Ek Bhartiye Janta

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@amanRverma

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India Katılım Nisan 2013
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Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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FirstBiharJharkhand
FirstBiharJharkhand@firstbiharnews·
गया: सड़क हादसे में शहीद हुए दरोगा नीरज कुमार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे और नम आंखों से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। पूरे क्षेत्र में शोक की लहर है। #Gaya #NeerajKumar #MartyrPoliceOfficer #StateHonours #BiharPolice #BiharNews #BreakingNews #Tribute #GayaNews #NewsUpdate #PoliceMartyr #Respect
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Indian Tech & Infra
Indian Tech & Infra@IndianTechGuide·
🚨 Bihar CM Samrat Choudhary invites Google to set up a GCC in the state, citing the Bihar GCC Policy 2026. Good efforts. 👏
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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Sadan Singh Rajput
Sadan Singh Rajput@SadanJee·
शहीद हुए दरोगा की मां, बेटा खोने का दर्द एक मां से बेहतर कौन समझ सकता दुर्घटना में मधेपुरा के तीन थाना अध्यक्ष सहित चार की मध्य रात्रि बेगूसराय में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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Begusarai News: सड़क हादसे में तीन थाना प्रभारी समेत 4 पुलिसवालों की दर्दनाक मौत, ट्रेनिंग से लौट रहे थे जवान zeenews.india.com/hindi/india/bi…
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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सहरसा : बेगूसराय में सड़क हादसे में 3 थानाध्यक्ष समेत 4 की मौत... पुलिसकर्मियों की मौत पर कोसी रेंज के DIG ने जताया दुख #BiharNews

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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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Janata Dal (United)
Janata Dal (United)@Jduonline·
बेगूसराय में हुए भीषण सड़क हादसे में तीन थाना प्रभारियों एवं वाहन चालक के असामयिक निधन का समाचार अत्यंत दुःखद एवं हृदयविदारक है। कर्तव्य निर्वहन के दौरान हुई यह अपूरणीय क्षति पूरे पुलिस परिवार तथा समाज के लिए गहरा आघात है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्माओं को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकाकुल परिजनों को इस असहनीय दुःख को सहन करने की शक्ति दें।
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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Samrat Choudhary
Samrat Choudhary@samrat4bjp·
बेगूसराय में हुए भीषण सड़क हादसे में तीन थाना प्रभारियों एवं वाहन चालक के असामयिक निधन का समाचार अत्यंत दुःखद एवं पीड़ादायक है। यह अपूरणीय क्षति पूरे पुलिस परिवार के लिए गहरा आघात है। दिवंगत आत्माओं की चिर शांति हेतु ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ तथा शोकाकुल परिजनों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूँ। इस दुःख की घड़ी में बिहार सरकार शोक संतप्त परिवारों के साथ खड़ी है। ॐ शांति। 🙏🏻
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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DD News Bihar | डीडी न्यूज बिहार
बेगूसराय में भीषण सड़क हादसा, तीन थाना प्रभारी समेत चार की मौत बेगूसराय। बिहार के बेगूसराय जिले में देर रात हुए भीषण सड़क हादसे में तीन थाना प्रभारी (SHO) और एक चालक की मौत हो गई। हादसा साहेबपुर कमाल थाना क्षेत्र के बखड्डा स्थित एनएच-31 पर हुआ, जहां तेज रफ्तार कार पीछे से एक ट्रक में जा टकराई। बेगूसराय एसपी मनीष कुमार ने बताया कि देर रात साहेबपुर कमाल थाना क्षेत्र के एनएच-31 पर एक भीषण सड़क हादसा हुआ, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई। मृतकों में मधेपुरा जिले में पदस्थापित तीन थाना प्रभारी और एक चालक शामिल हैं। सभी पटना से प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होकर लौट रहे थे, तभी उनकी कार ट्रक से टकरा गई। एसपी ने बताया कि हादसे के कारणों की जांच की जा रही है। पुलिस ने पोस्टमार्टम समेत सभी वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी कर ली हैं। दुर्घटना कैसे हुई, इसकी विस्तृत जांच जारी है। @DM_Begusarai | @bihar_police
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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Bihar News Point
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#NewsUpdates | बिहार के बेगूसराय में मधेपुरा पुलिस के 3 थानाध्यकक्ष सहित 4 लोगों की हुई सड़क हादसे में दर्दनाक मौत, बताया जा रहा है कि पटना से प्रशिक्षण लेकर एक ही गाड़ी पर सवार होकर सभी लौट रहे थे मधेपुरा… #BiharNews #Madhepura #Begusarai #Gaya #Patna
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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Press Trust of India
VIDEO | Bihar: 3 Station House Officers (SHOs) and a driver killed after car rams into a truck on NH-31 in Begusarai. Begusarai Superintendent of Police (SP) Manish Kumar says, "Four people lost their lives in an accident in Begusarai. Three police officers who were serving SHOs, and a driver were killed in the incident. The car carrying them rammed into a truck around 12.30 to 1 am while they were on their way to Madhepura. The investigation is underway and the bodies have been sent for a postmortem" (Source: Third Party) (Full video available on PTI Videos - ptivideos.com)
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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IANS
IANS@ians_india·
Begusarai, Bihar: Four people, including three serving police station in-charges from Madhepura district, were killed after a car collided with a truck on NH-31 in the Sahebpur Kamal area late at night. Police have launched an investigation into the accident.
