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Ambuj
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Ambuj
@ambujbh
Ambivert || Omnipresent || Karyakarta || Devotee of Mahadev || Award Winning Ex-Accidental Journalist || Ex-ABVP || Ex-Media President , DUSU (2018-19)
India Katılım Ağustos 2014
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अहंकार इंसान को कहीं का नहीं छोड़ता, अहंकार मनुष्य को खत्म कर देता है।
#MamtaBanerjee
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बंगाल में जीत के पीछे एक गुमनाम चेहरे की भी बात हो जाए….
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पूर्व राष्ट्रपति स्व. प्रणब दा को 2018 में आरएसएस के नागपुर कार्यक्रम में जाने के लिए राज़ी करने के पीछे संघ के एक गुमनाम मगर धुरंधर प्रचारक हैं। नाम है- रामचंद्र पांडेय। बंगाल से आने वाले कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे प्रणव दा के नागपुर जाने की घटना ने बंगाली भद्रलोक में संघ और भाजपा के प्रति भरोसा भर दिया। बंगाल में बीजेपी की जीत के यूँ तो बहुत से सूत्रधार हैं। फ़्रंट पर कार्य करने वालों को दुनिया जानती है, किंतु पांडेय जी का नाम पहले भी गुमनाम था, आज भी गुमनाम है। मौजूदा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को मिर्जापुर में आरएसएस का जिला कार्यवाह बनाकर पहली बार संगठन सिस्टम में सक्रिय करने वाले रामचंद्र जी हैं। अब बात बंगाल में उनके योगदान की।
2016 विधानसभा चुनाव के बाद आरएसएस ने अपने इस धुरंधर प्रचारक का केंद्र कोलकाता बनाकर उन्हें पूरे राज्य में संगठन को चुस्त-दुरुस्त रखने की कमान सौंपी। यह रामचंद्र पांडेय थे, जिन्होंने सिलिगुड़ी से लेकर बर्दवान, आसनसोल तक, कोलकाता के गली-कूचों से लेकर मुर्शिदाबाद, मालदा तक आम लोगों में छिपे बीजेपी और संघ कार्यकर्ताओं की कड़ियों को जोड़ना शुरु किया। कांग्रेस, टीएमसी और लेफ्ट के उन लोगों से संपर्क साधा जो बंगाल की दुर्दशा से अपने संगठनों में अंसतुष्ट थे। टीएमसी में सबसे मुखर सुवेंदु अधिकारी से लेकर प्रणब दा के संपर्क-सूत्र मनोज कुमार तक रामचंद्र पांडेय ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का इस्तेमाल किया, और यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब दा को आरएसएस के नागपुर कार्यक्रम तक पहुंचा कर बंगाली भद्रलोक और कांग्रेस के काडर में आरएसएस और बीजेपी के प्रति हर तरह के भरोसे और आश्वस्ति से भर दिया। उसी समय भविष्य के बंगाल की इबारत वस्तुतः रामचंद्र पांडेय के संपर्कों ने रच दी थी।
यह सारा कार्य रामचंद्र पांडेय के संपर्क सूत्रों से आरएसएस के नागपुर केंद्र ने साकार कर दिखाया।
