
GyanTalks With Sushila
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★ मेरे राजस्थानी भाषा के समर्थकों से कुछ सवाल हैं। अगर आप तर्क के साथ जवाब देना चाहें तो स्वागत है, अन्यथा दूर रहें। 1. आज राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा दिलाने की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। कहा जा रहा है कि हिंदी के प्रभुत्व को समाप्त कर local language और culture को बचाना जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में यह पूरे राजस्थान की भाषा और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है, या सिर्फ एक विशेष क्षेत्र और वर्ग का प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास है? भारत में जाति और भाषा का घनिष्ठ सम्बन्ध है। वास्तव में भारत में भाषा सिर्फ communication का माध्यम नहीं, बल्कि symbolic power और social privilege का महत्वपूर्ण उपकरण है। जैसा कि Pierre Bourdieu ने कहा था, भाषा तय करती है कि किसकी आवाज़ वैध मानी जाएगी और किसकी बोली का मजाक उड़ाया जाएगा। भारत के हर क्षेत्र में अलग-अलग बोलियां बोली जाती हैं। बड़े शहरों में ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोगों का उनकी बोली और accent को लेकर मजाक उड़ाया जाता है ताकि language based privilege कायम रखा जा सके। यह सिर्फ भाषाई नहीं, बल्कि social hierarchy और domination का हिस्सा है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में वरहदी, सोलापुरी, कोकणी, कोल्हापुरी, खानदेशी और अहिरानी जैसी अनेक बोलियां बोली जाती हैं, लेकिन standard Marathi मुख्यतः पुणे के उच्चवर्णीय शहरी linguistic structure पर आधारित मानी जाती है। परिणामस्वरूप बाकी बोलियों को “ग्रामीण” या “कम प्रतिष्ठित” मान लिया जाता है। 2. अब सवाल यह है कि अगर राजस्थानी को भाषा का दर्ज़ा मिल गया, उसे पाठ्यक्रम में compulsory कर दिया गया और RPSC जैसी परीक्षाओं में उसका fixed weightage तय हो गया, तो क्या मारवाड़ के अलावा बाकी क्षेत्रों की बोलियों और communities को भी equal representation मिलेगा? क्या मेवाड़, हाड़ौती, ढूंढाड़, शेखावाटी, मेवात, बागड़ आदि क्षेत्रों की भाषाई पहचान को भी समान महत्व मिलेगा? यहां तक कि मारवाड़ के भीतर भी क्या यह प्रत्येक community की local language है? या फिर यह एक विशेष सामंती वर्ग की भाषा को पूरे राजस्थान पर impose करना होगा? अगर किसी विद्यार्थी को राजस्थानी नहीं आती, तो क्या वह competitive exams में पीछे नहीं रह जाएगा? फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि “हम किसी पर language नहीं थोप रहे”? 3. आपका दूसरा तर्क यह है कि “संस्कृति और परंपरा बचाने के लिए राजस्थानी जरूरी है।” लेकिन यहां एक और बड़ा सवाल है। आज राजस्थान में अधिकांश विद्यार्थी third language के रूप में संस्कृत लेते हैं। German और French जैसी भाषाओं का डर दिखाना सिर्फ psychological fear creation है। वास्तविकता यह है कि राजस्थान का बहुसंख्यक विद्यार्थी आज भी संस्कृत पढ़ता है। अब सवाल उठता है : • क्या राजस्थानी संस्कृत से पुरानी भाषा है? (Is Rajasthani older than Sanskrit?) • क्या राजस्थानी की अपनी independent script है? (Does Rajasthani have its own independent script?) • क्या राजस्थानी में दर्शन (Philosophy), तत्त्वमीमांसा (Metaphysics), अध्यात्म (Spirituality), Logic (तर्कशास्त्र), Scientific Grammar (वैज्ञानिक व्याकरण), Mathematics (गणित), Ayurveda (आयुर्वेद), Astronomy (खगोलशास्त्र), Political Thought (राजनीतिक चिंतन), Jurisprudence (न्यायशास्त्र), Yoga (योग), Meditation (ध्यान), Drama (नाट्यशास्त्र), Poetics (काव्यशास्त्र), Prosody (छंदशास्त्र), Social Ethics (सामाजिक नैतिकता) और Knowledge Tradition (ज्ञान परंपरा) जैसी विशाल intellectual tradition मौजूद है? संस्कृत सिर्फ धार्मिक भाषा नहीं, बल्कि Indian civilization की foundational knowledge language रही है। संस्कृत में : • दर्शन (Philosophy) • तत्त्वमीमांसा (Metaphysics) • अध्यात्म (Spirituality) • चेतना एवं आत्मा पर गहन चिंतन (Consciousness & Soul Inquiry) • मोक्ष एवं जीवन-दर्शन (Liberation & Philosophy of Life) • नैतिकता एवं सदाचार (Ethics & Moral Conduct) • धर्म एवं कर्तव्य सिद्धांत (Duty & Dharma Theory) • योग एवं ध्यान परंपरा (Yoga & Meditation Tradition) • तर्कशास्त्र एवं शास्त्रार्थ (Logic & Debate Tradition) • वैज्ञानिक व्याकरण (Scientific Grammar) • ध्वनि विज्ञान एवं उच्चारण शुद्धता (Phonetics & Pronunciation Precision) • भाषाई संरचनात्मक शुद्धता (Structural Linguistic Precision) • शब्द निर्माण की क्षमता (Word Formation Capacity) • समृद्ध दार्शनिक शब्दावली (Rich Philosophical Vocabulary) • विशाल शास्त्रीय साहित्य (Vast Classical Literature) 1/. @sushilakajla2 @Decentladki1 @Commonmanist @dank0029


मैं इस बात से सहमत हूं कि राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलनी चाहिए लेकिन ये अनिवार्य नहीं वैकल्पिक होनी चाहिए। कक्षा 6 में बच्चे जो तृतीय भाषा चुनते हैं वहां संस्कृत/, राजस्थानी का विकल्प होना चाहिए। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी ये वैकल्पिक होनी चाहिए। ताकि जिनको ये सुविधाजनक लगे वो इसको चुन कर इस भाषा को नया आयाम दे सकें। राजस्थानी भाषा के और अधिक लेखक और कवि हमारे राज्य को मिल सकें व जिनको नहीं आती वो संस्कृत चुनें ताकि उनके लिए यह बाधा के रूप में काम न करे। धीरे धीरे संस्कृत की तरह राजस्थानी में भी लोगों की रूचि बढ़ जाएगी और सभी को आसान लगने लगेगी। हो सकता है us दिन सभी इसे अनिवार्य भी स्वीकार करने को तैयार हों लेकिन फिल्हाल वैकल्पिक के तौर पर मान्यता मिलनी चाहिए।



तरीका मिलता नहीं तुम्हें पार करने का मुझे, तुम मेरे सीने में एक सागर की तरह बहते हो। मैं जो रोई तो महफूज़ तुम भी न रह पाओगे, तुम मेरी आँख में काजल की तरह रहते हो।।



























