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A SON OF Ex. LANDLORD ( NATIONALIST) A Strong work team is carried towards successful. multiple Art, political analysis,writer's any topics,human culture.

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@KraantiKumar सिस्टम पर टिप्पणी करने से पहले व्यावहारिक ज्ञान तो हासिल कर लेना चाहिए था।जब सिस्टम में सीनियर और जूनियर का व्यवहारिक चरित्र ही नहीं रहेगा तो पदानुक्रम का क्या उद्देश्य यह जाता है?तुम्हारे लिए तो राष्ट्रपति और फोर्थ ग्रुप का पद भी समान हो सकता है।तब कसी आदेश का पालन कैसे होगा?
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Kranti Kumar
Kranti Kumar@KraantiKumar·
गांव दिहात में बड़का आदमी को हाथ उठाकर नमस्कार मत करो तो वो नाराज हो जाता है. ग्रामीण भारत की अव्यवस्था ही ऐसी बनी है कि बड़की जात को श्रमिक जातियों के लोग झुककर सलाम करते हैं. अगर भूल चूक से आपने किसी बाहुबली या दबंग नेता को भी सलाम नही किया तो वो आप पर नाराज हो जाएगा. भारत एक सामंतवादी देश है. यहां हर आदमी ताक़त मिलते ही फ्यूडल लॉर्ड बन जाता है. शहरों में कॉलोनी का वॉचमैन गार्ड की वर्दी पहनकर लोगों से बदतमीजी करता है. यहां तो मामला आईपीएस अफसर का है. आईपीएस अफसरों को ताक़त केवल कानून या सिस्टम नही देता, बल्कि समाज भी देता है. सलूट नही करने पर अंकिता वर्मा को जूनियर को दुबारा ट्रेनिंग सजा जो दी है वो उसमें एक प्रकार का सामंती अहंकार है.
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भारतीय चुनाव आयोग को Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) के नेताओं द्वारा संविधान विरोधी व्यक्तव दिये जाने के कारण उसका राजनीतिक पंजीकरण निरस्त कर देना चाहिए।भारतीय न्यायिक परिसीमन क्षेत्र में इस प्रकार के व्यक्तव्य लोक परंपराओं के विरुद्ध हैं #DMK_की_मान्यता_निरस्त_हो टैग चलायें।
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यदि आप अपनी classic डिजिटल फोटो, कलर पेंटिंग, वीडियो क्लिप,बनवाना चाहते हैं। तो आप हमारी सेवाएं ले सकते हैं।
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दलित राजनीति का स्वतंत्रता प्राप्ति के समय और बाद में छिटपुट प्रभाव रहा है। वह भी किसी के साथ गठबंधन करने पर। दलित राजनीति करने वाले अनपढ़ और अल्पबुद्धि कार्यकर्ता सांस्कृतिक परंपराओं पर छींटाकशी करके न सिर्फ अपने लोगों को नाराज़ कर रहे हैं। बल्कि संबंधित पार्टियों को भी डुबो रहे हैं। उन्हें लगता है वे सबसे बड़ी वैज्ञानिक सोच रखते हैं। जबकि इस देश सांस्कृतिक जड़ें इतनी गहरी हैं। कि उनका कोई अनुमान तक नहीं लगा सकता है। क्योंकि मानवीय संस्कृति किसी सवर्ण या अवर्ण की निजी संपत्ति नहीं है। यह दार्शनिक चिंतन का एक स्तर होता है। जो परंपराओं सहित पूरी तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है। और किसी न किसी रूप में अपने जल, जंगल जमीन और संसाधनों से जुड़ना सिखाता है। न कि बिना सिर पैर की हवाओं में उड़ना सिखाता है। नतीजा यह निकलता है। कि अनपढ़ और अल्पबुद्धि कार्यकर्ता ST,ST,OBC के अधिकांश लोगों को अपनी घटिया सांस्कृतिक छींटाकशी से नाराज़ कर देते हैं। सवर्ण राष्ट्रीय संस्कृति को मानता है या नहीं मानता है? यहां प्रश्न इसके कंपेयर करने का नहीं है। बल्कि SC,ST,OBC में ही स्वतंत्र रूप से एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है।जो भारतीय संस्कृति में पूरी निष्ठा और विश्वास रखता है। अपनी संस्कृति के लिए अपशब्द सुनकर भले ही वह क्रोधात्मक प्रतिक्रिया नहीं करता है। लेकिन हर चीज का विश्लेषण करता है। और जानता भी है। भारत अपनी संस्कृति के कारण ही स्थिर है। जब विकृतियां भयानक रूप से सामने आतीं हैं। तो ये जयभीम,नमोबुद्धाय करने वाले भागते नजर आते हैं। और अनेकों बार ऐसा हुआ भी है। लेकिन इस राष्ट्रीय संस्कृति को मानने वाले हर वर्ग ने इस देश और इसकी संस्कृति की रक्षा करने में अपना सब-कुछ खपा दिया है। और ऐसा खून अपने राष्ट्र और अपनी संस्कृति से कभी गद्दारी नहीं कर सकता है।
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Kranti Kumar
Kranti Kumar@KraantiKumar·
1996 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव AIADMK को 234 सीट में केवल 4 सीटें आईं. राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा, जयललिता का राजनीतिक भविष्य खत्म हो चुका है. राष्ट्रीय मीडिया उनकी सैंडल, साड़ी और बैंक बैलेंस गिन रहा था. 2001 के विधानसभा चुनाव में जयललिता ने 132 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की. करुणानिधि घर से उठवा कर जेल में बंद कर दिया. BSP को भले 1 सीट आयी है. BSP विचारधारा और मिशन वाली पार्टी है. बहन मायावती जी अगर सक्रिय भूमिका में आ गईं तो तो UP में सभी दल हवा में उड़ जाएंगे.
