Ashutosh Bhardwaj

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Ashutosh Bhardwaj

Ashutosh Bhardwaj

@ashubh

Writes.

Katılım Ekim 2009
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Ashutosh Bhardwaj
Ashutosh Bhardwaj@ashubh·
In 2013, I ran away from work to listen to him speak. In 2025, when the world tunes into the master, a forgotten chapter of my life returns to me. László Krasznahorkai once ignited my dreams and, perhaps, also lent them the sense of an ending. thewire.in/culture/laszlo…
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Ashutosh Bhardwaj
Ashutosh Bhardwaj@ashubh·
@himganj153 Nirmal Verma's Ek Chithda Sukh, in English A Rag Called Happiness. It captures the disillusionment of the 1970s. Melancholic youth and their restless quest.
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Himanish Ganjoo
Himanish Ganjoo@himganj153·
My Delhi book list. Most books on this are about Delhi / exploring Delhi history. Would love to add more titles, academic, non-academic, literature etc.
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Harsh Mander
Harsh Mander@harsh_mander·
My father Har Mander Singh would have turned 100 @Ram_Guha recalls Nehru’s bid to open India’s frontiers humanely by a chosen cadre My father was privileged to be part of this team Privileged to bring Dalai Lama to safety in 1959 Privileged to help build a humane inclusive nation
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Ashutosh Bhardwaj
Ashutosh Bhardwaj@ashubh·
Carlo Ginzburg. 15 April 1939 - 17 June 2026.
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Deutsch
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Alok Shukla
Alok Shukla@alokshuklacg·
मोदी सरकार ने राजस्थान के नाम पर अदानी के पॉवर प्लांटों तक कोयला पहुचाने के लिए हसदेव अरण्य में जिस केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक की वन स्वीकृति दी है उसके समृद्ध वन क्षेत्र को इस तस्वीर से समझिए। 1762 हेक्टेयर वन क्षेत्र को कोयला खदान में बदलने के लिए 7 लाख से अधिक प्राकृतिक साल जंगल के पेड़ो को काटा जाएगा । पहले से संचालित दो खदानों में इसी तरह का जैव विविधता से समृद्ध 10,500 एकड़ समृद्ध जंगल जमीन का विनाश किया जा चुका है । अदानी मोदी सरकार की मदद से सिर्फ़ PSU, निजी कंपनियों को ही एनएचआई हथिया रहा है बल्कि इस देश के लोगों की सांसे भी छीन रहा है।
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Namdev Katkar
Namdev Katkar@namdevwrites·
.@ashubh Sir, I read your book in just two days. Thank you for writing it. I first came to know about this book through the Marathi translation of Narendra’s ‘Abujhmad’ book. Thanks once again!
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English
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Ashutosh Bhardwaj
Ashutosh Bhardwaj@ashubh·
One of the finest Hindi poetry collections, listed in the New Yorker Best Books of 2026 So far. Translated by Rahul Soni. चाहता तो बच सकता था  मगर कैसे बच सकता था  जो बचेगा  कैसे रचेगा...
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Soumya Pillai
Soumya Pillai@soumya_pillai·
Exclusive: The Pak space prog, which has been practically defunct for decades, suddenly revived lst yr, conducting 6 launches in jst 16 months. Bt these launches aren't innocent: All the sats r placed in a particular orbit ideal for spying over Ind (cont) theprint.in/ground-reports…
English
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Ashutosh Bhardwaj
Ashutosh Bhardwaj@ashubh·
