pranava priyadarshee

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pranava priyadarshee

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@ppranava68

Working with navbharat times. RT doesn't mean endorsement

New delhi Katılım Mart 2011
237 Takip Edilen348 Takipçiler
pranava priyadarshee
pranava priyadarshee@ppranava68·
@manojkjhadu @TheTribhuvan देश और पत्रकारिता तो छोड़िए अपनी ही थोडी लाज रख लेते !!!
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pranava priyadarshee
pranava priyadarshee@ppranava68·
@manojkjhadu वाकई, इस 'प्रार्थना ' की बहुत जरूरत थी. इसके शब्दों और भावनाओं से पूरी पूरी सहमति है, उम्मीद है यह प्रार्थना जिन्हें संबोधित है उन्हें सद्बुद्धि और 'कॉक्रोच' समुदाय को हौसला देगी.
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Prof. Mukesh Kumar
Prof. Mukesh Kumar@mukeshbudharwi·
ममता बैनर्जी का दावा है कि बीजेपी ने उनसे 100 सीटें छीनी हैं। राहुल गाँधी ने उनके इस दावे का समर्थन भी किया है। तमाम विपक्षी दल भी उनसे सहमत हैं। लेकिन बीजेपी और गोदी मीडिया तरह-तरह के तर्क और आँकड़े देकर उन्हें झुठलाने में लगा हुआ है। इस अभियान के तहत एक नरैटिव ये बनाया जा रहा है कि ममता बैनर्जी की हार जनता की ज़बर्दस्त नाराज़गी की वज़ह से हुई। ये सही है कि पंद्रह साल से सत्ता में रहने की वज़ह से एंटी एनकंबेंसी रही होगी। मगर ये नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में उन्होंने ज़बर्दस्त प्रदर्शन किया था और बीजेपी को धूल चटा दी थी। दूसरे नरैटिव के तहत बताया जा रहा है कि हिंदुत्व की सुनामी ने ममता को डुबा दिया। यानी बीजेपी का घुसपैठिए का हौआ और ममता बैनर्जी का तथाकथित मुस्लिम प्रेम उनके ख़िलाफ़ चला गया। इसे भी आंशिक रूप से ही सही माना जा सकता है। सचाई ये है कि ये तमाम तर्क वोट चोरी को छिपाने के लिए दिए जा रहे हैं। कोशिश ये की जा रही है कि लोग धांधलियों की बात करने के बजाय ममता की नाकामी और बीजेपी की अभूतपूर्व कामयाबी की बात की जाए। लेकिन सचाई क्या है, आँकड़े क्या कहते हैं...जबरन थोपी गई एसआईआर का चुनाव पर कोई असर पड़ा या नहीं पड़ा। आँकड़ों की छानबीन करके बताया जा रहा है कि 49 से लेकर 105 सीटें ऐसी हैं जिन पर एसआईआर का असर देखा जा सकता है। बल्कि कहा जा सकता है कि एसआईआर की वज़ह नतीजों पर सीधा असर पड़ा। द वायर के मुताबिक 150 सीटें ऐसी हैं जिन पर हार जीत का अंतर हटाए गए मतदाताओं की संख्या से कम रहा। बीजेपी ने इनमें से 99 सीटें जीतीं, जबकि 2021 में उसने केवल 19 सीटें जीती थीं। यानी 80 सीटों का फ़ायदा। स्क्रोल . इन के मुताबिक 105 ऐसी सीटें हैं जिनमें बीजेपी की जीत का अंतर उन सीटों पर काटे गए वोटों से कम है। यानी अगर वोट नहीं काटे गए होते तो बीजेपी शायद नहीं जीत पाती। चुनाव में टीएमसी ने 129 सीटें गँवाई हैं। अगर इनमें से स्विंग सीटों को देखें तो 86 सीटें ऐसी हैं जिनमें बीजेपी की जीत का अंतर काटे गए वोटों से भी कम है। जादवपुर सीट को लीजिए। पिछले चुनाव में बीजेपी यहाँ तीसरे नंबर पर थी। मगर इस बार वह सत्ताईस हज़ार वोट से जीत गई। इस सीट पर 56 हज़ार मतदाताओं के नाम काटे गए थे। द ऑल्ट के मुताबिक 49 सीटें ऐसी हैं जहाँ पर हार जीत का अंतर ऐसे वोटरों की संख्या से कम रहा जो इसलिए वोट नहीं डाल सके क्योंकि उनके मताधिकार का फ़ैसला ही नहीं हो सका। एक विश्लेषक विकास कुमार ने दिलचस्प आँकड़े दिए हैं। सबसे ज़्यादा डिलीशन वाली 100 सीटों में भारी उलटफेर हुआ है। उनके मुताबिक 2021 में इन 100 सीटों में से बीजेपी के पास केवल 20 सीटें थीं मगर एसआईआर की बदौलत वे बढ़कर 68 हो गईँ। यानी 48 सीटों पर खेला। ध्यान रहे, ये सिर्फ़ एसआईआर का प्रभाव है। और दूसरी तरह से जो खेल किए गए उनका हिसाब किताब भी लगाया जाए तो बीजेपी कहाँ होगी सोचा जा सकता है।
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pranava priyadarshee
pranava priyadarshee@ppranava68·
पश्चिम बंगाल में जीत के पीछे क्या है...
