Sameer Ali

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@SameerAli91

Gorakhpur president:- Ghause Azam Foundation (GAF) NGO | Social worker | Follow: @SameerAli91 Follow our NGO Twitter account 👉 @GAF_NGO

Katılım Temmuz 2020
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का स्थापना दिवस, 5 साल: ख़िदमत, इंसानियत और मोहब्बत की ऐतिहासिक यात्रा* सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त समाजसेवी संस्था ग़ौसे आज़म फाउंडेशन ने अपना स्थापना दिवस पूरे जोश, जज़्बे और इंसानियत के साथ मनाया। बीते पांच वर्षों में फाउंडेशन ने समाज के उस तबक़े तक राहत पहुंचाई, जहां अक्सर निगाहें नहीं जातीं। भूखे, ग़रीब, बेसहारा और हक़ीक़ी ज़रूरतमंद। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन आज सिर्फ़ एक एनजीओ नहीं, बल्कि देश में प्यार, मोहब्बत और इंसानियत की गंगा बहाने वाला एक मज़बूत सामाजिक आंदोलन बन चुका है। बिना किसी भेदभाव के, फाउंडेशन ने खाने, शिक्षा, इलाज और आपात राहत के ज़रिए हज़ारों ज़िंदगियों में उम्मीद की रौशनी जगाई है। स्थापना दिवस के अवसर पर भी जश्न को दिखावे में नहीं, बल्कि ख़िदमत में बदला गया। आज की रात ग़ौसे आज़म फाउंडेशन की ओर से ग़रीबों और हक़ीक़ी ज़रूरतमंदों में खाना वितरित किया गया, ताकि कोई इंसान भूखा न सोए। यह सेवा कार्य ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब के स्पष्ट दिशा-निर्देश और मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। उनकी यही सोच है कि “ असली दिली सुकून तो तब है, जिसमें इंसान के काम इंसान आए। ” खाना वितरण का यह मानवीय अभियान गोरखपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में चलाया गया, जिनमें गोरखनाथ, रेलवे स्टेशन परिसर, बैंक रोड, काली मंदिर क्षेत्र सहित अन्य स्थान शामिल रहे। इन इलाक़ों में रात के समय ज़रूरतमंदों तक सीधे पहुंचकर सम्मान के साथ भोजन कराया गया। इस सेवा अभियान में ग़ौसे आज़म फाउंडेशन, गोरखपुर के सदर/अध्यक्ष, समीर अली, रहमतनगर अध्यक्ष मोहम्मद फैज, साथ ही रियाज़ अहमद, अमान, अहमद, मोहम्मद शारिक, फरहान हुसैन, मोहम्मद ज़ैद क़ादरी सहित फाउंडेशन के अन्य समर्पित सदस्यगण उपस्थित रहे। इन सभी ने मिलकर यह साबित किया कि ख़िदमत किसी शोहरत की मोहताज नहीं होती, जब नियत साफ़ हो तो काम खुद बोलता है। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के पांच साल ख़ामोश सेवा से बुलंद पहचान तक की वह कहानी हैं, जिसने समाज में यह भरोसा पैदा किया है कि आज भी इंसानियत ज़िंदा है। फाउंडेशन आने वाले समय में और भी व्यापक स्तर पर समाज सेवा, राहत और सशक्तिकरण के कार्यों को अंजाम देगा। *ग़ौसे आज़म फाउंडेशन* *Service • Humanity • Love*
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*बच्चों की पिटाई ज़रूरी है?* ताअ़लीम, तरबियत या तशद्दुद…? *LIVE Reading | नूरी जामा मस्जिद* बच्चों की पिटाई कोई तरबियत नहीं, बल्कि अक़्सर बच्चों के दिल व दिमाग़ में डर, बग़ावत और नफ़रत पैदा कर देती है। इस्लाम ने तालीम के साथ रहमत, हिकमत और मोहब्बत सिखाई है, ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं। आज ज़रूरत है कि हम बच्चों को मार कर नहीं, समझा कर, सुन कर और संभाल कर पढ़ाएं और आगे बढ़ाएं। आइए, क़ुरआन व सुन्नत, अक़्ल और तजुर्बे की रोशनी में इस अहम मौज़ू पर ग़ौर करें। *सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी* चेयरमैन : ग़ौसे आज़म फाउंडेशन 📞 9358649187 *📢 Share This Video — हर घर तक यह पैग़ाम पहुँचे*