रामचंद्र पांडेय कोई साधारण नाम नहीं है। 1967 में जब मोदीजी ने प्रचारक जीवन शुरु किया, उसी समय रामचंद्र पांडेय ने उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के अपने गांव को अलविदा कह दिया। वह प्रो. राजेंद्र सिंह के संपर्क में आए और फिर आरएसएस के होकर रह गए। 1967 से 2000 तक रामचंद्र पांडेय ने 33 साल अपनी जवानी पूर्वी यूपी से लेकर अवध, बुंदेलखंड आदि इलाकों में आरएसएस को मजबूत करने में खपा दी। बीजेपी के अनेक संगठन महामंत्री रामचंद्र पांडेय के द्वारा प्रशिक्षित हैं।
रामचंद्र जी आज भी गुमनाम तरीके से रहते हैं। दो जोड़ी कपड़ों में वह अपना साल गुजार देते हैं। उनकी साधारण चप्पल और निरंतर चलते रहने की उनकी इच्छाशक्ति ने उन्हें आरएसएस के सभी प्रचारकों में सबसे जमीनी स्तर पर खड़ा किया है। कोलकाता का कोई गली-कूचा नहीं, किसी आरएसएस और पुराने बीजेपी कार्यकर्ता का घर नहीं, जहां रामचंद्र पांडेय ने प्रवास न किया और बैठकी नहीं लगाई। उनके साथ इस कार्य में आरएसएस के युवा प्रचारकों की पूरी टोली दिन-रात संपर्क में जुटी रही। आरएसएस की घोषवादकों की टीम के वह पूरे देश के मार्गदर्शक संचारक हैं। और तो और, उत्तर प्रदेश के अवध, गोरखपुर, काशी, बुंदेलखंड के इलाकों में अधिकांश आरएसएस कार्यकर्ताओं के निर्माण में यदि सबसे ज्यादा सक्रिय भूमिका किसी ने निभाई तो 1967 से 2000 के मध्य रामचंद्र पांडेय ने निभाई।
सूत्र बताते हैं कि बीजेपी में नेताओं के चयन से लेकर टिकट बंटवारे तक में युवाओं को चुन चुनकर रामचंद्र पांडेय ने आगे किया और केंद्रीय नेतृत्व को सही सूचनाएं दीं। बीते 10 साल में रामचंद्र पांडेय ने पश्चिम बंगाल की जमीन के चप्पे चप्पे को छान मारा। बदलाव की बयार ऐसे ही आरएसएस कार्यकर्ताओं के बूते भी बीजेपी ने बंगाल में खडी की है।

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𝐅𝐫𝐨𝐦 𝐭𝐡𝐞 𝐡𝐞𝐚𝐫𝐭𝐥𝐚𝐧𝐝 𝐭𝐨 𝐁𝐞𝐧𝐠𝐚𝐥, 𝐭𝐡𝐞 𝐦𝐚𝐩 𝐢𝐬𝐧’𝐭 𝐣𝐮𝐬𝐭 𝐞𝐱𝐩𝐚𝐧𝐝𝐢𝐧𝐠, 𝐢𝐭’𝐬 𝐭𝐡𝐞 𝐛𝐞𝐥𝐢𝐞𝐟 𝐨𝐟 𝐚 𝐧𝐚𝐭𝐢𝐨𝐧 𝐝𝐞𝐭𝐞𝐫𝐦𝐢𝐧𝐞𝐝 𝐭𝐨 𝐩𝐫𝐨𝐠𝐫𝐞𝐬𝐬.
North to Northeast, the colour shift is no longer subtle. Bengal is simply the latest chapter in a story that’s already well underway.
𝐁𝐮𝐢𝐥𝐝𝐢𝐧𝐠 𝐚 #𝐕𝐢𝐤𝐬𝐢𝐭𝐁𝐡𝐚𝐫𝐚𝐭 𝐛𝐲 𝟐𝟎𝟒𝟕, 𝐭𝐨𝐠𝐞𝐭𝐡𝐞𝐫. 📷📷

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West Bengal Election : Result is about to announce in the coming morning...
The BJP will win more than 175 seats.
Mamata Banerjee will lose her Bhabanipur seat by a margin of over 8,000 votes.
Suvendu Adhikari will become the new Chief Minister of West Bengal.
POV : West Bengal will become the new Gujarat.
Jai Maa Bhawani
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आंटी @MahuaMoitra जी से छोटा सा सवाल क्या पूछ लिया, वो तो ब्लॉक करके भाग गई?🤭🤔
लगता है सवाल ज़्यादा कड़वा लग गया?
@DripsAjaypal जी ने ज़मीन पर आप निष्पक्ष होकर अपनी ड्यूटी करते रहिए और गुंडों को अच्छे से सबक़ सिखाइए, सोशल मीडिया पर अफ़वाह फलाने वाले अफवाहबाज़ों/ गुंडों से हम निपट लेंगे !


