محمد صدام حسین

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@SADDAMGAF

Tera mera rishta kya ? لا اله الا الله

India เข้าร่วม Kasım 2019
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محمد صدام حسین
محمد صدام حسین@SADDAMGAF·
बैंक ऑफ़ इंडिया बदडीहा ब्रांच में हमने अपने बच्चों का बचत खाता लगभग 3 महीने पहले खुलवाया था आज तक पासबुक नहीं मिला है ! बार-बार कोई ना कोई बहाना बनाकर वापस भेज दिया जाता है कभी स्टाफ नहीं है तो कभी मशीन खराब है तो कभी कुछ कभी कुछ @BankofIndia_IN आप ग्राहकों के धैर्य को.....
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*उम्मत की फ़िक्र के साथ इमामों की भी फ़िक्र ज़रूरी: सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी* इंदौर। दरगाह मैदान सोनवाय शरीफ़ में आज एक भव्य और ऐतिहासिक इस्लाही जलसे का आयोजन किया गया, जिसमें उलमा-ए-किराम, मशायख़ और नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के परस्तारों ने बड़ी तादाद में शिरकत की। जलसे में इस्लाम, इल्म और उम्मत की तरक़्क़ी के साथ-साथ, “इमाम-ए-मस्जिद के हक़ूक़ और उम्मत की ज़िम्मेदारियां” जैसे अहम मौज़ू पर रूहानी बयानात पेश किए गए। कार्यक्रम की सरपरस्ती दारुल उलूम नूरी के शैखुल हदीस, मुफ़्ती-ए-आज़म मालवा, पीरे तरीक़त, हज़रत मौलाना मुफ़्ती नूरुल हक़ साहब ने फ़रमाई। जबकि जलसे के मुख्य अतिथि ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, ख़लीफ़ा-ए-मुफ़्ती-ए-आज़म मालवा, हमदर्दे-क़ौम व मिल्लत, पीरे तरीक़त, हुज़ूर सैफ़े मिल्लत, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब थे। *सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब का बयान* अपने रूहानी और असरदार बयान में सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने फ़रमाया कि उम्मत की फ़िक्र करना, इमामों का शेवा है, लेकिन अब वक़्त आ गया है कि उम्मत भी इमामों की फ़िक्र करना शुरू करे।” उन्होंने कहा कि इमाम-ए-मस्जिद सिर्फ़ नमाज़ पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि उम्मत के रूहानी रहबर, सर का ताज और समाज की इस्लाही रहनुमाई करने वाले होते हैं। हर मोहल्ले, गांव और शहर को चाहिए कि अपने इमाम को इज़्ज़त और एहमियत दे, ताकि वह चैन और सुकून से दीन की ख़िदमत कर सकें। जिस इलाक़े में इमामों की इज़्ज़त और ख़िदमत की जाती है, वहां अल्लाह का फ़ज़ल, रहमत और बरकत नाज़िल होती है। *इमामों के हक़ूक़ पर बयान* सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने “इमामों के हक़ूक़” का ज़िक्र करते हुए कहा कि: इमाम की इताअत और ताअज़ीम की जाए। इमाम की ग़ीबत और बदगुमानी से बचा जाए। इमाम को रूहानी रहबर समझा जाए, न कि कर्मचारी। इमाम की सलाह और मशवरे को अहमियत दी जाए। इमाम और उनके परिवार का ख़ास ख्याल रखा जाए और सबसे बढ़कर, दिल खोलकर इमाम से मोहब्बत की जाए। *उम्मत के नाम पैग़ाम* सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने उम्मत से अपील की कि अपने इमामों को तन्हा मत छोड़ो, उनके साथ मिलकर मस्जिदों और समाज की इस्लाही तहरीक में हिस्सा लो और हर हाल में इमामों को खुश रखो। *अंत में उन्होंने दुआ की* या अल्लाह! हमारे इमामों को इल्म, अमल और इज़्ज़त अता फ़रमा और हमें उनकी इज़्ज़त और ख़िदमत करने की तौफ़ीक़ अता फरमा। *जलसे में शिरकत* इस मौक़े पर हज़रत मौलाना तौसीफ़ रज़ा, हज़रत मौलाना अमजद ख़ान, नूरी जामा मस्जिद कमेटी के सदर हाजी एहसान पटेल (सरपंच), नायब सदर हाजी सूफ़ी पप्पू पटेल, हाजी अरब अली पटेल, कमेटी के तमाम ज़िम्मेदारान और समाजसेवी बड़ी तादाद में मौजूद थे। महफ़िल का समापन दरूद व सलाम और दुआ-ए-ख़ैर पर हुआ। उसके बाद सभी को लंगर खिलाया गया।
