Neeraj🇮🇳 retweetledi

लगभग 90 के दशक तक जन्मे लोगों के लिए गर्मियों की छुट्टियां सिर्फ छुट्टियां नहीं होती थीं बल्कि यादों का खजाना होती थीं?
उन दिनों कुछ दिन दादा दादी या नाना नानी के घर बिताना जैसे एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाना होता था?
शाम होते ही छत पर पानी डाला जाता था फिर खाट दरी चादर और बिस्तर बिछाए जाते थे ताकि रात तक सब ठंडा हो जाए?
रात में जब तक बड़े लोग नहीं आते थे तब तक बच्चे आपस में गप्पें मारते थे कोई भूतों की कहानी सुनाता था तो कोई हंसी मजाक करता था?
जब बड़े आते थे तो कभी तारे गिनवाते थे कभी सप्तऋषि और ध्रुव तारा दिखाते थे कभी अंताक्षरी खेलते थे तो कभी पहाड़े सुनवाते थे?
हर छत से कोई न कोई पेड़ जरूर दिखता था जिसके बारे में कहा जाता था कि वहां चुड़ैल रहती है और रात में वह पेड़ और भी डरावना लगने लगता था?
अगर रात में नींद खुल जाए तो डर के मारे बच्चे मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ने लगते थे?
मच्छर उतने परेशान नहीं करते थे बस कभी अचानक आंधी या बारिश आ जाती तो सब सामान समेटकर नीचे भागना पड़ता था?
सुबह सूरज की पहली किरण और चिड़ियों की आवाज से नींद खुलती थी और बिस्तर हल्की ओस से नम मिलते थे?
फिर बच्चे उसी बात को लेकर एक दूसरे को छेड़ते रहते थे?
आस पास की छतें जुड़ी होती थीं और एक अनकहा नियम भी था कि अगर पास वाली छत पर कोई महिला हो तो बड़े लोग वहां नहीं सोते थे?
आज की सारी सुविधाएं भी उस दौर की सादगी और खुशी का मुकाबला नहीं कर पातीं क्योंकि वह समय सिर्फ जिया जाता था दिखाया नहीं जाता था


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