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@warrior6o

Katılım Kasım 2025
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Harendra Malik
Harendra Malik@HarendraMalikMP·
मेरे प्रिय भांजे गगन चौधरी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं ढेर सारी शुभकामनाएं। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपका जीवन सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और अपार सफलताओं से भरा रहे। आप हमेशा खुश रहें और जीवन में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करें।
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Rashtriya Lok Dal
Rashtriya Lok Dal@RLDparty·
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का निर्णय ग्रामीण स्वशासन को नई शक्ति, नई पहचान और नया सम्मान देने वाला ऐतिहासिक कदम है। प्रदेश के 57,694 ग्राम प्रधानों को मिली यह जिम्मेदारी गांवों के विकास को नई गति देगी तथा लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत करेगी। ग्राम स्वराज की भावना को सशक्त करते हुए यह निर्णय गांव, गरीब, किसान और विकास के संकल्प को नई दिशा प्रदान करेगा। #RLD #Panchayat
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Birpal Malik
Birpal Malik@MalikBirpal·
राष्ट्रीय लोकदल – जनपद शामली आज राष्ट्रीय लोकदल के शामली जिला कार्यालय पर राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय कौशल विकास और उद्यमिता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), भारत सरकार माननीय जयंत चौधरी जी की आगामी 11 जून को काबडौत में प्रस्तावित महत्वपूर्ण जनसभा को लेकर एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक आयोजित की गई। बैठक में कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई तथा जनसभा को ऐतिहासिक एवं अभूतपूर्व बनाने को लेकर गहन विचार-विमर्श किया गया। बैठक की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष चौधरी वाजिद अली ने की। बैठक में जनसंपर्क अभियान को गांव-गांव एवं बूथ स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने, कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियां तय करने तथा अधिक से अधिक संख्या में किसानों, युवाओं, महिलाओं एवं आम जनमानस की भागीदारी सुनिश्चित करने पर विशेष चर्चा की गई। उपस्थित पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने तथा 11 जून की जनसभा को ऐतिहासिक बनाने का संकल्प लिया। बैठक को संबोधित करते हुए क्षेत्रीय अध्यक्ष तरसपाल मलिक ने कहा कि “11 जून को काबडौत में प्रस्तावित राष्ट्रीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय कौशल विकास और उद्यमिता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), भारत सरकार माननीय जयंत चौधरी जी की जनसभा ऐतिहासिक होगी। यह कार्यक्रम संगठन की ताकत, कार्यकर्ताओं के उत्साह और जनता के विश्वास का प्रतीक बनेगा।” मंडल अध्यक्ष प्रभात तोमर ने कहा कि “माननीय जयंत चौधरी जी का कार्यक्रम किसानों, युवाओं, मजदूरों एवं समाज के प्रत्येक वर्ग की आवाज को मजबूती देने का कार्य करेगा। राष्ट्रीय लोकदल हमेशा जनहित की राजनीति करता आया है।” जिला अध्यक्ष चौधरी वाजिद अली ने कहा कि “राष्ट्रीय लोकदल जनपद शामली आगामी कार्यक्रम को ऐतिहासिक बनाने के लिए पूरी मजबूती एवं समर्पण के साथ तैयारियों में जुटा हुआ है। कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को कार्यक्रम से जोड़ रहे हैं।” थानाभवन विधायक अशरफ अली खान ने कहा कि “माननीय जयंत चौधरी जी हमेशा किसानों, नौजवानों, गरीबों एवं आम जनता की आवाज को मजबूती से उठाते रहे हैं। जनता का विश्वास लगातार राष्ट्रीय लोकदल के प्रति बढ़ रहा है।” सदर विधायक प्रसन्न चौधरी ने कहा कि “11 जून का कार्यक्रम संगठन की शक्ति का बड़ा प्रदर्शन होगा तथा भारी संख्या में कार्यकर्ता एवं आमजन कार्यक्रम में पहुंचकर इसे ऐतिहासिक बनाएंगे।” पूर्व विधायक राव वारिस ने कहा कि “राष्ट्रीय लोकदल हमेशा किसानों, मजदूरों, पिछड़ों एवं गरीबों की लड़ाई लड़ने वाला दल रहा है। यह कार्यक्रम प्रदेश की राजनीति में नई ऊर्जा एवं सकारात्मक संदेश देने का कार्य करेगा।” बैठक में उपस्थित सभी पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने एक स्वर में कहा कि राष्ट्रीय लोकदल की नीतियों एवं माननीय जयंत चौधरी जी के नेतृत्व में संगठन निरंतर मजबूत हो रहा है तथा आगामी जनसभा ऐतिहासिक जनसमर्थन का नया अध्याय लिखेगी। बैठक में क्षेत्रीय अध्यक्ष तरसपाल मलिक, मंडल अध्यक्ष प्रभात तोमर, जिला अध्यक्ष चौधरी वाजिद अली, सदर विधायक प्रसन्न चौधरी, थानाभवन विधायक अशरफ अली खान, पूर्व विधायक राव वारिस, प्रदेश महासचिव विजय कौशिक, सतबीर पंवार, ऋषिराज राझड़, अनवार चौधरी, बिजेंद्र मलिक, हरेंद्र ताना, देशराज भनेड़ा, अरविंद पंवार, उमेश पंवार, सतेंद्र चेयरमैन, डॉ. विक्रांत जावला, सुनील मलिक जी,बाबूराम पंवार, नीरज पंवार, डॉ. मुबारक अली, सनोज चौधरी, योगेश भभीसा, सुनील मलिक, सुधीर प्रधान, देवानंद गौड़, गुलाब सिंह, सत्यवीर सिंह, उमरदीन मंसूरी, आर्यन चौधरी, वीर सिंह मलिक, लबनान चौधरी, रजनीश कोरी, संजीव निर्वाल, अरविंद झाल, विकास धीमान, अंकित जैन, गगनदीप मलिक, रविंदर सोंटा, मोहित, सोहनपाल कसेरवा, राजन जावला, पप्पू प्रधान, विकास मलिक, रॉबिन तोमर, सचिन चौधरी, रविंदर, सहदेव मुखिया, सतबीर मूंछ, आशुतोष, कपिल पंवार, लक्ष्य बालियान सहित बड़ी संख्या में पदाधिकारी एवं देवतुल्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे। जय रालोद जय जयंत चौधरी
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Office of Ch Jayant Singh
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माननीय केन्द्रीय मंत्री @jayantrld जी से शिष्टाचार भेंट के दौरान चूरू के सांसद श्री राहुल कसवाँ जी ने अपने संसदीय क्षेत्र सुजानगढ़ में विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने हेतु केंद्रीय विद्यालय की स्थापना की मांग रखी। @RahulKaswanMP
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Jat Ethnic Religion
Jat Ethnic Religion@Jat_Ethnic·
मान्यता नहीं, इसे traditional knowledge कहते हैं। जो हमारे बुजुर्गों ने अपने पीढ़ी दर पीढ़ी प्रकृति को गहनता से Observe कर शोध के रूप में ईजाद किया। उनके शोध को मान्यता कहकर अंधविश्वास से मत जोड़ो। वैसे कितना अजीब हैं; लोग अंधविश्वास और आम लोगों के खून चूसने व राजाओं के शौक को परंपरा के नाम पर प्रमोट करते हैं, लेकिन गहनता से प्राकृतिक observation करने तथा पीढ़ी दर पीढ़ी शोध द्वारा पैदा किए traditional knowledge को मान्यता। बाकी आगे आपकी मर्जी हैं। बस मैं आप समझदार हैं, इसलिए बोल रहा हूं। शब्दों के फर्क को समझो। शुक्रिया..! ❣️
मरू री मरवण🏜️@Registani_ladki

☀️ नौतपा — गर्मियों के सबसे तपते 9 दिन वैज्ञानिक कारण: इन दिनों सूर्य की किरणें पृथ्वी पर लगभग सीधी पड़ती हैं, जिससे तापमान और लू अपने चरम पर होती है। 🌡️ मान्यता: कहा जाता है कि जितना तेज़ नौतपा तपेगा, उतना अच्छा मानसून और बारिश का मौसम रहेगा। 🌧️ #नौतपा #Summer #Heatwave #Monsoon

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Jat Ethnic Religion
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जो लड़की अपनी ज़िंदगी के सबसे बड़े फैसले में, अपनी माँ की लाख मिन्नतों और गिड़गिड़ाने के बाद भी उसकी भावनाओं को न समझे… तो फिर यह उम्मीद करना कितना सही है कि वह आगे चलकर अपने प्रेमी की माँ की भावनाओं और सम्मान का ख्याल रखेगी? इंसान का असली स्वभाव अक्सर वहीं दिखता है, जहाँ उसे सबसे गहरे रिश्तों की कद्र करनी होती है। अपने रिश्ते, अपना परिवार और अपनी जैविक धरोहर को बचाकर रखो, फिर आपका कोई मुकाबला नहीं है। आप दुनिया की सबसे बेमिसाल कौम हो। शुक्रिया ❤️
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Jat Ethnic Religion
Jat Ethnic Religion@Jat_Ethnic·