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Zehra calligraphy
Zehra calligraphy@zehraavadh·
मुझे बहुत डर लग रहा है 😢 मैं एक महिला हूँ और शांति से अपना छोटा सा इत्र का काम कर रही हूँ। न मैंने किसी से झगड़ा किया, न किसी को कुछ कहा। इसके बावजूद एक पुलिसकर्मी की भाषा बहुत गंदी और डराने वाली थी। ऐसी भाषा किसी के लिए भी सही नहीं है, खासकर एक महिला के लिए। मैं बस सम्मान और सुरक्षा चाहती हूँ। कृपया इस बात पर ध्यान दिया जाए। .@Uppolice .@myogiadityanath
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*कड़ाके की ठंड में इंसानियत की गरमाहट: ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन ने ज़रूरतमंदों में बांटा कंबल* * *गोरखपुर की सड़कों पर मानवता का पैग़ाम — राहगीरों, फुटपाथ पर सोने वालों और बेसहारा लोगों के बीच जीएएफ़ का राहत अभियान* #गोरखपुर। कड़ाके की ठंड को देखते हुए ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन (जीएएफ़) टीम ने एक सराहनीय मानवीय पहल करते हुए शहर के विभिन्न इलाक़ों में जाकर राहगीरों, सड़क किनारे सोने वाले और ज़रूरतमंद लोगों के बीच कंबलों का वितरण किया। इस राहत अभियान के दौरान जीएएफ़ टीम ने न सिर्फ़ कंबल बांटे बल्कि बेसहारा लोगों से दुआएं भी हासिल कीं। इस अवसर पर ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के ज़िला अध्यक्ष समीर अली ने कहा कि इस वर्ष ठंड का प्रकोप अत्यधिक है, जिससे सड़क किनारे जीवन गुज़ारने वाले और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन, हर साल दिसंबर और जनवरी की सर्दियों में कंबल, गर्म कपड़े आदि बांटता है और हमेशा मानव सेवा को अपना मूल उद्देश्य मानता है क्योंकि ज़रूरतमंदों के साथ खड़े रहना ही सच्ची समाजसेवा है। समीर अली ने समाज के सक्षम वर्ग से अपील करते हुए कहा कि हर व्यक्ति को अपने आसपास मौजूद ज़रूरतमंदों तक गर्म कपड़े और कंबल अवश्य पहुंचाने चाहिए, ताकि इस कड़ाके की ठंड में वे भी सम्मान के साथ अपना जीवन यापन कर सकें। कंबल वितरण अभियान को सफल बनाने में जीएएफ टीम के सदस्यों, अमान अहमद, रियाज़ अहमद, मोहम्मद ज़ैद, अनवर अली आदि की सक्रिय और सराहनीय भूमिका रही। ग़ौरतलब है कि ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन समय-समय पर सामाजिक, शैक्षणिक और मानवीय गतिविधियों के माध्यम से समाज के कमज़ोर तबक़े की मदद करता रहा है और आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा।
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Sameer Ali
Sameer Ali@SameerAli91·
*उर्स ए ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ पर ग़ौसे आज़म फाउंडेशन 28 दिसम्बर इतवार को दोपहर 12 से 2 बजे तक ग़ौसिया जामा मस्जिद, जामियानगर, गोरखनाथ, गोरखपुर में लगाएगा निःशुल्क स्वास्थ जांच शिविर @Allah_Ki_Talwar @SameerAli91 @azizkavish @GAF_NGO @AIMIMupdate @CommonBS786OM
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
