लालसा पहाड़ की फसल,
ढाल-ढाल झूमती हुई,
बाढ़ से बची रहे मगर,
मेघों को चूमती हुई।
जिंदगी खुदी नहीं,
रेत की नदी नहीं,
प्यार धार बाँध कर झरे,
तुम भरी-भरी लगी मुझे,
आँधियाँ लिए संभल पड़ीं।
#RajendraPrasadSingh#shair#zindagi@Kuhu_bole@satya_nirupam
हमारे सोए हुए धर्म-ज्ञान की सारी संपत्ति लुट जाए तो उसे खबर नहीं होती, परंतु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है। फिर उसे कोई जीत नहीं सकता।
-पंच परमेश्वर
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