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छाँव रास्ते हों तो दरख़्त भी हों कविता में इतनी छाँव ज़रूरी है राही डूमरचीर
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एक घर प्रेम ने उजाड़ दिया एक घर ग़रीबी ने इस बात से नहीं हुआ मैं इतना निराश इतना उदास जितना इस बात से क्यों उजड़ गए गाँव से दो घर किसी ने नहीं पूछा किसी से प्रभात
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कोई नहीं देगा तुम्हें तुम्हारे हिस्से की ज़मीन आसमान हवा, धूप, पानी सुनो लड़कियों! जंगली फूलों की तरह हक़ से उगना और जम जाना सीखो... चित्रा पंवार
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जब मैं उठूँ तो किसी पक्षी की तरह आनंदित होकर उठूँ जब मैं गिरूँ तो किसी पत्ते की तरह बिना पछतावे के गिरूँ वेंडेल बेरी
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मेरी एक आँख सपने देख रही है दूसरी तारे गिन रही है इतने पर भी मैं चाहता हूँ मेरी तीसरी आँख भी खुल जाए! केशव शरण
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मैंने नवजात शिशु को देखा शिशु देर तक मेरी अंगुली पकड़े रहा मैं एक अलौकिक आत्मीय ऊर्जा से भर गया पहली बार मुझे एहसास हुआ हम कविता को छू भी सकते हैं। जसवीर त्यागी
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