समाज के सक्षम और ज़िम्मेदार हज़रात, इमामों और उस्तादों की ताज़ीम, देखभाल और उनकी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आगे आएं : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन @Fuzail_Barkati @gfaareh @QmarTauhid @afsar_altaph @Khurshidraza_ @Faisalimam_1 @iamg2_ @ImranGifted @PashaNadeem3 @dpsingh1313 @dureshahrwar @MojeebSaqafi @Salimsiddiqui02 @abdul_m58149 @SYEDSHAMSHER786 @shamsher_ali91 👇👇
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
मदरसा बचेगा, तो क़ौम जिंदा रहेगी : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन #Madarsa #मदरसा पढ़ कर RT करें 👇👇👇
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ZUBAIR 🦁
ZUBAIR 🦁@Zubair99778·
इसकी गिरफ्तारी होनी चाहिए RT टैग करो रेल्वे को अजीब गुंडागर्दी है RT
Rehan_Idrisi@MR_COOL77777

इस दंगाई पर तत्काल कारवाई करे रेल्वे। किसने अधिकार दिया इस दंगाई को एक दाढ़ी टोपी वाले मुस्लिम को मारने की।😡

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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*लिव-इन को खुली आज़ादी, शादी पर उम्र की बेड़ी — सामाजिक संतुलन तोड़ने वाले क़ानून पर सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी का तीखा सवाल* *जब बालिग़ों को लिव-इन की इजाज़त है, तो उसी उम्र में निकाह और विवाह पर क़ानूनी बंदिशें क्यों बरक़रार हैं?* ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना क़ाज़ी सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने लिव-इन रिलेशनशिप और विवाह-उम्र के विरोधाभास पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि आज “बिना ज़िम्मेदारी वाले रिश्तों” को आसान और “ज़िम्मेदार रिश्तों” को मुश्किल बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब क़ानून दो बालिग़ों को साथ रहने और शारीरिक संबंध बनाने की अनुमति देता है, तो उसी उम्र में निकाह/ विवाह पर रोक समाज और परिवार — दोनों के लिए हानिकारक है। क़ाज़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब के अनुसार एक तरफ़ लिव-इन जैसे बंधनरहित रिश्तों को वैध और संरक्षित दर्जा मिल रहा है, वहीं निकाह/ शादी जैसे स्थिर और जवाबदेह रिश्तों पर उम्र की सख़्त पाबंदियां लगी हुई हैं। यह दोहरा मापदंड युवाओं को अस्थिर और असुरक्षित रिश्तों की ओर धकेलता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए भरोसे और परवरिश का संकट पैदा कर सकता है। *राजस्थान हाईकोर्ट के फ़ैसले का संदर्भ* सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया आदेशों की ओर इशारा किया, जिनमें सभी लिव-इन रिश्तों के पंजीकरण और अनुबंध की व्यवस्था तथा बालिग़ (अठारह वर्ष से ऊपर) व्यक्तियों को, भले वे विवाह-उम्र तक न पहुंचे हों, लिव-इन में रहने की अनुमति पर ज़ोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि संविधान और न्यायपालिका का सम्मान अनिवार्य है, लेकिन कोई भी आदेश हराम को हलाल और नैतिक रूप से संदिग्ध चलन को सामाजिक मानक नहीं बना सकता। क़ाज़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने पूछा कि जब अदालतें लिव-इन के लिए अलग रजिस्ट्रेशन और सुरक्षा तंत्र बना रही हैं, तो उसी गंभीरता से निकाह/ विवाह की उम्र और नियमों की समीक्षा क्यों नहीं की जा रही। “अगर