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यहां हुई थी संघ की स्थापना
27 अप्रैल 2026. एक कार्यक्रम के लिए नागपुर आया था. यहां पूजनीय डॉ हेडगेवार का घर है. सोचा, इस #तीर्थ के दर्शन करूं।
ऊपर का पहला चित्र देखें. इसी कक्ष में 1925 की विजयदशमी पर #संघ स्थापना हुई थी।
पहली मंजिल की बालकनी पर आ खड़े हुए। काफी ऊंची है। एक बार डाक्टर जी व उनके बड़े भाई यहां खड़े थे. देखा, बाहर गली में एक मुसलमान #हिंदू भाई को पीट रहा था। गुस्से में भरे दोनों भाइयों ने बालकनी से ही छलांग लगा दी और उस दुष्ट को अच्छा पाठ पढ़ाया।
रसोई में एक पटड़े पर बैठकर वह भोजन करते थे। वहां से बाहर का सब दीखता था। एक दिन वह भोजन के लिए बैठे ही थे कि एक अतिथि आते दीखे। घर में एक ही के लिए भोजन बचा था।
डॉक्टर साहब ने स्नेह से अतिथि को बैठाया और कहा कि मैने अभी भोजन किया है, आप करें। उस रात्रि डॉक्टर साहब आनंद से भूखे ही सोए।
घर के पीछे एक बड़ा कुआं है। गहरा है। एक समय उसकी सफाई आवश्यक हो गई थी। महंगा काम था. एक पूरी रात्रि लगाकर दोनों भाइयों ने स्वयं ही सारा पानी उलीच कर कुआं साफ कर लिया.
मन की आंखों से कितने ही दृश्य देख लिए।
डॉक्टर साहब की स्मृति को प्रणाम!
@RSSorg @ivskdelhi @VHPDigital @BajrangDalOrg @eHinduVishwa @epanchjanya @eOrganiser


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कहानी ख़त्म हुई….!
“मैं ओला चलाता हूँ।ज़्यादातर नाइट शिफ्ट करता हूँ। पिछले हफ्ते रात ग्यारह बजे एक बुज़ुर्ग सज्जन को उठाया। सफ़ेद पंजाबी धोती, आँखों में थकान-लेकिन आवाज़ में अजीब-सी दृढ़ता।
गाड़ी में बैठते ही बोले,
“आज रात मुझे पाँच जगहों पर ले चलना होगा । मैं तुम्हें 5000 रुपये दूँगा। नकद, लेकिन अंत तक कारण मत पूंछना।”
यह कहकर एक कागज़ आगे बढ़ाया। उस पर पाँच पते लिखे थे ।
पहला पड़ाव-
दक्षिण कोलकाता का एक पुराना घर।
मैंने गाड़ी रोकी। वे उतरे नहीं। सिर्फ़ खिड़की का शीशा नीचे करके देखते रहे। दस मिनट तक।
आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे, लेकिन कोई आवाज़ नहीं।
“चलो… अगला।”
दूसरा पड़ाव-
एक प्राथमिक विद्यालय। गेट बंद। अंदर अँधेरा मैदान।
वे उतरकर धीरे-धीरे झूले तक गए। एक झूले पर बैठकर हल्के-हल्के झूलने लगे।
बीस मिनट बाद लौटे। बोले -
“यहीं पढ़ाता था। तैंतालीस साल। ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय यही था।”
तीसरा पड़ाव-
एक छोटा पुराना कॉफ़ी हाउस।
अंदर जाकर एक कप चाय मँगाई। कोने की मेज़ पर अकेले बैठे रहे। चाय को छुआ तक नहीं। बस चारों ओर देखते रहे।
पंद्रह मिनट बाद लौटकर हल्के से मुस्कुराए -
“यहीं, मेरी और मिताली (उनकी पत्नी) की पहली मुलाक़ात हुई थी। 1969 में।”
चौथा पड़ाव-
निमतला श्मशान घाट।
वे उतरे। चिताभस्म के पास एक फ़लक के सामने खड़े होकर धीमे-धीमे कुछ बोलते रहे। मैं सुन नहीं पाया।
आधे घंटे बाद लौटे। आँखें लाल थीं।
“आज तीन साल हो गए उसे गए।”
पाँचवाँ पड़ाव-
एक बड़ा सरकारी अस्पताल।
गाड़ी पार्क करने को कहा। फिर मेरी ओर देखा -