Prof. Mukesh Kumar@mukeshbudharwi

पश्चिम बंगाल के बहुत ही चौंकाने वाले नतीजे आए हैं। ऐसे नतीजे आए हैं जिसकी दूर-दूर तक संभावनाएं नज़र नहीं आ रही थीं। ये ज़रूर कहा जा रहा था कि बीजेपी और टीएमसी के बीच टक्कर का मुक़ाबला हो सकता है या बीजेपी कुछ सीटों से आगे भी निकल सकती है, मगर ये किसी ने नहीं सोचा था कि बीजेपी को लगभग 200 सीटें मिल जाएंगी और टीएमसी 100 के अंदर सिमट जाएगी। कहा जा सकता है कि ये एक चमत्कार जैसा है, मगर सवाल उठता है कि इस चमत्कार के पीछे क्या है? चुनावी समीकरणों के देखते हुए ये मानना मुश्किल है कि सत्ता विरोधी लहर ने टीएमसी का तंबू उखाड़ दिया। या फिर हिंदुत्व ने बीजेपी का झंडा बुलंद कर दिया, क्योंकि ऐसे भी हालात नहीं दिखलाई दे रहे थे कि हिंदू-मुसलमान का ज़बर्दस्त ध्रुवीकरण होने वाला है। फिर सवाल उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि उलटफेर के पीछे चुनाव आयोग का चक्रव्यूह था...क्या एसआईआर के तहत बड़ी तादाद में मतदाताओं के नाम काटना बीजेपी के लिए वरदान साबित हुआ....क्या मनमाने तरीक़े से चुनाव का आयोजन करके उसने टीएमसी को पीछे धकेल दिया....या फिर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में इसका राज़ छिपा हुआ है..... अगर एक छोटा सा आँकड़ा ही लें तो समझ में आ जाता है कि कैसे एसआईआर गेमचेंजर रहा। बीजेपी और टीएमसी के वोटों में चार फ़ीसदी का अंतर है। अगर संख्या में बात करें तो 12-13 लाख वोटों का। अब देखिए कि वोट कितने काटे गए। 27 लाख तो लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर मगर कुल 91 लाख। 2021 में TMC का ~10% वोट लीड (60+ लाख मत) था। SIR ने ~91 लाख voters हटाकर close contests को ultra-marginal बना दिया। अब counting में BJP ~190 leads पर है – यानी SIR ने TMC की सत्ता उलटने की राह बना दी। क्या इसके बाद कुछ कहने को रह जाता है।

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Sarvapriya Sangwan
Sarvapriya Sangwan@DrSarvapriya·
दुनिया में जहां भी लोकतंत्र है, वहां लोग बड़े से बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के समय विरोध प्रदर्शन करते हैं. कोई विरोध ‘प्रदर्शन’ क्यों करता है? ताकि वो लोगों की नज़र में आए, लोगों तक उनकी बात पहुँचे. मीडिया उसे कवर करे. उनकी बात पर लोग चर्चा करें. प्रदर्शन लोगों को दिखाने के लिए ही होता है. वर्ना तो देश में न जाने कितने लोग प्रशासनिक दफ़्तरों के बाहर चिल्लाते, रोते, नारे लगाते रह जाते हैं, किसी को पता भी नहीं चलता. जब तक लोग अहिंसक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, तो समझिये कि उन्हें अब भी देश के लोकतंत्र से उम्मीद है. ये अच्छा साइन है. मेरा सवाल सत्ता समर्थकों से नहीं है, समझदार लोगों से है कि क्या ये सही है कि जब कोई अंतरराष्ट्रीय आयोजन हो, तो विदेशी लोगों के लिए टेंट लगा कर ग़रीबी को ढक दिया जाए? बाकी, लिहाज़ शब्द का इस्तेमाल शायद सिर्फ़ कड़वा सच छुपाने के लिए ही किया जाता है.
