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इंटरनेशनल लेबर डे (मज़दूर दिवस) सिर्फ़ कैलेंडर का एक पन्ना या सरकारी छुट्टी नहीं है, बल्कि यह शिकागो के शहीदों के खून से लिखा वो सुनहरा इतिहास है, जो मज़दूर वर्ग के हक़, सम्मान और सामाजिक न्याय का प्रतीक है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समाज की नींव बनाने वाले मज़दूरों और कर्मचारियों के पसीने की कीमत को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन अफ़सोस की बात है कि पंजाब की धरती, जिसने हमेशा ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है, आज मेहनती मज़दूर, कर्मचारी और मज़दूर सरकारी मशीनरी की बेरुखी और लगातार शोषण का शिकार हो रहे हैं। यह दिन हुक्मरानों को यह दिखाने का मौका है कि देश और राज्य का विकास करने वाले हाथ आज अपने ही बुनियादी हक़ के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
यह पंजाब सरकार के सरकारी नाइंसाफ़ी का सबसे काला उदाहरण है। ये टीचर, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के सुनहरे साल राज्य की शिक्षा व्यवस्था को समर्पित कर दिए हैं, दशकों की सेवा के बावजूद आज भी फुल-टाइम कर्मचारियों के बराबर हक़, बनती पेंशन, ग्रेच्युटी और रिटायरमेंट के फ़ायदों से महरूम हैं। सरकारों द्वारा समय-समय पर किए गए समझौते और वादे सिर्फ़ कागज़ साबित हुए हैं, जिससे इन टीचरों का भविष्य गहरे संकट में पड़ गया है। बिना किसी जॉब सिक्योरिटी और बिना समान पे स्केल के, इन टीचरों को लगातार झटके लग रहे हैं। यह कोई छोटी-मोटी एडमिनिस्ट्रेटिव चूक नहीं है, बल्कि शिक्षा के संस्थापकों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है, जो सरकार की नीयत और नीति दोनों पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
इसी तरह, पंजाब सरकार के लाखों कर्मचारियों को महंगाई भत्ता (DA) न देकर या जानबूझकर इसमें देरी करके, सरकार ने अपने ही कर्मचारियों पर भयानक आर्थिक बोझ डाल दिया है, जबकि पड़ोसी राज्य अपने कर्मचारियों को इससे कहीं बेहतर सुविधाएं दे रहे हैं। दूसरी ओर,
अनुसूचित जाति (दलित) मज़दूर वर्ग की पीड़ा और भी ज़्यादा दिल दहला देने वाली है। आज भी यह वर्ग बेरोज़गारी, ज़मीनहीनता, सामाजिक भेदभाव और आर्थिक असमानता की चक्की में पिस रहा है। कम वेतन, पढ़ाई के मौकों की कमी और हर चुनाव में किए जाने वाले खोखले भलाई के वादों ने इस मेहनतकश समुदाय को हाशिये पर धकेल दिया है। महंगाई के इस ज़माने में, जहाँ आम कर्मचारी DA के लिए परेशान है, वहीं दलित कर्मचारी दो वक्त की रोटी कमाने के लिए भी सामाजिक और आर्थिक ज़ुल्म झेल रहा है।
आज समय आ गया है कि मज़दूर, कर्मचारी, कंप्यूटर टीचर और दबे-कुचले वर्ग इन टूटे वादों और सरकारी बेरुखी के खिलाफ़ मिलकर और ज़ोरदार संघर्ष का बिगुल बजाएं। समाज और राज्य के विकास की रीढ़ की हड्डी का काम करने वाले इन वर्गों का शोषण किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। लेबर डे हमसे न सिर्फ़ अपनी आवाज़ उठाने की मांग करता है, बल्कि संघर्षों के ज़रिए सरकार को जवाबदेह भी ठहराता है। हम ज़ोर देकर मांग करते हैं कि हर काम करने वाले को बराबरी का हक़, पूरी पेंशन सुरक्षा, सही और समय पर मज़दूरी, DA की तुरंत बहाली और हाशिए पर पड़े मज़दूरों के लिए असली सामाजिक न्याय मिलना चाहिए। हक़ मांगने से नहीं मिलते, उन्हें एकजुट होकर छीनना पड़ता है—यही लेबर डे की सच्ची भावना और बड़ा संदेश है!
