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पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ।।
चैत्र नवरात्रि के "तृतीय दिवस" पर, जब साधक मौन की साधना में निमग्न होता है तब हृदय के सूक्ष्म कपाट खुलते हैं। वहाँ, चेतना के आलोक में, "माँ चन्द्रघण्टा" का वज्रप्रभा स्वरूप प्रकट होता है; सिंह पर सौम्यता और शक्ति की मूर्तिमती संनादति, कर-कमलों में शस्त्रों की प्रभा और मस्तक पर अर्धचन्द्र की शान्त शीतलता। यह दर्शन केवल बाह्य चित्र नहीं, अपितु अन्तर की गहराइयों में उदित होने वाला वह ब्रह्मस्वरूप सौन्दर्य है, जिसे भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य ने सौन्दर्यलहरी के अमृतमय श्लोकों में अमर किया है ।
त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः
त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया।
भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ।।
जहाँ अन्य देवता दो भुजाओं से अभय और वर की मुद्रा दिखाते हैं, वहाँ "माँ चन्द्रघण्टा" स्वयं ही अभय और करुणा की साक्षात् मूर्ति हैं। उनकी सत्ता शान्ति और शक्ति का संगम है; यह कोई आभूषण नहीं, अपितु आत्मा की परिपूर्णता का जीवन्त स्वरूप है।
"माँ चन्द्रघण्टा" का अभय अद्वैत वेदान्त का मूल मन्त्र है। जब साधक को यह बोध होता है कि “नाहं देहः, ब्रह्मास्मि,” तब भय का आवरण स्वतः छिन्न-भिन्न हो जाता है। माँ का यह स्वरूप वह ज्ञानज्योति है, जो साधक को अविद्या के सर्पिल बन्धनों से मुक्त कर, निर्भीकता के सिंहासन पर विराजमान कराती है। उनके चण्डकोपास्त्र बाह्य शत्रुओं के लिए ही नहीं, अपितु अन्तर के रजस् और तमस् पर विजय का प्रतीक हैं। अद्वैत का युद्ध बाह्य नहीं, अन्तरंग है - जहाँ मन, वासना और अज्ञान से संग्राम होता है। माँ की यह विकरालता आत्मानुशासन का सौम्य सौन्दर्य है, जो साधक को स्वयं की सत्ता का साक्षात्कार कराती है।
"माँ चन्द्रघण्टा" का घण्टा केवल शस्त्र नहीं, वह शब्दब्रह्म की दिव्य अनुगूँज है। जैसे - "ॐ" का प्रणव-नाद सृष्टि का मूल है, वैसे ही यह घण्टनाद साधक के अन्तर में अविद्या के तिमिर को विदीर्ण कर, आत्मचैतन्य का स्फुरण जागृत करता है। यह ध्वनि उपनिषदों के महावाक्यों-सी है, “तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि” जो चेतना को देह की मर्यादाओं से परे, अनन्त की ओर ले जाती है।
सौन्दर्यलहरी का यह काव्य - “तव हि चरणावेव निपुणौ” वेदान्त की परिपूर्णता का प्रतीक है। माँ के चरण केवल शरणस्थली नहीं, अपितु वह निर्विकल्प अवस्था हैं, जहाँ साधक समर्पण के सागर में डूबकर स्वरूपबोध प्राप्त करता है। यहाँ न इच्छा शेष रहती है, न भय; केवल ब्रह्म की शान्ति और सौन्दर्य का साक्षात्कार होता है। जब साधक "माँ चन्द्रघण्टा" के स्वरूप में वरदान नहीं, अपितु स्वयं की अखण्ड सत्ता को अनुभूत करने लगता है, तब नवरात्रि की साधना सिद्ध हो उठती है। उस क्षण माँ केवल देवी नहीं रहतीं, वे हृदय में ब्रह्मस्वरूपिणी होकर विराजमान हो जाती हैं। उनकी अर्धचन्द्र-शोभित शान्त छवि साधक की चेतना को आलोकित कर, उसे अनन्त शान्ति और सौन्दर्य के सागर में निमज्जित कर देती है।
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