RajeshJoshi

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@RajeshJoshi

Independent journalist and media trainer. (Aspiring actor) RT≠endorsement.

New Delhi, India Katılım Eylül 2008
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RajeshJoshi
RajeshJoshi@RajeshJoshi·
ये कितना दारुण वीडियो है! कौन हैं ९ बरस की छोटी-सी ईरानी बच्ची लीला के दुश्मन? कब उन हत्यारों को और उनके साथ दे रहे लोगों को उनके अपराधों की सज़ा मिलेगी - मिलेगी भी या नहीं?
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Supriya Shrinate
Supriya Shrinate@SupriyaShrinate·
This boy’s clarity of thought and honesty of expression on caste-based disparities are commendable. Hats off to you, young man! He is so right. Reservation is not a poverty alleviation programme but a means to bring equity and equilibrium to the social structure. 🫡🫡
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RajeshJoshi
RajeshJoshi@RajeshJoshi·
“A celebrity MAGA influencer and conspiracy theorist walked into a conclave in India under fire for mocking Indians as “third-world invaders” with low IQ and bad hygiene, but may have walked out as a new mascot for India’s Islamophobes.” A brilliant piece on far-right alliances.
Toda Peace Institute@TodaInstitute

A new report from @Planet_Deb examines transnational far-right alliances which are exacerbating existing challenges to democracy by creating a networked infrastructure that amplifies extremist ideologies @TodaInstitute tinyurl.com/4mrsa2tf

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ParanjoyGuhaThakurta
ParanjoyGuhaThakurta@paranjoygt·
April 4, 2026 | New Delhi: The Editors Guild of India is deeply concerned by both the contents and the underlying intent behind the Draft Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Second Amendment Rules, 2026 (“Draft Amendments”), which were made public by the Ministry of Electronics and Information Technology (MeitY) on March 30, 2026, with just a fortnight given for comments. Prima facie, the amended rules and guidelines, whose stated purpose is to “strengthen compliance” and increase the effectiveness of regulatory oversight of content regulation mechanisms under Part III (Code of Ethics relating to Digital Media) of the IT Rules, 2021” appear to arm MeitY with sweeping powers of content regulation, sharply increases the compliance burden on digital intermediaries, and gives the executive overarching powers to block or take down content generated by  “non news publishers” and intermediaries. This will directly infringe the fundamental right to free speech guaranteed to all citizens under the Constitution and will have a chilling effect on freedom of expression and the airing of contrarian views, which are fundamental to an open and functional democracy. Sub-rule (4) to Rule 3, which deals with due diligence obligations of intermediaries, now makes it mandatory on the part of intermediaries to comply with “any clarification, advisory, order, direction, standard operating procedure, code of practice or guideline issued by the ministry, by order in writing”. Failure to comply has been linked to loss of the safe harbour protection extended to intermediaries and platforms for user-generated content, under section 79 of the Information Technology Act. The absence of due process for the issuance of compliance orders and the complete lack of transparency in the process are deeply concerning. Changes to Rule 14(2) and Rule 14(5) in the draft amendment also greatly widen the powers of the Inter-Departmental Committee (IDC). IDC, a central oversight body constituted under Rule 14 of the Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021, was specifically created to hear grievances and complaints against digital content. Now, the IDC has been empowered to deal with and “matter” – a generalisation which arms the body to consider virtually any issue, in the absence of any definition of what constitutes a “matter”. Other provisions devolve rulemaking powers entirely to the executive branch, removing the window for legislative oversight provided under the IT Act. The EGi calls on the government to urgently review or recall the draft rules, and engage in more constructive consultations with all sections of stakeholders and take on board valid concerns and objections. Warm regards, Sanjay Kapoor, President Raghavan Srinivasan, General Secretary Teresa Rehman, Treasurer
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Jairam Ramesh
Jairam Ramesh@Jairam_Ramesh·
I still remember the quiz at Hindu College in mid-December 1974. The question was who was the only British PM to have been assassinated. Nandan and I were foxed. I took a wild guess and said Robert Peel. The answer was wrong and the other teams also didn’t know. The quiz master threw the question open to the audience. Prompt boomed in a shout from the back: Spencer Percival 1812. The answer was right and it came from none other than Shashi Tharoor. Ram Guha was in the audience and we have shared memories of this quite often.
Shashi Tharoor@ShashiTharoor

Yes those were the days. We at St Stephen’s were the pioneers of these festivals and similarly suffered from under-funding and minimal institutional support for travel. In 1973-74 Ramu Damodaran and I did to IIT Kharagpur what these IITans did to Miranda House, winning the debates and the quizzes, sweeping Best Speaker, Best Play, Best Team and the lot. We repeated the exercise at IIT Bombay’s first-ever cultural festival that winter! theprint.in/feature/iit-bo…

