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CheTan Dev MaNaS
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@ChetandevManas
जय श्री केदार 🙏 श्री गुरू चरण कमले भ्यो नम: श्री मातृ पितृ चरण कमले भ्यो नम:🙏🏼 DM Any information (Kedar Nath)
Katılım Eylül 2017
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@weirrdaah Come with me Senior Treck ledar.. India hike
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@rajgarh_mamta1 वैसे ही जैसे सिंघम मूवी मैं अजय देवगन को अपने गाँव मे पोस्टिंग मिल गयी थी SHO
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एक उम्र के बाद आदमी शान्त होने लगता है, भागता हुआ सा शान्त। भागता हुआ सा शान्त आदमी बहुत खतरनाक होता है। आदमी रूक नहीं सकता, उसे रुकने नहीं दिया जाता। वह रुक जाए तो दुनिया का बोझ मालूम पड़ता है। भागते-भागते वह भीतर से खाली होने लगता है। आस-पास स्नेह ढूंढता है जो दोस्तों से नहीं मिलता, दोस्त उलूल-जुलूल की बातों में फँसा कर खालीपन टाल सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते।
स्नेह खोजते आदमी से सुंदर कुछ भी नहीं, स्नेह खोजते आदमी से बुरा कुछ भी नहीं। आदमी को, एक समय आने पर अपनी माँ से दूर कर दिया जाता है। उसका कमरा अलग कर दिया जाता है, और उसे आदमियों की श्रेणी में धकेल दिया जाता है जो कठोर मालूम होते हैं। माँ से सिर्फ रसोई तक की बात होने लगती है। माँ के स्नेह की भूख आदमी को सारी उम्र एक खालीपन की और धकलेती है।
आदमी उस स्नेह को प्रेमिका में खोजता है और उसके साथ बच्चा होने लगता है। आदमी का बच्चा होना माँ के सिवा किसी को स्वीकार नहीं, प्रेमिका को भी नहीं। प्रेमिका कभी भी माँ नहीं हो सकती, उसकी अपेक्षाएं हैं, माँ की कोई अपेक्षा नहीं होती।
आदमी फिर आदमी होने लगता है और ढोने लगता है अपने आदमी होने का बोझ। मैंने किसी आदमी से "कैसे हो?" के उत्तर में "बढ़िया" के अलावा कुछ नहीं सुना।
बाकी सब बढ़िया।
- संयम शर्मा

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प्रिय खत
दीपावली चली गई। ऐसा प्रतीत होता है, जीवन के हर प्रपत्र में मैने तुम्हे अनंत काल के लिए खो दिया है। मनोस्थिति यूं हो चुकी है; तनिक भी कांटे चुभ जाए तो लगता है मृत्यु पास आ गई। मेरे भीतर जो सैलाब था वह मात्र तुम्हारे जाने भर से सुख चुका है। प्रतीक्षा की डोरी टूट चुकी है और प्रेम का दीया बुझ चुका है। तकलीफें अब जीने नहीं देती। सड़कों पर ही आराम कर लेता हूं। अब मेज़ पर सबकुछ रखता हूं सिवाय कलम और किताबों के,घर में सबकुछ है सिवाय तुम्हारे।
उलझन, बेचैनी, शोक, दया, मोह, आंसू ये अब तुम्हारे पर्याय बन चुके हैं। इतना लिखने के बाद भी मैं नहीं लिख सकता कि मैं क्या लिखना चाहता हूं। हकीकत ये हैं कि मैं अपने दुःख के गर्जन को मिटने के लिए शब्दों का सलाद बना रहा हूं। मै हु ब हू उन फसानों को नहीं लिख सकता क्योंकि तुम्हारा जिक्र करना मतलब फिर से तुम्हारा हो जाना होगा। अब तुम्हारा न होने में ही जीत है और मेरा हार जाना ही मेरी सहूलियत है।
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