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@mi82305

'शब्द' को 'ब्रह्म' कहा है क्योंकि ईश्वर और जीव को एक श्रृंखला में बाँधने का काम शब्द द्वारा ही होता है। सृष्टि की उत्पत्ति का प्रारम्भ भी शब्द से हुआ है।

Kailash Parwat Katılım Şubat 2024
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शब्द@mi82305·
@Akshara75u भवदंघ्रि - इस शब्द का अर्थ क्या है?
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अक्षरा
अक्षरा@Akshara75u·
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।। लोग बहुत से रोगों और वियोगों (दुःखों) से मारे हुए हैं, यह सब आपके चरणकमलों के निरादर के फल हैं।
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Vivek Sharma 🇮🇳
Vivek Sharma 🇮🇳@SaffRonicMan·
Navgraha Stotra | नवग्रह स्तोत्र एक शक्तिशाली वैदिक स्तुति है, जिसे महर्षि व्यास ने रचा है, जिसका उद्देश्य सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों (मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु) के अशुभ प्रभावों को शांत करना और जीवन में सुख, समृद्धि, आरोग्य व सकारात्मक ऊर्जा लाना है |
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Rajiv Malhotra
Rajiv Malhotra@RajivMessage·
An important message on Sanskrit and the census: Write ‘Sanskrit’ as your mother tongue in the census. — Dr. Pushpa Dikshit जनगणना में अपनी मातृभाषा संस्कृत लिखिए। — महामहोपाध्यायाचार्या डॉ पुष्पा दीक्षित, अध्यक्षा, पाणिनीय शोध संस्थान (कोसल संस्कृत समिति) @InfinityMessage @IFIMessage @Banyantree_org #Sanskrit #Census #Language #IndianLanguages #संस्कृत #जनगणना
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पञ्चतन्त्रम्
दूसरे के रहस्य और निन्दा किसी से न कहें। ब्राह्मण किसी के पाप अथवा अपाप दूसरों से न कहे, अन्यथा स्वंय उस पाप का भागी बनेगा। Do not reveal secrets or speak ill of others to anyone. A Brāhmaṇa must not disclose sins, whether real or imagined, of another person to others. १/२
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शब्द@mi82305·
@Nigrahacharya @gyansadhak अरे ब्राह्मण देव! उनका कहना हैं कि उनके नाम पर लोग कर्तन छोड़ कर सिर्फ कीर्तन पकड़ लिया...... ये समाज गलत दिशा मे चला गया ना कि महाप्रभु जी को वो बोल रहे हैं...... वो खुद चैतन्य महाप्रभु की जन्मोत्सव मनाते हैं...... और उनके उपदेश को आगे बढ़ाते हैं.
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जगद्गुरु निग्रहाचार्य / JagadGuru Nigrahacharya ™
चैतन्य महाप्रभु तो इनके और इनके शिष्यों के ही अनुसार स्मार्त शांकर संन्यासी थे तो इसका अव्यवस्था के उत्तरदायी ये क्यों नहीं ? और क्या महाप्रभु ने कहा कि सब क्षत्रियों को शस्त्र छोड़कर केवल मेरे पीछे कीर्तन करना चाहिए ? उनसे आप शस्त्र की आशा क्यों कर रहे हैं ? पुरी शंकराचार्य जी ने तो यह भी कहा है कि भगवान् की कृपा से वे अकेले ही सबों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं तो आपके ही कथनानुसार आपके ही परम्परा के शांकर संन्यासी चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन के कारण आपके ही कथनानुसार जो बंगाल हाथ से निकल गया, उसे ही बस