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☀️ नौतपा — गर्मियों के सबसे तपते 9 दिन वैज्ञानिक कारण: इन दिनों सूर्य की किरणें पृथ्वी पर लगभग सीधी पड़ती हैं, जिससे तापमान और लू अपने चरम पर होती है। 🌡️ मान्यता: कहा जाता है कि जितना तेज़ नौतपा तपेगा, उतना अच्छा मानसून और बारिश का मौसम रहेगा। 🌧️ #नौतपा #Summer #Heatwave #Monsoon



जैसलमेर के डंपिंग यार्ड में सैकड़ों गायों के शव पड़े हैं, तस्वीर हृदयविदारक है। यहां से MLA सत्ता पक्ष के है । गोभक्त सरकार राज्य में है क्या कर रही है


500 से अधिक गायों की लाशें मिली हैं, लेकिन मजाल है कि रामचरितमानस की कसम खाने वाला प्रतिनिधि या खुद को धर्मरक्षक बताने वाला कोई प्रभावशाली हिंदू खुलकर आवाज़ उठाए। जैसलमेर ज़िले की दोनों विधानसभा सीटों — जैसलमेर और पोकरण — से राजपूत विधायक हैं; छोटूसिंह भाटी और महंत प्रताप पुरी। लेकिन इतनी बड़ी घटना के बावजूद जिस तरह की चुप्पी दिखाई दे रही है, वह कई सवाल खड़े करती है। समस्या केवल घटना नहीं, बल्कि चयनात्मक नैतिकता है। धर्म, गौमाता, जीव रक्षा और पर्यावरण प्रेम की बातें अक्सर तभी ज़ोर पकड़ती हैं, जब वे चुनावी राजनीति, जातीय समीकरणों या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अनुकूल बैठती हों। बाकी समय वही मुद्दे अचानक मौन में बदल जाते हैं। जो लोग खुद को जीव रक्षा और पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा प्रहरी बताते हैं, वे भी ऐसी घटनाओं पर अक्सर गायब दिखाई देते हैं। मानो संवेदनशीलता भी व्यक्ति, जाति और राजनीतिक सुविधा देखकर तय की जाती हो। यदि किसी खान पर आरोप हो तो “जीव प्रेम” राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है, लेकिन जब किसी "सिंह" या स्थानीय सत्ता, जातीय प्रभाव या अपने लोग कटघरे में हों, तब पूरा जीव प्रेम “खाली पीली 18 की बात नहीं करने का…” वाले मौन में बदल जाता है। यही दोहरा मापदंड सबसे बड़ा प्रश्न है।