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P L Punia
P L Punia@plpunia·
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बताए ये व्यक्ति अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ?
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pranava priyadarshee
pranava priyadarshee@ppranava68·
@RahulDev718370 आपका दिल्ली से जाना निश्चित रूप से हम लोगों के लिए मायूसी वाली बात है. यह दिल्ली का नुकसान है, लेकिन इसमें लखनऊ का फायदा है. आपके जाने से हमारे लिए अब लखनऊ का आकर्षण बढ़ जाएगा. बहरहाल, यह फैसला बहुत अच्छा है. आपको हार्दिक बधाई :-)
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राहुल देव Rahul Dev
आज कुछ निजी बात। हम १७ साल जहाँ रहे वह गुड़गाँव और जहाँ लगभग २१ साल रहे वह दिल्ली छोड़कर वापस अपने लखनऊ जा रहे हैं। यानी ४१ साल लखनऊ से बाहर रहने के बाद। नया घर लेना होगा। इस उम्र में एकदम नए सिरे से गृहस्थी सजानी होगी। लेकिन घर लौटने का सुख सबसे ऊपर है। ह्रदय की तीन चौथाई दुनिया तो वहीं रही है। यहाँ के सारे प्यारे दोस्त, दिल्ली की बौद्धिक-सांस्कृतिक-पत्रकारीय गतिविधियों को छोड़ना पीड़ा देता है। उनकी कमी खलेगी हालाँकि लखनऊ में भी हर तरह की सक्रियताएँ बढ़ रही हैं। ईश्वर के प्रसाद से ही सुंदर बड़ा घर मिला जैसे की कल्पना नहीं की थी। उसे बेचना-छोड़ना टीस देता है। मालूम है अब कभी वैसा नहीं मिलेगा। लेकिन सच यह है कि अब ज़रूरत भी ऐसे घर की नहीं छोटे की है। भौतिक जीवन को छोटा, हलका और सरलतर बनाने की है। उस मुक्ततर जीवन के लिए उत्साह भी है। कोशिश होगी अपने प्रदेश-देश और दुनिया को बिना किसी दबाव, हड़बड़ी के देख सकें। नन्हीं नातिन के साथ समय बिता सकें। इस बदलाव के कई निजी कारण हैं। एनसीआर का असाध्य प्रदूषण उनमें एक प्रमुख है। कुछ समय से हर सुनने वाले को बिन माँगे सलाह दे रहा हूँ कि अगर आपके पास विकल्प हैं तो अपने बच्चों और बुजुर्गों की सेहत के ख़ातिर एनसीआर छोड़ दीजिए। यहाँ रहना और उन्हें रखना पूरी आयु के लिए बीमारियाँ मोल लेना है। नागरिकों के लिए साफ़ हवा-पानी-खाना उपलब्ध कराना हर सरकार के लिए प्रथम कर्तव्य होना चाहिए। उनकी सुरक्षा भी स्वास्थ्य के बाद आती है। सब कुछ जानते हुए भी, सारी शक्तियाँ होते हुए भी नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति यह उदासीनता अक्षम्य अपराध है। इससे बड़ी कोई प्राथमिकता राज्य के लिए नहीं हो सकती। लेकिन हम उस दौर में हैं जब जनता को धार्मिक-जातीय और अन्य भावनात्मक मुद्दों के एक अटूट जाल में उलझा-फुसला कर उसकी ही सबसे बड़ी ज़रूरतों को गौण बनाना सत्ता प्राप्ति और उसमें बने रहने की देशघाती-समाजघाती रणनीति सर्वोच्च मानी जा रही है। यह एक पर्यावरणीय-राजनीतिक-सामाजिक-धार्मिक आपातकाल का मिश्रित रूप है। उच्चतर नागरिक जागरूकता और सक्रियता ही इससे लड़ सकती है। कहीं भी रहें मित्रों और अपने प्यारे देश-समाज के साथ ही रहेंगे। दिल्ली आना-जाना होता ही रहेगा। आप सबको शुभकामनाएँ 🙏🙏🙏
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anil sinha
anil sinha@anilsinha2009·
भा ज पा ने लोकतंत्र का नया माडल बनाया है. अब उसे प्रवक्ता की जरूरत नहीं है क्योंकि यह काम पत्रकार कर देते हैं . अदालत में उसे वकील नहीं चाहिए क्योंकि जज महोदय यह जिम्मेदारी उठा लेते हैं .बिहार में एसआईआर पर कल की बहस से तो यही लगा.