वापस ले आइए। सबसे अधिक प्रमाद और कोरी भावुकता में इनके ही चेले फंसे हैं। कीर्तन और कर्तन का महत्त्व बताकर स्वधर्मनिष्ठ बनाना सराहनीय है पर चैतन्य महाप्रभु को अनावश्यक दोष देना निन्दनीय ही है। आज जो खान पान की शुद्धि और वैष्णवता बची है न बंगाल में, वो महाप्रभु के ही कारण है। अलग बात है कि वो भी अब इस्कोन के म्लेच्छ निगल रहे हैं। चैतन्य महाप्रभु का यदि उदाहरण दिया जा सकता है तो बोलने को सम्बन्ध दिखाने हेतु कल भज गोविंदम् लगाकर शंकराचार्य जी को भी कोई बोल देगा। यह भी बोल सकते हैं कि मुगलों से लड़ने के स्थान पर गोस्वामी जी मानस लिखने बैठ गए। और कीर्तनियों के कारण बांग्लादेश नहीं बना, इस्लामी जेहादियों के कारण बना। सिन्ध, पंजाब आदि में कौन से कीर्तनिये थे चैतन्य महाप्रभु को। वहां तो कथित वीर मार्शल कौम वाले हथियारबंद पंजाबी थे, फिर पाकिस्तान कैसे बन गया ? पर सत्य यही है कि बंगाल का हिन्दू या कहीं भी वहां के जनमानस में बसे गोस्वामीजी, महाप्रभुजी जैसों लोगों के दैनिक कीर्तन के प्रभाव से ही कुछ अपने मूल से जुड़ा रहा, अन्यथा शंकराचार्य आदि के बड़े बड़े संस्कृत भाष्य एवं दार्शनिक रहस्य मठों और विद्वानों के ही विमर्श के अंश रहे, घर घर जनमानस के हिन्दू में पहुंचे ही नहीं।
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🏹🚩पराग स्वस्थक्रान्ति गर्ग 🚩🏹
यह टिप्पणी सर्वथा अनुचित और आधारहीन है। स्वघोषित आचार्य को जगद्गुरु पर इस प्रकार बेबुनियाद आक्षेप करने से बचना चाहिए। पूज्य गुरुदेव ने भारतीय इतिहास और समाज में ‘क्षात्र धर्म’ तथा ‘कीर्तन’ (भक्ति) के बीच संतुलन के महत्व पर प्रकाश डाला है। उनका मुख्य निष्कर्ष यह है कि जब कोई दिव्य संपदा या आध्यात्मिक अभ्यास अति (अतिरेक) का रूप ले लेता है और रक्षात्मक शक्ति (क्षात्र धर्म/कर्तव्य) का स्थान लेने लगता है, तो राष्ट्र को विभाजन, परतंत्रता और दुर्दशा जैसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बंगाल में चैतन्य महाप्रभु के नाम पर कीर्तन के अत्यधिक प्रचार और अतिरेक ने क्षात्र धर्म को दबा दिया, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय विभाजन हुआ और अंततः बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इसी प्रकार, प्राचीन काल में गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी द्वारा असमय संन्यास की परंपरा को प्रोत्साहन देने से भारतीय शास्त्रों और क्षात्र धर्म में शिथिलता आई, जिसने देश को गुलामी की ओर अग्रसर किया। पूज्य गुरुदेव का चैतन्य महाप्रभु के प्रति कोई आक्षेप नहीं है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि चैतन्य महाप्रभु आज इस युग में होते, तो कीर्तन के नाम पर कर्तन (रक्षा-शक्ति) के त्याग की जो लहर चली है, उससे सबसे अधिक पीड़ा और रुदन उन्हीं को होता। शंकराचार्य जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि बंगाल तथा समग्र भारत की वर्तमान दुर्दशा का मुख्य कारण असमय निवृत्ति (समय से पहले संन्यास/वैराग्य) और क्षात्रधर्म का तिरस्कार है। इस प्रकार पूज्य गुरुदेव का कथन ऐतिहासिक संतुलन की चेतावनी है, न कि किसी महापुरुष के प्रति अनादर।
🏹🚩पराग स्वस्थक्रान्ति गर्ग 🚩🏹 tweet media🏹🚩पराग स्वस्थक्रान्ति गर्ग 🚩🏹 tweet media
जगद्गुरु निग्रहाचार्य / JagadGuru Nigrahacharya ™@Nigrahacharya

