
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है।
तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम
एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके।
खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।"
पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था।
थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।"
अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।"
अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे।
मंच पटना का, दर्द सरहद का
जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं।
एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है।
खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए।
यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे।
अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।)
आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार
रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर।
रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे।
यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा:
1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए।
2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए।
3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े।
4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए।
सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए।
Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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