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@9viewpoint

also highly contagious is kindness,patience,love, enthusiasm,and a positive attitude Don’t wait to catch it from others Be the carrier

Beigetreten Kasım 2011
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ।। चैत्र नवरात्रि के "तृतीय दिवस" पर, जब साधक मौन की साधना में निमग्न होता है तब हृदय के सूक्ष्म कपाट खुलते हैं। वहाँ, चेतना के आलोक में, "माँ चन्द्रघण्टा" का वज्रप्रभा स्वरूप प्रकट होता है; सिंह पर सौम्यता और शक्ति की मूर्तिमती संनादति, कर-कमलों में शस्त्रों की प्रभा और मस्तक पर अर्धचन्द्र की शान्त शीतलता। यह दर्शन केवल बाह्य चित्र नहीं, अपितु अन्तर की गहराइयों में उदित होने वाला वह ब्रह्मस्वरूप सौन्दर्य है, जिसे भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य ने सौन्दर्यलहरी के अमृतमय श्लोकों में अमर किया है । त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया। भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ।। जहाँ अन्य देवता दो भुजाओं से अभय और वर की मुद्रा दिखाते हैं, वहाँ "माँ चन्द्रघण्टा" स्वयं ही अभय और करुणा की साक्षात् मूर्ति हैं। उनकी सत्ता शान्ति और शक्ति का संगम है; यह कोई आभूषण नहीं, अपितु आत्मा की परिपूर्णता का जीवन्त स्वरूप है। "माँ चन्द्रघण्टा" का अभय अद्वैत वेदान्त का मूल मन्त्र है। जब साधक को यह बोध होता है कि “नाहं देहः, ब्रह्मास्मि,” तब भय का आवरण स्वतः छिन्न-भिन्न हो जाता है। माँ का यह स्वरूप वह ज्ञानज्योति है, जो साधक को अविद्या के सर्पिल बन्धनों से मुक्त कर, निर्भीकता के सिंहासन पर विराजमान कराती है। उनके चण्डकोपास्त्र बाह्य शत्रुओं के लिए ही नहीं, अपितु अन्तर के रजस् और तमस् पर विजय का प्रतीक हैं। अद्वैत का युद्ध बाह्य नहीं, अन्तरंग है - जहाँ मन, वासना और अज्ञान से संग्राम होता है। माँ की यह विकरालता आत्मानुशासन का सौम्य सौन्दर्य है, जो साधक को स्वयं की सत्ता का साक्षात्कार कराती है। "माँ चन्द्रघण्टा" का घण्टा केवल शस्त्र नहीं, वह शब्दब्रह्म की दिव्य अनुगूँज है। जैसे - "ॐ" का प्रणव-नाद सृष्टि का मूल है, वैसे ही यह घण्टनाद साधक के अन्तर में अविद्या के तिमिर को विदीर्ण कर, आत्मचैतन्य का स्फुरण जागृत करता है। यह ध्वनि उपनिषदों के महावाक्यों-सी है, “तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि” जो चेतना को देह की मर्यादाओं से परे, अनन्त की ओर ले जाती है। सौन्दर्यलहरी का यह काव्य - “तव हि चरणावेव निपुणौ” वेदान्त की परिपूर्णता का प्रतीक है। माँ के चरण केवल शरणस्थली नहीं, अपितु वह निर्विकल्प अवस्था हैं, जहाँ साधक समर्पण के सागर में डूबकर स्वरूपबोध प्राप्त करता है। यहाँ न इच्छा शेष रहती है, न भय; केवल ब्रह्म की शान्ति और सौन्दर्य का साक्षात्कार होता है। जब साधक "माँ चन्द्रघण्टा" के स्वरूप में वरदान नहीं, अपितु स्वयं की अखण्ड सत्ता को अनुभूत करने लगता है, तब नवरात्रि की साधना सिद्ध हो उठती है। उस क्षण माँ केवल देवी नहीं रहतीं, वे हृदय में ब्रह्मस्वरूपिणी होकर विराजमान हो जाती हैं। उनकी अर्धचन्द्र-शोभित शान्त छवि साधक की चेतना को आलोकित कर, उसे अनन्त शान्ति और सौन्दर्य के सागर में निमज्जित कर देती है। #चैत्र_नवरात्रि #चंद्र_घंटा #सनातन_संस्कृति #AvdheshanandG_Quotes
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Pakistan Untold
Pakistan Untold@pakistan_untold·
Indian Army personnel are 'mentally ill' coz they visited 'superstitious' Bageshwar Dham. Asim Munir is Arfa's 'Sahab' coz both Arfa & Assim believe in a prophet who broke moon, talked to ghosts in caves, and believed in a God nobody saw except Jinns.