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rajeevranjan@maholkyahai
rajeevranjan@maholkyahai@rajeevranjanMKH·
ऐसा लगता है कि पुलिस और ख़ुफ़िया तंत्र को सोनम वांगचुक के बारे में सारी नई जानकारियां तब मिलीं जब लद्दाख में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया ..हम तो यही जानते थे कि भारतीय सेना के लिए सोलर हीटड मिलिटरी टेंट और आईस स्तूप के आविष्कारक हैं ..और उनपर किताबें, रिसर्च और यहां तक कि फिल्मे ( थ्री इडियट्स) बनी ..एक आप वो हैं जो आप अपने दम पर बने और एक वो जो सिस्टम आपको बना दे
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Sarvapriya Sangwan
Sarvapriya Sangwan@DrSarvapriya·
हर बार लगता है कि इससे ज़्यादा तो बेतुका और बेवक़ूफ़ाना कुछ नहीं होगा. लेकिन सोनम वांगचुक की गिरफ़्तारी से एक बार फिर अपना रिकॉर्ड तोड़ दिया. सोनम वांगचुक गिरफ़्तारी से पहले अपने इंटरव्यू में ठीक ही कह रहे थे कि उनके जैसे व्यक्ति को, जिसने देश के लिए इतनी उपलब्धियां हासिल की हैं, उनके जेल जाने के बाद लोगों को समझ आएगा कि देश कहाँ आ गया है. #SonamWangchuk
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Manish Singh
Manish Singh@RebornManish·
न दैन्यम, न पलायनम!! सोनम वांगचुक गिरफ्तार हो गए। रासुका लगा है। सरकार के अनुसार वे शांति के लिए खतरा हैं। मीडिया के अनुसार वे विदेशी दलाल है। ●● विदेशी एजेंट होना कन्फर्म है। विदेश याने अमेरिका, जर्मनी, दूसरे कुछ यूरोपियन देश, या फिलीपींस भी हो सकता है। यहाँ से उन्हें अवार्ड औऱ फंड मिलता रहा है। उनका विदेशी पैसा का लाइसेंस, सरकार अकारण थोड़े ही कैंसल करेगी? पर आप मीडिया की न मानोगे। चलो, सोशल मीडिया की तो मान लो। यहाँ उनके नेपाली एजेंट होने की प्रबल सम्भवना है। नेपालियों के लेह हिंसा की शामिल होने की पुख्ता खबर से व्हाट्सप गर्म है। ●● अब आप यह भी न माने तो अंदर की बात बताते हैं। रियलिटी ये है, कि मुफ्त में दी गयी जमीन का आवंटन रद्द हो जाने पर वे हिंसा भड़का रहे हैं। वे जमीन के 14 करोड़... नही नही.. 37 करोड़ खा गये। इतने बेईमान हैं कि विश्वविद्यालय की मान्यता भी नही लिए। जबकि सरकार तो हाथ मे मान्यता पत्र लेकर, पहाड़ों पर उनके पीछे पीछे दौड़ रही थी। ●● अरे, आप यह भी नही मानते।तो अब असली कड़वी सचाई सुनो। सोनम वांगचुक लद्दाख में, सेना के लिए हो रहे बुनियादी ढांचा विकास को रोकना चाहते हैं। इसलिए क्योकि उनके पिता कांग्रेस के मंत्री थे।और वे खुद राहुल गांधी से मिले हुए हैं। वे एक नकली पर्यावरणविद हैं। असली पर्यावरणविद तो स्ट्रेटॉफियर में शोध करता है, आंदोलन नही। आपको याद है न, कि थ्री इडियट फ़िल्म में फ़िल्म में दिखाया था की उनकी डिग्री भी नकली है। वे झूठ भी बोलते हैं। इसलिए रैंचो की नाक लम्बी होकर किस करने के समय, बीच मे आ जाती थी। ●● अब हमारे हमारे इतने सबूतों के बाद भी आप सोनम को गद्दार नही मानते, तो तुम खुद गद्दार हो,भूरी के पिल्ले हो। औऱ तुम्हारी माँ हलाला करवाती है। ■■■■■■■■■■■■■■ लेकिन सोनम इसमे से किसी बात का दोषी नही। उसका दोष है- अपने राज्य में पूर्ण सरकार मांगना, अपने कल्चर, पर्यावरण की रक्षा के लिए 6 वी अनुसूची मांगना, दूसरे राज्यो की तरह लोक सेवा आयोग मांगना। ये यह सब मांगे गलत हैं। आंदोलन, भूख हड़ताल, मोदी सरकार के खिलाफ बोलना गलत है। ●● एक औऱ दोष है। सोनम, महात्मा गाँधी नही है। उनमे गांधी जैसी मैच्योरिटी नही है।