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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FirstBiharJharkhand
FirstBiharJharkhand@firstbiharnews·
बिहार- तीन थाना प्रभारियों की मौत बेगूसराय: साहेबपुर कमाल थाना क्षेत्र के बखड्डा स्थित एनएच-31 पर देर रात हुए भीषण सड़क हादसे में मधेपुरा जिले के प्रभारियों और एक वाहन चालक की मौत हो गई। #Begusarai #RoadAccident #BiharPolice #BreakingNews #BiharNews #NH31 #SahabpurKamal #AccidentNews #PoliceOfficer #Madhhepura
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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With Love Bihar
With Love Bihar@WithLoveBihar·
A tragic road accident occurred in Begusarai, Bihar. A car collided with a roadside truck, killing four people, including three police officers.  Names of the policemen and the driver who died in the accident: 1. Rajan Paswan, Ratwara SHO, resident of Mohaniya Bhabua 2. Neeraj Kumar, resident of Bihuri Gaya, Station House Officer, Belari 3. Gyanendra Amarendra Arar, Station House Officer, Manihari, Katihar 4. Jyotish Kumar, Driver, Amarpatti, Madhepura
With Love Bihar tweet media
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
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ANI
ANI@ANI·
#WATCH | Begusarai, Bihar: On road accident on NH-31, SP Begusarai, Maneesh says, "... Around midnight, between and 1 a.m., a major accident occurred near the highway, claiming four lives, including three police officers and one driver. Returning from Patna to their postings, their car collided with a truck in a severe crash..."
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Ek Bhartiye Janta
Ek Bhartiye Janta@amanRverma·
यह महज़ एक सड़क दुर्घटना नहीं है, यह बिहार पुलिस के उस सिस्टम की कहानी है जो अपने ही प्यादों की बलि ले लेता है। इस दर्दनाक हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी पटना के में बैठकर फरमान जारी करने वाले आला अफसरों को लेनी होगी। यह मिसमैनेजमेंट का वो काला सच है, जिसे हेडलाइन में सिर्फ 'एक्सीडेंट' लिखकर दबा दिया गया। लेकिन आज कहानी के पर्दे के पीछे की उस कड़वी हकीकत को देखिए, जिससे हर कोई मुंह चुराता है। तारीख 10, समय: ढलती हुई शाम एक थानेदार (SHO) की ज़िंदगी क्या होती है? पूरा दिन फाइलों के बोझ, गश्त, कागज़ी कार्रवाई और हर 5 मिनट पर बजते फोन कॉल के बीच पिसना। रात के 11-12 बजे तक काम की थकान और फिर हफ्ते में 2-3 बार आधी रात को अचानक रेड पर निकल जाना। पुलिस की नौकरी में न शनिवार होता है, न रविवार। अगर किसी SHO को 1 हफ्ता की छुट्टी मिल जाए, तो समझिए उसने साक्षात भगवान को पा लिया। यह बात इसलिए जानना ज़रूरी है ताकि आम जनता एक बार पुलिस के जूते में अपना पैर डालकर उनका दर्द महसूस कर सके। खैर, इसी भागदौड़ के बीच शाम को अचानक एक फरमान (नोटिफिकेशन) आता है—"कल सुबह 9 बजे पटना में