पुरी के शङ्कराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती श्रीचैतन्य महाप्रभु का बारम्बार अपमान बन्द करें "चैतन्य महाप्रभु कीर्तन करते रहे और बंगाल हाथ से निकल गया" बोलकर बंगाल की अव्यवस्था का कारण चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन को बताने वाले पुरी के शङ्कराचार्य यह स्पष्ट करें बंगाल तो पुरी पीठ के ही अधिकार में आता है फिर पुरी के शंकराचार्यों ने बंगाल को हाथ से निकलने क्यों दिया ? चैतन्य महाप्रभु को पुरी के शंकराचार्य ने शांकर संन्यासी बताया है तो बंगाल की अव्यवस्था का कारण शांकर परम्परा को मानना क्या उचित होगा ? ईसा मसीह पुरी पीठ में पढ़े थे और जेल में बन्द मुसलमानों का सहयोग लेकर हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे, जैसे दुर्भाग्यपूर्ण कथन करने वाले पुरी के शंकराचार्य स्वयं को तो त्रिनेत्रधारी पाशुपतास्त्रवेत्ता शिवस्वरूप बताते हैं जिनकी परिक्रमा इन्द्रादि भी करते हैं किन्तु बंगाल की अव्यवस्था का कारण अपने ही कथनानुसार शांकर संन्यासी (वस्तुतः भगवद्रूप) श्रीमहाप्रभुजी के कीर्तन को मानते हैं। जिनकी कृपा और मार्गदर्शन के कारण बंगाल में थोड़ा बहुत जो सात्त्विक आहार एवं सनातनी उपासना दिखती है, उन्हें "बंगाल हाथ से निकल गया" बोलकर पुरी पीठ का सम्बन्ध ईसा मसीह से दिखाने वाले पुरी के शङ्कराचार्य ने तो बाकी सभी शाङ्करपीठों को अराजक, आतङ्कवादी और गोहत्यारी तक घोषित कर रखा है। इसके बाद भी किस मुख से सवा घण्टे भजन का उपदेश करेंगे ? स्वधर्मनिष्ठा और कीर्तन + कर्तन के सामयिक महत्त्व को बताना अवश्य सराहनीय है किन्तु चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन को बंगाल की अव्यवस्था का उत्तरदायी बताना निन्दनीय अदूरदर्शिता का परिचायक है। हम तो श्रीचैतन्य महाप्रभु का योगदान सनातन धर्म में आदिशङ्कराचार्य जी के योगदान से कम नहीं समझते। हमारे परमगुरु ने शङ्कराचार्य के ज्ञान और चैतन्य महाप्रभु की भक्ति के समन्वय से ब्रह्मचिन्तन का उपदेश किया है। ― हंसवंशावतंस श्रीमन्महामहिम विद्यामार्त्तण्ड श्रीमज्जगद्गुरु निग्रहाचार्य स्वामिश्री श्रीभागवतानन्द गुरु #निग्रहाचार्य #Nigrahacharya #शंकराचार्य

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शब्द@mi82305·
तरबूज चाकू पर गिरे या चाकू तरबूज पर, कटना तरबूज को ही है.......... अगर वो खुद दिखाए तो समझ लेना तुम्हारा ग्रह खराब चल रहा हैं.
Ravi Kumar@babyravi2020

@PunchTantrum अगर वो खूद दिखाये। तो?

