ कहना शेष रहता है, न कुछ जानना; केवल होना शुद्ध, स्वप्रकाश, अनन्त ब्रह्मस्वरूप होना। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
86
97
301
2.4K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
31
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
एवं च कृतिमानन्दं तावत् साधु समभ्यसेत् । वश्यो यावत् क्षणात् पुंसः प्रयुक्तः स भवेत् स्वयम् ।।१२५।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के अत्यन्त व्यावहारिक, किन्तु सूक्ष्मतम रहस्य का उद्घाटन करते हैं। पूर्ववर्ती श्लोकों में उन्होंने ध्यान, धारणा और समाधि की परा अवस्थाओं का निरूपण किया; अब वे बताते हैं कि उस परमावस्था की प्राप्ति के लिए साधक को किस प्रकार अभ्यास करना चाहिए। यहाँ “कृतिमानन्द” और “अभ्यास” के माध्यम से वे उस क्रमिक साधना-पथ को स्पष्ट करते हैं, जो अन्ततः सहज ब्रह्मानुभूति में परिणत होता है। “एवं च कृतिमानन्दं” - यहाँ “कृतिमानन्द” का तात्पर्य उस आनन्द से है, जो प्रारम्भ में साधक के द्वारा अभ्यासपूर्वक, संकल्पपूर्वक उत्पन्न किया जाता है। यह स्वाभाविक आत्मानन्द नहीं, बल्कि “ब्रह्मैव अस्मि” इस भावना का बारम्बार चिन्तन कर मन को उसी में स्थिर करने से उत्पन्न होने वाला अनुभव है। यह एक प्रकार का साधनजन्य आनन्द है, जो अभी पूर्णतः सहज नहीं हुआ है, किन्तु आत्मानुभूति की दिशा में अग्रसर है। साधक प्रारम्भ में मन को बार-बार विषयों से हटाकर, ब्रह्मभाव में स्थापित करने का प्रयास करता है। जब वह “मैं देह नहीं, मन नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य ब्रह्म हूँ” इस विचार का निरन्तर अभ्यास करता है, तब मन में एक विशेष प्रकार की शान्ति और आनन्द का अनुभव होता है। यही “कृतिमानन्द” है - जो यद्यपि प्रारम्भ में प्रयासजन्य है, किन्तु साधना के लिए अत्यन्त आवश्यक है। “तावत् साधु समभ्यसेत्” - भगवद्पाद निर्देश देते हैं कि इस कृतिमानन्द का सतत्, विधिपूर्वक और दृढ़तापूर्वक अभ्यास किया जाए। “साधु” शब्द यहाँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है अर्थात् सम्यक् रीति से, निरन्तरता के साथ, श्रद्धा और धैर्यपूर्वक। यह अभ्यास केवल क्षणिक या आकस्मिक न होकर, जीवन का अंग बन जाना चाहिए। यही “अभ्यास” मन को परिष्कृत कर, उसे ब्रह्मस्वरूप के अनुरूप बनाता है। “वश्यो यावत्” - जब तक मन पूर्णतः वश में न आ जाए, तब तक यह अभ्यास आवश्यक है। मन का स्वभाव चञ्चलता है; वह बार-बार विषयों की ओर प्रवृत्त होता है। अतः साधक को निरन्तर सजग रहकर, उसे पुनः ब्रह्मभाव में स्थापित करना होता है। यह प्रक्रिया प्रारम्भ में कठिन प्रतीत होती है, किन्तु अभ्यास से यह सरल और स्वाभाविक हो जाती है। “क्षणात् पुंसः प्रयुक्तः” - जब यह अभ्यास परिपक्व हो जाता है, तब मन थोड़े से संकेत या प्रयत्न से ही तुरन्त ब्रह्मभाव में स्थित हो जाता है। जैसे किसी प्रशिक्षित अश्व को हल्के से संकेत देने पर वह नियंत्रित हो जाता है, वैसे ही साधक का मन भी सहज ही वश में आ जाता है। यहाँ “क्षणात्” शब्द उस तात्कालिकता का बोध कराता है, जहाँ साधक को मन को स्थिर करने में कोई विलम्ब या संघर्ष नहीं करना पड़ता। “स भवेत् स्वयम्” - अन्ततः यह अभ्यास इतना दृढ़ हो जाता है कि मन स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में स्थित रहने लगता है। अब कोई बाह्य प्रयत्न आवश्यक नहीं रहता; “कृतिमानन्द” “सहजानन्द” में परिणत हो जाता है। यह वही अवस्था है, जहाँ साधना और साध्य का भेद लुप्त हो जाता