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@TussharKodecha
आजकल कुछ घटनाएँ और कुछ चर्चाएँ देखकर सचमुच चिंता होती है कि हम एक समाज के रूप में किस दिशा में बढ़ रहे हैं।
किसी कॉमेडी शो में एक युवक किसी महिला मित्र को बिरयानी खिलाने के बदले "कीमत वसूलने" की बात करता है और दर्शक हँसते हैं। दूसरे मंच पर एक डॉक्टर मृत व्यक्तियों के शरीर को लेकर मज़ाक करती है और लोग तालियाँ बजाते हैं। कोई पॉडकास्टर अपने ही माता-पिता के बारे में अभद्र बातें करता है। कई तथाकथित कॉमेडियन देवी-देवताओं पर फूहड़ टिप्पणियाँ करते हैं और पढ़े-लिखे युवा उसे मनोरंजन समझकर स्वीकार कर लेते हैं।
सोशल मीडिया पर जब कभी व्हाट्सएप चैट या निजी बातचीत सामने आती है, तब भी एक विचलित करने वाली तस्वीर दिखाई देती है। किशोर लड़के और लड़कियाँ अपने ही सहपाठियों के बारे में ऐसी भाषा का प्रयोग करते दिखाई देते हैं जिसे पढ़ते हुए भी शर्म महसूस हो। रिश्तों, प्रेम, मित्रता और सम्मान जैसे शब्दों का अर्थ जैसे धीरे-धीरे बदलता जा रहा है।
समाचारों पर नज़र डालिए। कहीं रिश्तों की मर्यादाएँ टूट रही हैं, कहीं स्वार्थ के लिए परिवार बिखर रहे हैं, कहीं लालच और वासना के कारण अपराध हो रहे हैं। हर घटना अलग हो सकती है, लेकिन इन सबके पीछे एक समान प्रश्न दिखाई देता है—क्या हम धीरे-धीरे नैतिक सीमाओं को महत्व देना छोड़ चुके हैं?
पिछले कुछ वर्षों में आधुनिकता, व्यक्तिवाद, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रगतिशीलता की चर्चा खूब हुई है। इनमें से बहुत-सी बातें आवश्यक भी हैं। हर व्यक्ति को सम्मान और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब स्वतंत्रता और जिम्मेदारी का संतुलन टूट जाता है। जब अधिकार तो याद रहते हैं, पर कर्तव्य और मर्यादा पीछे छूट जाते हैं।
आज रिश्तों को निभाने की जगह उन्हें उपभोग की वस्तु की तरह देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। वफादारी, संयम, त्याग और प्रतिबद्धता जैसे शब्द पुराने या मज़ाक का विषय बना दिए गए हैं। कई युवाओं की नज़र में चरित्र और संस्कार अब उपलब्धि नहीं, बल्कि पिछड़ापन माने जाने लगे हैं। यही सबसे बड़ी चिंता है।
समाज केवल कानूनों से नहीं चलता। समाज विश्वास, अनुशासन, परिवार, संस्कार और पारस्परिक सम्मान से चलता है। यदि इन स्तंभों को कमजोर कर दिया जाए, तो फिर चाहे आर्थिक विकास कितना भी हो, भीतर से समाज खोखला होने लगता है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए केवल तकनीकी प्रगति या आर्थिक सफलता पर्याप्त नहीं है। हमें नैतिकता, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भी उतनी ही आवश्यकता है। क्योंकि जब किसी समाज में लज्जा, मर्यादा और उत्तरदायित्व का भाव कमजोर पड़ता है, तब उसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ते हैं।
यह किसी एक व्यक्ति, एक विचारधारा या एक पीढ़ी का प्रश्न नहीं है। यह हम सबके आत्ममंथन का विषय है। हमें यह तय करना होगा कि हम आने वाली पीढ़ी को केवल सुविधाएँ देना चाहते हैं या साथ में मूल्य भी देना चाहते हैं।
क्योंकि सभ्यताएँ केवल विज्ञान और धन से महान नहीं बनतीं, वे अपने चरित्र और मूल्यों से महान बनती हैं।
जयपुर के खोह नागोरियान में अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए विस्फोट से मारे गए लोगों के परिजनों के बीच जाकर उन्हें ढांढस बंधाया एवं हालातों का जायज़ा लिया। यहां बेहद मार्मिक हालात हैं, स्थानीय लोगों में सरकार और प्रशासन की संवेदनहीनता को लेकर आक्रोश है।
घटना के बाद फायर ब्रिगेड एवं एंबुलेंस के आने में देरी हुई। यदि ये समय पर आती तो शायद जनहानि कम होती। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजस्थान की राजधानी में इतना बड़ी घटना हो गई, कई लोगों की जान चली गई और सरकार के किसी बड़े नेता ने यहां का दौरा तक करना मुनासिब नहीं समझा।
मैंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर एवं जिला कलेक्टर, जयपुर से फोन पर बात कर पीड़ितों की यथोचित मदद करने का आग्रह किया है।
एक लड़के ने बताया कि वह अपने परिवार को ट्रेन में बैठाने के लिए महाराष्ट्र के कल्याण रेलवे स्टेशन गया था। ट्रेन दोपहर 12 बजे की थी लेकिन बाद में बताया गया कि वह 2 बजे आएगी।
लड़के ने प्लेटफॉर्म टिकट ले लिया था और परिवार के साथ इंतजार करता रहा। लेकिन ट्रेन लगातार लेट होती रही। शाम करीब 5 बजे वह परिवार को ट्रेन में बैठाकर वापस जाने लगा
तभी टीटी ने उसे रोक लिया और प्लेटफॉर्म टिकट दिखाने को कहा। उसने टिकट दिखाया तो टीटी ने कहा कि प्लेटफॉर्म टिकट 2 घंटे बाद एक्सपायर हो जाता है। इसके बाद उस पर 500 रुपये का जुर्माना लगा दिया!
वीडियो में लड़के ने सवाल उठाया कि जब ट्रेन रेलवे की वजह से कई घंटे लेट हुई थी तो उसके इंतजार की जिम्मेदारी कौन लेगा.??
उसने कहा कि उसने परिवार को छोड़ने के लिए वैध प्लेटफॉर्म टिकट लिया था, फिर भी उसे जुर्माना भरना पड़ा!
ये भी सवाल जायज है कि जब देरी रेलवे की तरफ से हुई थी तो उसकी सजा यात्री को क्यों मिली..?
वीडियो कमेंट में देखें 👇