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
इस्लाहे मुआ़शरा कांफ़्रेंस 📅 तारीख़: 02 नवंबर 2025 🕋 दिन: बरोज़ इतवार 🕰 वक़्त: बाद नमाज़-ए-ईशा 📍 मक़ाम: आस्ताना-ए-आलिया, दरगाह मैदान, सोनवाय शरीफ़, ज़िला इंदौर (म.प्र.) 💫 ज़ेरे सरपरस्ती: 🕌 हुज़ूर मुफ़्ती-ए-आज़म मालवा, पीरे तरीक़त, रहबरे शरीअ़त, हज़रत अल्लामा, मौलाना, मुफ़्ती अल्हाज *मोहम्मद नूरुल हक़* साहब क़िब्ला (शैख़ुल हदीस, दारुल उलूम नूरी, इंदौर) 🔥 मेहमाने ख़ुसूसी व ख़ुसूसी ख़िताब: 🌟 ख़लीफ़ा-ए-हुज़ूर मुफ़्ती-ए-आज़म मालवा, मुहाफ़िज़े नामूसे रिसालत, हमदर्दे क़ौम व मिल्लत, पीरे तरीक़त, हुज़ूर सैफ़े मिल्लत, हज़रत मौलाना *सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी* साहब क़िब्ला (चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, गौसे आज़म फ़ाउंडेशन, जयपुर, राजस्थान) 🎤 ज़ेरे निज़ामत: हज़रत मौलाना हाफ़िज़ *मोहम्मद तौसीफ़ रज़ा* साहब क़िब्ला (ख़तीब व इमाम, रहमानिया मस्जिद, नायता मुंडला, इंदौर) 🌺 ज़ेरे इनायत: जनाब डॉक्टर *सय्यद क़ाज़ी इशरत अली* साहब क़िब्ला (सुन्नी उलमा काउंसिल, इंदौर) 🕊 ख़ुसूसी नातख़्वाँ: 🎵 बुलबुले बाग़े मदीना, हज़रत क़ारी *मोहम्मद तालीब हुसैन अशरफ़ी* साहब क़िब्ला (धरमपुरी, ज़िला धार) 🌷 तिलावते कलामे पाक: हज़रत हाफ़िज़ व क़ारी *अमजद रज़ा ख़ान* साहब (नायब इमाम, नूरी जामा मस्जिद, सोनवाय) 🤲 पैग़ामे इस्लाह: मोहतरम दीनी भाईयो! इस जलसे का मक़सद समाज की इस्लाही, रूहानी और तालीमी जागरूकता को आम करना है। आप तमाम बिरादराने इस्लाम से दरख़्वास्त है कि कसीर तादाद में शिरकत फ़रमाएं और उलमा-ए-किराम के नूरानी, ईरफ़ानी और हक़्क़ानी बयानात से अपने दिलों को रौशन करें। 🕌 आपकी हाज़िरी न सिर्फ़ सवाब का ज़रिया होगी, बल्कि मुआ़शरे की इस्लाही तहरीक का हिस्सा भी बन जाएगी। 🍛 नोट: प्रोग्राम के बाद लंगर-ए-आम का भी शानदार एहतमाम रहेगा। सब हज़रात से गुज़ारिश है कि अपने अहबाब के साथ शिरकत फरमाएं। 🕋 मिनजानिब: सदर: जनाब हाजी *एहसान पटेल* (सरपंच) साहब, नायब सदर: जनाब हाजी सूफ़ी *पप्पू पटेल* साहब व *जुमला मेम्बरान*: नूरी जामा मस्जिद कमेटी, सोनवाय शरीफ़, इंदौर (म.प्र.) *🔥 “इस्लाहे मुआशरा की रूहानी शमअ, उलमा-ए-किराम की ज़बान से रौशन होगी!” 🔥* *🌙 आईए, इल्म, अमल और मोहब्बत की इस महफ़िल का हिस्सा बनिए! 🌙*
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OhWhySo
OhWhySo@OhWhySo·
@Chief_Qazi @Allah_Ki_Talwar @grok @SADDAMGAF @gfaareh @Abu_Hozaifa_786 @abdul_burg_ @Baha_Misbahi @ImranGifted @Fuzail_Barkati @MohiuddinH18204 @SahinKh85218038 @AnwarKhan6233 @imran_misbahi55 @iqbal92 @AFROZKHAN_92 @SaleemRazaNoori @raza_qureshi @QAAAADRI Kise khush karne me lage ho? Wahabiyon ko? Jo bolte hain milad karke khichde khakar 11 mana kar imaan taza karte hain ibadat chod kar nhin bolte hai Ibadat ke baad ye sab karte hain aur waqai iman taza hoti hai. Sirf fayde ke liye sufi jod lene se sufi nhin ho jayega.