है, जहाँ जो पहले प्रयासपूर्वक किया जाता था, वही अब स्वाभाविक स्थिति बन जाता है। दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक “अभ्यास” और “वैराग्य” के सिद्धान्त का अद्वैत रूप प्रस्तुत करता है। यहाँ अभ्यास का लक्ष्य मन का निरोध नहीं, बल्कि उसकी ब्रह्मनिष्ठा है। बारम्बार ब्रह्मभाव का चिन्तन करते-करते, मन की पुरानी वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं और अन्तःकरण शुद्ध होकर आत्मस्वरूप में ही स्थित हो जाता है। यह प्रक्रिया उसी प्रकार है, जैसे किसी धारा को बार-बार एक दिशा में मोड़ा जाए तो वह स्थायी रूप से उसी दिशा में प्रवाहित होने लगती है। प्रारम्भ में यह प्रयासपूर्वक होता है, किन्तु कालान्तर में यह स्वाभाविक बन जाता है। इसी प्रकार, “कृतिमानन्द” के अभ्यास से साधक का मन अन्ततः “सहज आनन्द” में स्थित हो जाता है। अतः भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् का का यह उपदेश अत्यन्त व्यावहारिक और प्रेरणादायक है। वे यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मानुभूति कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि निरन्तर अभ्यास का परिणाम है। प्रारम्भ में चाहे वह कृत्रिम प्रतीत हो, किन्तु उसी अभ्यास से अन्ततः सहज ब्रह्मनिष्ठा की प्राप्ति होती है। निष्कर्षतः, साधक को चाहिए कि वह ब्रह्मभाव से उत्पन्न कृतिमानन्द का निरन्तर अभ्यास करे, जब तक कि मन पूर्णतः वश में होकर स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में स्थित न हो जाए। यही अभ्यास अन्ततः उसे उस परम, सहज, अखण्ड आनन्द में प्रतिष्ठित करता है, जो अद्वैत वेदान्त की चरम सिद्धि है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
91
116
303
3.5K
Pawan Vasudev
Pawan Vasudev@vasudevpawan7·
@AvdheshanandG @AcharyaSabha @HariharAshram @narendramodi @AmitShah @EkatmaDham @FoundationLadli @kishorekaya 👏👏👏👏मेरे परम पूज्य ,परम आदरणीय श्रद्धैय सदगुरु जी के पावन श्री चरणों में श्रद्धा भाव से कोटि -कोटि चरण वन्दन III सादर हरिओम जी 🙏गुरु कृपा ही केवलम 🙏🙏
हिन्दी
0
0
0
27
Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
ब्रह्मैवस्मिति सद्वृत्त्या निरालंबतया स्थितिः। ध्यानशब्देन विख्याता परमानन्ददायिनी।।१२३।। ("अपरोक्षानुभूति") अद्वैत-वेदान्त के परमप्रवर्तक भगवत्पादाचार्य भाष्यकार श्री आदि शंकराचार्य इस श्लोक में “ध्यान” के उस परम, सूक्ष्म और तात्त्विक स्वरूप का उद्घाटन करते हैं, जो सामान्य ध्यान-प्रक्रियाओं से सर्वथा भिन्न और श्रेष्ठ है। यहाँ ध्यान न तो केवल मानसिक एकाग्रता है, न किसी रूप, प्रतीक या देवता का चिन्तन; अपितु यह आत्मस्वरूप में स्थित होने की वह अखण्ड, निरालम्ब अवस्था है, जो “ब्रह्मैव अस्मि” मैं ही ब्रह्म हूँ, इस दृढ़, अविच्छिन्न वृत्ति के रूप में प्रकट होती है। “ब्रह्मैव अस्मि इति सद्वृत्त्या” - यहाँ “सद्वृत्ति” का अभिप्राय उस अखण्डाकार वृत्ति से है, जो शास्त्र और गुरु के उपदेश से उत्पन्न होकर साधक के अन्तःकरण में दृढ़ता से प्रतिष्ठित हो जाती है। यह कोई साधारण विचार नहीं, अपितु आत्मसाक्षात्कार की परिणति है। जब “अहं देहः”, “अहं मनः”, “अहं कर्ता” इत्यादि अज्ञानजन्य भ्रान्तियाँ निवृत्त हो जाती हैं, तब “अहं ब्रह्मास्मि” का साक्षात्कार उदित होता है। यही वृत्ति यहाँ “सद्वृत्ति” के रूप में निरूपित है सत्, चित् और आनन्दस्वरूप ब्रह्म के साथ अपनी अभिन्नता का निश्चल बोध। “निरालंबतया