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Flight world@Flight_world24·
अक्सर लोग अपनी पहचान बनाने के जुनून में बहुत सी बातों की अनदेखी कर देते हैं। सकारात्मक पहचान बनाने के लिए सबसे पहले एक वास्तविक,मजबूत और लोकहित के लिए कल्याणकारी पृष्ठभूमि का निर्माण करना बहुत आवश्यक होता है।इसके लिए किसी विशिष्ट परिवार या समाज में जन्म लेना कोई कारण नहीं है।बल्कि यह सिद्धांत सर्व साधारण,सभी के लिए होता है। लेकिन फिर भी यदि किसी अच्छी पृष्ठभूमि वाले परिवार और समाज से जातक का संबंध होता है। तो निश्चित रूप से इसका लाभ भी जाने अनजाने में उसे मिलता है।क्योंकि यह भी वैचारिक, सांस्कृतिक,आर्थिक आधार का कारण बन जाता है। कुछ लोगों ने अपनी पहचान सिर्फ भारतीय प्राचीन साहित्य और प्रतीकात्मक संस्कृति की गलत व्याख्या,अपशब्द बोलकर,मनगढ़ंत आक्षेप लगाकर और गालियां देकर हासिल की है।किसी व्यक्ति या समुदाय को नाराज़ करके कोई भी उससे सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता है।प्राचीन समय में कोई नया जादू नहीं हुआ।मानवीय विकास सदैव ही विभिन्न प्रकार के निम्नतम स्तर से उच्चतम स्तर की ओर होता आया है।समय कभी नहीं बदलता है।सिर्फ लोगों की भाषा शैली,भावनाएं और विचारों में परिवर्तन आते रहते हैं।समय समय पर भाषाओं के भाव,अर्थ और संज्ञेय स्थितियां भी बदल सकतीं हैं। इसलिए एतिहासिक क्रम को जाने बिना किसी भी विषय में मनगढ़ंत कहानियां बनाना सामाजिक संरचनाओं और राष्ट्रीय धारणाओं को कितनी हानि पहुंचा सकतीं हैं।इसे किसी भी समय के अति महत्वाकांक्षी लोग कभी नहीं समझ पाते हैं।जब तक आम लोगों की समझ में आता है।तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इन तथ्यों से बिल्कुल भी इन्कार नहीं किया जा सकता है।प्राचीन भारतीय साहित्य में शूद्र शब्द की उपस्थिति थी।लेकिन यह मानवीय व्यवस्था के गुणात्मक आधार से पृथक शब्द नहीं है।प्राचीन भारतीय व्यवस्था में यह अवर्ण नहीं था बल्कि सवर्ण था।सवर्ण का अर्थ वर्ण में सम्मिलित स्थिति। यह शब्द किसी प्रकार से उच्च या निम्न होने की धारणाओं में सम्मिलित नहीं है।जिस प्रकार नये गठित किये गये दलित शब्द पर राजनीति करने वाले शूद्र शब्द की व्याख्या निम्न बताकर अपनी राजनीति चमकाने के लिए करते हैं। कोई भी सरंचना फिजिकल रूप से बाॅडी कहलाती है।इसका प्रत्येक पार्ट अपने कार्यों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।यदि शूद्र का स्थान पैरों में है। तो अपने बुजुर्ग और विद्वान लोगों के शूद्र वाले स्थान (पैरों) को छूकर ही आशीर्वाद क्यों लिया जाता है?कोई भी उनके मुख,भुजाओं,उदर का स्पर्श करके आशीर्वाद क्यों नहीं लेता है?जब शरीर की फिजिकल बनावट के अनुसार अन्य वर्णो के क्षेत्र उच्च हैं।तो प्रतीकात्मक रूप से उच्चतम स्थानों को स्पर्श करने की सांस्कृतिक परंपरा होनी चाहिए थी।जबकि हर परंपरा अपने स्थान पर सही है। लेकिन किसी चीज की गलत व्याख्या सामाजिक संरचनाओं को कितना नुक्सान पहुंचाती है।इससे अधिकतर लोगों को कोई मतलब नहीं होता है। ब्रिटिश शासन काल के पूर्वार्द्ध तक भारत में शूद्र नाम से कोई जाति या वर्ग नहीं था।इस शब्द की आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक प्रयोगशाला पूर्वी बंगाल (अब बंग्लादेश) में बनी थी। यह 1812- 1878 AD के मध्य हरिचंद ठाकुर द्वारा शुरू किए गए मतुआ संप्रदाय की स्थापना पर आधारित था।उन्होंने प्राचीन शूद्र शब्द को नामशूद्र के टाइटल से सामाजिक-धार्मिक सुधार,समानता और भक्ति के जरिए समुदाय को एकजुट किया। इस आंदोलन आधार धार्मिक था।बाद में उनके पुत्र गुरुचंद ठाकुर जैसे नेताओं के नेतृत्व में उच्च वर्ग और जमींदारों के विरुद्ध नामशूद्र नामक आंदोलन चलाकर इसे उगाया गया और इसे राजनीतिक रूप दिया गया था। इस आंदोलन का उद्देश्य संबंधित समाज को मानवीय स्तर के दर्जा प्राप्त सवर्ण में सम्मिलित कराकर ऊंचा दर्जा प्राप्त करना था। आज,वर्तमान में शूद्र शब्द को निम्नता और हीनता दर्शाने वाले शब्द के रूप में सिर्फ दलित राजनीति करने वाले परिभाषित कर रहें हैं।क्योंकि उन्हें अपनी राजनीति चलाने के लिए प्राचीन भारतीय साहित्य से शब्द और प्रतीक भी चुराने हैं।और उन पर ऊंची,नीच की नुक्ताचीनी भी करनी है।शूद्र प्राचीन साहित्य का सवर्ण शब्द है। जोगेन्द्रनाथ मंडल की राजनीतिक संरचना ने चांडाल जैसे प्राचीन शब्दों से निकल कर नामशूद्र में सम्मिलित हुए और नामशूद्र को दलित राजनीति से जोड़कर बंगाल प्रेसीडेंसी में स्वयं को प्रभावी नेता बना लिया। प्राचीन भारतीय साहित्य में समुदाय या वर्ग स्तर पर कोई अछूत जैसी धारणाएं नहीं थी। इसे स्वयं को सही सिद्ध करने वालों द्वारा तोड़ मरोड़ कर तत्कालीन राजनीतिक लाभ के लिए प्रस्तुत किया गया था। प्राचीन साहित्य में कुत्ता,सूअर,कौवा जैसे जंतुओं को उनके सर्वभक्षी स्वभाव होने और गंदे परिवेश में रहने के कारण चांडाल कहा जाता था।