गुरप्रीत सिंह तारूआना


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@Gurpreet0531 ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਝੂਠੇ ਲਾਰਿਆਂ ਦੀਆਂ ਪੰਡਾਂ ਨੂੰ ਉਡੀਕ ਉਡੀਕ ਕੇ ਕੰਪਿਊਟਰ ਅਧਿਆਪਕ ਕੁਝ ਤਾਂ ਖਾਲੀ ਹੱਥ ਰਿਟਾਇਰ ਹੋ ਕੇ ਆਪਣੇ ਘਰਾਂ ਨੂੰ ਤੁਰ ਗਏ ਹਨ ਅਤੇ ਕੁਝ ਇਸ ਜਹਾਨੋ ਤੁਰ ਗਏ ਹਨ
ਝੂਠਾ ਦਿਵਾਲੀ ਗਿਫ਼ਟ ਮੰਤਰੀ
ਝੂਠਾ ਮੀਟਿੰਗ ਮੁਲਤਵੀ ਮੰਤਰੀ
#jusiceforcfPunjab
#punjabsikhiakranti
#28aprile2026
PA
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सर्विस / धोखा — एक दिल दहला देने वाली कहानी
15 साल की ईमानदार, समर्पित और चुपचाप सर्विस के बाद, जब पंजाब का एक कंप्यूटर टीचर रिटायर होता है, तो उसके पास न कोई happiness होती है, न सिक्योरिटी, सिर्फ़ खालीपन। न पेंशन, न ग्रेच्युटी, न ही वो बेसिक अधिकार जो एक सरकारी कर्मचारी की ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव को सुरक्षित बनाते हैं। जिस अपॉइंटमेंट लेटर ने कभी उसे भरोसा दिलाया था कि उसकी सर्विस पंजाब सिविल सर्विसेज़ नियमों के तहत आएगी, वही कागज़ आज टूटे हुए वादे की याद दिला रहा है। यह सिर्फ़ कानूनी उल्लंघन नहीं है — यह भरोसे के साथ धोखा है।
यह कहानी सिर्फ़ एक टीचर की नहीं है, यह हर उस इंसान की आवाज़ है जिसने अपने सपने, अपनी जवानी और अपना समय सिस्टम को दिया है। जब सालों से स्टूडेंट्स का भविष्य बनाने वाला टीचर अपने ही भविष्य के लिए हाथ फैलाने को मजबूर हो जाए, तो यह समाज के लिए शर्म की बात है। “एक पैसा भी नहीं” — ये शब्द सिर्फ़ पैसे की तंगी नहीं दिखाते, ये टूटी हुई इंसानी इज़्ज़त की आवाज़ हैं।
यह सिर्फ़ एडमिनिस्ट्रेशन की गलती नहीं है, यह इंसानी भावनाओं की नाकामी है। जब एक टीचर अपनी ज़िंदगी के सबसे अच्छे साल क्लासरूम में बिताता है, तो रिटायरमेंट पर उसे सिक्योरिटी नहीं, बल्कि इग्नोरेंस मिलती है — यह एक तरह की साइलेंट पनिशमेंट जैसा है। यह उसकी मेहनत का मज़ाक है, उसके भरोसे का अंत है।
जो स्टेट “मॉडल” माना जाता था, वह आज अपने ही एम्प्लॉई का भरोसा तोड़ रहा है। यह हालत सिर्फ़ एक इंसान की नहीं है, यह पूरे सिस्टम पर एक काला धब्बा है। जब वादे सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं और असलियत में टूट जाते हैं, तो यह साबित होता है कि सिस्टम को सिर्फ़ काम चाहिए — लोग नहीं।
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