Dr Aminul khan Suri@SuriAminul
इतिहास गवाह है — जब न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग निष्पक्षता से हटते दिखाई देते हैं, तब लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है।
कमाल मौला मस्जिद मामले में ऐतिहासिक फैसला देने वाली संयुक्त पीठ में शामिल न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला के पुत्र सुजय शुक्ला को लगभग उसी दिन सरकारी पैनल अधिवक्ता नियुक्त किया जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है???
इतना ही नहीं, यह जानकर और भी आश्चर्य होता है कि सुजय शुक्ला, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री सुनील जैन जी के सहायक भी हैं, जिन्होंने इसी मामले में एएसआई @ASIGoI का पक्ष रखा था।
ऐसे में जनता के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक है — क्या यह केवल संयोग है? या फिर सत्ता, व्यवस्था और प्रभाव का सुनियोजित प्रयोग?
जब न्यायपालिका से जुड़े इतने बड़े फैसले के आसपास ऐसे नियुक्ति आदेश सामने आते हैं, तो सवाल उठना लोकतंत्र की सेहत के लिए आवश्यक है।
न्याय केवल होना नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए।
अगर न्याय के मंदिर में भी पक्षपात की आहट सुनाई देने लगे, तो लोकतंत्र का भरोसा कमजोर होता है।
शुक्ला जी को अपने बेटे के भविष्य का कितना ध्यान रखना पड़ा है, यह इन परिस्थितियों से स्पष्ट होता दिखाई देता है।
देश जानना चाहता है — क्या यह योग्यता थी, या व्यवस्था की कृपा?
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