@mkatju It may not have a long life, but it's a genuine articulation by angry youth. By calling it a gimmick and hoax, you are dishonoring them.
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Ashutosh Bhardwaj
Ashutosh Bhardwaj@ashubh·
कांग्रेस का इकोसिस्टम कॉकरोच आन्दोलन को बदनाम करने पर तुला है. एकदम स्पष्ट है.
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Hridayesh Joshi
Hridayesh Joshi@hridayeshjoshi·
कांग्रेस के शीर्षतम नेता को ख़तरा किसी बुद्धिजीवी के लेख से नहीं, बल्कि उनकी पार्टी के कुछ "हितैषियों और समर्थकों" से है। आख़िर सहिष्णुता की असली कसौटी क्या है? सहिष्णुता का अर्थ केवल उन विचारों को सुनना नहीं है जिनसे हम सहमत हों। उसकी वास्तविक परीक्षा तब होती है जब हमारे सामने ऐसे विचार आयें जो हमारी मान्यताओं, राजनीतिक निष्ठाओं या पूर्वग्रहों को चुनौती दें। यदि हम स्वयं को उदार, लोकतांत्रिक और सहिष्णु मानते हैं, तो हमें उन लोगों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना होगा जिनसे हमारा गहरा मतभेद हो। इसी संदर्भ में राहुल गांधी पर एक लेख की प्रतिक्रिया शायद उस लेख से भी अधिक महत्वपूर्ण और विचारणीय है। राहुल गांधी भले ही राजनीतिक रूप से सफल न रहे हों लेकिन उन्होंने हमेशा वैचारिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से दृढ़ता दिखाई है। उन पर दक्षिणपंथी विरोधियों ने ही नहीं बल्कि वामपंथी और लिबरल बुद्धिजीवियों के साथ सोशल मीडिया ट्रोल्स ने भी लगातार हमला किया है। गांधी परिवार के आलोचक रहे लेखक राम गुहा दशकों से नरेंद्र मोदी और भाजपा के भी सबसे मुखर आलोचकों में रहे हैं। उन्होंने अपने लेख में भी अपनी आलोचनात्मक दृष्टि को दोहराया है। ऐसे व्यक्ति को केवल इसलिए किसी का "एजेंट", "भक्त" या किसी खेमे का प्रतिनिधि बताना कि उसने एक असुविधाजनक या अप्रिय राय व्यक्त की है, न तो न्यायसंगत है और न ही बौद्धिक ईमानदारी का परिचायक। मतभेद होना स्वाभाविक है। किसी भी लोकतंत्र और जीवंत समाज में विचारों का टकराव आवश्यक है। लेकिन जो बात चिंताजनक है, वह मतभेद नहीं बल्कि उसकी अभिव्यक्ति का स्वरूप है। एक सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उन पर व्यक्तिगत हमले, अपमानजनक टिप्पणियां और लगातार चल रहा ऑनलाइन अभियान यह दर्शाता है कि हम विचारों का सामना करने के बजाय व्यक्तियों को निशाना बनाने लगे हैं। इसी संदर्भ में शीतल पी. सिंह @Sheeetalps की प्रतिक्रिया उल्लेखनीय है। उन्होंने गुहा से असहमति जताई, लेकिन तथ्यों, तर्कों और सम्मानजनक भाषा के साथ। उन्होंने व्यक्ति पर नहीं, विचार पर प्रहार किया। गुहा के लेख और उनके तर्क में ज़ाहिर तौर पर कमियां हैं और लोकतांत्रिक विमर्श का यही आदर्श स्वरूप होना चाहिए कि उन कमियों को रेखांकित किया जाये। किसी तर्क का प्रभावी उत्तर देने के लिए अपशब्दों की नहीं, बेहतर लॉजिक और तथ्यों की आवश्यकता होती है। कांग्रेस के गौरव पांधी @GauravPandhi ( जिन्होंने गुहा के लेख का विस्तृत जवाब सबसे पहले दिया) की भाषा अधिक आक्रामक लेकिन पूरी तरह स्वीकार्य है। उस लेख को भी सभ्य समाज में एक वाज़िब प्रतिक्रिया और जवाब की तरह देखा जायेगा। मूल प्रश्न यह नहीं है कि आपकी विचारधारा या विश्वास से सहमत होने वाला कोई बुद्धिजीवी सही है या गलत। किसी भी लेखक, इतिहासकार या राजनीतिक विरोधी या सहयोगी के विचारों से सहमति-असहमति होती रहेगी। असली प्रश्न यह है कि क्या हम अब भी विचारों पर बहस करने में सक्षम हैं, या हर असहमति को विश्वासघात मानकर व्यक्ति की प्रतिष्ठा को निशाना बनाने लगेंगे? सच तो यह है कि , राहुल गांधी की राजनीतिक संभावनाओं को किसी चीज़ से ख़तरा है तो वह वास्तविक खतरा एक लेख या आलोचना से तो कतई नहीं है। लोकतंत्र में आलोचना कोई खतरा नहीं होती। वास्तविक खतरा तब पैदा होता है जब समर्थक असुविधाजनक तथ्यों को देखने से इनकार कर दें, हर आलोचना को शत्रुता समझें और हर असहमत आवाज़ को खारिज कर दें। Echo Chamber भावनात्मक संतोष तो दे सकते