“अब कारण बताता हूँ। मुझे चौथे स्टेज का कैंसर है। डॉक्टर ने कहा है- कुछ हफ़्ते…शायद कुछ दिन। आज मैं अपनी पूरी ज़िंदगी आख़िरी बार देख लेना चाहता था।”
मैं स्टीयरिंग पर सिर रखकर रोने लगा।
उन्होंने कहा—
“वो घर—जहाँ बच्चों को बड़ा किया।
वो स्कूल—जहाँ अपना उद्देश्य पाया।
वो कॉफ़ी हाउस—जहाँ प्यार हुआ।
वो श्मशान—जहाँ आख़िरी विदाई दी।
और ये अस्पताल—जहाँ आज भर्ती होऊँगा। अब घर वापसी नहीं होगी।”
उन्होंने मेरे हाथ में 5000/- रुपये रख दिए।
“धन्यवाद, तुमने मुझे मेरी ज़िंदगी एक बार फिर घुमा दी। मेरे आख़िरी अजनबी इंसान...जिसने मेरे साथ कोमल व्यवहार किया।”
मैंने कहा-
“नहीं, ये मैं नहीं ले सकता ।”
वे बोले-
“लो, देने के लिए मेरा कोई नहीं। बच्चों ने इतनी दूरी बना ली है कि अब वो बात नहीं करते। यार-दोस्त कोई बचा नहीं, एक-एक करके सब विदा हो गये। तुमने तीन घंटे दिए—तीन घंटे की इंसानियत। उसकी कीमत पैसे से ज़्यादा है।”
छोटा सूटकेस लेकर वे अंदर चले गए।
अगले दिन मैं अस्पताल गया। पूछा-“श्री अनिरुद्ध मुखर्जी। केबिन 412”।
फूल लेकर अंदर गया। मुझे देखकर मुस्कुराए -
“तुम आए?”
“आपको ऐसे छोड़ नहीं पाया।”
दो घंटे बातें हुईं—मिताली देवी की, उनके छात्रों की, उनके रूठे हुए बच्चों की।
मैं रोज़ जाने लगा। चाय ले जाता। अख़बार पढ़कर सुनाता। कभी चुपचाप बैठा रहता।
एक दिन बोले -
“सोचता था अकेला मरूँगा। लेकिन तुम हो। आख़री वक़्त में एक अजनबी, परिवार बन गया। तुम्हें मेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद।”
मैंने उनका हांथ पकड़ा :
“आप अकेले नहीं हैं।”
*मंगलवार भोर 3 बजकर 17 मिनट पर वे स्वर्ग चले गए।*
मैं उनका हांथ पकड़े बैठा था।
आख़िरी शब्द थे :
“सबसे कहना… अजनबियों की ओर देखना। सचमुच देखना। हम सब कहीं जा रहे हैं—कोई तेज़, कोई धीरे। जाते हुए राह में दया करना। तुमने की। तुमने मेरे आख़िरी दिनों को जीने लायक बना दिया।”
मॉनिटर की आवाज़ सीधी रेखा बन गई।
श्मशान में उनके दाह-संस्कार के समय थे—कुल छः लोग -
मैं,
तीन नर्स,
एक वकील,
और एक पूर्व छात्र।
तैंतालीस साल की शिक्षकी।
बावन साल का दांपत्य।
इक्यासी साल की ज़िंदगी।
छह लोग।
मैंने कहा—
“अनिरुद्ध बाबू ने मुझे सिखाया-
हर अजनबी किसी का पूरा संसार होता है।
हर यात्री एक कहानी है।
हर इंसान जी रहा है, मर रहा है, इंतज़ार कर रहा है—कोई उसे देखे।
उन्होंने मुझे 5000/- रुपये दिए थे जीवन की सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए।
लेकिन जो शिक्षा दी—उसकी कीमत पैसे से कहीं ज़्यादा है।
"मानवता कोई अतिरिक्त चीज़ नहीं। यही सब कुछ है।”
आज भी वो 5000/- रुपये मेरे ग्लव बॉक्स में रखे हैं। खर्च नहीं किए।
क्योंकि हर यात्री शायद अपनी आख़िरी यात्रा पर हो। हर अजनबी शायद आख़िरी विदाई दे रहा हो।
इसलिए अब मैं अलग तरह से गाड़ी चलाता हूँ।
पूंछता हूँ। सुनता हूँ। लोगों को देखता हूँ।
क्योंकि एक बुज़ुर्ग शिक्षक ने एक कोमल रात माँगी थी-और एक अजनबी रुक गया था।
निशब्द क्षण, अनकहा सत्य।
: अज्ञात
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My panipuri wala disappeared 10 days ago. No cart, no sign. I used to go there almost daily, so it felt strange.