500 से अधिक गायों की लाशें मिली हैं, लेकिन मजाल है कि रामचरितमानस की कसम खाने वाला प्रतिनिधि या खुद को धर्मरक्षक बताने वाला कोई प्रभावशाली हिंदू खुलकर आवाज़ उठाए। जैसलमेर ज़िले की दोनों विधानसभा सीटों — जैसलमेर और पोकरण — से राजपूत विधायक हैं; छोटूसिंह भाटी और महंत प्रताप पुरी। लेकिन इतनी बड़ी घटना के बावजूद जिस तरह की चुप्पी दिखाई दे रही है, वह कई सवाल खड़े करती है। समस्या केवल घटना नहीं, बल्कि चयनात्मक नैतिकता है। धर्म, गौमाता, जीव रक्षा और पर्यावरण प्रेम की बातें अक्सर तभी ज़ोर पकड़ती हैं, जब वे चुनावी राजनीति, जातीय समीकरणों या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अनुकूल बैठती हों। बाकी समय वही मुद्दे अचानक मौन में बदल जाते हैं। जो लोग खुद को जीव रक्षा और पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा प्रहरी बताते हैं, वे भी ऐसी घटनाओं पर अक्सर गायब दिखाई देते हैं। मानो संवेदनशीलता भी व्यक्ति, जाति और राजनीतिक सुविधा देखकर तय की जाती हो। यदि किसी खान पर आरोप हो तो “जीव प्रेम” राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है, लेकिन जब किसी "सिंह" या स्थानीय सत्ता, जातीय प्रभाव या अपने लोग कटघरे में हों, तब पूरा जीव प्रेम “खाली पीली 18 की बात नहीं करने का…” वाले मौन में बदल जाता है। यही दोहरा मापदंड सबसे बड़ा प्रश्न है।
Decent Chaudhary@Decentladki1

जैसलमेर के डंपिंग यार्ड में सैकड़ों गायों के शव पड़े हैं, तस्वीर हृदयविदारक है। यहां से MLA सत्ता पक्ष के है । गोभक्त सरकार राज्य में है क्या कर रही है

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Jat Ethnic Religion
Jat Ethnic Religion@Jat_Ethnic·
2019 में मथाना गौशाला में 600 में से लगभग 500 गायों की मौत हो गई। हाल ही में जैसलमेर में भी 500 से अधिक गायों की लाशें मिलने का मामला सामने आया। ऐसे उदाहरण दिखाते हैं कि संस्थागत संरक्षण हमेशा वास्तविक संरक्षण नहीं होता। विडंबना यह भी है कि एक तरफ गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा होती है और दूसरी तरफ भारत दुनिया के सबसे बड़े गौमांस निर्यातक देशों में बना रहता है। यानी सार्वजनिक भावनाएँ और वास्तविक आर्थिक गतिविधियाँ — दोनों एक-दूसरे के विपरीत चल रही हैं। इस बीच “गौ-रक्षक” की पहचान कई जगह नैतिकता नहीं, बल्कि सामाजिक शक्ति और भय का माध्यम बनती गई। धार्मिक प्रतीक के पीछे छिपकर अपराधों को नैतिक वैधता देने की प्रवृत्ति बढ़ी। भीड़ संरक्षण देने लगी, राजनीति उपयोग करने लगी और कानून कमजोर पड़ता गया। आज स्थिति यह हो चुकी है कि कुछ लोग गाय के नाम पर चंदा, राजनीति, सामाजिक दबदबा और संरक्षण — सब कुछ हासिल कर रहे हैं। थोड़ी सी गायें इकट्ठा कर गौशाला बना लो, फिर “विश्व स्तरीय गौशाला” के नाम पर भावनात्मक अभियान चलाओ, जागरण और कथाएँ करवाओ, और जनता की भावनाओं को धार्मिक अपराधबोध में बदल दो। लाखों का चंदा आएगा, लेकिन वही गायें फिर भी सड़कों पर प्लास्टिक खाती मिलेंगी। कई मामलों में गौ-तस्करी और गौ-रक्षा के बीच आर्थिक सांठगांठ के आरोप भी सामने आए। यानी जिस व्यवस्था को नैतिक आंदोलन बताया गया, उसके भीतर भी शक्ति, धन और भय की राजनीति सक्रिय हो गई। और सबसे खतरनाक बात यह है कि “गौ-रक्षक” की पहचान अब कई जगह अपराधों के नैतिक शुद्धिकरण का माध्यम बनती जा रही है। कोई व्यक्ति चाहे कितना भी हिंसक, भ्रष्ट या अपराधी क्यों न हो, यदि वह धार्मिक प्रतीक के पीछे खड़ा हो जाए तो भीड़ उसे नैतिक वैधता देने लगती है। यही भीड़-मानसिकता का सबसे खतरनाक चरण होता है। यह केवल गाय का प्रश्न नहीं है। यह भारत के नैतिक ढाँचे का प्रश्न है। क्योंकि जिस समाज में कानून से ऊपर भीड़ खड़ी हो जाए, वहाँ अंततः कोई भी सुरक्षित नहीं बचता — न इंसान, न पशु और न ही नैतिकता। मैं भी चाहता हूँ कि गायों का बेहतर संरक्षण हो। लेकिन मेरा सवाल सीधा है — क्या गाय का संरक्षण एक किसान या पशुपालक से बेहतर कोई संस्था कर सकती है? एक किसान अपने पशु को केवल आर्थिक वस्तु की तरह नहीं पालता। वह उसके साथ जीता है। उसका श्रम, उसका परिवार और उसका जीवन उससे जुड़ा होता है। इसलिए एक किसान या पशुपालक से बेहतर संरक्षण किसी संस्थागत ढाँचे में हमेशा संभव नहीं होता। यदि बच्चों का संरक्षण माँ-बाप से बेहतर अनाथ आश्रम में होता, तो आज हर बच्चा अनाथ आश्रम में होता। उसी प्रकार गायों के साथ भी है। यदि सच में गायों की स्थिति सुधारनी है, तो समाधान हिंसा, भीड़ और भावनात्मक उन्माद नहीं है। समाधान है — किसान और पशुपालक को फिर से संरक्षण-व्यवस्था के केंद्र में लाना। वरना परिणाम वही रहेगा जो आज दिखाई दे रहा है — सबसे अधिक “गौभक्ति”, और सबसे अधिक बेसहारा गायें। और यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। ऐसे अपराध, भीड़-मानसिकता और सामाजिक अस्थिरता की बदौलत भारत Global Peace Index 2025 में 163 देशों में 115वें स्थान पर पहुँच चुका है। 2/2.
