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कचौड़ी नहीं, सवाल व्यवस्था पर है
किसी पूर्व संपादक (संजीव श्रीवास्तव जी) का रिटायरमेंट के बाद कचौड़ी की दुकान खोलना निजी पसंद हो सकती है। इसमें शर्म नहीं, मेहनत है। लेकिन अगर यह एक प्रवृत्ति का संकेत है तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, पूरी पत्रकार बिरादरी के भविष्य का आईना है। सवाल यह नहीं कि उन्होंने क्या चुना। सवाल यह है कि उन्होंने और क्या चुन सकते थे?
पत्रकारिता में तीन-चार दशक खपा देने के बाद विकल्प इतने सीमित क्यों रह जाते हैं? क्यों एक ईमानदार पत्रकार के सामने “समझौता” या “संघर्ष” के अलावा तीसरा रास्ता अक्सर नहीं दिखता? यही किसी पक्ष के पत्रकार होते तो राज्यसभ या किसी सरकारी व्यवस्था का भाग बनकर मलाई काट रहे होते।
खैर, सरकारी नौकरी में पेंशन है। बैंकों में सेवा लाभ हैं।
प्रोफेसरों के पास अकादमिक सुरक्षा है। लेकिन पत्रकार? ज़्यादातर पत्रकार असंगठित क्षेत्र के कामगारों की तरह काम करते हैं। न ठोस कॉन्ट्रैक्ट, न सामाजिक सुरक्षा, न पेंशन की गारंटी। फील्ड में धक्के अलग, दबाव अलग, मुकदमे अलग। जवानी में वह सत्ता से सवाल पूछता है। बुढ़ापे में उसे अपनी सुरक्षा का सवाल सताने लगता है।
यहीं से शुरू होता है झुकने का सिलसिला। कोई पार्टी की “अनौपचारिक सेवा” में लग जाता है, कोई आयोग या बोर्ड की उम्मीद में, कोई विज्ञापन या ठेका पाने की दौड़ में। जो युवा उम्र में नहीं झुकता, वह कई बार सुरक्षित बुढ़ापे की चिंता में झुक जाता है। यह व्यक्तिगत कमजोरी से ज़्यादा सिस्टम की विफलता है। पत्रकार के पास संविधान से अतिरिक्त अधिकार नहीं होते। वह सिर्फ सवाल पूछ सकता है, जवाब देने की बाध्यता सामने वाले पर नहीं होती। उसकी असली ताकत सिर्फ उसकी रिपोर्ट है। और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी- उसका असुरक्षित भविष्य।
इसलिए मुद्दा कचौड़ी नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या एक समाज अपने सवाल पूछने वालों को सम्मानजनक बुढ़ापा दे पा रहा है? अगर नहीं, तो यह किसी एक संपादक की कहानी नहीं, लोकतंत्र की संरचना पर उठता हुआ सवाल है। इस पर सरकार को भी सोचना होगा। और समाज को भी।

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