Ashfaq Qureshi retweetledi

22 अक्टूबर 1900 शाहजहाँपुर की पवित्र मिट्टी ने उस दिन एक ऐसे सपूत को जन्म दिया, जिसने अपनी हर सांस मातृभूमि को अर्पित कर दी। नाम था अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, जिनकी रगों में लहू नहीं, आग बहती थी आज़ादी की आग, जो ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिलाने वाली थी।
वह कोई साधारण युवक नहीं थे। उनके हृदय में देशभक्ति की ज्वाला इतनी प्रखर थी कि उन्होंने चैन और आराम के मार्ग को छोड़कर संघर्ष और बलिदान का पथ चुना।
राम प्रसाद बिस्मिल के साथ उन्होंने जब काकोरी कांड का बीड़ा उठाया, तो यह केवल एक ट्रेन लूट नहीं थी यह गुलामी के विरुद्ध पहला विद्रोही गर्जन था जिसने अंग्रेज़ी सत्ता की चूलें हिला दीं।
19 दिसंबर 1927 की सुबह जब फैजाबाद जेल की दीवारों ने उनकी अंतिम सांस को महसूस किया, तब इतिहास ने अपने पन्ने थाम लिए।
उनकी यह वाणी आज भी हर भारतीय के हृदय में विश्वास और साहस का दीपक जलाती है।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ हिंदू-मुस्लिम एकता की वह ज्योति थे जिसने आज़ादी के आंदोलन को नई आत्मा दी।
राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ दो आत्माएँ, एक लक्ष्य: भारत की स्वतंत्रता। उनकी मित्रता आज भी हमें बताती है कि जब उद्देश्य पवित्र हो, तो मज़हब नहीं, केवल मातृभूमि की सेवा मायने रखती है।
उनकी कविताएँ आज भी हवा में तैरती हैं, जवानों के दिलों में जोश जगाती हैं, और हर इंसान को यह याद दिलाती हैं कि अमरता बलिदान से ही मिलती है।
आज जब हम “भारत माता की जय” का नारा लगाते हैं, कहीं न कहीं अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की मुस्कान उस पुकार में घुल जाती है। उन्होंने मौत को गले लगाकर यह दिखा दिया कि गुलामी की जंजीरों से बेहतर है फाँसी की रस्सी जो झूलते हुए भी वतन के तिरंगे को सलाम करती है।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ अमर हैं, क्योंकि उनका जीवन केवल इतिहास नहीं, प्रेरणा है। हर बार जब कोई युवा देश के लिए कुछ करने की ठानता है वही दीपक फिर जल उठता है, जिसे शाहजहाँपुर के उस सपूत ने प्रज्वलित किया था।

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