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शब्द@mi82305·
@SerpentForce पंचांग के हिसाब से अक्षय तृतीया कल है.... उदया तिथि मे....... कल 10:40 तक तृतीया ही रहेगा.
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Shatrudhan Pandey
Shatrudhan Pandey@Shatrud23678005·
मध्यप्रदेश में बीजेपी विधायक बाबा जी से आशीर्वाद लेने गए थे और फिर...
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Darth Vader
Darth Vader@SerpentForce·
दो लोग जब भी मिलें तो एक दूसरे के बारे में बात करें, किसी तीसरे व्यक्ति की चर्चा यदि उनके जीवन की घटनाओं की हंसी उड़ाने के लिए कर रहे हैं या निंदा कर रहे हैं तो ऐसे लोगों से दूरी बनाकर ही रखनी चाहिए। जो लोगों के बारे में बात करके अपना मनोरंजन करता हो, उसकी संगत करके कोई लाभ नहीं।
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Darth Vader
Darth Vader@SerpentForce·
संघ ही वह जगह है जहाँ तुम जैसों की ब्रीडिंग होती है, पूरा देश तो अपनी परम्पराओं से चल रहा है। तुम्हें बुरा भी राममंदिर के कारण नहीं लग रहा है, मोदी और संघ के कारण लग रहा है। इतनी वड़े धर्मज्ञ होते तो श्रीरामचरितमानस की फटती प्रतियों को देखकर द्रवित होते। विधर्मियो के चरण न धोते।
Rahul Kaushik@kaushkrahul

एक ऐसी ब्रीड इस देश में आ गई है जो भाजपा और संघ से अपनी घृणा के कारण राम जन्मभूमि मंदिर जैसे पवित्र कार्य में भी मीन-मेख ढूँढते रहते हैं। पहले अतिक्रमण मिटाने पर, फिर गर्भगृह की नक्काशी पर, फिर प्राण प्रतिष्ठा पर, फिर प्लिंथ में बनी कलाकृतियों पर, उसके बाद ध्वजारोहण पर और अब इस ज्योति पर - केवल छाती पीटना ही ध्येय रह गया है। मंदिर में १००० अच्छे और भव्य कार्य हुए हैं। यह स्थान कोई पौराणिक या ऐतिहासिक स्थान नहीं है। केवल ३.५ साल के लिए एक स्थानापन्न मंदिर यहाँ रहा जिसको बाद में हटा दिया गया। किसी ने न्यास को नहीं बोला था यहाँ कुछ बनाने के लिए, न्यास ने स्वयं तय किया और जो उनको उचित लगा, वो बनाया। पर जिन्होंने जीवन भर देश, समाज, धर्म के लिए कुछ भी नहीं किया और केवल मुफ्त के इंटरनेट के बल पर नेता बनने का ढोंग कर रहे हैं, वे उनको सिखाने का दुस्साहस कर रहे हैं जिनका जीवन देश धर्म की रक्षा में निकल गया, जिन्होंने घर छोड़ दिया, परिवार नहीं बनाया इस देश के लिए

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शब्द@mi82305·
@_kumbhkaran Mujhe to Mahamanav par hi sandeh hai...... उनकी महत्वकांछा से डरता था ये कीड़ा!
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कुंभकरण
कुंभकरण@_kumbhkaran·
Some GOATed statements of General Vipin Rawat. > The Indian Army is apolitical and must remain so. > Gentlemen Army is conservative. The Army’s job is not to make women comfortable… We need to ensure our men are ready for operations in extreme conditions > Population growth with different people having different aspirations… is a matter of concern > There is a difference between leaders and those who misguide people > Leaders are not those who lead people in the wrong direction. > We are not here to please anyone; we are here to fight and win wars His death still scares me. There was surely something we are unaware of!
Śaciṣṭha@RiseBharata

