
Yaqut Ali
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Yaqut Ali
@aliyaqut
Work: @thewire_in @dwnews @pulitzercenter @frontline_india Young Journalist Finalist 2025 by @thomfound RedInk Nomination - 3 [email protected]
India Katılım Ekim 2014
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Modi's Defeat on Friday Will Prove to Be a Turning Point.
On how Friday the 18th will go down - Harish Khare writes. thewire.in/politics/modis…
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PM Modi's speech today was a gross violation of the Model Code of Conduct. Will @ECISVEEP take action?
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An alleged video circulating on social media claims security forces are destroying CCTV cameras in Manipur. Can @manipur_police clarify whether this is authentic or misleading?
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Excl: Baba Bageshwar Dham can receive foreign donations.
MHA has granted FCRA registration to the religious body led by Dhirendra Krishna Shastri, a Madhya Pradesh-based godman who seeks to establish ‘Hindu Rashtra’.
thehindu.com/news/national/…
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Political turmoil in Indian border state as nine million lose voting rights bbc.in/4ehR6dY
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This report highlights how power can be misused. Do watch: youtube.com/watch?v=fz5K8R…

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Video evidence captured by @SonalPateria and @udayfromearth shows the police hitting @saketanand95 with a lathi, followed by a denial. The footage also reflects how authorities behave even when being recorded. It raises an important question: what happens when there is no camera?
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ट्रांसजेंडर कानून: पहचान खुद की, मंजूरी सरकार की [Indian Transgender Law... youtu.be/2fs-EQY0s8k?si… for @dw_hindi

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Stories like this take time, effort and money. I spent seven months putting together the research and groundwork needed for this story, so please read the story and support @Article14live, @shreyaraman18 1/2 (links below)
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पंडित जी,
आपको सुप्रभात।
पहली बात, भारत में बड़ी “आबादियाँ” किसी “षड्यंत्र” से नहीं बनीं; वे इसी समाज के भीतर पैदा हुईं, पलीं-बढ़ीं और उसी सामाजिक अपमान का अनुभव करती रहीं। वर्ण-जाति व्यवस्था में जिन समुदायों को “अस्पृश्य” ठहराया गया, उन्हें मंदिर, कुएँ, बस्ती, शिक्षा, सम्मान और सामाजिक बराबरी से दूर रखा गया। इतिहास बताता है कि दलित समुदायों के बहुत से लोगों ने इस अपमान से निकलने के लिए दूसरे धर्मों या नए सामाजिक-धार्मिक रास्तों की ओर रुख किया; यह “आसमान से टपकना” नहीं, सामाजिक बहिष्कार की ऐतिहासिक परिणति थी। अनेक “अछूत” समुदायों ने भेदभाव से बचने के लिए दूसरे धर्म अपनाए।
दूसरी बात, किसी भी समुदाय के लिए “जिहादी”, “क्रिप्टो”, “कायर” जैसी सामूहिक गालियाँ इतिहास नहीं, नफ़रत की भाषा हैं। यह भाषा कोई भी सुसंस्कृत और सभ्य व्यक्ति प्रयुक्त नहीं कर सकता। कोई भी गंभीर इतिहासकार पूरी आबादियों को अपराधी शब्दों में नहीं बाँटता; वह यह पूछता है कि सामाजिक संरचना ने किन हालात में अलगाव, प्रतिरोध, धर्मांतरण और पहचान की राजनीति को जन्म दिया। भारत की जाति-व्यवस्था को आधुनिक शोध दुनिया की सबसे पुरानी संस्थाबद्ध दमन-प्रणालियों में गिनता है।