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*ईमान देग से नहीं, सजदों से ताज़ा होता है* जिस्म की ताज़गी तो स्वादिष्ट पकवानों से हो सकती है लेकिन ईमान की ताज़गी सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की इताअ़त (आज्ञापालन) से होती है। जब इंसान नमाज़, रोज़ा, ज़कात, और नेक अमल करता है तो उसका दिल रौशन होता है, ईमान मज़बूत होता है। लेकिन अगर कोई सिर्फ़ खाने-पीने को “ईमान ताज़ा करने” का ज़रिया बताए तो यह समझ की कमी है, न कि दीनी बात। ईमान कोई थकने-जागने वाला जिस्मानी हिस्सा नहीं बल्कि वह रूह की हालत है जो इबादत, तस्लीम व रज़ा और ख़ुलूस से मज़बूत होती है। इसलिए यह कहना कि “हम तो मीलाद का खाना खाकर या किसी अवसर का पकवान खाकर ईमान ताज़ा करते हैं” — यह बात रमज़ और महफ़िल की रौनक़ तो बढ़ा सकती है, मगर ईमान की असल ताज़गी का कारण नहीं बन सकती। *ईमान को ताज़ा करने के सही रास्ते वे हैं जो क़ुरआन और सुन्नत ने बताए:* नमाज़ों की पाबंदी, तिलावते क़ुरआन, ज़िक्रे इलाही, दरूद व सलाम, नेकियों में सबक़त और अल्लाह व उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुक्मों की पाबंदी। जब इनसे दिल सजता है, तो बंदा अपने रब के क़रीब होता है और यही असली “ईमान की ताज़गी” है। खाना-पीना, देग, सब अपनी जगह लज़ीज़ चीज़ें हैं, लेकिन उनसे रूह की नहीं, जिस्म की ताज़गी मिलती है। इसलिए मुसलमान को चाहिए कि “ईमान को खुराक” दे अ़मले सालेह (नेक काम) से और “जिस्म को खुराक” दे हलाल रोज़ी से। वरना हाल ये होगा कि ईमान ताज़ा नहीं होगा, सिर्फ़ पेट ताज़ा होगा। 😄 नोट: रौंग नम्बरों से खुद भी बचिए और दूसरों को भी बचाइए। *सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी* चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन वीडियो यहां देखें 👇👇👇
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🇮🇳Jitendra pratap singh🇮🇳
🔴 अरे ओ सुप्रीम दल्लों, यदि भारत एक सेकुलर देश है तो उसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ क्या कर रहा है? पूछता है भारत...
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Chandan Sharma
Chandan Sharma@ChandanSharmaG·
गौ रक्षक मोनू मानेसर को भुल गए? हरियाणा में भाजपा राजस्थान में भाजपा केंद्र सरकार में भाजपा फिर भी मोनू मानेसर का कुछ पता नहीं कि कब जेल से बाहर आएंगे? इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा?
