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आज पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी M.A. ( फिजिक्स) का जन्म दिवस । वे पहले भारतीय विज्ञान के प्रोफेसर थे। महर्षि दयानंद सरस्वती की मृत्यु के समय वे उनके पीछे खड़े थे । कालकूट विष के कारण दारुण दुख और अत्यंत अस्वस्थ होते हुए भी महर्षि के तेजस्वी चेहरे और आत्मबल को निहारकर नास्तिक गुरुदत्त पक्के आस्तिक आर्य समाज के दीवाने बन गए । वे अत्यंत मेधावी और प्रज्ञा बुद्धि के धनी थे । विज्ञान के साथ उनका वेद विद्या पर भी असाधारण अधिकार हो गया था । 24 वर्ष की उम्र में उनकी लिखी पुस्तक “ टर्मिनोलॉजी ऑफ़ वेदाज “ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड के ग्रेजुएट कोर्स में पढ़ने के लिए स्वीकृत हुई। कई उपनिषदों का उनका इंग्लिश भाष्य बहुत प्रभावी था। उनके द्वारा सम्पादित “ वैदिक मैगज़ीन” ने दुनियाँ के इंडोलॉजिस्ट्स में हलचल मचा दी । यह दुर्भाग्य कि वे 26 वर्ष से भी कम उम्र में बीमारी से 1890 में चल बसे । उनकी बहुत इच्छा थी कि वे वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ़ रिलीजियन्स (1893) शिकागो में भाग ले । वे अगर वैदिक धर्म का प्रतिनिधित्व करते तो आज विश्व में वैदिक संस्कृति का डंका बजा होता । उनकी जन्म-जयंती पर उनकी पावन स्मृति में शतश: नमन ।

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