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Aravind
Aravind@aravind·
Unknown men strike again at the rabid animals that tried to bite India.
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Guilherme Teló
Guilherme Teló@guilhermehtelo·
🚨 Just published! We validated an ultrasound-based score combining VExUS + LUS to guide decongestion in acute heart failure. A step forward toward more precise, ultrasound-driven management. Proud of our team! Congrats Henrique! onlinelibrary.wiley.com/doi/epdf/10.10…
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Rubika Liyaquat
Rubika Liyaquat@RubikaLiyaquat·
माँगी थी ईदी… लियाक़त साहब @iamliyaquat ने याद दिला दी ED 😁😇 #EidMubarak
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Aravind
Aravind@aravind·
Based on some mainstream views, my counter views: In the next decade, the west isn't collapsing. The US isn't collapsing. The USD isn't collapsing. The GCC countries aren't quitting the USD or the US. UAE and its Dubai are not collapsing. Russia is not collapsing. IMHO, all the above are GLISCO propaganda that has gone mainstream. And so many in the world have fallen for it. And it is going to affect their future if they take life decisions based on this. To the contrary, I see the US is getting stronger. The USD will get stronger from here. The US is going to control most of the world's oil and set the oil price. China will get weaker due to US actions. India will get stronger. The UAE and its Dubai will do very well. Russia will be back mainstream, work with the US where it can, and will become another rich "European" nation.
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
"अपरोक्षानुभूति" महत्त्वे सर्ववस्तूनामणुत्वं ह्यतिदूरतः। तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ।।८०।। (भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अपरोक्षानुभूति) भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य इस श्लोक में अनुभूति-जन्य भ्रान्ति का एक और सूक्ष्म दृष्टान्त प्रस्तुत करते हैं। जब कोई अत्यन्त विशाल वस्तु अत्यधिक दूरी पर होती है, तो वह अति सूक्ष्म यहाँ तक कि बिन्दुवत् प्रतीत होती है। पर्वत दूर से रेखा-सा दिखता है, आकाश में विचरता विमान लघु बिन्दु-सा, और सूर्यास्त के समय विशाल सूर्य भी क्षुद्र-सा अनुभव होता है। वस्तु का वास्तविक स्वरूप नहीं बदलता; परिवर्तन केवल दृष्टि की सीमा और परिस्थिति में है। उसी प्रकार, असीम, सर्वव्यापक, निरुपाधिक आत्मा जो ब्रह्मस्वरूप है, अज्ञान के कारण सीमित देह के रूप में प्रतीत होती है। आत्मा में कोई संकोच या परिवर्तन नहीं होता; संकुचन केवल बुद्धि की भ्रान्ति में है। दृष्टान्त का अद्वैतार्थ : यह श्लोक स्पष्ट करता है कि आत्मा स्वभावतः अनन्त है, देह सीमित है और सीमितता का आरोप अज्ञानजन्य है। जैसे दूरस्थ महावस्तु सूक्ष्म दिखती है, वैसे ही अनन्त आत्मा “मैं यह शरीर हूँ” की संकीर्ण धारणा में बँधी प्रतीत होती है। यह वास्तविक संकुचन नहीं, प्रत्यभिज्ञान का अभाव है। उपनिषद् आत्मा की अनन्तता का उद्घोष करती हैं कि “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तैत्तिरीयोपनिषद् ) ब्रह्म अनन्त है। “एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः” (मुण्डकोपनिषद् ) आत्मा अणुवत् प्रतीत होता है, पर वह चेतना से ज्ञेय है। “असंगो ह्ययं पुरुषः” (बृहदारण्यक ) यह पुरुष असंग है। यहाँ “अणु” शब्द वास्तविक सूक्ष्मता नहीं, अपितु उपाधि-जन्य प्रतीति का द्योतक है। आत्मा स्वयं न सूक्ष्म है, न स्थूल; वह सर्वाधिष्ठान चैतन्य है। भगवद्गीता में कहा गया कि “यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते…” जैसे आकाश सर्वव्यापक होकर भी स्पर्श से लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा देह में स्थित प्रतीत होकर भी उससे लिप्त नहीं होती। किन्तु अज्ञानवश जीव कहता है कि “मैं सीमित हूँ”, “मैं यहाँ तक हूँ”, “मैं जन्मा हूँ।” यह संकीर्णता उसी प्रकार है, जैसे - दूरस्थ पर्वत का लघु प्रतीत होना। ब्रह्मसूत्र का सिद्धान्त है कि आत्मा नित्य, अविकार, सर्वगत है। देह उसके ऊपर अध्यास से आरोपित है। भगवद्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार, यह देहाभिमान ही संसार-बन्धन का कारण है। अनन्त आत्मा में सीमितता की प्रतीति उसी प्रकार है, जैसे - विशाल वस्तु में सूक्ष्मता का अनुभव। वस्तु में परिवर्तन नहीं; दृष्टि में दोष है। अज्ञान आत्मा को सीमित नहीं करता; वह केवल आत्मविस्मृति उत्पन्न करता है। जैसे दूर से पर्वत छोटा दिखे तो पर्वत छोटा नहीं हो जाता, वैसे ही “मैं देह हूँ” की भ्रान्ति से आत्मा सीमित नहीं हो जाती। ज्ञान का उदय होते ही सीमितता की भ्रान्ति लुप्त होती है, जीवत्व का मिथ्यात्व प्रकट होता है और आत्मा अपनी अनन्त महिमा में स्वयं प्रकाशित होती है। यह श्लोक अद्वैत वेदान्त का अत्यन्त मार्मिक प्रतिपादन है अनन्त आत्मा में देहत्व का अनुभव केवल अज्ञानजन्य प्रतीति है। जैसे - दूरस्थ महावस्तु सूक्ष्म प्रतीत होती है, वैसे ही असीम ब्रह्म आत्मा सीमित देह के रूप में अनुभव होता है। ज्ञान से यह संकीर्ण दृष्टि विलीन हो जाती है, और शेष रहता है - एकमेव अद्वितीय, सर्वव्यापक, अनन्त ब्रह्म। #अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त #AdvaitVedanta #स्वाध्याय #PrabhuShriKiLekhni #AvdheshanandG_Quotes #avdheshanandg_mission #स्वामी_अवधेशानन्द_गिरि
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om@9viewpoint·
@wmakarand @rohanduaT02 We used to buy illustrated books on coaching those days, mastering techniques Gone are those times now, it’s all about getting to the boundary
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Makarand Waingankar
Makarand Waingankar@wmakarand·
16 yr old Sunil Gavaskar is being guided by coach Vasant Amladi the correct position of the front elbow in the summer vacation camp of the CCI at the Brabourne stadium in 1965.
Makarand Waingankar tweet media
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om@9viewpoint·
@MicieliA_MD No role of IVT if no perfusion scan or DWI not done
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Andrew Micieli
Andrew Micieli@MicieliA_MD·
The Pitt Case (S02E08): Middle age women presents with painless monocular vision loss 1 hour from onset. VA light perception, and fundus photos show signs of CRAO (confirmed by ophtho). CTA negative. Would you recommend thrombolysis? 🤷🏻‍♂️ #stroke #neurology #MedEd
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Aravind
Aravind@aravind·
You can always count on ANI to create and sell content for the cheap to Al Jazeera, Reuters, BBC, CNA etc for all their negative reports on India. The funny thing is these same DS media call ANI as pro-India propaganda. Btw, the guy below says he's starving to death.