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RajeshJoshi
RajeshJoshi@RajeshJoshi·
@HJUjaipur के क्लास रूम में पहला सबक़ हमने सीखा - सवाल उठाओ! हर क़दम और हर मुद्दे पर सवाल पूछो- अपने प्रोफ़ेसरों से, कुलपतियों और कुलाधिपतियों से, अफ़सरों, विधायकों, मंत्रियों, प्रधानमंत्रियों से और बड़े से बड़े तुर्रम ख़ाँ से। मुझे फ़ख़्र है कि सारा इस्माइल मेरी छात्रा रही हैं।
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan

हरिदेव जोशी विश्वविद्यालय, दीक्षांत समारोह का प्रकरण और सारा इस्माइल! यह सचमुच दुःखद है और उससे भी अधिक हृदय को हल्की; लेकिन सुदीर्घ पड़ा से भर देने वाला। एचजेयू के दीक्षांत समारोह में जो घटित हुआ, उसके बारे में सबसे बड़ी विडंबना यही है कि शोर बहुत हुआ, पर बात समझी ही नहीं गई। जैसे किसी उजले कक्ष में अचानक इतनी आवाज़ें भर जाएँ कि सबसे सरल वाक्य भी सुनाई देना बंद हो जाए। मैंने समाचारों के माध्यम से अब तक जो पढ़ा, जाना और समझा है, उसका निष्कर्ष यही है कि विश्वविद्यालय के युवाओं की इच्छा न तो असंगत थी, न उद्दंड, न अपमानजनक। वे न धन माँग रहे थे, न नौकरी, न कोई असाधारण सुविधा। वे राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष जैसे उच्च पदों पर बैठे और अपने विश्वविद्यालय के कुलाधिपति से सम्म्मान और अधिकारपूर्वक केवल एक स्मृति चाहते थे। एक ऐसी स्मृति, जिसे वे अपने घर ही नहीं, जीवन की दीवार पर टाँग सकें, अपने घरवालों को दिखा सकें, अपने समय की उपलब्धि की तरह सँजो सकें, अपने आपको बता सकें कि उन्होंने किन ऊँचे लोगों से यह उपलब्धि प्राप्त की है। वे चाहते थे कि प्रदेश के उच्च पदों पर विराजमान व्यक्तियों, जैसे महामहिम राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, उच्च शिक्षा मंत्री और उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और कुलपति प्रो. एनके पांडे साहब के हाथों डिग्री लेते हुए उनका एक चित्र हो; ऐसा चित्र जिसमें केवल चेहरा न हो, भविष्य का आशीर्वाद भी हो। जिसे वे गर्व के साथ रख सकें। इस देश में जिस समय स्वयं राजनेता सपरिवार जाकर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ फोटो खिचवाकर प्रचारित कर रहे हों तो इन युवाओं की भी तो कुछ आकांक्षा होगी! यौवन अक्सर बहुत छोटी दिखने वाली चीज़ों में अपना सबसे बड़ा उत्सव खोज लेता है। एक तस्वीर कई बार केवल तस्वीर नहीं होती; वह माँ-बाप की आँखों में चमक बनती है, किसी छोटे कस्बे के घर में पहली बड़ी उपलब्धि का प्रमाण बनती है, किसी छात्र की सोशल मीडिया डीपी में नहीं, उसके आत्मविश्वास में टँगी रहती है। वह उनके इन्स्टा की रील भर नहीं रहती है। वह कहती है : देखो, मैं वहाँ तक पहुँचा था; मैंने अपनी मेहनत को मान्यता लेते देखा था। इस भाव को यदि ठीक से पढ़ा जाता तो शायद इतना धुँधलका न बनता। यह एक तरह से कम्युनिकेशन के उच्चतम संस्थान में मिस-कम्युनिकेशन का जीवंत उदाहरण है। और यहाँ सबसे ज़रूरी बात यह है कि यदि छात्रों के भीतर वैचारिक आक्रोश होता, मन में विरोध और कुंठा होती तो उसका रूप बिल्कुल अलग होता। वे काले झंडे दिखाते, नारे लगाते, कटु शब्द बोलते, सार्वजनिक असहमति दर्ज़ करते या मंच पर जूता उछाल देते या किसी पर स्याही फेंक देते। पर उन्होंने जो चाहा, वह विरोध की भाषा नहीं, सम्मान की भाषा थी। वे इन गरिमामय हस्तियों के साथ एक फ्रेम में आना चाहते थे; वे उस क्षण को जीवन की अर्जित ऊष्मा की तरह सहेजना चाहते थे। इसे अपमान कैसे कहा जा सकता है? यह तो उलटे उन पदों के प्रति विश्वास का द्योतक है। यह तो युवा मन का वह निष्कपट संकेत है, जिसमें सत्ता नहीं, स्नेह देखा जाता है; पद नहीं, प्रतिष्ठा का स्पर्श; औपचारिकता नहीं, आशीर्वाद। मुझे दु:ख है, मीडिया के मेरे कुछ साथी इस घटनाक्रम की व्याख्या में थोड़ा ट्विस्ट कर रहे हैं। ऐसे