हैं, लेकिन वे राजनीतिक सफलता या आत्ममंथन का विकल्प नहीं बन सकते। अक्सर वोल्टेयर से जोड़ा जाने वाला प्रसिद्ध विचार—"मैं आपकी बात से असहमत हूँ, लेकिन उसे कहने के आपके अधिकार की रक्षा आखिरी सांस तक करूँगा" (I disapprove of what you say, but I will defend to the death your right to say it) — सहिष्णुता की इसी भावना को व्यक्त करता है। यह बात वास्तव में वोल्टेयर ने कही या नहीं इसे लेकर भी इतिहासकारों में विवाद है लेकिन इतना तो कह ही सकते हैं कि लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है। आत्मविश्वासी विचारधाराएं और राजनीतिक आंदोलन आलोचना से नहीं डरते। वे जानते हैं कि उनके विचार जांच-परख की कसौटी पर खरे उतर सकते हैं। असुरक्षित आंदोलन हर असहमति को विद्रोह और हर प्रश्न को हमला मान लेते हैं।
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Prabhat Ranjan
Prabhat Ranjan@prabhatranjann·
हमारे समय में पानी का संकट दरअसल पानी का संकट नहीं बल्कि उसकी ‘स्मृति के खो जाने का संकट है। जिस समाज में तालाब और बावड़ियाँ केवल इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का नमूना थीं, वहाँ आज पानी बोतलों में बंद पैसों से मिलता है। विश्व पर्यावरण दिवस के बहाने कुमारी रोहिणी का यह लेख हमें विकास की अंधी दौड़ के बीच दो पल ठहरकर अपनी जड़ों की ओर देखने का न्योता देता है। पानी पर अनुपम मिश्र के काम और समकालीन कवियों की लिखी कविताओं के विमर्श के साथ यह लेख पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच एक ज़रूरी संवाद की तरह दिखाई पड़ता है। – मॉडरेटर =========================================== पानी की स्मृति और भविष्य की प्यास कभी-कभी लगता है कि हमारे समय का सबसे बड़ा संकट पानी का संकट नहीं, दरअसल स्मृति का संकट है। आधुनिकता के इस कंक्रीट समय में हमारे मनुष्य ने पानी से अपना रिश्ता बहुत छोटा और पेशेवर कर लिया है। हम सुबह उठकर नल खोलते हैं और पानी मिल जाता है। प्यास लगती है, तो जेब से कुछ सिक्के निकालकर या UPI पेमेंट करके प्लास्टिक की बोतलों में बंद पानी खरीद लेते हैं। बहुत हुआ तो एक फोन कॉल पर टैंकर हमारे दरवाजे पर आकर खड़ा हो जाता है। हमारे लिए पानी अब एक ‘सर्विस’ है, एक सुविधा, बाजार में बिकने वाली एक चीज़। लेकिन वास्तव में पानी की भूमिका और महत्ता को जानने के लिए इतिहास के पन्नों को बहुत पीछे तक पलटने की जरूरत नहीं है। कुछ दशक पहले तक पानी के साथ हमारा रिश्ता इतना मशीनी नहीं था। वह सीधा, आत्मीय और बेहद जीवंत था। तब किसी गांव का तालाब सूख जाना केवल जल संकट नहीं होता था, उसे पूरे समुदाय की चेतना पर लगे एक गहरे आघात की तरह देखा जाता था। हर साल जब जून का महीना आता है, तो वैश्विक विमर्शों की सुगबुगाहट के बीच हम ‘पर्यावरण दिवस’ की रस्म अदायगी करने लगते हैं। हम पेड़ लगाने के कुछ त्वरित संकल्प लेते हैं, प्लास्टिक को ना कहने की सामूहिक कसमें खाते हैं और एयर-कंडीशनर कमरों में बैठकर ‘क्लाइमेट चेंज’ की वैश्विक चिंताओं पर अकादमिक बहसें करते हैं। jankipul.com/the-memory-of-…
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Abir Dasgupta
Abir Dasgupta@AbirDasgupta101·
All are invited to join at the Press Club, Kolkata, on Friday the 12th of June, to remember my father Probal Dasgupta, who passed away suddenly on the night 1 June.
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Ashutosh Bhardwaj
Ashutosh Bhardwaj@ashubh·
2011: My first yr of reporting, walked with him on Noida-Aligarh padyatra - returned unimpressed. 2013: Saw him abandoning the Cgarh Cong after Naxals killed the state leadership. 2020: Published this --- Rahul G 'lacks the CV' to lead a national party. theprint.in/opinion/hathra…
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Dhanya Rajendran
Dhanya Rajendran@dhanyarajendran·
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