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Sanjay Dixit ಸಂಜಯ್ ದೀಕ್ಷಿತ್ संजय दीक्षित
पाकिस्तान के पेशावर में कल एक लड़के ने अपनी माँ की इसलिए हत्या कर दी क्यूंकि माँ ने कह दिया कि धरती गोल है। लड़के ने कहा कि कु रान तो कहती है धरती चपटी है तो तुमने कु रान की तौहीन कर दी है इसलिए तुम वाजिब उल क़त्ल हो गई हो। जी कु रान कहती है आयत 15.19 में कि धरती चपटी है, और 29.8, 9.23, 9.84, 9.113, 31.15, 60.4 में कहती है कि जो माता पिता काफ़िर हो उनसे घृणा करो। बद्र के युद्ध में कई मुयलमानों ने अपने काफ़िर पिता व अन्य परिवार जनो की हत्या की थी इसलिए ये सुन्नत भी है। इसलिए उस लड़के ने सच्चा इलसाम ही लागू किया। ये महर्षि पाणिनि का क्षेत्र है। लड़का आज भी हिंदू होता तो प्रात माता के चरण छूकर किसी विद्यालय में संस्कृत पढ़ रहा होता। हम हिंदू धर्म को नहीं बचाएंगे तो पचास सौ साल बाद हमारे वंशज ऐसे ही राक्षस बनेंगे। हम आज मुफ्तखोरी के लालच में, जाति की झूठी शान में, अपनी जाति के वोट बैंक मैनेजरो, चोट्टो, ठगो, लुटेरों को वोट देंगे तो अपने बच्चों को पेशावर जैसा शापित समाज ही देंगे।
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محمد صدام حسین
محمد صدام حسین@SADDAMGAF·
हवाई चप्पल वाले हवाई जहाज में चढ़ते हुए 😂😂😂 #छठी_मैय्या #छठ #ChhathPuja #c
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محمد صدام حسین
محمد صدام حسین@SADDAMGAF·
बिल्कुल छोड़ देना चाहिए ताकि इन सेक्युलर हिन्दू भाइयों का परिवार भी गोबर और मूत्र जैसी घिन्न गंदगी से बचा रहे..... @saddamgaf
Manoj Srivastava@ManojSr60583090

*ये मुंबई का पेठपाड़ा है* *सारे सेक्यूलर हिंदुओं को* *परिवार सहित* *इसी भीड़ के बीच में छोड़ देना चाहिए*

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محمد صدام حسین
محمد صدام حسین@SADDAMGAF·
@ManojSr60583090 बिल्कुल छोड़ देना चाहिए ताकि इन सेक्युलर हिन्दू भाइयों का परिवार भी गोबर और मूत्र जैसी घिन्न गंदगी से बचा रहे.....
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Manoj Srivastava
Manoj Srivastava@ManojSr60583090·
*ये मुंबई का पेठपाड़ा है* *सारे सेक्यूलर हिंदुओं को* *परिवार सहित* *इसी भीड़ के बीच में छोड़ देना चाहिए*
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Mohammed Zubair
Mohammed Zubair@zoo_bear·
"We faced Bullets, Teargas shells" 🤡 Dramebaaz Joker. Propaganda failane ke liye ground reporting ki kya zaroorat hai...
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SA_Razvi
SA_Razvi@SarfrazRaza313·
जो कौम अपनी तारीख़ भूल जाती है, वह कौम मुर्दा कहलाती है। दुनिया में बसने वाली हर कौम अपनी महान हस्तियों की तारीख़ें बनाती है, चाहे वह विलादत की तारीख़ हो या इंतिक़ाल की तारीख़। चाहे वह उस कौम की आज़ादी की तारीख़ हो या उसके निखार की तारीख़। यहूद आज तक मस्जिद-ए-अक़्सा में अपनी तारीख़ ढूँढ रहे हैं, कभी ताबूत-ए-सकीना के रूप में, तो कभी आसाया-ए-मूसवी के रूप में। ईसाई अपनी तारीख़ ढूँढ रहे हैं। पर यह कैसी बदनसीबी है मुस्लिम कौम के उन चंद फ़िरक़ों की, जो अपनी तारीख़ को ख़ुद अपने हाथों से मिटाने की कोशिश कर रहे हैं। कभी मोहर्रम में शहादत-ए-हुसैन को न मनाने की बात कहकर, तो कभी मिलाद न मनाने की बात कहकर, नबी की विलादत की तारीख़ मिटाना चाहते हैं। कभी बुज़ुर्गान-ए-दीन के उर्स न मनाने की बात कहकर, तो कभी मेराज-उन-नबी की याद को बिदअत कहकर। जबकि क़ुरआन कहता है कि अल्लाह के दिनों को याद करो। कभी क़ुरआन कहता है, किताब