परिव्राजक

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@jiwan_sameer

I hate politics. विचरण मन का आचरण तन का,कल हों न हों.श्रीकृष्ण का दीवाना भावनाओं का पथिक- पहाड़ी! यादों के गलियारे से!!रमता जोगी!मीडिया में झांकें! रिपोस्ट!

विलीन- अल्मोडा उत्तराखण्ड Katılım Ocak 2017
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परिव्राजक@jiwan_sameer·
बह चली बयार लुट न जाये सिंगार उड़ा न ले कहीं बेताब वो तैयार बांध लो आंचल कहीं छूट न जाये शीशे की दीवार चलना हुआ दुश्वार संभलना जरा गिरे हो हर बार थाम लो जिगर कहीं टूट न जाय हर गली में तैयार बैठे हैं चितचोर बिखरे हैं इधर तार-तार बेजार बेदर्द जमाना है यह कहीं लूट न जाय...
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Darshana Kanani
Darshana Kanani@4kanani·
कुछ अधूरी सी बातें, कुछ अनकहे लफ़्ज़, वक़्त के साथ भी सब कुछ साथ निभाता। भूलना चाहूँ तो यादें थाम लेती हैं, छोड़ना चाहूँ तो दिल फिर वहीं लौट जाता। ये कैसा रिश्ता है, जो नाम भी नहीं माँगता, फिर भी हर दर्द में बस तुम्हें ही बुलाता। ~Ink By Darsh_
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बाधाएं तोड़ो लक्ष्य की ओर बढ़ो भाग्य लिख दो मशालें जली क्रांति का बिगुल बजा जागो फिर से तोड़ो अंधेरा सूर्य को उकसाओ नया सवेरा उठो सारथी रक्त में उबाल हो जीतो समर नींद से जागो सक्रिय है मंशा भी विजयी भव #G1 #छोटा_दरवाज़ा
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Arpita Kumar
Arpita Kumar@Arpitayadav02·
हर रिश्ते में मुनाफ़ा मत खोजिए, कुछ रिश्ते सुकून भी देते हैं...!
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हृदय-आंगन की मृदल मृदा में जो बीज तुमने बोये थे, स्मृति-सिक्त उन हरित पल्लवों पर अब पुष्प मधुर मुस्काये हैं। यह रिक्त सदन, यह मौन डगर रास न आती बिन तुम्हारे, गगन के इन रिक्त नक्षत्रों ने लोचनों में प्राण-दीप जलाये हैं।। #Kavita250
#Kavita250@KavitaTwoFifty

Kavita250 शीर्षक 'आँगन' (संलग्न पोस्ट से लिया गया शब्द) एक ट्वीट में ही इस शीर्षक पर एक कविता लिखें और हैशटैग #Kavita250 लगा, 5.4.26 तक पोस्ट करें एक हैंडल से अधिकतम 2 कविताएँ पोस्ट हो सकती हैं ⭐️ सर्वश्रेष्ठ कविता का एक शब्द अगले सप्ताह का शीर्षक होगा और 'कोट पोस्ट' किया जाएगा!