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Jat Ethnic Religion
Jat Ethnic Religion@Jat_Ethnic·
नैतिकता, समझदारी और सोच ही मनुष्य को बाकी प्राणियों से अधिक बुद्धिमान और शक्तिशाली बनाती है। यदि सड़क पर एक तरफ कोई पौधा हो और दूसरी तरफ कोई पशु या पक्षी, तो अधिकांश लोग पशु या पक्षी को बचाने की कोशिश करेंगे। उसी प्रकार यदि एक तरफ कोई इंसान हो और दूसरी तरफ कोई पशु, पक्षी या गाय हो, तो हर सामान्य मनुष्य पहले इंसान को बचाने की कोशिश करेगा। यही नैतिकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी जीव महत्वहीन हैं, बल्कि यह कि मनुष्य अपने नैतिक ढाँचे में जीवन का मूल्य-क्रम तय करता है। इसी नैतिकता के आधार पर मनुष्य पशु और इंसान को एक स्तर पर नहीं रखता। इसी कारण सभ्यता आगे बढ़ने के साथ मनुष्य ने हिंसा कम करने, खेती विकसित करने और स्थायी भोजन व्यवस्था बनाने की कोशिश की। मानव सभ्यता का विकास केवल तकनीकी विकास नहीं था, बल्कि हिंसा को नियंत्रित करने की प्रक्रिया भी था। एक समय था जब पूरी मानव जाति अपने से कमजोर जीवों को मारकर भोजन करती थी। लेकिन जैसे-जैसे सभ्यता विकसित हुई, वैसे-वैसे इंसानों में सोच और संवेदनशीलता भी विकसित होती गई। खेती और पशुपालन शुरू हुए। स्थायी समाज बने। तकनीकी विकास हुआ। यानी सभ्यता का अर्थ केवल मशीनें नहीं, बल्कि नैतिक नियंत्रण भी था। इसी प्रक्रिया में किसान और पशुपालक समाज ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। सदियों तक गाय, बैल, ऊँट और दूसरे पशुओं का संरक्षण इसलिए संभव हो पाया क्योंकि उस संरक्षण के पीछे आर्थिक संतुलन था। गाय दूध देती थी, बैल खेती करता था, ऊँट परिवहन करता था। यानी संरक्षण और उपयोग — दोनों साथ चलते थे। लेकिन आधुनिक तकनीक ने यह संतुलन तोड़ दिया। ट्रैक्टर ने बैलों की जगह ले ली। रासायनिक खाद ने जैविक खाद की जगह ले ली। मशीनों ने पशुओं के श्रम को अप्रासंगिक बना दिया। यानी पशुपालन का आर्थिक ढाँचा टूट गया। अब किसान के लिए किसी पशु का संरक्षण भावनात्मक रूप से तो संभव था, लेकिन आर्थिक रूप से कठिन होता चला गया। यहीं से समस्या शुरू हुई। किसी भी जीव का संरक्षण केवल भावनाओं के भरोसे नहीं चल सकता। संरक्षण हमेशा आर्थिक संरचना, उपयोगिता और जिम्मेदारी पर टिकता है। यही कारण है कि आज सबसे अधिक “गौमाता” कहे जाने के बावजूद गाय सबसे अधिक सड़कों पर आवारा दिखाई देती है, प्लास्टिक खाती दिखाई देती है और उपेक्षित दिखाई देती है। समस्या गाय से प्रेम की कमी नहीं है। समस्या संरक्षण की व्यावहारिक व्यवस्था के टूटने की है। लेकिन इसी बीच राजनीति ने गाय को धार्मिक भावनाओं और पहचान की राजनीति का हथियार बना दिया। धीरे-धीरे स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि गाय के नाम पर इंसान की हत्या को भी उचित ठहराया जाने लगा। भीड़ ने कानून की जगह लेनी शुरू कर दी। नैतिकता की जगह पहचान-आधारित उन्माद ने ले ली। यहीं सबसे बड़ा नैतिक पतन हुआ। क्योंकि जिस समाज में किसी पशु के नाम पर इंसान की हत्या सामान्य होने लगे, वहाँ नैतिकता नहीं, भीड़-मानसिकता शासन करने लगती है। 2014 के बाद गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की घटनाओं में अचानक वृद्धि दिखाई देने लगी। सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार 2014 से 2018 के बीच गोरक्षा के नाम पर 85 हिंसक घटनाएँ सामने आईं, जिनमें 34 लोगों की मौत हुई और 289 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। 2014 में ऐसे केवल 3 मामले सामने आए थे। 2015 में यह संख्या बढ़कर 12 हो गई। इन घटनाओं में 10 लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और 48 लोग घायल हुए। 2016 में 24 मामले सामने आए। 