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नई राजनीतिक संरचनाओं और विचारों को खड़ा करने के लिए दुनिया भर के सांस्कृतिक स्थलों पर तत्कालीन समय में आक्रामक रुप से बदलाव किए गए थे। और मानवीय संस्कृति को विवादास्पद बनाया गया था। यह ईश्वर के नाम पर दिशाहीन उद्देश्यों के लिए राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने और करने वालों (तत्कालीन लोगों) ने किया है। अल अक्सा प्राचीन यहूदी टेम्पल था। यहूदी समुदाय का दूसरा प्रमुख स्थान। यहूदी लोग इस पवित्र स्थान की चट्टान को बाबा आदम और अब्राहम द्वारा दी गई बलि और उसके पुत्रों के स्वप्न से जुड़ा हुआ पवित्र स्थान मानते थे। जब ईसाई विचार प्रचलन में आया तो उन्होंने पुराने विचारों से सहमति जताई। और इस विचार को ईसाई मत से जोड़कर यथावत रखा। लेकिन मुस्लिम विचार का प्रचलन आते ही इसे मोहम्मद साहब से जोड़ दिया गया कि मोहम्मद साहब के स्वर्ग जाने और अंतरिक्ष की यात्रा करने के पदचिन्ह चट्टान ( Dome of the rocks) पर बने हुए हैं। और उन्होंने अपनी अन्तरिक्ष यात्रा करने वाहन भी इसी स्थान के पास खड़ा किया था। या बांधा था। लेकिन भारत और श्रीलंका तक पहुंच कर मुस्लिम विचार आदम की चोटी के पदचिन्हों को मोहम्मद साहब के पैरों के निसान घोषित नहीं कर पाए तो उन्होंने उसे आदम के पैरों के निशान घोषित कर दिया और पुर्तगालियों ने पूरी पर्वत श्रृंखला को आदम पर्वत की श्रंखला,यहां तक कि राम सेतु को भी आदम का पुल घोषित कर दिया। लेकिन प्राचीन समय से उन्हें श्रीपाद कहा जाता है।श्री सनातन महालक्ष्मी का संबोधन है। पाल का अर्थ पैर होता है। जिसका अर्थ महालक्ष्मी के पैरों के निशान। शायद प्राचीन समय में वर्तमान में श्रीलंका को लक्ष्मी, कुबेर की नगरी कहा जाता था लेकिन बौद्ध उसे बुद्ध के पद चिन्ह मानते हैं। और तमिल विश्वासों में इसे से भगवान शिव का स्थान माना जाता है। सिंहली भाषा में इसे समनालाकंडा, पाली भाषा में समंतकुटा,तमिल भाषा में इसे शिवनोलिपाथमलाई, मलयागिरी,संस्कृत स्रोतों में इसे रत्नगिरि या मल्यगिरि भी कहा गया है। निष्कर्ष : किसी भी विचार या प्रतीक को कोई भी व्यक्ति या समूह सिर्फ अपने हितलाभ के लिए प्रथम नहीं बता सकता है। और न हीं एतिहासिक रुप से अपने तथ्यों और तर्कों को दूसरों की अपेक्षा शत प्रतिशत प्राचीन और सच्चा और सबसे उच्च बता सकता है। क्योंकि स्थान वही होते हैं। लेकिन समय बदलने के साथ साथ उक्त स्थानों से संबंधित विचारों में परिवर्तन आ जाते हैं। उदाहरण के लिए:-> यदि कोई ग्रुप किसी स्थान को फोलो करता है।तो वह अपने तत्कालीन विचारों पर आधारित होता है। लेकिन यदि उस स्थान से संबंधित पूरा ग्रुप अपनी निष्ठा, विश्वास और विचारों को बदल लेता है। तो वहां स्वत: ही संक्रमित विचार स्थापित हो जाते हैं। इससे इन तथ्यों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। कि विचार वास्तविक और प्राकृतिक हैं। अथवा कूट रचित और झूठें हैं। जिन्हें समकालीन लोगों ने अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए गढ़ा था। अनुयायियों में परंपराएं संचारित होने के बाद उन्हें वही सच लगने लगता है। जो उनके व्यवहार में रह रहता है। नोट:-> यह विश्लेषण सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों के "लेयरिंग" (layering) और syncretism (मिश्रण) की एक सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसका किसी विशिष्ट ग्रुप या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है।
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भारतीय लोगों को भारत के प्राचीन साहित्य और प्रतीकों को लेकर भरी गई गलतफहमियों की समीक्षा करनी चाहिए।मनुस्मृति राजकीय सभा के संरक्षण में लिखा हुआ विधान व सख्ती से कहीं पर भी लागू नहीं था।मनुस्मृति सहित 18 मुख्य स्मृतियां और 18 लघु स्मृतियो के लिखने का साहित्यिक प्रचलन था।इसका कोई निश्चित एक लेखक नहीं था।जिन ऋषि प्रवर्तकों से जो लोग जुड़े हुए थे। इनके लेखन का हिस्सा वही लेखक बनते थे।जिनमें मानवीय पृष्ठभूमि पर नैतिक चिंतन और लेखन की प्रतिभा मौजूद थी।वे इसमें सम्मिलित हो सकते थे। इन सभी स्मृतियों में बहुत अच्छे अकाट्य सिद्धांत भी हैं। वहीं इनमें कुछ ऐसा लेखन भी है,जो कभी मान्य नहीं किया गया था।किसी भी साहित्य संकलन के ग्रंथों में कुछ चीजें समयानुकूल नहीं होने या समझने में अर्थ भेद के कारण पूरा ग्रंथ गलत सिद्ध नहीं किया जा सकता है। इसमें अनेक लोगों के विचार संहिताओं के रूप में संकलित हैं।इनका राजकीय स्तर पर लागू होने का कोई प्रमाण नहीं है। तत्कालीन फैसले और नीतियों का निर्धारण सदां से मंत्रिमंडल के बहुमत और केन्द्रीय राजा (राष्ट्राध्यक्ष) की अनुमति के आधार पर होते थे।वहीं परमपराएं आज भी यथावत है।भारत में लोकतंत्र प्राचीन काल से रहा है।भारत में लोकतंत्र अंग्रेजों की देन नहीं है। स्वयं उनकी राष्ट्रीय व्यवस्था में नाम मात्र का संविधान है।नैतिकता बड़े ग्रंथों से नहीं आती है। बल्कि व्यावहारिकता की नैतिक पृष्ठभूमि पर सार्वजनिक उद्देश्यो के लिए कितनी ईमानदारी है। इस पर निर्भर करती है। यहां प्रश्न है?