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जुनून (एक आवाज)
तुम मेरी ज़िंदगी में पहले क्यों नहीं आए यह प्रश्न कभी-कभी मन के आकाश पर एक ठहरे हुए बादल-सा रुक जाता है पर तभी समय मुस्कुराकर कहता है कुछ मिलन इच्छाओं के बीज से नहीं परिपक्वता के वृक्ष से जन्म लेते हैं। कुछ मुलाक़ातें हमारे चाहने से नहीं होतीं वे तब घटित होती हैं जब जीवन की धूप–छाँव से गुजरकर आत्मा भी स्वीकार करना सीख जाती है। शायद हम पहले मिलते तो पहचान न पाते या मिलकर भी उस गहराई को छू न पाते जो आज सहज लगती है। इसलिए अब समझ आता है हम देर से नहीं मिले हम ठीक उसी क्षण मिले जब समय ने जीवन ने और हमारी आत्माओं ने एक साथ “हाँ” कहा। और वही क्षण हमारे मिलन का नहीं, हमारे सत्य का जन्म था। 💞
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जुनून (एक आवाज)
वो सजना-संवरना जिनको रास नहीं आता पर रूप ऐसा कि श्रृंगार भी शरमा जाता ना काजल की रेखा, ना अधरों पर रंग फिर भी मुखड़ा जैसे उषा का प्रथम प्रसंग। केश उनके आबनूस की गहरी अंधियारी रात जिनमें उलझ जाएँ चाँद-सितारे दिन और रात कंघी भी ठिठक कर पूछे क्या करूँ मैं प्रयास जब हर लट स्वयं लिखती सौंदर्य का इतिहास। लंबा कद ऐसा कि अम्बर भी झुक जाए बादल मुस्काकर कहें हमें भी पास बुलाए चलें तो लगे जैसे सरिता बही मंथर रुकें तो प्रतीत हो थम गया स्वयं अंतर। ना पाउडर, ना लाली, ना श्रृंगार का भार फिर भी दर्पण बोले मैं हूँ लाचार काँच भी मान जाए अपनी ही हार ये तो स्वयं प्रकृति का जीवित अवतार। हँसी उनकी जैसे मंदिर की मधुर टुनक और क्रोध भी ऐसा जैसे गुलाबों की खनक डाँटें भी तो लगे जैसे वाणी का हार जिसमें छिपा हो स्नेह का अपार संसार। अरे! ऐसी सादगी पर तो कवि भी हैरान कह उठे ये नारी नहीं सृष्टि का वरदान हास्य में कह दूँ हे देवों की सरकार, कहीं भूल से तो नहीं उतार दी अप्सरा इस बार?
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Ⓜ️ughal 🎓
Ⓜ️ughal 🎓@MUGLEAZAM14·
मुझे तुम को सुनानी है मुकम्मल दास्ताँ अपनी अधूरी दास्ताँ सुन कर सितारो तुम न सो जाना
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🏹 अंतर्यामी जय श्री राम 🏹 भारत,भारतीय
जब-जब रण में गर्जा भारत, शत्रु स्वयं घबराया है वीरों की हुंकार सुन, अम्बर तक थर्राया है रक्त नहीं ये धारा केवल, ज्वाला बन बहता है विजय-पताका फहराने को, हर वीर लड़ा जाता है 🚩💐 कृपया पूरा पढ़ें 🚩💐🙏
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Siyaram Soni
Siyaram Soni@Sramverma1·
तुम्हारी उपस्थित से आलोकित मेरा आँगन, मेरे प्राणों का मृदुल अनाहत स्पंदन है। इसके हर कण में तेरी स्मृति का आवर्तन, मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व तुझमें ही समर्पित है। #Kavita250 ~डाॅ सियाराम "प्रखर" x.com/i/status/20381…
#Kavita250@KavitaTwoFifty

Kavita250 शीर्षक 'आँगन' (संलग्न पोस्ट से लिया गया शब्द) एक ट्वीट में ही इस शीर्षक पर एक कविता लिखें और हैशटैग #Kavita250 लगा, 5.4.26 तक पोस्ट करें एक हैंडल से अधिकतम 2 कविताएँ पोस्ट हो सकती हैं ⭐️ सर्वश्रेष्ठ कविता का एक शब्द अगले सप्ताह का शीर्षक होगा और 'कोट पोस्ट' किया जाएगा!

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Ashok Mushroof
Ashok Mushroof@AMushroof·
ग़ज़ल -- रदीफ़-- अच्छा लगा बाहर -- फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन 2122 2122 2122 212 मतला -- गुफ़्तगू में उसके लहज़े का असर अच्छा लगा, बात कम थी पर हर अंदाज़-ए-नज़र अच्छा लगा। मुद्दतों के बाद दिल ने फ़िर किसी को चाहा है, इस दफ़ा ये इश्क़ मुझको तो बहुत अच्छा लगा। दिल की वीरानी में जब वो मुस्कुराने आ गया, सूना-सूना घर मुझे तो फ़िर बहुत अच्छा लगा। उसकी आँखों में छुपा था एक गहरा सा सुकूँ, देखकर उस रौशनी को हर सफ़र अच्छा लगा। हमने माना दर्द भी था उसकी हर इक बात में, पर वही दर्द-ए-मोहब्बत इस क़दर अच्छा लगा। वक़्त के एक मोड़ पर जब सब पराये हो गए, एक उसका साथ ही बस हमसफ़र अच्छा लगा। दिल को छूकर जो चली थी वो हवा उसकी तरफ़, उसकी ख़ुशबू का असर शामो-सहर अच्छा लगा। थाम कर हाथों को उसने कुछ यूँ राहत दी मुझे, जैसे बरसों बाद कोई अपना दर अच्छा लगा। उसकी बातें, उसकी यादें, उसका हल्का सा असर, सब मिला कर ज़िंदगी का ये सफ़र अच्छा लगा। अब ज़ुदाई का भी ग़म कुछ इस तरह सहने लगे, उसके जाने का भी अपना वो हुनर अच्छा लगा। उसने रुख़्सत के लिए जाते जो मुड़कर देखा था, दिल को वो आखीर सा भी एक सफ़र अच्छा लगा। हमने तन्हाई को भी अब दिल में अपने है रखा, उसके बिन ये दर्द भी अब तो मुझे अच्छा लगा... #अशोक_मसरूफ़ Pic credit Pinterest
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Madhuri
Madhuri@madhuri067·
माधव....... कुछ यूं उतर गए हो मेरी रग रग में तुम कि खुद से पहले अहसास तुम्हारा होता हैं मुझे 🙏🙏जय जय श्री राधा माधव जी 🙏 🙏
Madhuri tweet media
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