राज्य सचमुच महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा चाहता है, तो उसे सबसे पहले स्थिर, क़ानूनी रूप से संरक्षित परिवार को मज़बूत करना होगा, न कि अस्थिर व्यवस्थाओं को आसान बनाना”। *शरीअत और सामाजिक दृष्टिकोण* क़ाज़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने कहा कि इस्लामी शरीअ़त निकाह को पवित्र, सुरक्षित और जवाबदेह रिश्ते का रास्ता मानती है और हर उस चलन का विरोध करती है जो युवाओं को बे-ज़िम्मेदारी और नैतिक गिरावट की ओर ले जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी अदालत या सरकार से नहीं, बल्कि उन व्यवहारों से है, जो पति-पत्नी और बच्चों की इकाई को कमज़ोर करते हैं और समाज की नैतिक रीढ़ पर चोट पहुँचाते हैं। *ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन की अपील* ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन ने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की है कि जिन बालिग़ युवाओं को क़ानून लिव-इन की खुली अनुमति देता है, उन्हें उसी उम्र में निकाह/विवाह की भी स्वतंत्रता और क़ानूनी सुरक्षा दी जाए। फ़ाउंडेशन का मानना है कि यदि 18 वर्ष के युवा अपने जीवन के बड़े फ़ैसले लेने में सक्षम माने जाते हैं, तो उन्हें स्थायी पारिवारिक ढांचा चुनने से रोकना न्यायसंगत नहीं है। संस्था ने सुझाव दिया कि विवाह-उम्र से जुड़े क़ानूनों की समीक्षा कर, ऐसी नीतियां बनें जो युवाओं को ग़ैर-ज़िम्मेदार रिश्तों की बजाय पंजीकृत, सुरक्षित और जवाबदेह निकाह/ विवाह की तरफ़ प्रोत्साहित करें, साथ ही जागरूकता और काउंसलिंग कार्यक्रमों को बढ़ाया जाए। क़ाज़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने अंत में कहा कि ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन हर उस दिशा का समर्थन करेगा, जो समाज को स्थिरता, सुरक्षा और ज़िम्मेदारी की ओर ले जाए और हर उस रुझान का विरोध करेगा, जो युवाओं को हरामकारी और नैतिक गिरावट की तरफ़ ले जाता है।
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All India Muslim Personal Law Board
🚨 ज़रूरी सूचना! 🚨 ​वक्फ संपत्तियों को UMEED पोर्टल पर पंजीकृत करने की अंतिम तिथि 5 दिसंबर 2025 है, लेकिन पोर्टल तकनीकी समस्याओं से घिरा हुआ है! 😡 प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन एक बुरा सपना बन गया है। ​वक्फ संपत्तियों को बचाने के लिए अपनी आवाज़ उठाएं! ​📢 ट्वीट करें: #FixUMEEDPortal #SaveWaqf ​🗓️ आज: 3 दिसंबर 2025 (बुधवार) 🕰️ शाम 7:30 बजे
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*एसआईआर फ़ॉर्म सिर्फ़ वोट का पेपर नहीं बल्कि अधिकार, सुरक्षा और सम्मान की ढाल हैः सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी* @Allah_Ki_Talwar #Tejas #DubaiAirShow
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