में इब्राहिम को याद करो। कभी क़ुरआन फ़रमाता है, किताब में मूसा को याद करो। कभी कहता है, असहाब-ए-फ़ील के वाक़िए को याद करो। कभी कहता है, लुक़मान को याद करो, कैसा हिकमत वाला बंदा था। कभी फ़रमाता है, याह्या को याद करो। {सूरह अम्बिया, सूरह मरियम, सूरह आल-ए-इमरान, सूरह ताहा, सूरह शुअरा में} बार-बार अल्लाह के महबूब बंदों की याद मनाने का हुक्म दिया जा रहा है। अब प्लीज़ जुलूस और दूसरी तक़रीबों की उन ख़ुराफ़ात का ज़िक्र न करने लग जाना, जो जहालत की बुनियाद पर होती हैं। और याद रखो, अगर हाथ में तकलीफ़ हो, तो तकलीफ़ को दूर किया जाता है, हाथ को नहीं काटा जाता। इसलिए ख़ुराफ़ात को दूर करने की बात करो, तारीख़ों को मिटाने की नहीं। #कॉपी
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MOHAMMAD SAIFULLAH
MOHAMMAD SAIFULLAH@Allah_Ki_Talwar·
*शहर में निकाला गया ईद मिलादुन्नबी का ऐतिहासिक जुलूस* * पूरे देश ने मनाया पंद्रह सौ साला ईद मिलादुन्नबी * ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन ने किया निशुल्क शुगर की दवा का वितरण * जुलूस में बाँटी गई मिठाइयाँ, उलमा का किया गया शानदार इस्तक़बाल * सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी का जगह जगह हुआ शानदार स्वागत रबीउल अव्वल की रौनक़ और नबी-ए-पाक सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की आमद का जश्न आज शहर की गलियों में अपनी पूरी शान व शौकत के साथ नज़र आया। हज़ारों अक़ीदतमंदों की मौजूदगी में जुलूसे मोहम्मदी निकाला गया, जिसने शहर की फ़िज़ा को "नारा-ए-तकबीर, नारा-ए-रिसालत" की सदाओं से गूंजा दिया। ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन (जीएएफ़) की जानिब से इस मौक़े पर इंसानी भलाई की अनूठी मिसाल पेश की गई। मर्कज़ी सुन्नी मदीना मस्जिद के पास “शुगर का राजा” दवा का निशुल्क वितरण किया गया, जिससे बड़ी संख्या में लोगों ने लाभ उठाया। जुलूस में शामिल बच्चों को मिठाई, केक और बिस्किट बाँटे गए, जबकि उलमा-ए-किराम और जलूस के जिम्मेदारों को फूलों की मालाओं से नवाज़कर उनका इस्तक़बाल किया गया। ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने कहा कि ईद मिलादुन्नबी का जुलूस सिर्फ़ जश्न नहीं बल्कि सीरत-ए-नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को याद करने और अमन व मोहब्बत का पैग़ाम देने का ज़रिया है। उन्होंने कहा कि अगर हम अपनी ज़िंदगी में नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तालीमात उतार लें तो समाज से नफ़रत और तफ़रक़ा हमेशा के लिए मिट सकता है। 1500 सालह जश्ने ईद मिलादुन्नबी पर ग़ौसे आज़म फाउंडेशन गोरखपुर और बस्ती मंडल ख़लीलाबाद की टीमों ने मदरसा हुसैनिया और मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत नुरुल उलूम के जुलूसों में भी बच्चों को बिस्किट, पानी और फ्रूटी बाँटकर ख़ुशियाँ बांटीं। उलमा और जुलूस के जिम्मेदारों को मालाएँ पहनाकर उन्हें मुबारकबाद दी गई। इस मौक़े पर ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के राष्ट्रीय महासचिव मोहम्मद ओसामा सैफुल्लाह, जिला अध्यक्ष समीर अली, रियाज अहमद, मोहम्मद जैद, अमान अहमद, मोहम्मद जैद कादरी, मोहम्मद शारिक, नूर मोहम्मद दानिश, समीउल्लाह अंसारी समेत कई ज़िम्मेदारान मौजूद रहे। खलीलाबाद से शहान रज़ा, दिलशाद, जुबेर अंसारी, हाफ़िज़ अशरफ़, शादाब, नबी हसन और मोहम्मद वक़ार अहमद (अध्यक्ष, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन, बस्ती मंडल) ने जुलूस को कामयाब बनाने में अहम भूमिका निभाई।
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