Missing Him Badly,

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Vedant
Vedant@TheVedant108·
यदि आप भी केदारनाथ यात्रा के लिए जाना चाहते हैं तो आपके लिए मेरी तरफ से कुछ जानकारी एवं सुझाव- ● आप जहाँ भी रहते हैं सबसे पहले आपको यदि ट्रेन से आ रहे हैं तो आप हरिद्वार आईये यदि फ्लाइट से आ रहे हैं तो आप देहरादून आईये । ● हरिद्वार आपका सेंटर पॉइंट है इसके बाद आप यदि केदारनाथ के लिए बस से जाना चाहते हैं तो सबसे पहले ऑनलाइन या ऑफलाइन हरिद्वार से गौरीकुंड की बस बुक कर लें क्योंकि आपको तुरंत टिकिट मिलना मुमकिन नहीं है और यदि आप कार से जाना चाहते हैं केदारनाथ तो 3 दिन के लिए कार होती है बुक और यदि केदारनाथ-बद्रीनाथ जाना चाहते हैं तो 5 दिन के लिए कार बुक होती है जो आपको हरिद्वार से केदारनाथ-बद्रीनाथ के दर्शन कराके वापिस हरिद्वार छोड़ देती है । (यदि आप कार को देहरादून बुलाना चाहें या ऋषिकेश तो वहाँ भी बुला सकते हैं) ● वैसे तो कार के रेट फिक्स नहीं है लेकिन फिर भी स्विफ्ट 3500 रुपये प्रतिदिन, अर्टिका और इनोवा 4500-5500 रुपये प्रति दिन के हिसाब से मिल जाती हैं (यदि भीड़ कम हो तो और भी सस्ती मिल जाती हैं) ● यदि आप Helicopter से जाना चाहते हैं तो सिर्फ इसी वेबसाइट से ही बुक करें- heliservices.uk.gov.in ● आने से पहले अपने रजिस्ट्रेशन इस वेबसाइट से बुक करें- registrationandtouristcare.uk.gov.in/signin.php बगैर रजिस्ट्रेशन के न जाएं वरना दिक्कते हो सकती हैं वैसे ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन हरिद्वार में भी होते हैं लेकिन आप अपनी चीज़े पहले से करके आएं तो ज्यादा बेहतर हैं। ● हरिद्वार से केदारनाथ के लिए यदि कार से जा रहे हैं तो आपको आपका कार वाला रुद्रप्रयाग तक ले जाएगा फिर वहाँ से आपको 50 रुपये देकर गौरीकुंड के लिए कार मिलेंगी । ● गौरीकुंड में स्नान करने एवं माता पार्वती जी के दर्शन के बाद आप अपनी पैदल यात्रा चालू कर सकते हैं यदि घोड़े से जाना चाहे तो 3500 रुपये के लगभग आपको देने होने जो आपको घोड़ा पड़ाव से लेकर बेसकैम्प तक छोड़ेगा । ● पैदल यात्रा के दौरान सामान जितना कम हो सके उतना कम ले जाये (लेकिन उल्टी,दस्त, बुखार,सिर दर्द,कपूर और ठंडी का पूरा सामान रखें अपने साथ) ● गौरीकुंड से केदारनाथ लगभग 21 किलोमीटर है इसको पैदल चढ़ने में सामान्य लोगो को 5-7 घण्टे लगते हैं बस इतना याद रहे रास्ते में ज्यादा चीज़ें न खायें बस लेकिन लिक्विड चीज़ें लेते रहे जिससे चढ़ने में आपको आसानी होगी । ज्यादा रुके नहीं धीरे-धीरे चढ़ते चले । ● शुरुवात में ज्यादा कवर करने की कोशिश करें क्योंकि