Acharya Azad Singh
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Acharya Azad Singh
@AzadSin17497289
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एक चीज आप ने गौर की है? जो अशोक गहलोत जी मुख्यमंत्री रहते हुए तो कांग्रेस पार्टी के विधायकों और मंत्रियों से भी नहीं मिलते हैं, जैसे ही मुख्यमंत्री पद जाता है उन्हें गरीब याद आ जाते हैं, फिर PR के लिए इस प्रकार की स्क्रिप्टेड रीलें बनती है और इस बार तो उनका PR इतना घटिया तरीके से कराया जा रहा है कि बच्चा भी बोल सकता है ये पुरी तरह से स्क्रिप्टेड है। अशोक गहलोत जैसे व्यक्ति को अगर अपने आपको गरीबों का गणेश और राजनीति में रिलेवेंट दिखने के लिए इस प्रकार के प्रायोजित चीजें करनी पड़े तो आप समझ सकते हैं कि वर्तमान राजनीति में उनकी पकड़ कहां तक है और उनकी जादूगरी कांग्रेस आलाकमान के आशीर्वाद के बिना कितनी गहरी है? मैंने हमेशा से कहा है और फिर कह रहा हूं कि ये आदमी जादूगर से ज्यादा एक कठपुतली की तरह इस्तेमाल किए गए नेता हैं। आप आजादी से पहले राजस्थान का इतिहास, सामाजिक वर्चस्व और आजादी के बाद में 2018 तक भाजपा की स्थिति समझेंगे तो हर चीज आपको समझ आएगी कि जिस वर्ग ने कांग्रेस में कठपुतली के तौर पर इन्हें क्यों चुना गया था और आज उन्हीं लोगों द्वारा राजनीति से ही क्यों साइडलाइन किया जा रहा है जिसमें " चौथी बार गहलोत सरकार, नहीं तो भाजपा सरकार" के नारे खुद गहलोत जी साइड से लगवाए जा रहे हैं। उस वर्ग ने अब अशोक गहलोत को कठपुतली की तरह इस्तेमाल कर के छोड़ दिया है, क्योंकि उन्हें बीजेपी में अपनी चीजें सुदृढ़ सुसज्जित मिल गई है, ऊपर से कांग्रेस आलाकमान का आशीर्वाद खुद गहलोत जी ठुकरा चुके हैं, तो इनकी जादूगरी ( जो कभी थी नहीं) अब सिर्फ रील में दिख रही है जो खुद अपने आप में अशोक गहलोत को फिर से delusion में रखकर किया जा रहा एक स्वांग है, ठीक वैसे ही जैसे 2020-2023 के बीच किया गया था जिसकी वजह से कांग्रेस की सरकार रिपीट नहीं हो पाई थी, लोग भी वही है, चाल भी वही है। अब गहलोत जी के हाथ में है कि वो खुद की राजनीति के साथ बेटे की राजनीति खत्म करवाते हुए कांग्रेस को हरवाने के लिए इस्तेमाल होते हैं या अपने आप को मजबूत करते हुए, कांग्रेस की मजबूती के लिए प्रयास कर के वैभव गहलोत के साथ राजस्थान कांग्रेस के लिए भी एक शानदार राजनीतिक विरासत, मजबूत सामाजिक गठजोड़ छोड़ कर जाते है, खुद की जादूगरी, खुद के वर्चस्व के दम पर चौथी बार गहलोत सरकार बना पाते हैं।




जंगीपाड़ा, भवानीपुर, रैना, सतगछिया, खड़ग्राम, नवग्राम, कांडी, जंगीपुर, बेलडांगा सहित लगभग 15 सीटें तो ऐसी हैं, जहाँ तृणमूल जितने वोटों से हारी है, उससे थोड़ा ही अधिक वोट राहुल गांधी के उम्मीदवार लेकर गए हैं।



सीकर, राजस्थान यज्ञ में दलित समाज के व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को शामिल नहीं होने दिया जाएगा। ~ वैदिक पंडित @SikarPolice इस जातिवादी कीड़े को sc-st act में अरेस्ट करें हालांकि दलितों के इस तरह के फिजूल कार्यक्रमों में जाने पर कानूनी रोक भी लगनी चाहिए।



Paying 3,000 for an LPG cylinder is still better than having Congress in power.





क्या ऐसे बयान पर मुक़दमा दर्ज नहीं किया जाना चाहिए??? जो व्यक्ति सरेआम वैदिक परंपरा के नाम पर एक वर्ग विशेष को अपमानित करने का प्रयास कर रहा है उसे जेल के सलाखों के अंदर होना चाहिए!




कांग्रेस के नेताओं को बीजेपी वाले हलकान किए रखते हैं। एक ऐसी पार्टी जिसने देश में आज़ादी के बाद से राज किया और जो 1885 में बनी है, उसे 1980 में बनी पार्टी ने नहीं, कांग्रेस में कल तक रहे एक अदने से उस नेता ने हलकान कर रखा है, जिसे राहुल गांधी ने अपने कुत्ते से भी अधिक तवज्जो देना उचित नहीं समझा। खेड़ा साहब को कई पीढ़ियों के एक महान् वकील साहब ने सिर्फ़ जमानत भर दिलवाई है और वो भी सुप्रीम कोर्ट से। एफ़आईआर क्ववैश नहीं करवाई। यह तो ऐसा ही है कि बेटा माँ से रोटी माँग रहा था तो माँ ने उसे दीवार में बने आळे में बिठा दिया। बेटा रोटी मांगना भूल गया और आळे में फंसने से बेहाल होकर वहाँ से उतारने के लिए रोने लगा। माँ ने उतारा नहीं, बस कहा कि उतार रही हूँ तो बच्चा चुप हो गया। ऐसे कोई राजनीति होती है भला। क्या इतने बड़े नेताओं को एंटीसिपेट्री बेल करवानी चाहिए? क्या नेहरू, गांधी और दूसरे महान् नेताओं से यही सीखा। वे किस दिन एंटी सिपेट्री बेल करवाकर बाहर आए थे? आज भी देश में जाने कितने ही युवा लोग जेलों में बिना किसी कारण फ्रेम्ड केसेज में बंद हैं। लेकिन ये लोग उन्हें बाहर करवाने के लिए कुछ नहीं करेंगे। फ़ुज़ैल जाफ़री का एक शेर है : एहसास-ए-जु़र्म जान का दुश्मन है 'जाफ़री' है जिस्म तार तार सज़ा के बग़ैर भी।









विधायक की शिकायत पर पुलिस ने तीन कर्मचारियों को गिरफ्तार तो कर लिया, लेकिन क्या शिकायत को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य भी जुटाए गए हैं? जिस तरह विधायक हमले और आंख में चोट का वर्णन कर रहे हैं, वह उनके हाव–भाव और सार्वजनिक उपस्थिति से मेल नहीं खाता। संबंधित कर्मचारी अनुसूचित जाति से आते हैं और निजी कर्मचारी एक प्रतिष्ठित कंपनी से है ऐसे में उनका पक्ष सुने बिना की गई कार्रवाई एकतरफ़ा प्रतीत होती है।




