Arvind kumar
5.7K posts

Arvind kumar
@arvindlucknow02
socialist , proud indian














जनता ने मिलकर कर ली तैयारी हे यूपी अबकी अखिलेश आवेगा 🙏

जब मैं थाने में था तब मुझे पता चला कि मेरे अलावा 3 और क्रिएटर्स पर FIR हुई है। जिनमें से एक औरंगाबाद से दूसरा गुजरात से और तीसरा दिल्ली से है। इन तीनों ने नितिन गड़करी के बेटे की गाड़ी में योगिता ठाकरे नाम की बच्ची की जो लाश मिली थी उसपर वीडियो बनाए थे। इन वीडियोज में वही जानकारी थी जो पब्लिक डोमेन में है। औरंगाबाद वाले को बुलाया गया, पूरे दिन पूछताछ की गई और उसका फ़ोन जफ़्त करके भेज दिया गया। गुजरात वाले क्रिएटर के बारे में पुलिस वालों से सुना है कि वो जेल में है। और दिल्ली वाला क्रिएटर अभी पेश नहीं हुआ है। मेरे मामले में, मामला गरमा गया क्योंकि मेरे पीछे पूरा समाज खड़ा है। लेकिन वो लड़के अकेले पड़ गए और सफर कर रहें हैं। विपक्षी दलों से माँग है कि मेरा छोड़ों उन तीनों का सार सँभाल लो। नेताजी ज़ुल्म कर रहे हैं।





अलबला गया है अमेरिका! अमेरिका से आने वाले अलग अलग तरह के बयान क्या संकेत देते हैं? क्या खीज और बौखलाहट में ट्रंप कुछ भी बोले और किए जा रहे हैं? भदेस शब्द ‘अलबला’ जाने का मतलब समझते हुए ईरान जंग में बुरी तरह फँस गए अमेरिका की हालत समझिए। youtu.be/vweGF4SCwJU?si…









यादवों के नेता अखिलेश यादव का मुख्यमंत्री न बनने के यह 18 बड़े कारण है 1, नाम परिवर्तन की राजनीति: अखिलेश यादव सरकार का सबसे विवादित कदम बीएसपी सरकार द्वारा बहुजन महापुरुषों के नाम पर रखे गए जिलों और संस्थानों के नामों को बदलना 2 महापुरुषों का अपमान: ज्योतिबा फुले नगर, महामाया नगर और कांशीराम नगर जैसे जिलों के नाम बदलकर अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर दलित चेतना के प्रतीकों को चोट पहुँचाई। 3 प्रतीकों के प्रति शत्रुता: बाबा साहेब अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के सम्मान में बने स्मारकों और पार्कों को 'फिजूलखर्ची' बताकर उनका राजनीतिक विरोध किया गया। 4, पदोन्नति में आरक्षण का विरोध: संसद में पदोन्नति में आरक्षण (Reservation in Promotion) बिल फाड़ने की घटना सपा के दलित विरोधी रुख का सबसे बड़ा प्रमाण मानी जाती है। 5, प्रशासनिक उपेक्षा: सपा शासन के दौरान दलित अधिकारियों को मुख्यधारा के पदों से हटाकर हाशिए पर रखने के आरोप लगातार लगते रहे। 6,सामाजिक न्याय का ढोंग: 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देने वाली सपा के कार्यकाल में दलितों के खिलाफ अपराधों के आंकड़ों में वृद्धि देखी गई थी। 7, कांशीराम जी की विरासत का अपमान: मान्यवर कांशीराम उर्दू-अरबी-फारसी विश्वविद्यालय का नाम बदलकर केवल भाषा विश्वविद्यालय करना उनकी विरासत को सीमित करने जैसा था। 8, योजनाओं को बंद करना: दलित छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और विशेष कल्याणकारी योजनाओं में कटौती की गई या उनके नाम बदल दिए गए। 9 सपा का मूल चरित्र: समाजवादी पार्टी का मूल वोट बैंक अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में दलितों के साथ संघर्ष की स्थिति में रहा है, जिसे अखिलेश नियंत्रित करने में विफल रहे। 10 राजनीतिक अवसरवाद: चुनाव आते ही अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण करना, लेकिन सत्ता में रहते हुए उनके नाम वाले जिलों को मिटाना दोहरे चरित्र को दर्शाता है। 11 इतिहास से छेड़छाड़: महापुरुषों के नाम हटाकर अखिलेश यादव ने आने वाली पीढ़ियों को दलित क्रांति के इतिहास से वंचित करने का प्रयास किया। 12, मानसिकता का परिचय: स्मारकों को 'पत्थरों का ढेर' कहना उनकी उस मानसिकता को उजागर करता है जो दलित गौरव को स्वीकार नहीं कर पाती। 13 क्षेत्रीय अस्मिता का बहाना: नामों को बदलने के पीछे क्षेत्रीय पहचान का तर्क दिया गया, जो दलित महापुरुषों के कद को छोटा करने की एक चाल थी। 14 शक्ति का दुरुपयोग: बहुमत का उपयोग विकास के बजाय उन प्रतीकों को मिटाने में किया गया जो दलित समाज के स्वाभिमान से जुड़े थे। 15, कानून व्यवस्था: सपा के 'गुंडाराज' के दौरान सबसे ज्यादा प्रताड़ना दलित समाज के निर्दोष लोगों ने झेली। 16, शिक्षा संस्थानों पर प्रहार: गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के बजट और महत्व को कम करना शिक्षा के प्रति नहीं बल्कि विचारधारा के प्रति द्वेष था। 17 सांस्कृतिक वर्चस्व: सपा ने हमेशा एक विशेष वर्ग के सांस्कृतिक वर्चस्व को बढ़ावा दिया, जिससे दलित संस्कृति और पहचान पीछे छूट गई। 18, विश्वासघात: दलितों ने जब-जब सपा पर भरोसा किया, उन्हें बदले में उनके महापुरुषों के अपमान की राजनीति ही मिली। निष्कर्ष: उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि अखिलेश यादव की राजनीति दलितों के उत्थान की नहीं, बल्कि उनके प्रतीकों और अधिकारों को कुचलने की रही है, जो उन्हें दलित विरोधी साबित करती है। @samajwadiparty @mediacellsp @surya_samajwadi @AnilYadavmedia1 @JyotiDevSpeaks @BhanuNand