2017 में यह संख्या 37 तक पहुँच गई, जिसमें 11 लोगों की मौत हुई और 152 लोग घायल हुए। यानी भीड़ का आत्मविश्वास लगातार बढ़ता गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन घटनाओं में मारे गए अधिकांश लोग किसान, पशुपालक या सामान्य ग्रामीण थे। इनमें से अधिकांश मामलों में कोई संगठित गौ-तस्करी सिद्ध नहीं हुई। यानी जिन लोगों ने पीढ़ियों तक गायों का पालन किया, वही लोग सबसे अधिक संदेह, हिंसा और मॉब लिंचिंग का शिकार बने। इसका मनोवैज्ञानिक परिणाम क्या हुआ? डर। पशुपालकों और किसानों ने गाय पालना कम करना शुरू कर दिया। क्योंकि अब पशुपालन केवल आर्थिक बोझ नहीं था, बल्कि सामाजिक और कानूनी जोखिम भी बनता जा रहा था। और यहीं से गायों की दुर्दशा और बढ़ी। आज स्थिति यह है कि गायों के नाम पर सबसे अधिक भावनात्मक भाषण हैं, सबसे अधिक धार्मिक उन्माद है, सबसे अधिक चंदा है — लेकिन सबसे अधिक आवारा गायें भी वहीं हैं। यदि गौशालाएँ वास्तव में समाधान होतीं, तो आज गायें सड़कों पर नहीं दिखतीं। यदि भावनात्मक नारों से संरक्षण संभव होता, तो गायें प्लास्टिक खाकर नहीं मरतीं। वास्तविकता यह है कि अनेक गौशालाएँ स्वयं अव्यवस्था, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का केंद्र बन चुकी हैं। पथमेड़ा जैसी प्रसिद्ध गौशालाओं में बाढ़ के दौरान हजारों गायों की मौत हुई। 1/.
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500 से अधिक गायों की लाशें मिली हैं, लेकिन मजाल है कि रामचरितमानस की कसम खाने वाला प्रतिनिधि या खुद को धर्मरक्षक बताने वाला कोई प्रभावशाली हिंदू खुलकर आवाज़ उठाए। जैसलमेर ज़िले की दोनों विधानसभा सीटों — जैसलमेर और पोकरण — से राजपूत विधायक हैं; छोटूसिंह भाटी और महंत प्रताप पुरी। लेकिन इतनी बड़ी घटना के बावजूद जिस तरह की चुप्पी दिखाई दे रही है, वह कई सवाल खड़े करती है। समस्या केवल घटना नहीं, बल्कि चयनात्मक नैतिकता है। धर्म, गौमाता, जीव रक्षा और पर्यावरण प्रेम की बातें अक्सर तभी ज़ोर पकड़ती हैं, जब वे चुनावी राजनीति, जातीय समीकरणों या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अनुकूल बैठती हों। बाकी समय वही मुद्दे अचानक मौन में बदल जाते हैं। जो लोग खुद को जीव रक्षा और पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा प्रहरी बताते हैं, वे भी ऐसी घटनाओं पर अक्सर गायब दिखाई देते हैं। मानो संवेदनशीलता भी व्यक्ति, जाति और राजनीतिक सुविधा देखकर तय की जाती हो। यदि किसी खान पर आरोप हो तो “जीव प्रेम” राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है, लेकिन जब किसी "सिंह" या स्थानीय सत्ता, जातीय प्रभाव या अपने लोग कटघरे में हों, तब पूरा जीव प्रेम “खाली पीली 18 की बात नहीं करने का…” वाले मौन में बदल जाता है। यही दोहरा मापदंड सबसे बड़ा प्रश्न है।

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हिन्दुओं की सर्वश्रेष्ठ जातियाँ खुद अपने आर्यों के रूप में भारत में फैलाव का उल्लेख वेदों में करती हैं और उसी वेदों में खुद के गाय का मांस खाने पर पाबंदी का उल्लेख उत्तर वैदिक काल के समय में करती हैं। आज भी अगर देखा जाए तो हिंदुओं में सबसे ज्यादा मांस का सेवन सवर्ण हिन्दू करते हैं क्योंकि किसान-कमेरे वर्ग से उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा बेहतर है। हिन्दुओं में 85% बहुसंख्यक लोगों में 75% लोग गरीब हैं, तो उनके लिये आर्थिक रूप से ही मांस का सेवन करना मुश्किल हो जाता है। वैसे मैं किसी के कुछ भी खाने के खिलाफ नहीं हूँ। इंसान को ज़िंदा रहने के लिये भोजन ज़रूरी है। और कोई भी इंसान सुविधा और सुलभता के हिसाब का भोजन करेगा। यही उसकी समझदारी है। प्राकृतिक संतुलन और जीव संरक्षण, दोनों के हिसाब से जन्म-मरण चलता रहना चाहिए क्योंकि एक पशुपालक या किसान किसी भी जीव को बेहतर संरक्षण के बदले में अपना कुछ फायदा भी चाहेगा। पहले किसान या पशुपालक गाय को दूध और बैल को खेत की जुताई में काम लेता था और उसके बदले में उसका बेहतर संरक्षण करता था। उसी हिसाब से बाकी के भी पालतू जानवरों के संरक्षण और उसके बदले में काम होते थे। आज खेती में तकनीक ने इतना विस्तार कर लिया कि बैलों और ऊँटों के काम की जगह मशीनों ने ले ली। और जैविक खाद की जगह रासायनिक खाद ने ले ली, तो उनके संरक्षण के बदले किसान या पशुपालक का कोई फायदा नहीं रहा। आर्थिक रूप से उनका संरक्षण करना मुश्किल हो