जनआंदोलन दोधारी तलवार होता हैं। अक्सर, उसे चलाने वालों के हाथ से निकल जाता हैं। आंदोलनों में स्वस्फूर्त (या घुसाई गई) अराजकता की तरफ बहने की प्रवृत्ति होती है। कॉडर पर नियंत्रण न हो, तो आंदोलन नही करना चाहिए। तो आंदोलन अगर मोपला के रास्ते, चौरीचौरा पहुँच जाये, तो गांधी उसे वापस ले लेते थे। यह नैतिक बल गांधी मे था। सोनम अभी उस स्तर से दूर हैं। ●● लेकिन बेदाग हैं। 30 साल से लद्दाख क्षेत्र में शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, और सतत विकास के लिए जुटे हैं। उनके कार्यों की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान है। उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, रोलेक्स अवार्ड फॉर एंटरप्राइज और ग्लोबल अवार्ड फॉर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर जैसे सम्मान मिले हैं। वे NIT श्रीनगर से बी.टेक. औऱ फ्रांस के क्रेटर से अर्थन आर्किटेक्चर के मास्टर हैं। वे लद्दाख के ग्रामीण बच्चों को, स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण के अनुकूल शिक्षा देते है। उनका बर्फ के स्तूप का आविष्कार, लद्दाख जैसे शुष्क क्षेत्रों में पानी की कमी को दूर करने में मदद कर रहा है। इन्ही अनुभवों को वह लद्दाख में एक विश्वविद्यालय बनाकर पढ़ाना चाहते थे। जो अब आंदोलन के कारण खटाई में है। ●● लेकिन इस आंदोलन ने उन्हें लेह मे मसीहा जैसी छवि दी है। वे मार्च से सितंबर 2024 में लेह से दिल्ली पदयात्रा कर चुके हैं। उन्हें तब भी गिरफ्तार किया गया था। हिरासत में अनशन पर बैठे। पुलिस ने छोड़ दिया। रिहाई के राजघाट पर गांधी को श्रद्धांजलि दी और सरकार को अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपा। गृह मंत्रालय के आश्वासन के बावजूद, वे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, या गृह मंत्री से न मिल सके। ●● ताजा दौर में लेह में हिंसा फैली। इसका दोषी सोनम वांगचुक को ठहराया जा रहा है। उनपर अनर्गल आरोप भी है, सत्ता का कहर उनकी संस्थाओं पर टूटा है। अपनी सफाई में ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले थे, की आज उन्हें गिरफ्तार करके अज्ञात स्थान ले जाया गया। औऱ लद्दाख में इंटरनेट बैन कर दिया गया है। ●● यह कदम लद्दाख में, भारत सरकार की लोकप्रियता में कोई इजाफा नही करेगा। सोनम वांगचुक को भी डराने या झुकाने में सरकार कामयाबी मिलेगी, उम्मीद नही। लद्दाख में वे हीरो हो चुके हैं। देश की निगाहें उनपर हैं, और हमारी दुआयें उनके साथ। उनकी मांगें वाजिब, तार्किक,और सामान्य हैं। सभी मांगों, और गांधीवादी तरीको पर सोनम वांगचुक को डटे रहना चाहिए। न दैन्यम, न पलायनम!!