नैतिकता, समझदारी और सोच ही मनुष्य को बाकी प्राणियों से अधिक बुद्धिमान और शक्तिशाली बनाती है। यदि सड़क पर एक तरफ कोई पौधा हो और दूसरी तरफ कोई पशु या पक्षी, तो अधिकांश लोग पशु या पक्षी को बचाने की कोशिश करेंगे। उसी प्रकार यदि एक तरफ कोई इंसान हो और दूसरी तरफ कोई पशु, पक्षी या गाय हो, तो हर सामान्य मनुष्य पहले इंसान को बचाने की कोशिश करेगा। यही नैतिकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी जीव महत्वहीन हैं, बल्कि यह कि मनुष्य अपने नैतिक ढाँचे में जीवन का मूल्य-क्रम तय करता है। इसी नैतिकता के आधार पर मनुष्य पशु और इंसान को एक स्तर पर नहीं रखता। इसी कारण सभ्यता आगे बढ़ने के साथ मनुष्य ने हिंसा कम करने, खेती विकसित करने और स्थायी भोजन व्यवस्था बनाने की कोशिश की। मानव सभ्यता का विकास केवल तकनीकी विकास नहीं था, बल्कि हिंसा को नियंत्रित करने की प्रक्रिया भी था। एक समय था जब पूरी मानव जाति अपने से कमजोर जीवों को मारकर भोजन करती थी। लेकिन जैसे-जैसे सभ्यता विकसित हुई, वैसे-वैसे इंसानों में सोच और संवेदनशीलता भी विकसित होती गई। खेती और पशुपालन शुरू हुए। स्थायी समाज बने। तकनीकी विकास हुआ। यानी सभ्यता का अर्थ केवल मशीनें नहीं, बल्कि नैतिक नियंत्रण भी था। इसी प्रक्रिया में किसान और पशुपालक समाज ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। सदियों तक गाय, बैल, ऊँट और दूसरे पशुओं का संरक्षण इसलिए संभव हो पाया क्योंकि उस संरक्षण के पीछे आर्थिक संतुलन था। गाय दूध देती थी, बैल खेती करता था, ऊँट परिवहन करता था। यानी संरक्षण और उपयोग — दोनों साथ चलते थे। लेकिन आधुनिक तकनीक ने यह संतुलन तोड़ दिया। ट्रैक्टर ने बैलों की जगह ले ली। रासायनिक खाद ने जैविक खाद की जगह ले ली। मशीनों ने पशुओं के श्रम को अप्रासंगिक बना दिया। यानी पशुपालन का आर्थिक ढाँचा टूट गया। अब किसान के लिए किसी पशु का संरक्षण भावनात्मक रूप से तो संभव था, लेकिन आर्थिक रूप से कठिन होता चला गया। यहीं से समस्या शुरू हुई। किसी भी जीव का संरक्षण केवल भावनाओं के भरोसे नहीं चल सकता। संरक्षण हमेशा आर्थिक संरचना, उपयोगिता और जिम्मेदारी पर टिकता है। यही कारण है कि आज सबसे अधिक “गौमाता” कहे जाने के बावजूद गाय सबसे अधिक सड़कों पर आवारा दिखाई देती है, प्लास्टिक खाती दिखाई देती है और उपेक्षित दिखाई देती है। समस्या गाय से प्रेम की कमी नहीं है। समस्या संरक्षण की व्यावहारिक व्यवस्था के टूटने की है। लेकिन इसी बीच राजनीति ने गाय को धार्मिक भावनाओं और पहचान की राजनीति का हथियार बना दिया। धीरे-धीरे स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि गाय के नाम पर इंसान की हत्या को भी उचित ठहराया जाने लगा। भीड़ ने कानून की जगह लेनी शुरू कर दी। नैतिकता की जगह पहचान-आधारित उन्माद ने ले ली। यहीं सबसे बड़ा नैतिक पतन हुआ। क्योंकि जिस समाज में किसी पशु के नाम पर इंसान की हत्या सामान्य होने लगे, वहाँ नैतिकता नहीं, भीड़-मानसिकता शासन करने लगती है। 2014 के बाद गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की घटनाओं में अचानक वृद्धि दिखाई देने लगी। सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार 2014 से 2018 के बीच गोरक्षा के नाम पर 85 हिंसक घटनाएँ सामने आईं, जिनमें 34 लोगों की मौत हुई और 289 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। 2014 में ऐसे केवल 3 मामले सामने आए थे। 2015 में यह संख्या बढ़कर 12 हो गई। इन घटनाओं में 10 लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और 48 लोग घायल हुए। 2016 में 24 मामले सामने आए। 2017 में यह संख्या 37 तक पहुँच गई, जिसमें 11 लोगों की मौत हुई और 152 लोग घायल हुए। यानी भीड़ का आत्मविश्वास लगातार बढ़ता गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन घटनाओं में मारे गए अधिकांश लोग किसान, पशुपालक या सामान्य ग्रामीण थे। इनमें से अधिकांश मामलों में कोई संगठित गौ-तस्करी सिद्ध नहीं हुई। यानी जिन लोगों ने पीढ़ियों तक गायों का पालन किया, वही लोग सबसे अधिक संदेह, हिंसा और मॉब लिंचिंग का शिकार बने। इसका मनोवैज्ञानिक परिणाम क्या हुआ? डर। पशुपालकों और किसानों ने गाय पालना कम करना शुरू कर दिया। क्योंकि अब पशुपालन केवल आर्थिक बोझ नहीं था, बल्कि सामाजिक और कानूनी जोखिम भी बनता जा रहा था। और यहीं से गायों की दुर्दशा और बढ़ी। आज स्थिति यह है कि गायों के नाम पर सबसे अधिक भावनात्मक भाषण हैं, सबसे अधिक धार्मिक उन्माद है, सबसे अधिक चंदा है — लेकिन सबसे अधिक आवारा गायें भी वहीं हैं। यदि गौशालाएँ वास्तव में समाधान होतीं, तो आज गायें सड़कों पर नहीं दिखतीं। यदि भावनात्मक नारों से संरक्षण संभव होता, तो गायें प्लास्टिक खाकर नहीं मरतीं। वास्तविकता यह है कि अनेक गौशालाएँ स्वयं अव्यवस्था, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का केंद्र बन चुकी हैं। पथमेड़ा जैसी प्रसिद्ध गौशालाओं में बाढ़ के दौरान हजारों गायों की मौत हुई। 1/.