गया। सिर्फ जैविक खाद के बदले संरक्षण सौदे का घाटा हो गया। संरक्षण में लागत ज्यादा और बदले में कीमत के रूप में सिर्फ जैविक खाद। ऐसे में बेहतर संरक्षण तभी हो सकता है जब लागत और मेहनताने के बदले में अच्छी कीमत मिले। वो कीमत उसके कत्लखाने में पहुँचने से ही मिल सकती है। और तभी उसका बेहतर संरक्षण या पालन-पोषण हो सकता है। लेकिन कुछ सालों से राजनीतिक रूप से बढ़ते हिंदुत्व के प्रभाव ने गाय को गौमाता बना दिया। और इंसान से भी ऊपरी दर्जा दे दिया। गाय के नाम पर एक इंसान की हत्या को भी मुनासिब और सही समझा जाने लगा। इस तरह गाय के नाम पर इंसानों की हत्या एक आम और मामूली सी बात हो गई। इस इंसानी नैतिक पतन का परिणाम यह हुआ कि लोगों ने गाय का संरक्षण और पशुपालन करना छोड़ दिया, जिससे गाय की दुर्गति होनी शुरू हो गई। गाय प्लास्टिक और सड़क पर पड़ा कूड़ा खाने को मजबूर हो गई। पशुपालन और संरक्षण की प्रक्रिया को हम गाय और भैंस के कम्पेरिजन से बेहतर समझ सकते हैं। आज गाय की तुलना में भैंस का संरक्षण व पशुपालन कहीं बेहतर और अधिक होता है। जिसका कारण गाय के नाम पर इंसानी नैतिक पतन और उससे होने वाली मोब लिंचिंग है। इसका जिम्मेदार केवल और केवल हिंदुत्व और उसके प्रभाव से बने गौभक्त व गौ रक्षक हैं। मोब लिंचिंग में सारी हत्याएँ किसान और पशुपालकों की हुईं। इनमें से एक भी गौ-तस्कर नहीं था। और इसमें भी अधिकतर हिन्दू किसान व पशुपालकों की मोब लिंचिंग हुई है। इस दहशत के डर से किसान और पशुपालकों ने गाय का पशुपालन करना छोड़ दिया। अब गाय का पशुपालन किसान और पशुपालकों से छीन कर कुछ लोगों ने गौशालाओं के रूप में अपना लिया। जब मैं किसान आंदोलन के वक्त टिकरी बॉर्डर पर था, वहाँ मैं, मीत मान और महकसिंह तरार चर्चा कर रहे थे। उस दौरान हमने दूध और टैक्स रिफंड के साथ OECD-ICRIER की 2000 से 2017 तक की रिपोर्टों और उपलब्ध कृषि-आर्थिक अनुमानों का एक संयुक्त विश्लेषण किया। इस विश्लेषण के आधार पर यह अनुमान सामने आया कि 17 वर्षों में MSP प्रणाली के तहत किसानों का सरकार में “निगेटिव सपोर्ट/आर्थिक अंतर” लगभग 45 लाख करोड़ रुपये के आसपास बैठता है। अगर इसमें टैक्स रिफंड और अन्य समायोजन भी जोड़ लिए जाएँ, तो यह आँकड़ा लगभग 51 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच जाता है। इस आधार पर औसतन यह प्रभाव प्रति वर्ष लगभग 3 लाख करोड़ रुपये निकलता है। यह आँकड़ा मुख्य रूप से उन 23 फसलों पर आधारित है जो MSP व्यवस्था के अंतर्गत आती हैं। ध्यान रहे, यह मौजूदा MSP फॉर्मूले के आधार पर किया गया एक समग्र अनुमान है। अगर इसमें अकेले दूध (डेयरी सेक्टर) को भी जोड़ दिया जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका कुल प्रभाव लगभग दोगुना होकर करीब 6 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष तक पहुँच जाता है। असल खेल यह है कि भारत में दूध उत्पादन तथा डेयरी सेक्टर एक बहुत बड़ा और लाभकारी ग्रामीण व्यवसाय है, जिसे सही ढंग से प्रबंधन करने पर अच्छा मुनाफा भी मिल सकता है। और गौ भक्ति इसी बड़े व्यवसाय को छिनकर हत्याने तक थी।
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नैतिकता, समझदारी और सोच ही मनुष्य को बाकी प्राणियों से अधिक बुद्धिमान और शक्तिशाली बनाती है। यदि सड़क पर एक तरफ कोई पौधा हो और दूसरी तरफ कोई पशु या पक्षी, तो अधिकांश लोग पशु या पक्षी को बचाने की कोशिश करेंगे। उसी प्रकार यदि एक तरफ कोई इंसान हो और दूसरी तरफ कोई पशु, पक्षी या गाय हो, तो हर सामान्य मनुष्य पहले इंसान को बचाने की कोशिश करेगा। यही नैतिकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी जीव महत्वहीन हैं, बल्कि यह कि मनुष्य अपने नैतिक ढाँचे में जीवन का मूल्य-क्रम तय करता है। इसी नैतिकता के आधार पर मनुष्य पशु और इंसान को एक स्तर पर नहीं रखता। इसी कारण सभ्यता आगे बढ़ने के साथ मनुष्य ने हिंसा कम करने, खेती विकसित करने और स्थायी भोजन व्यवस्था बनाने की कोशिश की। मानव सभ्यता का विकास केवल तकनीकी विकास नहीं था, बल्कि हिंसा को नियंत्रित करने की प्रक्रिया