शम्स तबरेज़ साहब ! आपने ओवैसी साहब पर बात कही, लेकिन असली सवाल कहीं और है… भारत में 20 करोड़ मुसलमान हैं — और आपको उनकी क़यादत ही क्यों चुभती है? क्यों? कभी सोचा? 1️⃣ हर समाज की अपनी आवाज़, अपनी लीडरशिप… बस मुसलमानों की नहीं? देश में हर जाति–समुदाय की अपनी राजनीतिक ताक़त है— ✓ जाट के जाट नेता ✓ दलित के दलित नेता ✓ यादव के यादव नेता ✓ मराठा के मराठा नेता ✓ सिख के सिख नेता तो बताइए… मुसलमान अपनी आवाज़ खुद उठाए तो पेट में दर्द क्यों शुरू हो जाता है? क्या मुसलमान भारतीय नहीं? क्या मुसलमानों के टैक्स से सरकार नहीं चलती? क्या मुसलमानों को संविधान ने हक नहीं दिया? 2️⃣ मुस्लिम क़यादत इसलिए ज़रूरी है क्योंकि दर्द वह समझेगा जिसने झेला हो ☆ लिंचिंग किसने झेली? ☆ फर्ज़ी एनकाउंटर किसने झेले? ☆ सरकारी नौकरियों में किसकी हिस्सेदारी गिरती गई? ☆ जेलों में किसकी आबादी बढ़ती गई? ☆ कौन सा समाज शैक्षिक रूप से सबसे पीछे धकेल दिया गया? इनका जवाब एक ही है — मुसलमान। और जिसे जख़्म न लगे हों वह मरहम क्या लगाएगा? 3️⃣ मुस्लिम प्रत्याशी नहीं जीतते। यही तो चीख–चीखकर बता रहा है कि मुस्लिम क़यादत क्यों ज़रूरी है जब किसी समुदाय की एकता नहीं, अपना नेतृत्व नहीं, अपनी रणनीति नहीं, तो सीटें नहीं, सिर्फ आँसू मिलते हैं। अगर किसी मुस्लिम क्षेत्र में 60% मुस्लिम हैं और विधायक 0% आ रहे हैं… तो दोष मुसलमानों का नहीं, उनकी बिखरी हुई क़यादत का है। 4️⃣ मुस्लिम नेतृत्व किसी के ख़िलाफ़ नहीं — यह अपनी राजनीतिक क़ब्र खुद खोद देने से इनकार करना है अगर दलित अपने अधिकारों की आवाज़ उठाए तो वह “दलित राजनीति” है। अगर मराठा उठाए तो “मराठा आंदोलन”। अगर किसान उठाए तो “किसान आंदोलन”। लेकिन अगर मुसलमान अपने अधिकार मांगे तो “सांप्रदायिकता”…? यह नियम किस किताब में लिखा है? किस संविधान में? किस लोकतांत्रिक सिद्धांत में? 5️⃣ सेक्युलरिज़्म का मतलब यह नहीं कि मुसलमान चुप रहेंगे। सेक्युलरिज़्म का मतलब है — सबको बराबरी का हक़ अगर भाजपा सिर्फ हिंदू वोट बैंक पर चल सकती है, अगर अन्य पार्टियाँ जाति–आधारित रणनीति बना सकती हैं, तो मुसलमान सिर्फ भारत के नागरिक की तरह, अपनी आवाज़ क्यों नहीं उठा सकते? क्या मुसलमानों के गले में संविधान नहीं टंगा? आखिरी और सबसे बड़ा सच मुस्लिम क़यादत का मतलब भारत को बांटना नहीं — भारत को पूरा करना है। जिस देश में 20 करोड़ मुसलमान, 200+ विधानसभा क्षेत्र, 70+ लोकसभा क्षेत्र मुस्लिम प्रभाव वाले हों… वहाँ मुसलमान की आवाज़ गायब कर देना, लोकतंत्र की सबसे बड़ी धोखाधड़ी है। भारत हर किसी की आवाज़ से मजबूत होता है — मुसलमान की आवाज़ दबाने से नहीं सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी @Allah_Ki_Talwar चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन @GAF_NGO #BiharElection2025 @ShamsTabrezGazi @asadowaisi @warispathan @Mubashir_AIMIM @aimim_karwan1 @MyChoice_AIMIM @CorporatorAimim @shadab_chouhan1 @Razvi_Sher7
Shams Tabrez@ShamsTabrezGazi

ओवैसी साहब आप बीजेपी को रोकने के लिए चुनाव थोड़ी न लड़ रहे थे. आपने बहुत पहले ही कह दिया है भाजपा को हराने का ठेक हमने नहीं ले रखा है. पर इतना तो साफ ज़ाहिर हो रहा है. दूसरे दलों के मुस्लिम प्रत्याशियों को सदन में पहुंचने से रोकने का ठेका आपने ज़रूर ले रखा है. कम से कम बिहार चुनाव से यही साबित हो रहा है. आप उसी जगह पर अपने उम्मीदवार खड़े कर देते हैं. जहां पहले से ही एक मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा था. हर साल कितने मुस्लिम विधायक बनते थे. लेकिन आज कितने बन रहे हैं. आप अगर सिर्फ मुस्लिमों के कयादत की बात करेंगे और बीजपी और संघ परिवार भी केवल हिन्दुओं की बात करेगी. तब तो सेक्यूलर पार्टियां भी अगर किसी मुस्लिम को टिकट देना बंद कर दें. तो आपको क्या फायदा होगा. 