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pranava priyadarshee
pranava priyadarshee@ppranava68·
जो चीजें हमें इस दुनिया से, अपनी इस जिंदगी से जोड़ती हैं, उन्हीं बातों को आध्यात्मिक दृष्टि से संपन्न लोग खारिज करते हैं, हमें उनसे पीछा छुड़ाने की सलाह देते हैं, ये चक्कर क्या है... इस हफ्ते का धूपछांव। @NBTDilli
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pranava priyadarshee@ppranava68·
जुडिशरी में ऊपरी स्तरों पर महिलाओं की नुमाइंदगी बढ़नी चाहिए, यह निर्विवाद है, पर इस दिशा में प्रयासों की कमी दिखती है। इस कमी को जल्द से जल्द दूर करने को लेकर किसी तरह की बेचैनी समाज में नहीं है। और, यह भी अकारण नहीं... आधी दुनिया, एक दिन विलंब के लिए माफी सहित। @NBTDilli
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pranava priyadarshee
pranava priyadarshee@ppranava68·
बड़ी उपलब्धियां, भारी विपदाएं और गंभीर चुनौतियां... सब पर अक्सर भारी पड़ते हैं वे छोटे-छोटे पल, जो हौला सा स्पर्श देकर अनंत सागर में विलीन हो जाते हैं। उस स्पर्श का अहसास सालों साल बरकरार रहते हुए उन नन्हे पलों की विराटता का एलान करते रहते हैं... इस हफ्ते का धूपछांव। @NBTDilli
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pranava priyadarshee
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नोएडा के निक्की कांड जैसा कोई प्रकरण हो जाए तब उस पर अफसोस जताना, रोना-पीटना, हाय-तौबा मचाना एक बात है, और समय रहते उन कारकों की शिनाख्त करना बिल्कुल अलग, जो ऐसे कांड की जमीन तैयार करते हैं... आधी दुनिया, एक दिन विलंब के लिए माफी सहित। @NBTDilli
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pranava priyadarshee
pranava priyadarshee@ppranava68·
वाकई ये अभियान शर्मनाक है. कॉंग्रेस प्रवक्ता को भी इस स्तर तक उतरने से परहेज करना चाहिए था.
Yogendra Yadav@_YogendraYadav

एक महिला पत्रकार (जिनसे मेरी असहमति रही है) के निजी जीवन के बारे में जिस किस्म की घटिया टिप्पणियां सोशल मीडिया पर चल रही हैं, वो शर्मनाक हैं। किसी पत्रकार की प्रोफेशनल आलोचना अपनी जगह है, आजकल कई बार नीयत पर भी सवाल उठाने पड़ते हैं। लेकिन अगर वो महिला हो तो यह आलोचना उसके व्यक्तिगत जीवन पर छींटाकशी का रूप क्यों लेती है? क्या यह हिंदुस्तानी मर्द की बीमार मानसिकता का नमूना नहीं है? क्या ऐसे लांछन लगाकर हम उन्ही संवैधानिक मूल्यों का हनन नहीं करते जिनकी रक्षा के लिए हम लड़ रहे हैं? कृपया इस कीचक्रीड़ा को बंद करें!

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pranava priyadarshee
pranava priyadarshee@ppranava68·
@WriterDeepak @NBTDilli Please watch this conversation when you have time. Will wait for your feedback. मेरी किताब 'चौराहों पर चौराहे' को लेकर मुझसे यह बातचीत यूट्यूब चैनल सत्यहिंदी के कार्यक्रम ताना बाना के लिए मुकेश कुमार जी ने की है। youtu.be/WoWrmjGnMwI?si…
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Deepak Lokhande
Deepak Lokhande@WriterDeepak·
@ppranava68 @NBTDilli After all these years, I read your column the way you would speak and the tone, and the pauses, and that excitement in your eyes and voice...
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pranava priyadarshee
pranava priyadarshee@ppranava68·
जीवन में कठिन समस्याएं तो आती ही रहती हैं, उनसे निपटने के अलग-अलग नुस्खे भी हम ढूंढते-आजमाते रहते हैं। ऐसा ही एक नुस्खा मुझे बचपन में मिला था, जो तब काफी कामयाब लगता था... इस हफ्ते का धूप छांव आज एनबीटी एडिट पेज पर। @NBTDilli
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