भी था। एक समय था जब पूरी मानव जाति अपने से कमजोर जीवों को मारकर भोजन करती थी। लेकिन जैसे-जैसे सभ्यता विकसित हुई, वैसे-वैसे इंसानों में सोच और संवेदनशीलता भी विकसित होती गई। खेती और पशुपालन शुरू हुए। स्थायी समाज बने। तकनीकी विकास हुआ। यानी सभ्यता का अर्थ केवल मशीनें नहीं, बल्कि नैतिक नियंत्रण भी था। इसी प्रक्रिया में किसान और पशुपालक समाज ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। सदियों तक गाय, बैल, ऊँट और दूसरे पशुओं का संरक्षण इसलिए संभव हो पाया क्योंकि उस संरक्षण के पीछे आर्थिक संतुलन था। गाय दूध देती थी, बैल खेती करता था, ऊँट परिवहन करता था। यानी संरक्षण और उपयोग — दोनों साथ चलते थे। लेकिन आधुनिक तकनीक ने यह संतुलन तोड़ दिया। ट्रैक्टर ने बैलों की जगह ले ली। रासायनिक खाद ने जैविक खाद की जगह ले ली। मशीनों ने पशुओं के श्रम को अप्रासंगिक बना दिया। यानी पशुपालन का आर्थिक ढाँचा टूट गया। अब किसान के लिए किसी पशु का संरक्षण भावनात्मक रूप से तो संभव था, लेकिन आर्थिक रूप से कठिन होता चला गया। यहीं से समस्या शुरू हुई। किसी भी जीव का संरक्षण केवल भावनाओं के भरोसे नहीं चल सकता। संरक्षण हमेशा आर्थिक संरचना, उपयोगिता और जिम्मेदारी पर टिकता है। यही कारण है कि आज सबसे अधिक “गौमाता” कहे जाने के बावजूद गाय सबसे अधिक सड़कों पर आवारा दिखाई देती है, प्लास्टिक खाती दिखाई देती है और उपेक्षित दिखाई देती है। समस्या गाय से प्रेम की कमी नहीं है। समस्या संरक्षण की व्यावहारिक व्यवस्था के टूटने की है। लेकिन इसी बीच राजनीति ने गाय को धार्मिक भावनाओं और पहचान की राजनीति का हथियार बना दिया। धीरे-धीरे स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि गाय के नाम पर इंसान की हत्या को भी उचित ठहराया जाने लगा। भीड़ ने कानून की जगह लेनी शुरू कर दी। नैतिकता की जगह पहचान-आधारित उन्माद ने ले ली। यहीं सबसे बड़ा नैतिक पतन हुआ। क्योंकि जिस समाज में किसी पशु के नाम पर इंसान की हत्या सामान्य होने लगे, वहाँ नैतिकता नहीं, भीड़-मानसिकता शासन करने लगती है। 2014 के बाद गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की घटनाओं में अचानक वृद्धि दिखाई देने लगी। सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार 2014 से 2018 के बीच गोरक्षा के नाम पर 85 हिंसक घटनाएँ सामने आईं, जिनमें 34 लोगों की मौत हुई और 289 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। 2014 में ऐसे केवल 3 मामले सामने आए थे। 2015 में यह संख्या बढ़कर 12 हो गई। इन घटनाओं में 10 लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और 48 लोग घायल हुए। 2016 में 24 मामले सामने आए। 2017 में यह संख्या 37 तक पहुँच गई, जिसमें 11 लोगों की मौत हुई और 152 लोग घायल हुए। यानी भीड़ का आत्मविश्वास लगातार बढ़ता गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन घटनाओं में मारे गए अधिकांश लोग किसान, पशुपालक या सामान्य ग्रामीण थे। इनमें से अधिकांश मामलों में कोई संगठित गौ-तस्करी सिद्ध नहीं हुई। यानी जिन लोगों ने पीढ़ियों तक गायों का पालन किया, वही लोग सबसे अधिक संदेह, हिंसा और मॉब लिंचिंग का शिकार बने। इसका मनोवैज्ञानिक परिणाम क्या हुआ? डर। पशुपालकों और किसानों ने गाय पालना कम करना शुरू कर दिया। क्योंकि अब पशुपालन केवल आर्थिक बोझ नहीं था, बल्कि सामाजिक और कानूनी जोखिम भी बनता जा रहा था। और यहीं से गायों की दुर्दशा और बढ़ी। आज स्थिति यह है कि गायों के नाम पर सबसे अधिक भावनात्मक भाषण हैं, सबसे अधिक धार्मिक उन्माद है, सबसे अधिक चंदा है — लेकिन सबसे अधिक आवारा गायें भी वहीं हैं। यदि गौशालाएँ वास्तव में समाधान होतीं, तो आज गायें सड़कों पर नहीं दिखतीं। यदि भावनात्मक नारों से संरक्षण संभव होता, तो गायें प्लास्टिक खाकर नहीं मरतीं। वास्तविकता यह है कि अनेक गौशालाएँ स्वयं अव्यवस्था, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का केंद्र बन चुकी हैं। पथमेड़ा जैसी प्रसिद्ध गौशालाओं में बाढ़ के दौरान हजारों गायों की मौत हुई। 1/.