अनेक स्मृतियों के होने के बाद भी अंबेडकर ने मनु-स्मृति को ही टार्गेट क्यों किया था? जबकि अन्य स्मृतियों में भी बहुत सी बातें आधुनिक प्रचलन के अनुसार अव्यावहारिक लिखी हुई हैं। क्योंकि ब्रिटिश भारत सरकार अपनी नीतियों के अंतर्गत एक दूसरे ग्रुप्स के हितों में टकराव बनाये रखने के लिए ईसाई, मुस्लिम,सिख ग्रुपों को संरक्षित करती थी।जो अपनी धार्मिक मान्यताओं के नियमों को फोलो करते थे।तब अंग्रेजों ने मनुस्मृति से कुछ आंशिक धारणाओं को संकलित करके उसे हिन्दू कोड बनाया। हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई की धारणाओं को अंग्रेज भारत में विरासत के रूप में छोड़कर गए थे।अंग्रेजों की उत्तराधिकारी कांग्रेस ने इसे स्लोगन बना दिया। हिन्दू,मुस्लिम,सिख, ईसाई,आपस में हैं भाई।इसी नारे की नकल तत्कालीन समय में चीनी सैनिकों ने भी"हिन्दी,चीनी"भाई भाई"कहकर किया था।भाई होना अच्छी बात है।लेकिन भाई हैं तो फिर हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई क्यों हैं?तब उन्हें भारतीय होकर राष्ट्र और राष्ट्रीय संस्कृति को प्राथमिकता देनी चाहिए।और यदि भाई हैं।तो फिर भाई को धोखा क्यों? भारतीय स्वतंत्रता के समय जोगेन्द्रनाथ मंडल बंगाल प्रेसीडेंसी में पिछड़ों के प्रभावशाली नेता थे।उनके विषय में कहा जाता है।कि वे अविभाज्य बंगाल के पक्षधर थे।लेकिन मुस्लिम लीग का समर्थन करते थे।चलो राजनीतिक समर्थन लेना या देना अथवा वापिस लेना सामयिक राजनीतिक आवश्यकता हो सकती है।लेकिन यदि वे अविभाज्य राज्य के समर्थन में थे तो उन्होंने विभाजन के मुद्दे पर मुस्लिम लीग को वोट क्यों किया?फिर अपने लोगों को लेकर पाकिस्तान चले गए।पाकिस्तान का विभाजन सिर्फ मुस्लिम लीग की राजनीति नहीं थी। इसमें दलित राजनीति और कांग्रेस भी शामिल थी।लेकिन जब पाकिस्तान में जोगेन्द्रनाथ मंडल का प्रभाव कम हो गया तो अपने लोगों को उन्हीं के हालातों पर छोड़कर वे रातोंरात भागकर भारत आ गये। और फिर कभी पूर्वी या पश्चिमी पाकिस्तान में वापिस नहीं गये। उन्होंने भारत में आकर फिर से अपनी राजनीतिक शतरंज बिछाने की कोशिश यह बोलकर शुरू की कि भारत विभाजन के लिए कांग्रेस जिम्मेदार थी। उनको तो सिर्फ मोहरा बनाया गया था।लेकिन फिर भारतीय लोगों ने उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया। और अंततः वे भारतीय राजनीति में गुम हो गये। यहीं से मनुस्मृति को खलनायक बनाने का अवसर बाबा साहब ने लपक लिया।जबकि इससे पहले मनुस्मृति क्या है?इसमें क्या लिखा हुआ है?इसकी व्यावहारिक और नैतिक सच्चाई क्या है?इसे अधिकांश भारतीय नागरिक जानते ही नहीं थे। क्योंकि यह पहले और बाद में कभी आधिकारिक रूप से लागू ही नहीं थी। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार मनु-स्मृति सतयुग में लागू होने वाला ग्रंथ कहा जाता है।इसके आधार पर मनुस्मृति तो कई हजार वर्षों से लागू ही नहीं थी। किसी के आर्थिक रूप से पिछड़ने का कारण उद्योगों की संरचनाओं में बदलाव,और अर्थ नीतियों के कारण होता है।इसमें सांस्कृतिक कारण जिम्मेदार नहीं होते हैं।लोग अपनी दिनचर्या के लिए पहले भी उतने ही स्वतंत्र थे।प्राचीन भारत में याज्ञवल्क्य,और पाराशर संहिताओं के प्रचलन में होने के एतिहासिक वर्णन मिलते है।वे भी आंशिक रूप से लागू थीं। जो गुप्त काल में आंशिक रूप से लागू थी।
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कुछ लोग बहुत ही संक्षिप्त बुद्धि से सोचते हैं। उन्होंने धारणाएं बना रखीं हैं। जैसे ब्राह्मण ने स्वयं को शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ घोषित कर लिया है। ब्राह्मणों ने काल्पनिक ग्रंथ रचकर स्वयं का वर्चस्व बनाये रखा रखा है।जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। जब सच को सच स्वीकार नहीं किया जायेगा तो न सिर्फ आप झूठे आवरण में भटकते रहेंगे। बल्कि उन लोगों को भी भटकाते रहेंगे, जो आपके विचारों का अनुसरण करतें हैं। ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है। इस कथन से उन लोगों को ईर्ष्या होती है।जो किसी जाति,ग्रुप की सोच के फ्रेम से स्वंय को बाहर नहीं निकल पाते हैं। या प्रकृति में परमाणु की सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं।सिर्फ,तिलक,टोपी,हैट,दाढ़ी,जनेऊ,चोटी,पगड़ी, गेरुआ,पीले या सफेद वस्त्र,सिर का मुंडन टाई,आदि पहनने मात्र से कोई ब्राह्मण या अब्राह्म नहीं बनता है। यह किसी की व्यक्तिगत शैली या किसी संस्था आदि का ड्रेसकोड हो सकता है। इस प्रकार की वेषभूषा कोई स्वतंत्र व्यक्ति भी अपना सकता है। या ऐसा कर सकता है। लेकिन किसी देश का उच्चस्तरीय आधिकारिक थिंकटैंक ही उस देश का ब्राह्मण या अब्राह्म कहलाने का अधिकारी होता है। और यह उनकी क्षमता पर निर्भर करता है। कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर द्विपक्षीय, बहुपक्षीय एवं सार्वभौमिक स्थितियों और समस्याओं से वे कितनी सूझ-बूझ और कुशलता से निपटकर मानवीय हितों के लिए सही दिशा तय करते हैं।