छोटी लिंचौली तक थोड़े जल्दी कवर कर सकते हैं क्योंकि उसके बाद आपको हर 200 मीटर पर रुकना होगा और स्पीड कम और थकावट ज्यादा महसूस होगी । ● बेसकैम्प में ही GMVN के टेंट होते हैं वहाँ आप अपने यात्रा की डेट के अनुसार टेंट बुक कर सकते हैं GMVN WEBSITE- gmvnonline.com ● बेसकैम्प से केदारनाथ मंदिर लगभग 1.5 किलोमीटर है,मंदिर के पास भी रूम ले सकते हैं लेकिन उनका कोई रेट फिक्स नहीं होता । ● मंदिर में दर्शन के लिए आप बाहर से घी ले लें क्योंकि यहाँ घी लगाने और केदारेश्वर को टच करने का बहुत महत्व है दर्शन के पश्चात आप जो बाहर नन्दी जी विराजमान हैं उनके दर्शन करें और लगभग 15/30 मिनट वहाँ बैठे फ़ोटो/मोबाइल से दूर थोड़ी बाबा से भी तो बातें करना हैं न अपने को क्योंकि यहाँ (केदारनाथ) और महाकालेश्वर में जो एनर्जी है वो मैंने अभी तक कहीं महसूस नहीं कि तो मेरे कहने पर यहाँ बैठिएगा जरूर शांति से आँखे बंद करके कुछ समय । ● गर्भगृह से दर्शन सुबह से दोपहर 12 बजे तक ही होते हैं उसके बाद बाहर से ही दर्शन होते हैं पूजा और VIP दर्शन के लिये आप मंदिर के पास से ही पास ले सकते हैं एक दिन पहले या कई बार तुरन्त भी । ● इसके बाद मंदिर के पीछे भीम सिला है और शंकरचार्य जी की समाधि वहाँ भी दर्शन कर सकते हैं फिर उसके बाद आप लगभग मंदिर से 600 मीटर दूर भैरवनाथ जी के दर्शन भी कर सकते है । ● यात्रा के दौरान पैसे कैश ही रखें क्योंकि कई बार नेट नहीं चलता तो चीज़ें दिक्कत करती हैं और आधारकार्ड भी साथ रखें कई बार जरूरत पड़ सकती है । ● दर्शन के बाद शाम को सन्ध्या आरती भी देख सकते हैं वो लगभग 7 बजे होती है । ● केदारनाथ जाने का सबसे सही समय पट खुलने से लेकर जून तक फिर सितंबर से पट बंद होने तक (बीच के समय बारिश होती है तो थोड़ा रिस्की होता है) ● यात्रा से आने के बाद आपको बार-बार लगेगा कि कब आएं दोबारा क्योंकि शिव जहाँ स्वर्ग वहाँ । ● बाकी मर्यादाओं का ख्याल रखें ये पिकनिक स्थल नहीं है यह शिव की तपस्या की भूमि है 🙏🏻 जानकारी अच्छी लगी हो तो आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें बाकी कुछ लगे तो पूछ सकते हैं । जय केदार..कृपा अपार 🙏🏻 #Kedarnath #KedarnathTrip
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शब्द@mi82305·
मोहन के अनुसार देश की सभी पुलिस, सीबीआई, ED, court, Army सब बंद कर देना चाहिए.... हमें प्रयास करना चाहिए कि लोग सदाचारी हो जाये तो अपने आप ही चोरी, हत्या, भ्रष्टाचार, आतंकवाद सब बंद हो जायेगा...... अगर लोग सदाचारी हो गये तो..... RSS मे सब साले चूतिया ही भरे पड़े है क्या?
Ajeet Bharti@ajeetbharti