Today I found his number from old GPay payments and called him.
He said he sold his entire cart because his wife was admitted to the hospital.
Everything gone. No income. No backup.
Then he said one line, Sir I need a job.
That stayed with me.
I met him. Instead of help, we planned a business.
From a roadside cart to a proper shop.
Prime location. 15k rent. 50k deposit.
He agreed to work 8 hours, 3 pm to 11 pm, for 20k salary.
Then he said something most people won’t understand.
This will do 5k daily. Around 1.5 lakh a month. You can save 60 to 70k.
A man who lost everything is still thinking about growth.
While most people with everything keep making excuses.
I am investing 1.5 lakh into this.
Not sympathy. Just backing mindset.
Let’s see if this gamble proves a point.
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Ground feedback is much more bullish than even the most optimistic pre poll estimates. In Purulia, which neighbours my Dhanbad LS, TMC seems to be struggling to even win one seat. Feedback from local journalists very active and connected on ground suggest BJP is also headed to landslide in Jalpaiguri, Darjeeling, Kalimpong, Dinajpur, Bardhaman, Birbhum and Jhargram.
Mayur Shekhar Jha@mayur_jha
PROCHOND PORIBORTAN
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"जाओ, जाकर मोदी से कह देना!"
और उस महिला ने मोदी से आतंकियों की बात कह दी!
उसके बाद मोदी ने पाकिस्तान और आतंकियों से कैसे बदला लिया था ये किसी से छिपा नहीं है!
पहलगाम हमले का आज एक साल पूरा हो रहा है, वही हमला जिसमें आतंकियों ने,
किसी की जाति नहीं पूछी,
आतंकियों ने किसी की भाषा नहीं पूछी,
आतंकियों ने किसी का राज्य नहीं पूछा,
आतंकियों ने कुछ पूछा तो धर्म पूछा और हिन्दू सुनते ही गोली मार दी!
पहलगाम हमले में अपनी जान गंवाने वाले सभी नागरिकों को पाञ्चजन्य नमन करता है!

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ममता के गढ़ से बगावती आवाज!
ममता बनर्जी के पड़ोसी ने बताया सच!
पश्चिम बंगाल चुनाव के बीच ममता बनर्जी के गढ़ भवानीपुर से एक ऐसी आवाज सामने आई है, जिसने सियासी हलचल तेज कर दी है।
विदेश में सफल करियर छोड़कर बंगाल लौटे उनके पड़ोसी ने न सिर्फ बंगाल की मौजूदा स्थिति पर सवाल उठाए, बल्कि ममता सरकार को लेकर अपनी बेबाक राय भी रखी।
क्या है वो वजह, जिसने उन्हें वापस बंगाल खींचा?