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ये 28 बुद्धों की गिनती किसने की थी?28 बुद्ध के जन्म कितने वर्षों के अंतराल पर हुये थे? यह सुनिश्चित कैसे हुआ कि ये सभी बुद्ध के ही क्लान हैं?जबकि विज्ञान के अनुसार गर्भकाल के दौरान किसी को भी पता नहीं होता है‌।कि वह कौन है? और डाइरेक्ट रुप से किसी का पुनर्जन्म नहीं हो सकता है। विज्ञान के अनुसार पूर्व जन्म किसी के पूर्वज होते हैं। और पुनर्जन्म उसकी आने वाली पीढ़ी होती है। क्या 28वें गौतम बुद्ध के पिछले क्रम में उनके सभी 27 पूर्वजों को बुद्ध मान लिया जाये। या कुछ और,आप कहना क्या चाहते हैं? लोगों को बुद्ध के नाम पर गुमराह करने के बजाय वैज्ञानिक रूप से स्पष्टीकरण दे। या बुद्ध के नाम पर बेतुकी बातें करना बंद करें। या जो इतिहास के नाम पर मनगढ़ंत बातें फैला रहा है। उसे वैज्ञानिकों से डिबेट करने के लिए फ्रंट लाइन पर आगे रखें। भारतीय संस्कृति वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है। और वह बिना तथ्यों, तकनीकी कारणों, सिद्धान्तों एवं तर्कों के अभाव में ऐसे तथ्यों को निरस्त कर देती है।
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बौद्ध धर्म में तथागत बुद्ध 28वें बुद्ध थे. प्रथम बुद्धा का नाम तणहंकर हैं. तण द्रविड़ सब्द है. तणहंकर बुद्धा का जन्म सिंधु घाटी सभ्यता में हुआ था. सिंधु घाटी सभ्यता द्रविड़ सभ्यता थी. इसलिए शुरुआती बुद्धों का नाम द्रविड़ भाषा में है. मगर ज्यों ज्यों हम सिंधु घाटी सभ्यता से गौतम बुद्ध की तरफ चलते हैं, त्यों त्यों हम बुद्धों के नाम प्राकृत भाषा में होते जाते हैं. 28 बुद्धों के नामों से हम सिंधु घाटी सभ्यता से गौतम बुद्ध के काल तक कि सभ्यताई यात्रा कर सकते हैं. तथागत बुद्ध कोई पहले बुद्ध नही थे. गौतम बुद्ध का जन्म बौद्ध सभ्यता में हुआ था. सिंधु घाटी, नंद वंश और मौर्य वंश बौद्ध सभ्यता थी. बहुतों को मालूम नही है, उन्हें लगता है बौद्ध धर्म का इतिहास गौतम बुद्ध से शुरू होता है. जैसे भगवान महावीर ने जैन धर्म से जुड़कर उसमें कुछ घटाया कुछ जोड़ा, उसी तरह भगवान बुद्ध ने बौद्ध धर्म से जुड़कर इसमें कुछ घटाया, कुछ जोड़ा. 28वें बुद्ध भगवान गौतम बुद्ध को कोटि कोटि प्रणाम.
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भारत विश्व में प्रतीकात्मक साहित्य और प्रतीकात्मक फिगर संस्कृति का संरक्षक है।वैसे तो हमारी संस्कृति प्रत्येक कण कण और शरीर के एक एक रोम को प्रकृति की धरोहर स्वीकार करती है। क्योंकि प्रकृति का नियंता पूरी जैव विविधता और यहां तक कि मनुष्य भी नहीं है।बल्कि मानवीय संरचना भी प्राकृतिक कारणों से निर्मित है। मानवीय गुण और स्वभाव प्रकृति के अस्तित्व में सदैव के लिए बने रहें। इसलिए मानवीय संस्कृति को कुछ सैद्धांतिक प्रतीकात्मक साहित्य और फिगर के साथ जोड़ा गया है। प्रत्येक व्यक्ति उच्चतम स्तर का तत्वदर्शी या वैज्ञानिक नहीं होता है। इसलिए उसके सार को समझने और संरक्षित रखने के लिए प्रतीकात्मक साहित्य और फिगर संस्कृति को अपनाया गया है। अवतार या अवतरण शब्द का अर्थ उद्धरण होता है। प्रायः सामान्य रूप से लोग इसका अर्थ ईश्वर के उत्पन्न होने या प्रकट होने से लगाते हैं। क्योंकि पृथ्वी पर मनुष्य का उद्भव जैवविविधता के क्रमिक विकास से हुआ है। इसलिए पद्मनाभन (विष्णु) को नाभिकीय प्रतीक मानकर इससे प्रतीकात्मक रूप से जैवविविधता को जोड़ा गया है। ये अवतार जैव विविधता के संरक्षण और समय के अनुसार जीव के अनुकूलन (Adaptation) की वैज्ञानिक कहानी को पौराणिक कथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। भगवान विष्णु के 10 अवतार (दशावतार) पृथ्वी पर जीवन के क्रमिक विकास (Evolution) और जैवविविधता के संरक्षण का प्रतीकात्मक चित्रण हैं, जो जलचर से थलचर और फिर पूर्ण मानव विकास को दर्शाते हैं। ये अवतार मत्स्य (मछली) से लेकर कल्कि तक पारिस्थितिकी तंत्र और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने व प्राकृतिक आपदाओं के दौरान जीवन को बचाने का उद्देश्य रखते हैं। विष्णु के 10 अवतार और उनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण: मत्स्य अवतार (मछली): यह जीवन की शुरुआत को दर्शाता है, प्रथम एककोशीय जीव की उत्पत्ति जल में हुई। क्योंकि अधिकांश मछलियों की प्रजातियां जल से बाहर अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती हैं। जो जल में उत्पन्न हुई (paleozoic era)। वैज्ञानिक रूप से यह जल प्रलय के दौरान प्रजातियों को बचाने का प्रतीक है। कूर्म अवतार (कछुआ): यह उभयचर (Amphibian) जीवन को दर्शाता है,जो जल और थल दोनों में रह सकते हैं (Mesozoic era)। यह जैविक विकास को जल से स्थल की तरफ प्रतीकात्मक रूप से प्रदर्शित करता है। वराह अवतार (सूअर): यह पूरी थलचर स्तनधारी जैविक विकास (Terrestrial) का प्रतीक है,जो पानी से बाहर निकलकर पूरी तरह भूमि पर रहने वाले जीवों के विकास को दर्शाता है। नरसिंह अवतार (आधा मानव-आधा सिंह): यह जैविक विकास को हिंसक जानवर और आदिमानव के बीच के चरण को दर्शाता है।यह जैव विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।