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WARRIOR
WARRIOR@warrior6o·
@Ankur28141828 bio ki ncert reading jarur kariya bhai agar notes milja wese hi unse padh liya ya fir mere paaas ha ma bhej dunga mehnat karta reh bhai badhia trah bhot aage javega mahri duva ha tere pe
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Jon Snow
Jon Snow@Ankur28141828·
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TeamRLD
TeamRLD@TeamRLD1·
भाईचारा जिंदाबाद...💪🏻
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Rohit Agarwal
Rohit Agarwal@rohitagarwal850·
ब्राह्मण, जाट, गुर्जर के बाद अब राजकुमार भाटी ने यादवों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हुए। जिस आदमी के चरित्र में ही खोट हो वह खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है। हमें पूरी आशा है @yadavakhilesh जी शायद अब जाग जाएं और समाज के हो रहे अपमान पर अपनी चुपी तोड़े @rajkumarbhatisp
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जाट समाज
जाट समाज@JAT_SAMAAJ·
राजनीति में राजकुमार भाटी हैं, उनका परिवार नहीं! उसी प्रकार ये भी समझ लो - राजनीति में राजकुमार भाटी है, समाज की माँ-बहने नहीं। किसी कार्यक्रम/मंच से समाज की औरतों के लिए एसी बात कहना कतई भी सही नहीं। और जो आस-पास बैठ कर दाँत दिखा रहे थे, हंसने वाली बात तो ये राजकुमार भाटी का संदर्भ समझने के बाद भी नहीं लग रही।
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SanataniRiddhi
SanataniRiddhi@Ridhu417Sharma·
देख लो सड़कछाप चमचो तुम्हारी 🪳 कॉकरोच पार्टी के कनखजूरे को यह किनका पालतू कनखजूरा है।😃 @AamAadmiParty @CJP_2029 😃😃 अरे कनखजूरे तू तो बहुत पुराना पालतू है खुजलीवाल का।😃😃
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खूंटैला
खूंटैला@bhagat_128·
ओए शैम्पी बेटा, गूज़र प्राचीनकालीन राजपूतस् हैं;💀 दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी तक का 'राजपूत-इतिहास' गूज़रों का इतिहास है मेनळी मसळन् राजा भोज ऑफ माळवा मध्यप्रदेश!💥 हां आधुनिक गूजर बड़े मूर्ख है & आज इनका नेतृत्व गंवारों पे है; किन्तु राजू चाळाक हैं, हर किसी को डैडी बना ळेते हैं!👍
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Sudhir Mishra 🇮🇳
Sudhir Mishra 🇮🇳@Sudhir_mish·
मुस्लिम बेटियों को 30 हजार दिया- यह इंटरव्यू तब का है जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे- अखिलेश जी ने बताया था कि 30 हजार रूपये सिर्फ मुस्लिम बेटियों को दे रहे थे? SC-ST ,, OBC ,, सामान्य वर्ग की बेटियाँ गरीब नहीं थी क्या.... यह भेदभाव क्यों किया?🤔
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Thakur Voice 🚩
Thakur Voice 🚩@ArjunThaku70355·
#ghosi_Yadav बकरीद पर गाय बेचते हैं फिर यही लोग भगवान श्री कृष्ण के #फर्जी वंशज भी बनते हैं !!
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जाट समाज
जाट समाज@JAT_SAMAAJ·
सच्चाई यही है कि जाट समाज हमेशा अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाता आया है — फिर चाहे सरकार हुड्डा की रही हो, चौटाला की या खट्टर की। हर दौर में गलत नीतियों और फैसलों के खिलाफ आंदोलन हुए हैं। लेकिन अब हाल ये हो गया है कि जैसे ही जाट समाज किसी मुद्दे पर आवाज़ उठाता है, सरकार की IT सेल के “2 रुपये प्रति पोस्ट” वाले लोग उसे तुरंत जाट बनाम नॉन-जाट का रंग देने लगते हैं। कह दिया जाता है कि “इन्हें नॉन-जाट CM बर्दाश्त नहीं।” मतलब अब सरकार के गलत फैसलों पर सवाल उठाना भी जातिवाद कहलाएगा? हद तो तब है जब असली मुद्दों से ध्यान हटाकर समाजों को आपस में बांटने की कोशिश की जाती है। क्या महंगाई, बेरोज़गारी, किसानों के मुद्दे, खिलाड़ियों के साथ अन्याय या युवाओं के भविष्य की चिंता सिर्फ एक बिरादरी के मुद्दे हैं? ये सवाल और संघर्ष तो 36 बिरादरी को मिलकर उठाने चाहिए। #जाट_समाज
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