संघ को समझना…

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हिरण्यरेता
कुछ नीच जडबुद्धि वेद के ज्ञानकाण्ड (वेदान्त) की बराबरी मोनोथीइज्म जैसे आसुरी वाद से करते हैं। "तो अबाधित वस्तु जो होती है वह विषयकी आदिमें इन्द्रिय, और इन्द्रियकी आदिमें वृत्ति, वृत्तिकी आदिमें शान्ति और शान्तिकी आदिमें साक्षी और उस साक्षीका विवेक करने पर स्पष्ट ऐसा मालूम पड़ता है कि इससे बड़ा तो कोई नहीं हो सकता, क्योंकि बड़ापन तो देशकालमें होगा, वह तो साक्षीको छूता ही नहीं है तो न लम्बाई-चौड़ाई साक्षीको छूती है और न उम्र साक्षीको छूती है और न वजन साक्षीको छूता है तो आखिरमें यह साक्षी है क्या? तो उस समय श्रुति जो है वह निर्द्वन्द्व भावसे बोलती है तत्त्वमसि, जिस परिपूर्णता, अद्वितीयता आदिका श्रवण, मनन, निदिध्यासन तुम करते आये हो वह यही तो है न जो तुम हो । यदि अपने प्रति किसीके मनमें असम्भावना, विपरीत भावना हो तो उसको यह जो श्रुति है तत्काल काट देती है । भ्रम निवृत्तिमें ही श्रुतिकी चरितार्थता है आत्मानुभूतिमें नहीं, भ्रमकी निवृत्तिसे उपलक्षित माने भ्रमकी निवृत्ति हो जाने पर जो शेष है, कौन है, स्वयं है उसीको श्रुति ब्रह्म कहती है यह वेदान्तियोंकी साधनाका क्रम है। और यदि इसको कोई स्वीकार नहीं करता है तो चाहे वह भगवान् महावीर होवें, और चाहे भगवान् बुद्ध हों और चाहे अपने गुरुके नामके साथ कोई परमगुरु, परात्पर गुरु, परमेष्ठि गुरु कोई अपना नाम रख ले कोई गुरु कोई भगवान् कोई तीर्थंकर और सम्बुद्ध और कोई मसीहा और कोई पैगम्बर यदि इस वस्तुके साक्षात्कार पर्यन्त अपनी साधनाको नहीं ले जाता तो यह कहना पड़ेगा कि वह वेदान्त सम्प्रदायसे बहिर्भूत है । उसका सम्प्रदाय अपना होगा और उसको हम हाथ जोड़ते हैं वह बहुत बढ़िया है पर जो अद्वैत वेदान्तका सम्प्रदाय है उसमें उसकी परिगणना नहीं है । हम इतना ही कहते हैं केवल, उसका अपना कोई सम्प्रदाय यदि धुरधाममें जानेका है तो वह जाये धुरधाममें, यदि उसको कुल्ले मालिकसे मिलना है तो मिले कुल्ले मालिकसे, हम उसके सम्प्रदायको, हम खुदाके बहिश्तको बुरा नहीं मानते हैं और न ही ईसाके स्वर्ग राज्यको बुरा मानते हैं; पर हम लोग जो वेदान्त सम्प्रदायके अनुयायी हैं उनको जो वेदान्त सम्प्रदायका साधन और उसमें जो सिद्ध वस्तुका बोध है उसकी तरफ ध्यान देना चाहिए ।" ~ स्वामीश्री अखण्डानन्द सरस्वतीजी महाराज
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Radharamanचंद्रहास तिवारी
@PunchTantrum यहाँ यह ध्यान रखना है कि कुल की बात की जा रही है,न कि जाति/वर्ण की। स्व जाति से बाह्य विवाह वर्णसंकर कारक है। वर्णसंकरता से पाप वृद्धि होती है।
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शब्द@mi82305·
@Gannu_j भाई देवताओं मे इन्द्र क्षत्रिय है.... बृहस्पति आदि ब्राह्मण देवता है..... वसु आदि वैश्य देवता है.... 😀
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गन्नू झा(गोबर गणेश)
ब्राह्मण इंद्र जब माता के गर्भ से प्रकट हुए तो वे क्रन्दन करते हुए नहीं आए, उन्होंने जन्म लेते ही माता से पूछा कि क्या कोई उन्हें कष्ट दे रहा है, यदि कोई शत्रु है तो उसका वो तत्काल वध करेंगे। ब्राह्मण माता के गर्भ से धर्म जानकर आता है। उसका समर्पण धर्म ही के हेतु है।
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शब्द@mi82305·
@Gannu_j अरे भाई वो ऋषि थे.... उनसे अपना तुलना ना करो.... ऋषियों से पेड़, लता, देवता, दानव.. सब जन्मे है..... तुम उनके दर्शन की भी योग्यता नही रखते हो..... कलयुग मे ब्राह्मण को अपने वर्ण से अलग विवाह करने पर वर्णसंकर संतान की उतपत्ति होती है.
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गन्नू झा(गोबर गणेश)
वशिष्ठ के पौत्र पराशर ने शूद्र स्त्री से संतान प्राप्त किया। उस संतान को लोग वेदव्यास कहते हैं। इस सूची के अनुसार वे निषाद हुए।😂😂😂
शब्द@mi82305

@Gannu_j कुछ भी ना लिखा कर भाई........ इस समय सबसे ज्यादा वर्णसंकर ब्राह्मण मे ही है.........

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