प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) है।" पूरे बिहार से कुछ चुनिंदा थानों के SHO को फेज-वाइज़ ट्रेनिंग के लिए रैंडमली चुन लिया गया था। नियम तो यह कहता है कि बुलावा आने के बाद इन अफसरों को रात भर आराम करने दिया जाता, ताकि सुबह वे तरोताजा होकर अपनी सरकारी गाड़ी से निकलते। लेकिन हकीकत? हकीकत का ताना-बाना तो मजबूरियों से बुना था। थानेदार और उनका ड्राइवर दोनों बुरी तरह थके हुए थे। किसी की दो दिन बाद क्राइम मीटिंग थी, तो किसी को पेंडिंग केस में चार्जशीट दाखिल करनी थी, तो किसी को रेड पर जाना था। सबसे बड़ी बात यह कि उनका थाना पटना से 150 से 300 किलोमीटर दूर था—कोई नेपाल बॉर्डर पर तैनात था, कोई बंगाल तो कोई झारखंड बॉर्डर पर। लेकिन हुक्म था कि सुबह 9 बजे पटना में हाजिरी लगनी चाहिए, वरना लेट होने पर सीनियर अफसरों का एक ही पेटेंट डायलॉग होता है—"टांग दिए जाओगे।" अब थानों की हालत देखिए। इतने संसाधन नहीं होते कि एक SHO अपनी पूरी गाड़ी और सरकारी ड्राइवर लेकर पटना चला जाए। अगर एक गाड़ी चली गई, तो पीछे से थाने का काम ठप हो जाएगा, एडिशनल SHO के काम में बाधा आएगी। इस संकट से निकलने के लिए पास के थानों के कप्तानों ने एक प्लान बनाया—"सब मिलकर एक ही गाड़ी से चलते हैं।" अब शायद आपको समझ आ गया होगा कि उस रात एक ही गाड़ी में 3-3 SHO क्या कर रहे थे। वे शौक से नहीं, बल्कि अपनी ड्यूटी और सिस्टम की लाचारी के कारण एक साथ सफर कर रहे थे। मंच पटना का, दर्द सरहद का जैसे-तैसे आंखें मलते हुए, नींद को मात देकर ये अफसर सुबह 9 बजे पटना पहुंच जाते हैं। मीटिंग की शुरुआत होती है एक लंबे, थकाऊ 2 घंटे के भाषण से। ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। यह अच्छी बात है, जनता की नज़र में पुलिस की जो छवि है उसे बदलना ही चाहिए। लेकिन क्या इस कड़कड़ाती ड्यूटी और लंबी यात्रा के लिए उन्हें कोई भत्ता या खाने का खर्च दिया जाता है? जी नहीं, एक धेला भी नहीं। एक पुलिस अफसर को केस इन्वेस्टिगेशन (IO) और थाने के रखरखाव के कई कामों में अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते हैं। ट्रांसपोर्टेशन से लेकर कोर्ट के चक्कर काटने और जज के रीडर के कमीशन तक का बोझ अक्सर उनके निजी बजट पर ही आता है। खैर, मुद्दे पर आते हैं। जब आला अफसरों को पता है कि लोग बिहार के दूर-दराज के कोनों से आ रहे हैं, तो मीटिंग सुबह 9 बजे रखने का कोई तुक नहीं था। लेकिन पटना के आलीशान दफ्तरों में बैठने वालों को क्या? उन्हें तो बस एक नोटिफिकेशन जारी कर देना है। भुगतेंगे तो वो परिवार जिनके बेटे या पति इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ गए। यह मैराथन मीटिंग दिन भर चली और खत्म कब हुई? रात के 7 बजे। जी हां, देर शाम 7 बजे। अब जो अफसर महीनों बाद बॉर्डर के किसी ग्रामीण इलाके से पटना आया है, वह सोचता है कि चलो आज शहर में एक अच्छा डिनर कर लिया जाए। इसी भागदौड़ और ट्रैफिक जाम के बीच रात के 7 से 9 बज जाते हैं। (साफ कर दें कि इस डिनर का हादसे से कोई सीधा संबंध नहीं है, यह बस एक इंसान की आम मानसिक स्थिति को दर्शाता है।) आखिरी सफर और सिस्टम का शिकार रात के