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Better to not know which moment may be your last, alive to be mystery of it all....

India Katılım Temmuz 2020
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PARAS TANVESH@ParasTanvesh·
दिल ढूँढता है, फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...
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Science Journey
Science Journey@ScienceJourney2·
🔥 इब्न बतूता की आँखों से सती प्रथा का भयावह सच (ब्राह्मणवादी परंपरा की जकड़न में औरत की जलती हुई देह का इतिहास) ⸻ 🕊️ 14वीं सदी का भारत: एक यात्री की दृष्टि से 14वीं सदी का भारत—दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक का शासनकाल। अरब से आया एक यात्री, इब्न बतूता, इस भूमि के वैभव, विविधता और धार्मिकता से अभिभूत था। उसने भारत के नगरों, धर्मस्थलों, राजाओं और आम जनता के जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण किया। परन्तु इसी यात्रा के दौरान उसकी आँखों ने एक ऐसा दृश्य देखा, जिसने उसे भीतर तक हिला दिया — “सती प्रथा” का दृश्य। इब्न बतूता ने अपनी पुस्तक “रिहला” (जिसका हिंदी अनुवाद “इब्न बतूता की भारत यात्रा”, लेखक – मदनगोपाल, में मिलता है) में विस्तार से लिखा है। ⸻ 🔥 इब्न बतूता का प्रत्यक्ष अनुभव: वह लिखता है — “मैंने देखा कि एक हिंदू स्त्री अपने पति की चिता की ओर जा रही थी। वह सजी-धजी थी, जैसे किसी उत्सव में भाग लेने जा रही हो। आगे-आगे नगाड़े बज रहे थे, और पीछे लोग ‘जय’ के नारे लगा रहे थे। उसके हाथ में एक दर्पण था, जिससे वह अपने चेहरे को निहारती जाती थी। चारों ओर ब्राह्मण और स्त्रियाँ भजन गा रही थीं।” बतूता आगे कहता है — “जब वह चिता तक पहुँची, तो उसने अग्नि की ओर प्रणाम किया और बिना किसी भय के उसमें कूद पड़ी। चारों ओर नगाड़े, ढोल और शहनाइयाँ बजने लगीं। पुरुषों ने लकड़ियाँ डालनी शुरू कीं ताकि वह जल्दी जल जाए। भीड़ ‘सती माता की जय’ के नारे लगा रही थी।” इब्न बतूता स्वयं इस दृश्य को देखकर स्तब्ध और पीड़ित हो गया। वह लिखता है कि यह दृश्य इतना भयावह था कि वह बेहोश हो गया और उसके मित्रों ने उसे पानी से धोकर संभाला। यह वर्णन मात्र घटना नहीं, बल्कि एक सभ्यता के अंधकारमय पक्ष का जीवंत दस्तावेज़ है — जहाँ स्त्री की मृत्यु को उत्सव बना दिया गया था। ⸻ 📜 ब्राह्मणवाद की जकड़न: धर्म के नाम पर छल ब्राह्मणों ने धर्मग्रंथो में लिखा कि स्त्री को पति के बिना अधूरी और अपवित्र माना गया। “पति ही परमेश्वर है” — यह सूत्र बार-बार दोहराया गया। ‘मनुस्मृति’ जैसी रचनाओं में विधवा स्त्रियों को जीवनभर के दुःख, संयम और अपमान का आदेश दिया गया। इस सामाजिक आतंक के परिणामस्वरूप सती प्रथा ने धार्मिक रूप ले लिया। ब्राह्मणों ने यह धारणा फैलाई कि — “जो स्त्री अपने पति की चिता पर जल जाती है, वह सीधे स्वर्ग जाती है और अपने कुल को मोक्ष दिलाती है।” यह विचार केवल धर्म नहीं, बल्कि पितृसत्ता का वैचारिक औजार था — जिसका उद्देश्य था कि स्त्री को कभी स्वतंत्र अस्तित्व का अनुभव न हो। ⸻ 🕯️ इब्न बतूता की संवेदनशील दृष्टि इब्न बतूता कोई आधुनिक मानवाधिकार