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परिव्राजक
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परिव्राजक
@jiwan_sameer
I hate politics. विचरण मन का आचरण तन का,कल हों न हों.श्रीकृष्ण का दीवाना भावनाओं का पथिक- पहाड़ी! यादों के गलियारे से!!रमता जोगी!मीडिया में झांकें! रिपोस्ट!
विलीन- अल्मोडा उत्तराखण्ड เข้าร่วม Ocak 2017
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फांस जो गड़ी है
रगों में धंसी है
धरा पर उतरते
प्रक्षेप से ये
अंधेरों में लिपटे
आश्लेष से ये
जितने भी वर्जित
वे लौटते हैं
प्रत्यंचित विपर्यय
मौन तोड़ते हैं
मुस्कानों पर अब
गहरा अंकुश है
संदेशों में पसरा
रेत का धनुष है
त्रास जो सही है
संताप ने कही है...
#G1
#अंतर्नाद

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हृदय-आंगन की मृदल मृदा में
जो बीज तुमने बोये थे,
स्मृति-सिक्त उन हरित पल्लवों पर
अब पुष्प मधुर मुस्काये हैं।
यह रिक्त सदन, यह मौन डगर
रास न आती बिन तुम्हारे,
गगन के इन रिक्त नक्षत्रों ने
लोचनों में प्राण-दीप जलाये हैं।।
#Kavita250
#Kavita250@KavitaTwoFifty
Kavita250 शीर्षक 'आँगन' (संलग्न पोस्ट से लिया गया शब्द) एक ट्वीट में ही इस शीर्षक पर एक कविता लिखें और हैशटैग #Kavita250 लगा, 5.4.26 तक पोस्ट करें एक हैंडल से अधिकतम 2 कविताएँ पोस्ट हो सकती हैं ⭐️ सर्वश्रेष्ठ कविता का एक शब्द अगले सप्ताह का शीर्षक होगा और 'कोट पोस्ट' किया जाएगा!
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Morning vibe --
Good morning X family
hv nyc pleasent day 🙏
खिड़की से उतरी है आज धूप
जैसे तेरी हँसी का पहला ख़त
नींद की सिलवट अभी बाकी हैं
और दिन ने दस्तक़ भी दे दी है।
चाय की भाप में घुला आलस
ख़ामोशी भला क्यों चुप रहती
आज भी वही तुम हो, वही मैं
बस कुछ वक्त नया ये लगता है
रास्ते जाग भी चुके सब बाहर
पर दिल अभी तक है ठहरा ये
बस एक नाम लबों तक आया
और सवेरा भी जैसे मुस्कुराया।
🐦🔥🌿🍂🪴🌹🪷🎊🍫
#अशोक_मसरूफ़
PIC credit Pinterest

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रिश्ता शुरू करना तो मुमकिन है
पर सच्चे मन से निभाना आसान नहीं,
सात फेरों के वचन लेना एक रीत है
वादा पूरा करना सबके बस की बात नहीं
एक यात्रा है जहाँ जीवनसाथी
हाथ थामे इस सफ़र पर आगे बढ़ते हैं
समर्पण से, प्रेम से, सहयोग से
अंतिम सफ़र तक एक दूजे साथ निभाते हैं
-#Aks✨🧿
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कभी ओझल कभी सामने
कभी लुप्त हो किसी बहाने
दूर कहीं क्षितिज पर घूमें
अंबर धरा को हौले से चूमें
इक स्नेहदीप जला आएंगे
संग नवानुराग राग गायेंगे
किन्तु कैसे हो यह सब संभव
त्वरित विलुप्त पलक झपकते
क्योंकि तुम हो मेरी दिवास्वप्न सी..🖋️
आज का अनुबोध
#अनुराग #affection #स्नेह

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🚩🙏🏻🙏🏻💐
excellent
🚩🙏🏻🙏🏻
परिव्राजक@jiwan_sameer
फांस जो गड़ी है रगों में धंसी है धरा पर उतरते प्रक्षेप से ये अंधेरों में लिपटे आश्लेष से ये जितने भी वर्जित वे लौटते हैं प्रत्यंचित विपर्यय मौन तोड़ते हैं मुस्कानों पर अब गहरा अंकुश है संदेशों में पसरा रेत का धनुष है त्रास जो सही है संताप ने कही है... #G1 #अंतर्नाद
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