स्थितिः” - ध्यान का यह स्वरूप किसी बाह्य या आन्तरिक आलम्बन पर आश्रित नहीं है। सामान्य ध्यान में साधक किसी देवता, मंत्र, चक्र या बिन्दु को आधार बनाता है; किन्तु यहाँ साधक स्वयं ही अपने आत्मस्वरूप में स्थित है, जो सर्वाधार होकर भी किसी का आश्रित नहीं। यह “निरालम्बता” अद्वैत का हृदय है - जहाँ न ध्याता है, न ध्यान का विषय, न ध्यान की क्रिया; केवल एक अखण्ड, स्वयंप्रकाश चैतन्य ही शेष रहता है। इस स्थिति को भाष्यकार भगवान् कहते हैं - “ध्यानशब्देन विख्याता” अर्थात् यही वास्तविक ध्यान है। यह परिभाषा ध्यान को उसकी सीमित, साधनात्मक परिधि से उठाकर उसकी परमावस्था में प्रतिष्ठित करती है। यहाँ ध्यान कोई प्रयत्न नहीं, बल्कि स्वाभाविक स्थिति है - स्वरूपावस्थानम्। यह वही अवस्था है, जिसे उपनिषद् “अमृतत्व” और “ब्रह्मनिष्ठा” के रूप में वर्णित करते हैं। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह ध्यान “अध्यारोप-अपवाद” की प्रक्रिया का चरम फल है। प्रारम्भ में साधक जगत् को सत्य मानकर विविध साधनाओं में प्रवृत्त होता है; किन्तु ज्ञान के उदय होने पर यह बोध होता है कि समस्त प्रपञ्च केवल नाम-रूपात्मक उपाधि है, जिसका अधिष्ठान एकमात्र ब्रह्म है। जैसे रज्जु में सर्प का भ्रान्ति से आरोप होता है और ज्ञान होने पर केवल रज्जु ही शेष रह जाती है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान होने पर समस्त जगत् ब्रह्मस्वरूप में ही लीन हो जाता है। उसी स्थिति में यह “निरालम्ब ध्यान” प्रकट होता है। यह ध्यान न तो मन का दमन है, न विचारों का निषेध; अपितु यह उस ज्ञान की दृढ़ता है, जिसमें मन का प्रत्येक व्यापार स्वयं ब्रह्मस्वरूप में ही लीन हो जाता है। यहाँ साधक मन को रोकने का प्रयास नहीं करता, बल्कि यह जानता है कि मन, बुद्धि, अहंकार - सब उसी चैतन्य के प्रकाश में प्रकट हो रहे हैं और उसी में लीन हैं। “परमानन्ददायिनी” इस ध्यान का फल है - परम आनन्द। यह आनन्द किसी विषय से उत्पन्न नहीं, न ही क्षणिक है; यह आत्मस्वरूप का स्वाभाविक, नित्य, निरपेक्ष आनन्द है। जब साधक “मैं ब्रह्म हूँ” इस सत्य में स्थित हो जाता है, तब वह बाह्य सुखों की खोज से मुक्त हो जाता है। उसे न प्राप्त करने का शोक रहता है, न प्राप्त होने पर हर्ष; वह स्वात्मानन्द में स्थित होकर पूर्णता का अनुभव करता है। यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि यह अवस्था केवल बौद्धिक चिन्तन का परिणाम नहीं है। यह “श्रवण, मनन, निदिध्यासन” की दीर्घ साधना का परिपाक है। जब शास्त्र-वाक्यों का सत्य बार-बार चिन्तन और आत्मनिष्ठ ध्यान के द्वारा अन्तःकरण में दृढ़ हो जाता है, तब यह अखण्ड वृत्ति सहज रूप से प्रवाहित होने लगती है। उसी का नाम यहाँ “सद्वृत्ति” है। अतः, आचार्य शंकर का यह उपदेश साधना के उस सर्वोच्च शिखर का संकेत करता है, जहाँ ध्यान, ध्याता और ध्येय - इन तीनों का भेद लुप्त हो जाता है। यह अद्वैत की पूर्णता है कि जहाँ साधक स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप बनकर, निरालम्ब, निर्विकल्प और स्वप्रकाश चैतन्य में स्थित रहता है। निष्कर्षतः, “ब्रह्मैवस्मि” की अखण्ड भावना में निरालम्ब स्थित होना ही वास्तविक ध्यान है, और यही वह अवस्था है, जो साधक को परमानन्द की अनुभूति कराती है। यही अद्वैत वेदान्त का परम लक्ष्य, और यही मानव जीवन की चरम सिद्धि है। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #AvdheshanandG_Quotes
Swami Avdheshanand tweet media
हिन्दी
93
95
295
2.4K