कार्यकर्ता नहीं था, परंतु उसने जो देखा, वह उसके लिए असहनीय था। उसकी दृष्टि इस प्रथा को “आध्यात्मिक नहीं, बल्कि अमानवीय” मानती है। वह कहता है कि हिंदू स्त्रियाँ “स्वेच्छा” से सती होती हैं, पर वास्तव में यह सामाजिक दबाव और ब्राह्मणों की धार्मिक सत्ता का परिणाम था। स्त्रियाँ अपने ऊपर समाज के ताने और परिवार के अपमान का भय लेकर आग में कूदती थीं — न कि ईश्वर के प्रति प्रेम या भक्ति से। बतूता यह भी लिखता है कि भीड़ में जोश था, पर भीतर भय और अंधविश्वास था। ⸻ 🧠 आलोचनात्मक दृष्टि से सती प्रथा 1.स्त्री को संपत्ति बनाना – सती प्रथा ने स्त्री को पुरुष की “संपत्ति” के रूप में स्थापित किया। जब स्वामी मर गया, तो वस्तु (स्त्री) का अस्तित्व व्यर्थ माना गया। 2.धर्म की आड़ में हिंसा – इसे “धर्म” कहा गया, जबकि यह प्रत्यक्ष हिंसा थी। स्त्री को यह सिखाया गया कि मरना ही धर्म है, जीना अधर्म। 3.सामाजिक नियंत्रण का माध्यम – जो स्त्रियाँ सती नहीं होती थीं, उन्हें अपमानित किया जाता था, “अपवित्र” कहा जाता था। 4.पुरोहित वर्ग का हित – ब्राह्मणों को इन अनुष्ठानों से सामाजिक प्रतिष्ठा और धन दोनों प्राप्त होते थे। 5.स्त्री की शिक्षा और स्वतंत्रता का दमन – सती प्रथा ने सदियों तक स्त्रियों की चेतना को दबा दिया। ⸻ 🌺 धर्म या पाखंड? यह प्रश्न केवल इतिहास का नहीं, चेतना का है — क्या कोई धर्म किसी प्राणी से उसका जीवन छीन सकता है? क्या ईश्वर किसी की देह को अग्नि में जलाने से प्रसन्न होता है? 🌿 निष्कर्ष: जलती चिताओं से उठती चेतना सती प्रथा केवल एक ऐतिहासिक अध्याय नहीं, बल्कि मानवता के इतिहास पर दाग है। इब्न बतूता के नोट्स हमें यह दिखाते हैं कि जब धर्म सत्ता बन जाता है, तब करुणा मर जाती है। ब्राह्मणवादी ढाँचे ने स्त्रियों को जो “पवित्रता” दी, वह वास्तव में उनकी स्वतंत्रता की राख थी। आज जब समाज आधुनिकता, समानता और स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा है, तब हमें इतिहास के इन धुँधलकों से सीख लेनी चाहिए — कि धर्म कभी भी मनुष्य की गरिमा से बड़ा नहीं हो सकता।
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Raju Parulekar
Raju Parulekar@rajuparulekar·
मेरे बिहारी बहनों और भाईयों, विषय: आपको ग़ुलाम बनाने का षड्यंत्र ❗️👇 🚨Election Commission of India has failed in its Constitutional Duty. 🚨The Opposition should bring in impeachment motion against CEC Gyanesh Kumar. ▪️The Model Code of Conduct for Bihar Elections came into effect on 06-10-2025. ▪️Defying the same, Bihar Government has transferred ₹10,000 to multiple accounts under ‘Mukhyamantri Mahila Rozgar Yojana’ on 17/10, 24/10 and 31/10. The next transfer is due on 07/11. ▪️Bihar will vote on 06/11 and 11/11, after taking these Cash doles. ▪️ECI has full control over State Administration during Elections. It could have immediately directed the State to not deliver these Cash dole outs during while MCC is in force. But it didn’t, thereby openly siding with the BJP led alliance. ▪️And you think MVA will win the Elections❓As in Maharashtra, the CEO will hint at higher Women participation after Elections are over and BJP will justify the abnormally higher female Voter turnout to this Cash Dole out. 🚨 ECI is not impartial❗️It is working to Manufacture Consent for BJP led NDA Government in Bihar. @manojkjhadu @yadavtejashwi