जब मानवीय विकास जंगली जीवों के साथ रहते हुए संघर्षरत था।और अपने विकास की तरफ अग्रसर था। वामन अवतार (बौना मानव): यह आदिमानव या होमो सेपियन्स के विकास का प्रारंभिक चरण है, जो शारीरिक रूप एवं कद से छोटा था।और अपनी शारीरिक संरचना को सुडौल रूप से विकसित करने में अग्रसर था। परशुराम अवतार (वनवासी मानव): यह मानव विकास का वह चरण है।जब वह शारीरिक रूप से शक्तिशाली और फरसा कुल्हाड़ी जैसे आदिम हथियारों का उपयोग करना शुरू किया और हिंसक जानवरों की क्रूरता का अपनी शक्ति से अंत किया और नैतिक जीवन की शुरुआत हुई। राम अवतार (आदर्श मानव): यह एक सामाजिक और अनुशासित मानव (Civilized Man) का प्रतीक है,जिसने समाज में मर्यादा और नैतिकता का हमेशा पालन किया और आम लोगों के लिए आदर्श स्थापित करने और उन्हें प्रसन्न रखने लिये कष्टप्रद पारिवारिक जीवनयापन किया। कृष्ण अवतार (योगी/ नीतियों का पुरोधा): यह परिष्कृत और बुद्धिमान मानव का प्रतीक है,जो कूटनीति,कला,संस्कृति,सटीक परंपराओं और नैतिकता की स्थापना के लिए किन्हीं भी नीतियों (साम,दाम,दंड,भेद) का उपयोग करने से परहेज़ नहीं करता है। बुद्ध अवतार (ज्ञानवान मानव): यह मानव विकास के उच्चतम मानसिक और आध्यात्मिक चरण को दर्शाता है, जो अहिंसा और करुणा पर जोर देता है। और दर्शाता है कि मनुष्य का बौद्धिक सत्व ही उसे अपना सही साक्षात्कार करा सकता है।दुनिया मोह-माया के भ्रम के कारण स्वयं से पृथक होकर ईश्वर को खोजती है। कल्कि अवतार (भविष्य का प्रतीक): यह प्रतीकात्मक रूप से भविष्य का प्रतिनिधित्व करता है।और नई संभावनाओं को आकार देता है। सामयिक मानव को दर्शाता है,यह वैज्ञानिक रूप से पूर्णतया उन्नत होगा।और अनैतिक,उदण्डता, अराजकता और विनाशकारी शक्तियों का अंत करेगा। यही जैवविविधता के साथ आदि,स्थित,अंत का सम्पूर्ण प्राकृतिक चक्र है।कुछ नये नये वैज्ञानिकों को यह सब पाखंड और ब्राह्मणों द्वारा कपोल कल्पित कहानियां लगती हैं।जबकि इसमें कुछ भी कूट रचित साहित्य अथवा इसमें किसी से कोई तथ्य छिपाया नहीं गया है।
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वास्तविकता में ऐसे परिवारों को शैक्षणिक, आर्थिक और वैचारिक सहयोग की आवश्यकता है। उन लोगों को आरक्षण देने की कोई आवश्यकता नहीं है।जो ऐसे परिवारों के नाम पर राजनीति करते हैं।और आरक्षण का पूरा लाभ स्वयं उठाकर ऐसे परिवारों को पीछे धकेल देते हैं।SC,ST,OBC में क्रीमी लेयर लागू होना चाहिए।
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ब्राह्मणों का बौद्धिक वर्चस्व स्वयं शिवाजी के शासन में ही था। और श्री समर्थ रामदास, शिवाजी शासन के समय महाराष्ट्र के महान संत थे। शिवाजी महाराज की भाषा अपने महान संत के लिए तुम्हारी जैसी घटिया और बेहूदा कभी नहीं थी। आधिकारिक रूप से शिवाजी का उनसे मिलने का प्रमाण हो या नहीं हो। व्यावहारिक रूप से शिवाजी का उनसे संपर्क था। वे उन्हें अपना दार्शनिक गुरु मानते थे। तुम्हारे कुतर्कों से सच नहीं बदल जायेगा।शिवाजी के मंत्रिमंडल और उनकी सैन्य संरचनाओं का इतिहास पढ़ो।ब्राह्मण नफरत के इस फेब्रिकेटेड नैरेटिव की बत्ती बनाओ और घुसेड़ लो।तुम्हारे जैसे ब्राह्मण बनने की ईष्र्या लेकर पैदा होते हैं।लेकिन अपनी निम्न सोच और कर्मों के कारण ब्राह्मण नहीं बन पाते हैं। यदि यह सच नहीं है तो प्रतिस्पर्धा करने के लिए ब्राह्मण ही क्यों चाहिए?ब्राह्मण तो आधुनिक व्यवस्था का कोई शब्द ही नहीं है। ब्राह्मण पहले भी कोई जाति नहीं थी। आज भी कोई जाति नहीं है। ब्राह्मण से शक्तिशाली तो भारत में अन्य जातियां भी हैं। कभी उनसे प्रतिस्पर्धा करने का साहस जुटा कर देखो।
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Shahnawaz Khan🇮🇳@shahnawm·
@KraantiKumar औरंगजेब आलमगीर जैसे शासक के सामने शिवाजी आगरा दरबार में गए, जहां उन्हें जानबूझकर दूसरी पंक्ति में खड़ा कर दिया गया। प्रोटोकॉल का रोना रोया, नाराज होकर चिल्लाए, फिर भाग निकले। भागने का तरीका तो कमाल का था — टोकरी में छुपकर! 😂
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Kranti Kumar
Kranti Kumar@KraantiKumar·
छत्रपति शिवाजी महाराज जब मुग़ल बादशाह औरंगजेब से मुलाकात करने गए तो उन्हें जानबूझकर दूसरे पंक्ति में खड़ा किया गया. प्रोटोकॉल के तहत मराठा साम्राज्य का शासक होने के नाते उन्हें प्रथम पंक्ति में स्थान मिलना चाहिए था. छत्रपति शिवाजी महाराज ने विरोध किया. मुगल बादशाह औरंगजेब से बहस हो गयी. उस समय ऐसा करना किसी अन्य राजा में हिम्मत नही थी. जब तक शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज थे. मुग़ल डेक्कन पर कब्जा नही कर पाए. डेक्कन पर प्रभुत्व जमाने के लिए औरंगजेब 26 सालों तक डेक्कन में भटकता रहा. शिवाजी महाराज ने मुग़लों को थका दिया था. वो कभी किसी स्वामी रामदास के आगे नमस्तक नही हुए. कभी अपना मुकुट किसी स्वामी के चरणों में नही रखा. सारी कहानी बाद में तैयार की गयी ताकि ब्राह्मण जाति का वर्चस्व दिखाया जा सके. धीरेंद्र शास्त्री झूठ बोलता है.