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Navroop Singh
Navroop Singh@TheNavroopSingh·
Just Finished Dhurandar 2 Revenge some time back ! What a fabulous movie 😎❣️
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UK Report
UK Report@UK_REPT·
NEW — 🇦🇪🇷🇺 Dubai's economy is losing about $1 million per minute due to airport downtime
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु। देवि प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ।। चैत्र नवरात्र का "द्वितीय दिवस" माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना को समर्पित है। "माँ ब्रह्मचारिणी" का स्वरूप साधक को यह स्मरण कराता है कि ईश्वरप्राप्ति का मार्ग बाह्य वैभव से नहीं, बल्कि अन्तःकरण की शुद्धि, तप की दीप्ति और चित्त की एकाग्रता से प्रशस्त होता है। भगवद्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म को एकमेव, नित्य, अखण्ड, निरुपाधिक, सर्वव्यापक चैतन्य सत्ता कहा गया है। वही ब्रह्म सत्य है, वही आत्मतत्त्व है, और उसी परम सत्ता की साधना की ओर उन्मुख करने वाली दिव्य प्रेरणा का मूर्त स्वरूप हैं - "माँ ब्रह्मचारिणी"। वे उस चेतना की अधिष्ठात्री शक्ति हैं, जो साधक के भीतर तप, वैराग्य, संयम और ज्ञान की प्रभा को जाग्रत करती है। जब अंतःकरण में साधना का प्रकाश उदित होता है, तब अविद्या का अन्धकार हटने लगता है और आत्मा अपने ब्रह्मस्वरूप की ओर जाग्रत होती है। इस प्रकार माँ ब्रह्मचारिणी साधक को क्रमशः उस महावाक्यात्मक अनुभूति की दिशा में अग्रसर करती हैं - “अहं ब्रह्मास्मि”। माँ के करकमलों में सुशोभित अक्षमाला निरन्तर जप, ध्यान, चित्तैकाग्रता और ईश्वर-स्मरण का प्रतीक है। यह केवल मनकों की माला नहीं, बल्कि साधना की अखण्ड धारा का बोध कराती है। उनके दूसरे हाथ में स्थित कमण्डलु त्याग, वैराग्य, पवित्रता और साधुता का प्रतीक है। वह साधक को बताता है कि जब तक जीवन में सरलता, संयम और आन्तरिक निर्मलता नहीं आती, तब तक ज्ञान का पात्रत्व भी पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता। इस प्रकार "माँ ब्रह्मचारिणी" का सम्पूर्ण स्वरूप स्वयं एक मौन उपदेश है - तप ही तेज है, संयम ही शक्ति है और वैराग्य ही ज्ञान का प्रवेशद्वार है। भगवद्पादाचार्य श्री आदि शंकराचार्य सौन्दर्यलहरी में भगवती की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं - अविद्यानामन्तस्तिमिरमिहिरद्वीपनगरी जडानां चैतन्यस्तबकमकरन्दस्रुतिझरी। दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपुवराहस्य भवति ।। अर्थात् देवी अविद्या के आन्तरिक अन्धकार को नष्ट करने वाली सूर्यरश्मियों की नगरी हैं; जड़ता से ग्रस्त जीवों में चेतना का अमृत बरसाने वाली हैं; अभावग्रस्तों के लिए चिन्तामणि के समान हैं; और जन्म-मरणरूप संसार-सागर में निमग्न जीवों के लिए भगवान् विष्णु के वराहरूप की उद्धारिणी शक्ति हैं। यही शक्ति "माँ ब्रह्मचारिणी" के स्वरूप में तपस्विनी बनकर साधक का मार्ग आलोकित करती है। अद्वैत वेदान्त में आत्मज्ञान की सिद्धि के लिए साधनचतुष्टय को अनिवार्य माना गया है। भगवद्पादाचार्य ने स्पष्ट कहा है कि गुरु के उपदेश का यथार्थ बोध उसी को होता है, जिसका अन्तःकरण इन चार साधनों से सम्पन्न हो। पहला है - विवेक-नित्य और अनित्य के भेद का स्पष्ट ज्ञान; दूसरा है - वैराग्य अनित्य, असार और भोगप्रधान वस्तुओं से आन्तरिक असंगता; तीसरा है - षट्सम्पत्ति-शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान; और चौथा है - मुमुक्षुत्व मोक्ष की तीव्र, निष्कपट और अखण्ड