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Kamlesh Kumar Pal
Kamlesh Kumar Pal@Kamleshpalboy·
💔 छतरपुर की दिल दहला देने वाली घटना! एक दिन पहले बेटे की हत्या, और अगले ही दिन पिता को पेड़ से लटका दिया गया! 😢 अगर यह आत्महत्या होती, तो क्या किसी के पैर में चप्पल होती? 🤔 यह साफ़ तौर पर हत्या (Murder) का मामला है मुझे तो लगता है कि कहानी कुछ और ही है शायद हाई प्रोफाइल का और जमीन का हमारी मांग है कि 1. फास्ट ट्रैक न्याय मिले 2. CBI जांच कराई जाए 3. अपराधियों पर कठोरतम कार्रवाई हो अब बस जांच नहीं, न्याय चाहिए! ✊ #छतरपुर_हत्याकांड #JusticeForVictims #CBIInquiry @actrprince @amityadav134841 @AnilKumar798329 @AnujPal841 @badripal @brijesh_pal_ @Girijapalpbh @GyanDelhiVns @i_prashantpal @pal_ji20 @PalAshok12 @PNSinghPal_inc @shekharpal28 @Vinodpaul0 @Rakeshpal1998 @palrahulji
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PARAS TANVESH
PARAS TANVESH@ParasTanvesh·
अनिल मिश्रा को उसके कर्मों का फ़ल जल्द मिलेगा
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PARAS TANVESH@ParasTanvesh·
@gautam__011 हम अहिंसावादी है! वैसे भी ब्राह्मणों को और शिक्षा की जरूरत है क्योंकि बिचारे विदेशी है और अवैध कब्जा करके बैठे है।
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PARAS TANVESH@ParasTanvesh·
दोगले ब्राह्मण संगठन को सख्त ताड़ना चाहिए
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PARAS TANVESH
PARAS TANVESH@ParasTanvesh·
संस्कारी क़ौम के कथावाचक ने गुप्ता की ले ली #BrahminsGenes
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PARAS TANVESH
PARAS TANVESH@ParasTanvesh·
श्रद्धालुओं की दर्दनाक मौत नहीं मोक्ष प्राप्ति कहिए #Stampede
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Science Journey
Science Journey@ScienceJourney2·
✍️ “कैसे ब्राह्मणों ने छुआछूत को धर्म बना दिया — पाराशर स्मृति के उदाहरणों के आधार पर” भूमिका: भारतीय समाज में छुआछूत की जड़ें ब्राह्मणवादी धार्मिक ग्रंथों में गहराई तक फैली हुई हैं। पाराशर स्मृति जैसे ग्रंथ इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि कैसे एक योजनाबद्ध तरीके से “शुद्ध” और “अशुद्ध” की अवधारणा गढ़ी गई, ताकि वर्ण व्यवस्था को स्थायी और ब्राह्मणवादी सत्ता को अखंड रखा जा सके। ⸻ १. चाण्डाल-दर्शन मात्र से अशुद्धि पाराशर स्मृति (श्लोक 24) में कहा गया है कि यदि कोई ब्राह्मण चाण्डाल को देख ले, तो उसे तुरंत स्नान कर सूर्य-नारायण का दर्शन कर “शुद्ध” होना चाहिए। 