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ये लोग किस हद तक गिर सकते हैं। कुछ कहना बहुत मुश्किल है। समझ नहीं आ रहा है। सरकार और पुलिस ऐसे लोगों को क्यों नजर अंदाज कर रही है। यह सभी स्तरों से गिरा हुआ व्यक्ति मूतनीमैया के जयकारे खुले मंच से लगाकर भारतीय संस्कृति के प्रतीकों पर अश्लील टिप्पणियां कर रहा है। यह जिस किसी को मानता हो या नहीं मानता हो। यह इसका व्यक्तिगत विषय है। लेकिन अन्य लोगों की भावनाओं का मज़ाक़ बनाने की स्वतंत्रता कौन सा कानून देता है।अच्छा होगा कि लोगों में प्रितिक्रियावश आक्रोश फैलने से पहले ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई हो। अन्यथा इससे लोगों में संदेश जा रहा है। कि सरकार और पुलिस का इन लोगों के लिए मूक समर्थन है। और यह सब-कुछ जानबूझकर किया जा रहा है। यदि इस देश में अमर्यादित और असभ्य ऐसे लोग रहते हैं।तो निश्चित रूप से ऐसे लोगों से राष्ट्र और प्रतीकात्मक राष्ट्रीय संस्कृति को बहुत बड़ा खतरा है। कोई बाहरी दुश्मन इस प्रकार की दीमक से खतरनाक नहीं हो सकता है। @HMOIndia @CMODelhi @DelhiPolice #Arrest_this_person_immediately
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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अपने एजेंडे के लिए तुम जिन तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत कर रहे हो तत्कालीन समय के लोगों में ऐसा कुछ नहीं था। तुम सिद्ध करके बता दो कि शिवाजी ब्राह्मणों से नफ़रत करते थे। शिवाजी सभी विद्वानों का सम्मान करते थे। उनके मंत्रिमंडल व राजकीय विभागों में भी उच्च पदों पर सबसे अधिक लोग ब्राह्मण ही थे। कुछ स्थानीय ब्राह्मणों द्वारा उन्हें क्षत्रिय नहीं मानकर उनका राज्याभिषेक नहीं करने का मतलब यह नहीं है। वह सभी ब्राह्मणों का मत था। अंततः उनका राज्याभिषेक काशी के विद्वान ब्राह्मण ने ही किया था। और राज्याभिषेक के बाद शिवाजी ने भोज का आयोजन किया और हजारों ब्राह्मणों को उपहार भेंट किये। अब इसमें तुम अपने आप को फिट कर सकते हों कि शिवाजी के भोज आयोजन में तुम कहां दरियां बिछा रहे थे। और सफाई व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कहां झाड़ू लगा रहे थे। वैसे हम झाड़ू लगाने को निम्नतम कार्य नहीं मानते हैं। सुना है देहली में तो कुछ नेताओं ने झाड़ू की ही अच्छी तरह से सफाई कर दी है। इसी प्रकार द्रोणाचार्य, एकलव्य का फर्जी टोपिक बना रखा है। भले यह एक चरित्र कथा हो। जब गुरु दक्षिणा मांगने वाले और गुरु दक्षिणा देने वाले को किसी भी प्रकार की आपत्तियां नहीं थी। तब वर्तमान समय में निष्कर्ष निकालने वाले तुम कौन होते हो। एकलव्य परोक्ष रूप से द्रोणाचार्य को ही गुरु स्वीकार करते थे। तुम लोग कहते हो उन्होंने एकलव्य को भील होने के कारण प्रशिक्षण नहीं दिया। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। आज भी सैन्य स्कूलों में सैनिकों के बच्चे ही पढ़ते हैं।यह व्यवस्था के नियम होते हैं। इसके लिए न कोई एकलव्य जिम्मेदार होता है और न द्रोणाचार्य जिम्मेदार होता है। लेकिन मूर्खतापूर्ण बातें करने वाली परिपाटी को कौन समझाएगा? जब उनसे मार्गदर्शकों के माइंड में ही गंदगी भरी हुई है।
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Kranti Kumar
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राजमाता जिजाबाई छत्रपति शिवाजी महाराज की माता होने साथ-साथ उनकी गुरु, मार्गदर्शक और प्रेरणा भी थीं. रामदास छत्रपति शिवाजी महाराज का गुरु नही था. राजकीय अभिलेख, पत्र आदि में कहीं भी रामदास का उल्लेख नही है. रामदास उनके गुरु थे बाद की किताबों में जोड़ा गया है. उसी तरह जैसे 19वीं सदी में जोड़ा गया चाणक्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु हैं. सवर्ण वर्चस्व कायम रखने के लिए आरएसएस रामदास को गुरु के रूप में स्थापित करना चाहता है. प्लान के तहत धीरेंद्र शास्त्री ने बयान दिया रामदास छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु हैं. महाराष्ट्र शिवाजी महाराज, फुले और अंबेडकर की भूमि है. आरएसएस का प्लान कामयाब नही हो पाएगा.
