
प्रारंभिक काल में श्वेतांबर समाज भी वीतराग, नग्न (अचेलक) स्वरूप में ही पूजा करता था। उस समय साधुओं के दो स्वरूप प्रचलित थे—अचेलक (नग्न) और सचेलक (वस्त्रधारी), जो आज भी परंपरा में विद्यमान हैं। प्रारंभिक प्रतिमाएँ पूर्णतः वीतराग, निष्काम और निर्विकार स्वरूप में ही निर्मित होती थीं। ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक जैन परंपरा में तीर्थंकरों का स्वरूप अत्यंत सरल, निर्वस्त्र और आत्मशुद्धि का प्रतीक था। बाद के काल में, सामाजिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय प्रभावों के कारण प्रतिमाओं के स्वरूप में परिवर्तन किया गया और वस्त्र व आभूषण जोड़े गए। यह परिवर्तन मूल परंपरा नहीं, बल्कि समय के साथ हुआ एक संशोधन था। मूल जैन दर्शन में आज भी वीतरागता, त्याग और निर्विकारता को ही सर्वोच्च आदर्श माना जाता है। #Jainism



