अभिलाषा। माँ ब्रह्मचारिणी साधक के भीतर इन चारों साधनों को पुष्ट और दृढ़ करती हैं। वे यह बोध कराती हैं कि ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ केवल इन्द्रियनिग्रह नहीं है; उसका गूढ़ अर्थ है कि चित्त की समस्त वृत्तियों को ब्रह्म की ओर अभिमुख करना, अन्तःकरण को निर्मल बनाना, और जीवन को अखण्ड सत्य की खोज में प्रतिष्ठित कर देना। ब्रह्मचर्य वस्तुतः ब्रह्म में चर्या है; अर्थात् ब्रह्मतत्त्व में मन, बुद्धि और प्राण की निरन्तर प्रतिष्ठा। अतः चैत्र नवरात्र के इस पावन अवसर पर "माँ ब्रह्मचारिणी" की उपासना साधक को बाह्य अनुष्ठान से अन्तरंग ध्यान की ओर, कर्मकाण्ड से तत्त्वचिन्तन की ओर, और भक्ति से आत्मबोध की ओर ले जाती है। उनके कृपामय वरदहस्त से तप में स्थिरता, संयम में सौम्यता, श्रद्धा में दृढ़ता और वैराग्य में प्रकाश उत्पन्न होता है। जब साधक उनके चरणों में समर्पित होकर साधना करता है, तब उसका अन्तःकरण ब्रह्मप्रकाश के लिए पात्र बनता है और आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप की ओर जाग्रत होती है। #चैत्र_नवरात्रि #ब्रह्मचारिणी #सनातन_संस्कृति #navratri #AvdheshanandG_Quotes
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Navroop Singh
Navroop Singh@TheNavroopSingh·
Ashtavakra Gita - Mukti - By Osho 🙏🏼😇🌸
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Cliff Reid
Cliff Reid@cliffreid·
I was trying different vagal manoeuvres today while treating a patient with SVT and a colleague suggested I try a testicular squeeze. However, after about 30 seconds the patient got really uncomfortable and said “Doctor can you please stop squeezing your testicles?”
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Kanwal Sibal
Kanwal Sibal@KanwalSibal·
Even if for argument’s sake their activities are aimed at Myanmar the entering into and exiting from Myanmar through adjoining Indian territory in violation of Indian laws by foreign mercenaries is a very serious matter. It also constitutes interference in our relations with Myanmar. That they entered Mizoram illegally is a fact and talking of Russian “disinformation” in this regard is a distraction.
Chris Blackburn@CJBdingo25

We need clarity on a dangerous situation. But is Russia is flooding the zone with disinformation? I've made inquiries into @Matt_VanDyke and @OfficialSOLI activities in Burma/Myanmar. They seem to be focused only on Myanmar, not the Seven Sisters. But it's early days. More could be released. There have also been dubious reports SOLI sniper teams were active in the Monsoon Uprising in Bangladesh...

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Abhijit Iyer-Mitra
Abhijit Iyer-Mitra@Iyervval·
Ukraine - BLAMES RUSSIA - for 6 Ukrainians being arrested in restricted areas in India. Yesterday it claimed the 6 had gotten lost. It says it respects Indian security while having in the past sold Pakistan tanks & denied India naval engines. Why do we tolerate this nonsense?
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@ShivAroor a WSJ strategic title
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Shiv Aroor
Shiv Aroor@ShivAroor·
“Secretly.” 🤦🏽‍♂️
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