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किसने कहा है?माथे पर चंदन लगाना धार्मिक परंपरा है।चंदन ठंडक प्रदान करने वाला एक हर्बल है।इसे मस्तिष्क को ठंडक पहुंचाने के लिए उपयोग किया जाता है।तिलक किसी भी अनुष्ठान में प्रतीकात्मक रूप से लगायें जाते हैं।संस्कृति का उपयोग पूरे विश्व में प्रतीकात्मक रूप से ही किया जाता है।टाई सर्दी,गर्मी से बचने का वस्त्र नहीं है। बल्कि क्रूस का प्रतीक है।लेकिन टाई लगा सकते हैं।
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Savita Kumari
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सरकारी कर्तव्य निर्वहन के वक्त किसी को भी अपनी धार्मिक पहचान का दिखावा करने की कोई जरूरत नहीं। जय भीम जय संविधान🔥🔥🔥
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कुछ लोग दादाजी कोंडदेव को शिवाजी का राजनीतिक/प्रारंभिक गुरु मानते हैं (जिन्होंने बचपन में उन्हें प्रशिक्षित किया) शिवाजी के दार्शनिक गुरु के रूप में समर्थ रामदास ही सबसे प्रसिद्ध और प्रमाणित नाम है। सिर्फ तुम और एक राजेन्द्र प्रसाद दो ही इतिहासकारों से वास्तविक इतिहास शुरु होता है। जो पहले लिखकर गये हैं। वे गप्पे लिखकर गये थे।समझ में नहीं आया जब चन्द्रगुप्त, अशोक, मिहिर भोज, शिवाजी आदि जैसे महान बड़े राजा और महात्मा बुद्ध, कबीर, रविदास जैसे बहुजन समाज के अंग थे। तो शोषण ब्राह्मण ने कैसे कर लिया था? और यदि शोषण किया था तो ये लोग उभरकर महान कैसे बन गये। अपनी कमी और दोषों का ठीकरा दूसरों के ऊपर फोड़ने से कोई निर्दोष साबित नहीं होता है। फर्जी और झूठी कहानियां बनाने से या किसी को गालियां बकने या विचार, आइडियल चुराने से कोई महान नहीं बनता है। बल्कि शिष्टता की लिस्ट में भी उनका नाम डाउन होता चला जाता है।
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नागपुर में आरएसएस के कार्यक्रम में धीरेंद्र शास्त्री ने छत्रपति शिवाजी महाराज का अपमान किया. धीरेंद्र शास्त्री ने कहा, शिवाजी महाराज जब लड़ाई से थक हार गए थे तब अपने गुरु रामदास के पास गए और उनके चरणों में तलवार रखकर अपना राजपाठ देने को कहा. यह बयान धीरेंद्र शास्त्री ने मोहन भागवत के सामने दिया. धीरेंद्र ने इस बयान के जरिए बहुत महीन तरीके से छत्रपति शिवाजी महाराज का अपमान और ब्राह्मण जाति के गुरु रामदास का गुणगान किया. जिस तरह चाणक्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु नही हैं. उसी तरह रामदास भी छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु नही हैं. रामदास का अस्तित्व है, लेकिन छत्रपति शिवाजी से रामदास से कोई वास्ता नही है. झूठे इतिहास के नाम पर सवर्ण हेजेमोनी की दुकानदारी बंद होनी चाहिए.
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अब SC,ST, OBC में क्रीमी लेयर लागू होना चाहिए।जो परिवार 75 वर्षों से आरक्षण का लाभ लेकर सामान्य जैसी जीवन शैली विकसित कर चुके हैं।उन्हें आरक्षण की श्रेणियों से बाहर निकाला जाना चाहिए और इसका लाभ वास्तविक परिवारों को मिलना चाहिए। कौन कहता है?जातिगत आरक्षण आर्थिक उन्नति का आधार नहीं था। इसका वास्तविक भौतिक उद्देश्य आर्थिक, शैक्षणिक, वैचारिक उन्नति ही था। जातिगत धारणा भावनात्मक संरचना है। कौन अपने और किसी अन्य के विषय में क्या सोच रखता है? यह सामाजिक पृष्ठभूमि की भावनात्मक संरचना है। और भावनाएं,अधिनियम या कानून नहीं होते हैं। विधिक प्रक्रियाएं फिजिकल रूप से प्रचलित स्थितियों का सर्वेक्षण करतीं हैं। और उसी आधार पर सिफारिशें प्रस्तुत करतीं हैं। तत्कालीन समय में पूरी की पूरी जातियों को किसी न किसी कारण से पिछड़े मानकर आरक्षित श्रेणियों में शामिल किया गया था। इसका विधिक उद्देश्य जातिगत भावनात्मक पृष्ठभूमि पर बिल्कुल भी नहीं था। मुख्य उद्देश्य व्यावहारिक रूप से पिछड़े लोगों को शैक्षणिक, वैचारिक, आर्थिक रूप से उत्थान करते हुए मुख्य धारा से जोड़ना था। सबसे पहले SC का गठन हुआ था। और इसे सबसे अधिक वर्षों से आरक्षण का लाभ मिल रहा है। उसके बाद SC का गठन हुआ था, सबसे बाद में OBC श्रेणी को लागू किया गया था। आरक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त की जाने वाली व्यवस्था नहीं है। और न ही इस पर किसी व्यक्ति, परिवार, जाति, समाज,वर्ग, संप्रदाय का एकाधिकार है। इसका एकाधिकार संबंधित व्यवस्थाओं के पास होता है। जो लोग वास्तविकता में राष्ट्रीय निर्माण की सोच रखते हैं। और किसी भी प्रकार से सामान्य और संपन्न जीवन शैली प्राप्त कर चुके हैं। उन्हें अपनी स्वेच्छा से आरक्षण देना बंद कर देना चाहिए। और वास्तविक परिवारों को आरक्षण का लाभ लेने के लिए मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।
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Prajapati Inder Bajrangi
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इं. डी. पी. गौतम जी की बात से कौन कौन सहमत है??? गरीब तो OBC, SC, ST में भी है!
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