80 फीसद की आबादी से क्या आप धर्म के आधार पर लड़ना चाहते हैं. इसे कौम की नुमाइंदगी नहीं कहते. आपने पांच सीटें निकाली है. इसके लिए मुबारकबाद के हकदार है. लेकिन आप मज़हब के नाम पर जो ज़हर बो रहे हैं. उसका नतीजा सिर्फ मुसलमाना का आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार होने वाला है. अगर आप धर्म के आधार नुमाइंदगी की बात करते हैं. इससे कोई एतराज़ नहीं है. समाज में हर तबके को नुमाइंदगी मिलनी चाहिए. लेकिन आपकी सियासत अब बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की दिशा में भाग रही है. इससे आपको बचना होगा. मुस्लिम से जुड़े बहुत से मुद्दे सदन में आएगें. और पहले ही पेंडिंग है. उनसे आप कैसे निजाद पाएंगे. उसमें आपके कितने नुमाइंदे वोटिंग कर पाएंगे. उस वक्त आपको दूसरे सेक्यूलर पार्टियों से समर्थन भी चाहिए होगा. सदन में सिर्फ जज़्बाती तकरीरों से आप मुसलमानों का दिल जीत सकते हैं. पर सदन में आपको नम्बर की ज़रूरत पड़ेगी. और उस नम्बर को हासिल करने के लिए आपको सेक्यूलर पार्टियों के साथ की ज़रूरत होगी, तब आप क्या करेंगे. उस वक्त भी आप मुसलमानों को कोसते रह जाएंगे. हमने 4-5 सालों में मुस्लिमों की कयादत के लिए आपके मेहनत को सराहा है. उसे कैमरे पर फिल्माया भी है. कई एपिसोड भी बनाए हैं. लेकिन आपकी सियासत अब मुस्लिमों के खिलाफ ही नज़र आ रही है. आपकी राजनीति ही मुस्लिमों के खिलाफ एक घातक होती जा रही हैं. आपकी पार्टी मुस्लिमों को गालीबाज़ बना रही है. या फिर यूं कहें कि आरएसएस और बीजेपी के जैसे ही गालीबाज़ ट्रोलर आपके पार्टी के समर्थक बनते जा रहे हैं. कहीं ये मुसलमानों के गर्दन काटने पर न तुल जाएं. आपके समर्थकों की ज़ुबान और उनकी भाषा निहायत ही गलीज़ होती जा रही है.

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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
🔥 सवाल सच्चे हैं, जवाब चाहिए 🔥 सोचिए — आधार कार्ड हर जगह जुड़ा है: पैन कार्ड, बैंक, राशन, मोबाइल, गैस, स्कूल तक… लेकिन वोटर आईडी से लिंक नहीं! 😳 आख़िर क्यों? अगर आधार, वोटर कार्ड से लिंक हो जाए तो: 👉 एक ही व्यक्ति कई नामों से वोट नहीं डाल पाएगा। 👉 फर्ज़ी और डुप्लिकेट वोट ख़त्म हो जाएंगे। 👉 चुनाव प्रणाली पारदर्शी बनेगी। तो फिर सरकार इसे अनिवार्य क्यों नहीं करती? जब PAN-आधार लिंक न करने पर ₹10,000 जुर्माना लग सकता है, तो वोटर कार्ड पर इतनी नरमी क्यों? 🤔 लॉकडाउन के वक़्त वैक्सीन और आधार तुरंत लिंक हुए थे, तो चुनाव आयोग का सिस्टम अब तक क्यों अटका है? क्या यही है “डिजिटल इंडिया” और “पारदर्शी लोकतंत्र”? या फिर यह किसी की सियासी सुविधा का मामला है? 🇮🇳 यह सवाल किसी पार्टी के खिलाफ़ नहीं — यह भारत के लोकतंत्र की सच्चाई का सवाल है। 📢 अब वक़्त है सवाल पूछने का, न कि चुप रहने का! ✊ #आधार_वोटर_लिंक_कब_तक ✊ #सवाल_अब_हम_पूछेंगे ✊ #जागो_भारत_जागो (Note: यह पोस्ट सार्वजनिक तथ्यों और सरकारी दस्तावेज़ों पर आधारित है। इसका उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना है, राजनीति नहीं। RT ज़रूर करें) ब्लू टिक वाले चाहें तो @Allah_Ki_Talwar को फॉलो कर सकते हैं फॉलो बैक मिल जाएगा 😉 #ExitPoll
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