👉 इससे स्पष्ट है कि केवल “देख लेने” मात्र से भी ब्राह्मण को “अशुद्ध” मान लिया जाता था — यह मानसिक गुलामी का पहला बीज है। ⸻ २. चाण्डाल द्वारा छुए जल के उपयोग पर कठोर प्रायश्चित्त श्लोक 25–27 में कहा गया है कि यदि किसी ब्राह्मण ने अज्ञानवश चाण्डाल द्वारा खूदवाए या छुए जल का उपयोग किया, तो उसे उपवास, वमन (उल्टी करके पानी निकालना), अथवा तीन दिन तक गौमूत्र और यवागू (जौ का दलिया) से बना भोजन करना चाहिए। 👉 इसका अर्थ है कि स्वच्छता नहीं, बल्कि जाति-आधारित घृणा को “धर्म” घोषित किया गया। ⸻ ३. चाण्डाल के घर या वस्तुओं का स्पर्श ‘पाप’ घोषित श्लोक 40–42 में कहा गया है कि यदि किसी ब्राह्मण ने चाण्डाल के घर में प्रवेश किया, तो उस घर को जलाना(?) चाहिए और फिर अग्नि-होम आदि के द्वारा भूमि को “शुद्ध” करना चाहिए। 👉 यह न केवल घृणा की चरम सीमा है, बल्कि यह समाज में अलगाव, हिंसा और अपमान को वैध ठहराने का धार्मिक औजार है। ⸻ ४. ‘प्रायश्चित्त’ के नाम पर अमानवीय दंड इन श्लोकों में हर “स्पर्श” या “संपर्क” के बाद ब्राह्मण को गोमूत्र पीने, उल्टी करने, उपवास करने, या जौ के सूप खाने जैसे कर्मों का आदेश है। 👉 यह दिखाता है कि “शुद्धता” का पूरा ढांचा जातिगत श्रेष्ठता के भ्रम पर टिका हुआ था — जहाँ एक समूह को “दैवीय” और दूसरे को “अपवित्र” कहा गया। ⸻ ५. महिलाओं और अन्य वंचित समुदायों के प्रति भेदभाव अध्याय 6, 44, 45 श्लोकों में कहा गया है कि यदि किसी के घर में चाण्डाल या दासवृत्ति करने वाली स्त्री (जैसे धोबिन, चमारिन, व्याधिनी आदि) घुस जाए, तो घर की मिट्टी और पात्र तक बदल देने के निर्देश हैं। 👉 यह इस बात का प्रमाण है कि “धर्मग्रंथों” का उद्देश्य समानता नहीं, बल्कि जातिगत अपमान को स्थायी बनाना था। ⸻ ६. दार्शनिक और सामाजिक विश्लेषण पाराशर स्मृति जैसे ग्रंथों में “शुद्धता” का विचार आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक नियंत्रण का औजार भी था। •ब्राह्मण को “देवता” और शूद्र को “अपवित्र” घोषित कर दिया गया। •“प्रायश्चित्त” के बहाने शारीरिक कष्ट और भय को धार्मिक अनिवार्यता बना दिया गया। •धर्म के नाम पर मनुष्य की गरिमा, समानता और सहअस्तित्व की भावना को नष्ट किया गया। ⸻ ७. निष्कर्ष: धर्म या सामाजिक साजिश? इन श्लोकों से स्पष्ट है कि छुआछूत “आध्यात्मिक गलती” के साथ साथ एक सामाजिक नीति भी थी — जिसका उद्देश्य वर्णव्यवस्था की दीवारों को सुदृढ़ बनाना था। पाराशर स्मृति जैसे ग्रंथों ने न केवल असमानता को वैध बनाया, बल्कि उसे “ईश्वरीय आदेश” का रूप देकर सदियों तक समाज पर थोप दिया। ⸻ ८. आधुनिक दृष्टिकोण आज के युग में जब संविधान समानता और मानवता का प्रतीक है, तब यह आवश्यक है कि हम इन ग्रंथों की आलोचनात्मक समीक्षा करें और समझें कि “धर्म” के नाम पर रची गई जातिगत हिंसा का मुकाबला केवल वैज्ञानिक सोच, करुणा और समानता से ही संभव है।
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Dayanand Kamble
Dayanand Kamble@dayakamPR·
Remembering the anti-superstition campaigner & a rationalist Dr #NarendraDabholkar on his birth anniversary. #DrDabholkar devoted his life to fighting superstitions followed in different religions. His revolutionary thoughts are so relevant in today’s time.