करीब 10 बज रहे थे। पटना शहर के दम घोंटू जाम और भीड़भाड़ से निकलकर वह गाड़ी वापस बॉर्डर की तरफ दौड़ती है। किसी को 150 किलोमीटर दूर जाना था, तो किसी को 250 किलोमीटर। रात की खामोशी में हेडलाइट की रोशनी के सहारे थक चुकी आंखें रास्ता ढूंढ रही थीं। ड्राइवर और अफसर दोनों की पलकें भारी थीं, शरीर जवाब दे चुका था, लेकिन सुबह फिर से थाने की कमान संभालनी थी। इस अंधी दौड़ में कुछ खुशकिस्मत अफसर तो सही-सलामत अपने थानों तक पहुंच गए....लेकिन कुछ बदनसीब अफसर रास्ते में ही दम तोड़ गए। वे किसी गाड़ी से नहीं टकराए थे, वे इस संवेदनहीन और मिसमैनेज्ड सिस्टम का शिकार हो गए थे। यदि आगे ऐसे हादसों को रोकना है, तो इन बदलावों को तुरंत लागू करना होगा: 1. ऐसी किसी भी समीक्षा या प्रशिक्षण मीटिंग को राज्य स्तर के बजाय जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) पर ही आयोजित किया जाए। 2. आज भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को अपनी गवाही या बयान दर्ज कराने के लिए पुराने पोस्टेड जिलों के कोर्ट में चक्कर काटने पड़ते हैं। इस औपनिवेशिक व्यवस्था को तुरंत बंद कर इसे ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) में तब्दील किया जाए। 3. अगर पटना में कोई ट्रेनिंग बेहद ज़रूरी भी है, तो उसका समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक ही रखा जाए, ताकि दूर से आने वाले अफसरों को रात में सफर न करना पड़े। 4. पुलिस महकमा आज सबसे ज़्यादा मेंटल हेल्थ (मानसिक तनाव) के मुद्दों से जूझ रहा है। यहां वर्क-लाइफ बैलेंस की बात करना बेमानी है, क्योंकि उनकी ज़िंदगी में 'लाइफ' बची ही नहीं है। सरकार जो 1 महीने की एक्स्ट्रा सैलरी (13 महीने का वेतन) देती है, बेशक उसे वापस रख ले, लेकिन बदले में हफ्ते में कम से कम 1 दिन का ऑफ (साप्ताहिक छुट्टी) ज़रूर दे। और जो छुट्टियां उनका हक हैं, उन्हें मांगना किसी जंग जीतने जितना मुश्किल न बनाया जाए। सिस्टम में कमियां और परेशानियां बहुत हैं। उन्हें एक-एक करके सुधारिए, अफसरों के लिए नई परेशानियां खड़ी मत कीजिए। Disclaimer: इस कहानी में बयां की गई कुछ बातें और परिस्थितियां शत-प्रतिशत (100%) तथ्यपरक न होकर, पुलिसिंग के गहरे दर्द और मानसिक दबाव को समझाने के लिए रचनात्मक रूप से लिखी गई हैं। हालांकि, इस घटना और इसकी कड़वी हकीकत से जुड़े 90% तथ्य पूरी तरह सत्य और वास्तविक हैं। @TheNewspinch @BiharTakChannel @Live_Cities @news4nation @firstbiharnews @KashishBihar @NavBiharPatrika @thetruthin @thebiharmail @PatnaNow @1stIndiaNews @TNNavbharat @WithLoveBihar @ANI @news4nations @CNNnews18 @patna_press @TheStatesmanLtd @np_nationpress @zingabad @NEWSNCFB
Bihar Police@bihar_police

दिनांक 11/12 .06.2026 की रात्रि में हुई सड़क दुर्घटना में थानाध्यक्ष, अरार, पु०अ०नि० ज्ञानानन्द अमरेंद्र (गृह जिला-कटिहार), थानाध्यक्ष, बेलारी, पु०अ०नि० नीरज कुमार (गृह जिला-गयाजी) एवं थानाध्यक्ष, रतवारा, पु०अ०नि० साजन पासवान (गृह जिला-कैमूर) की आकस्मिक मृत्यु हो गई। (1/3)

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