

Amrendra Kumar
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@ErAmrendra58
जिंदगी हर कदम एक नयी जंग है।












जलन नहीं, मेघा जी, अफ़सोस होता है और तरस भी आता है! अफ़सोस पत्रकारिता पर, और तरस आप लोगों पर। ऐसी नकेल कसी गई है कि Press Freedom Index में देश 157वें स्थान पर खिसक गया। अब जब पत्रकारिता करने की इजाज़त न हो, तो साड़ी पहनकर खुद ही शोपीस बनना पड़ता होगा; इसलिए तरस आता है। हम आज मशीनतंत्र से हारे हैं, कल जीतेंगे भी। लेकिन आप अपना सोचिए। 2014 के बाद वाली ‘पत्रकारिता की तकनीक’ से जो आपकी इज़्ज़त गई, वह इस जन्म में वापस आती नहीं दिखती। और जिस तरह की पत्रकारिता आप कर रही हैं, उस पर मंटो काफ़ी कुछ लिख गए हैं। नहीं पढ़ा हो तो किताबें मुझसे उधार ले लीजिएगा; शायद उन्हें पढ़कर भीतर का मुर्दा पत्रकार जाग जाए। और हाँ, बहुजन महिलाओं के पास साड़ी और मेकअप से ज़्यादा गंभीर मुद्दे हैं; उनसे उलझने और उन्हें सुलझाने के लिए। इसलिए साड़ी और मेकअप अपने पास रखिए; साहस और विचार की ज़रूरत हो तो हमारे पास ज़रूर आइएगा। थोड़ी मदद तो हम सभी कर ही सकते हैं।
















पटना GPO का हाल देख लीजिए… 2 घंटे लेट आने के बाद भी काम नहीं, फोन पर गपशप जारी 😶 जनता लाइन में खड़ी है, और यहाँ “पहले बात, फिर काम” चल रहा है।