तीसरी बात, कन्हैया लाल टेलर साब की 28 जून 2022 को उदयपुर में हत्या नृशंस थी। दो नृशंस मुसलमान हमलावरों ने हत्या का वीडियो बनाया और उसे सार्वजनिक भय फैलाने के औज़ार की तरह इस्तेमाल किया। अख़बारों की रिपोर्ट के अनुसार यह हत्या नूपुर शर्मा के समर्थन में कथित पोस्ट के संदर्भ में की गई और उसके बाद सांप्रदायिक तनाव भड़का।
चौथी बात, मकान निर्माण मजदूर मोहम्मद अफ़राज़ुल साब की 6 दिसंबर 2017 को उदयपुर से महज़ 61 किलोमीटर दूर राजसमंद में शंभूलाल रेगर के हाथों की गई हत्या भी उतनी ही, अपितु दृश्य क्रूरता के स्तर पर अत्यंत भयावह थी। कुल्हाड़ी या तलवार से हमला, फिर जलाना और पूरे कृत्य का वीडियो एक छोटे बालक से बनवाना। अफ़राज़ुल पश्चिम बंगाल से आए एक प्रवासी मज़दूर थे।
पाँचवीं बात, इन दोनों हत्याओं में नैतिक फ़र्क़ नहीं है। दोनों में एक निर्दोष व्यक्ति को पहचान-आधारित नफ़रत के वातावरण में मारा गया; दोनों में वीडियो को आतंक और संदेश की भाषा बनाया गया; दोनों में मनुष्य को मनुष्य नहीं, प्रतीक बना दिया गया। फ़र्क़ अगर है तो हमारी राजनीतिक स्मृति में है। किसे बार-बार याद किया जाता है और किसे सुविधानुसार भुला दिया जाता है। यही चयनात्मक शोक समाज को खोखला करता है।
मैं बार-बार देखता हूँ कि काँग्रेस के पूर्व सीएम सहित ढेर सारे नेता और भाजपा के लोग बार-बार कन्हैलाल जी के परिवार के प्रति फ़िक्रमंद रहते हैं, जो कि एक अच्छी बात है; लेकिन बुरी बात ये है कि कोई अफ़राजुल का सपने में भी नाम नहीं लेता! दो निर्दोष एक ही तरह के वहशियाना तरीक़े से मारे गए; लेकिन यह भयावह रूप से दुःखद है कि हिन्दू का मारा जाना मारा जाना है और मुसलमान का मारा जाना मारा जाना ही नहीं है!
छठी बात, किसी भी दल के समर्थकों, नेताओं या कार्यकर्ताओं की निकटता की चर्चाएँ हों, उससे मूल नैतिक प्रश्न नहीं बदलता: क्या हम हर पहचान-आधारित हत्या की एक जैसी निंदा करेंगे या केवल वही याद रखेंगे, जो हमारे राजनीतिक आख्यान के काम आए? कन्हैया लाल भी निर्दोष थे, अफ़राज़ुल भी निर्दोष थे। दर्ज़ी की हत्या और मज़दूर की हत्या दोनों सभ्यता पर धब्बा हैं। एक को याद रखकर दूसरे को भुलाना न्याय नहीं, घृणित पक्षपात है।
इसलिए पूजनीय पंडित जी, सही जवाब यह है कि पहले मनुष्य को मनुष्य मानिए। जिसने सदियों तक बराबरी नहीं दी, वही आज यह न पूछे कि लोग दूसरे रास्तों पर क्यों गए। और जिसने एक हत्या पर आक्रोश जताया है, उसे दूसरी हत्या पर भी उतनी ही नैतिक आग रखनी होगी। यही इतिहास का भी तकाज़ा है और इंसानियत का भी।उस इंसानियत का जो सनातन समाज में चींटी के पाँव से दबने को भी पापाचार मानता है! @Shukla_Suniil
🚩 पं.सुनील शुक्ल 🇮🇳@Shukla_Suniil
@TheTribhuvan @annadohazare @HansrajMeena तो श्रीमान जी भारत में ये जो 30 करोड़ जिहादी,2 करोड़ क्रिप्टो ईसाई ल,5 करोड़ अम्बेडकराइट नव बौद्ध भीमते आदि कहां से आ गए ये कहीं आसमान से नहीं टपके है सब यही के कायर हिंदू है,एकाध जिहादी से जरा उसके धर्म की सच्चाई पूंछ के देख लेना STSJ हो के रहेगा,कन्हैया लाल टेलर याद है न ⚔️🗡️
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दिल में प्यार है
आंख्या में काजल है,
ओ मारो राजस्थान है
जगह-जगह मीठा फल है।
ANI@ANI
#WATCH | Rajasthan: Members of the Hindu community, under the aegis of Hindu-Muslim Ekta Samiti, shower flower petals on members of the Muslim community who offered namaz at Eidgah in Jaipur, on Eid ul-Fitr.
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