देखिए लंदन से लौटे डॉ. रजत शुभ्र बनर्जी का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू :
youtube.com/watch?v=n8_FNC…

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आप जानते हैं कि 24 नवंबर, 2005 को राज्य में पहली बार एन०डी०ए० सरकार बनी थी। तब से राज्य में कानून का राज है और हम लगातार विकास के काम में लगे हुए हैं। सरकार ने शुरू से ही सभी तबकों का विकास किया है चाहे हिंदू हो, मुस्लिम हो, अपर कास्ट हो, पिछड़ा हो, अति पिछड़ा हो, दलित हो, महादलित हो- सभी के लिए काम किया गया है। हर क्षेत्र में काम हुआ है चाहे शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, सड़क हो, बिजली हो, कृषि हो। महिलाओं एवं युवाओं के लिए भी बहुत काम किया गया है।
इन दिनों काम को और आगे बढ़ाया गया है। अगले पाँच वर्षों यानि 2025 से 2030 के लिए 7 निश्चय-3 का गठन किया गया है। इससे और ज्यादा काम होगा जिससे बिहार काफी आगे बढ़ेगा। बिहार के विकास में केन्द्र का भी पूरा सहयोग मिल रहा है। इसके लिए आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का नमन करते हैं। बिहार और तेजी से विकसित होगा और देश के टॉप राज्यों में शामिल हो जाएगा तथा देश की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
हमने बिहार के लोगों के लिए बहुत काम किया है। इतने दिनों से हमने लगातार लोगों की सेवा की है। हमने तय किया था कि अब मुख्यमंत्री का पद छोड़ देंगे और इसलिए आज मंत्रिमंडल की बैठक के बाद माननीय राज्यपाल से मिलकर उन्हें इस्तीफा सौंप दिया। अब नई सरकार यहाँ का काम देखेगी। नई सरकार को मेरा पूरा सहयोग एवं मार्गदर्शन रहेगा। आगे भी बहुत अच्छा काम होगा तथा बिहार बहुत आगे बढ़ेगा।
सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूँ तथा शुभकामनाएं देता हूँ।
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भीमराव आम्बेडकर की जयंती आज, जानें डॉ. आम्बेडकर को !
बाबासाहेब आंबेडकर का जीवन कोई सहज यात्रा नहीं था, बल्कि संघर्षों, अपमानों और लगातार मिलती चुनौतियों के बीच आगे बढ़ने की एक वास्तविक कहानी है।
हर अनुभव ने उनकी सोच और दृष्टि को और स्पष्ट किया, उनके विचारों को लेकर मतभेद और विवाद भी रहे पर उनका जीवन इन्हीं बहसों, अनुभवों और संघर्षों के बीच आकार लेता गया।
आइए, आंबेडकर जयंती के अवसर पर उनके जीवन और विचारों को तथ्यों के आधार पर समझने का प्रयास करें।




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पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में हूं, चुनाव यात्रा के दौरान दुर्गापुर आना हुआ है। सुंदर और व्यवस्थित शहर है। उद्योग-धंधे भी अच्छे हैं, उच्च शिक्षण संस्थानों की भरमार है, लेकिन उद्योग हो या शिक्षण संस्थान सब केंद्र सरकार वाले हैं, राज्य सरकार से संबंधित संस्थानों की स्थिति खस्ताहाल ही दिखी। शहर में बहुत पोटेंशियल है, बहुत अच्छा किया जा सकता है, बशर्ते निष्पक्ष मन वाला अच्छा नेतृत्व हो।
तस्वीर दुर्गापुर के इस्कॉन मंदिर की है। मंदिर में दर्शन के पश्चात दोपहर का भोजन भी करने का अवसर मिला, शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक आहार। इस दौरान मंदिर में कुछ लोगों को पंक्ति में खड़ा होकर भोजन लेते देखा, पता किया तो एक प्रबंधक ने बताया कि मंदिर में निर्धन, असहायों के लिए निःशुल्क भोजन की व्यवस्था है, लोग आते हैं पंक्ति में खड़े होकर भोजन लेते हैं, नीचे बिछी दरी पर बैठकर खाते हैं और अपने काम पर चले जाते हैं।
कई बार बड़े मंदिर-मठों के बारे में एक नकारात्मक विमर्श प्रसारित किया जाता है कि मंदिर लूट का अड्डा है, मंदिर बनाने से क्या हो जाएगा, लेकिन जो मुझे यहां दिखा उस से साफ पता चलता है कि मंदिर आस्था का केंद्र तो है ही, इसके अलावे यह एक छोटी अर्थव्यवस्था का केंद्र भी है जहां किसी की जाति और पहचान पूछे बगैर हर जरूरतमंद की मदद की जाती है। कई लोग दुकानों के माध्यम से रोजगार पाते हैं तो कई लोग एक वक्त की रोटी पाते हैं। ये बेहद सुकून देने वाला अनुभव था।
मंदिर पर सवाल करने वालों से जरा पूछिये कि "मस्जिदों में कितने भूखों को प्रतिदिन भोजन दिया जाता है?"



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