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Science Journey
Science Journey@ScienceJourney2·
“जापान में छूआछूत या ‘Burakumin’ जैसी सामाजिक व्यवस्था के लिए बौद्ध धर्म नहीं, बल्कि स्थानीय सामाजिक-राजनीतिक कारण और Shinto purity beliefs ज़िम्मेदार थे।” ⸻ 🪷 फैक्ट-चेक | क्या जापान में ‘छूआछूत’ बौद्ध धर्म से आया था? बिल्कुल नहीं! ⸻ 🔍 दावा (Claim): “जापान में जो ‘Burakumin’ या अपवित्रता (untouchability) की प्रथा थी, वह बौद्ध धर्म की देन है क्योंकि बौद्ध धर्म मांसाहार और मृत्यु-संबंधी कर्मों को अपवित्र मानता था।” ⸻ 🚫 सत्य (Fact Check): यह दावा असत्य है। 🪷 1️⃣ बुद्ध ने कभी छूआछूत की शिक्षा नहीं दी •अम्बट्ट सुत्त व वासेट्ठ सुत्त में बुद्ध ने कहा: “न जाति(जन्म) से मनुष्य नीचा होता है, न जाति(जन्म)से ऊँचा — कर्म से ही होता है।” •बौद्ध संघ में हर जाति, हर वर्ग को प्रवेश की अनुमति थी । •छूआछूत या “अपवित्रता” की धारणा बुद्ध के सिद्धांतों के विरुद्ध है। ⸻ ⚕️ 2️⃣ बौद्ध धर्म ने ‘चिकित्सा’ को धर्म बताया, न कि छूआछूत •बुद्ध स्वयं बीमार भिक्षुओं की सेवा करते थे और कहते थे: “जो रोगी की सेवा करता है, वह मेरी सेवा करता है।” •विनयपिटक में चिकित्सा, स्वच्छता, और उपचार को धर्म-कर्म बताया गया है। •बौद्ध भिक्षु चिकित्सक (医僧, i-sō) जापान, श्रीलंका, चीन में शल्य-चिकित्सा और औषधालय चलाते थे। 📜 उदाहरण: सम्राट शोमू (8वीं सदी) ने “施薬院 (Shayaku-in)” नामक सार्वजनिक अस्पताल बौद्ध प्रेरणा से बनवाए। ⸻ 🏯 3️⃣ जापान में छूआछूत का स्रोत — बौद्ध नहीं, “Shinto Purity Belief” था •शिंतो धर्म में मृत्यु, रक्त और अशुद्धता (kegare) से बचने के अनुष्ठान पहले से मौजूद थे। •जब बौद्ध धर्म जापान पहुँचा (6वीं सदी ईस्वी), तो शासकों ने Shinto की “शुद्धता” और बौद्ध “अहिंसा” को मिलाकर “मृत्यु और मांसाहार से जुड़ी नौकरियों” को अपवित्र घोषित कर दिया। •यह धार्मिक नहीं, सामाजिक-राजनीतिक नियंत्रण का उपकरण बन गया। ⸻ ⚔️ 4️⃣ Tokugawa काल (1603–1867) ने इसे “कानूनी छूआछूत” बना दिया •शोगुन शासन ने समाज को चार वर्गों में बाँटा (समुराई, किसान, कारीगर, व्यापारी)। •इनके बाहर “eta” (गंदे पेशे वाले) और “hinin” (अमानव) रखे गए। •इन्हें गाँवों से बाहर बसाया गया, स्कूल, धार्मिक स्थानों और सार्वजनिक स्थानों से दूर रखा गया। ➡️ यह व्यवस्था राज्य-निर्मित सामाजिक भेदभाव थी — धर्म नहीं। ⸻ 🧘 5️⃣ बौद्ध धर्म तो हमेशा करुणा और समानता का पक्षधर रहा •चिकित्सा, करुणा और सेवा — यही उसका मूल संदेश है। •बौद्ध धर्म में “शल्य चिकित्सा” (सर्जरी) तक को करुणा का कार्य माना गया। •बुद्ध का धर्म “मनुष्य को जोड़ने वाला” था, न कि “वर्ग या जाति में बाँटने वाला”। चीन, कोरिया, श्रीलंका, थाईलैंड, खोतान, मंगोलिया, तिब्बत, मयन्मार जैसे बहुतेरे देशों में बुद्ध धम्म का डंका बजता आया लेकिन कभी भी छूवछूत नहीं पाया गया। ⸻ ✅ निष्कर्ष (Conclusion): “जापान में ‘Burakumin’ या छूआछूत जैसी व्यवस्था बौद्ध धर्म से नहीं, बल्कि स्थानीय शिंतो ‘पवित्रता बनाम अशुद्धता’ विचार और सामंती राजनीति के कारण विकसित हुई।” ⸻ 📚 प्रमाण (Sources): •Ian Neary, The Mobility of Japan’s Burakumin (Routledge, 2010) •Japan: An Illustrated Encyclopedia (Kodansha, 1993) •Vinaya Pitaka (Mahāvagga 8.26: “Whoever serves the sick, serves me.”) •Dīgha Nikāya: Ambaṭṭha Sutta, Vāseṭṭha Sutta ⸻ 🪷 संदेश: “बुद्ध ने छूआछूत नहीं, चिकित्सा, करुणा और समानता सिखाई।” “Burakumin का दुख — बौद्ध धर्म नहीं, बल्की जापान के पारम्परिक मानव की गलत व्याख्या का परिणाम था।”
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