समय में यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि उप मुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और कुलपति प्रो. पांडे ने तत्परता से परिस्थिति को सँभाला, उसे बिखरने नहीं दिया और अंततः कार्यक्रम को संभव हद तक बेहतर स्वरूप दिया। यह कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। संस्थान कई बार विवाद से नहीं, विवाद की व्याख्या से घायल होते हैं। और एचजेयू का दुर्भाग्य भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। इस नए अंकुरित होते विश्वविद्यालय को प्रायः अनावश्यक और अवांछित विवादों के घेरे में खींच लिया जाता रहा है। मानो कुछ संस्थानों के हिस्से प्रश्न अधिक आते हों और कुछ के हिस्से मौन। जबकि हम सब जानते हैं कि इस प्रदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में कितनी विसंगतियाँ बिना किसी सार्वजनिक बेचैनी के गुजर जाती हैं। डिग्रियों की विश्वसनीयता से लेकर नियुक्तियों की गुणवत्ता तक। पर वहाँ अक्सर कोई पंक्ति नहीं लिखी जाती; यहाँ एक कंपन भी तूफ़ान बना दिया जाता है। आधी-अधूरी सुविधाओं के बीच, इतनी दूर न आवागमन का साधन है और न वहाँ छात्रावास। न शिक्षकों को सरकारी आवास दिए गए हैं, न कुलपति का आवास है। न पुस्तकालय सुसमृद्ध है। यह कैसी विडंबना है कि सरकार एक साथ एक विश्वविद्यालय और आरआईसी बनाती है। लेकिन शिक्षा का उच्च केंद्र अभावों से ग्रस्त है और आरआईसी क्या वैश्विक मानदंड छू रहा है। शिक्षा के प्रति इतनी आपराधिक उपेक्षा क्यों? इतने साल बाद भी क्यों स्थायी और निर्विवाद नियुक्तियाँ नहीं हुई हैं? क्यों वहाँ तक आवागमन के साधन नहीं हैं? आख़िर आरआईसी, कंस्टीट्यूशन क्लब और एक विश्वविद्यालय की तुलना तो करके देखिए! एक विश्वविद्यालय के परिसर में अगर उसी के कुलाधिपति और बाकी मेहमानों को इतनी बेहतरीन सरकारी कारों की सुविधा के बाद भी जाने में दिक्कत है तो थोड़ा वहाँ के विद्यार्थियों और शिक्षकों की समस्या को भी समझ लिया जाए! यह एक सरकारी विश्वविद्यालय है। इसलिए हर किसी के निशाने पर आ जाता है। लेकिन कितने ही निजी और डीम्ड विश्वविद्यालय, जहाँ अपार धांधलियाँ हैं; लेकिन मजाल कि कहीं कुछ आ जाए। प्रोफेसर साहब ख़ुद हैं कॉमर्स में पीएचडी, करवा रहे हैं कम्प्युटर साइंस में पीएचडी। सोसाइटी के दस्तावेजों को कूटरचित करने के दोषी पाए जाते हैं, लेकिन कहीं कुछ नहीं होता। सेना तक से सम्मान आ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट 50-50 हज़ार डिग्रियों को इस आधार पर निरस्त कर देता है कि तकनीकी शिक्षा की डिग्रियाँ दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से संभव ही नहीं। लेकिन किसी को जेल भेजना तो दूर, कोई प्राथमिकी तक दर्ज़ नहीं होती। यह सातवें अचरज़ के समान है। लेकिन है। हम देखते हैं कि खुले मैदान में विश्वविद्यालय दिखा दिया जाता है और बाद में कुलपति भी बहाल होते हैं और जैसे कहीं कुछ हुआ ही नहीं। एक विवि की नियुक्तियों में भ्रष्टाचार होता है। संभागीय आयुक्तों की जाँच होती है; लेकिन सब ठंडे बस्ते में। ऐसे किस्से अनंत हैं। दरअसल, मुझे लगता है कि यह क्षण आरोप का नहीं, आत्मपरीक्षण का होना चाहिए। विशेषकर इसलिए कि हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय घुटनों पर चलता और अपने शैशव से उठता हुआ एक संचार विश्वविद्यालय है। यहाँ के विद्यार्थी, यहाँ के शिक्षक और स्वयं यह संस्थान तीनों यदि एक-दूसरे को सुनने की कला में ज़रा और धैर्य रखें तो भूलभुलैया जैसी स्थितियाँ भी सहज रास्ता पा सकती हैं। संचार का सबसे बड़ा संकट शब्दों की कमी नहीं, भावों का पक्षद्रोही उद्वेलन है। और यहाँ तो भाव बहुत ही सुंदर थे : सम्मान, निकटता, मान्यता, स्मृति और सदाशयता की इस उत्कट अभीप्सा। लेकिन उसे ग़लत पढ़ लिया गया। एचजेयू के नेतृत्वकारी शिक्षक आदरणीय हैं और वैदुष्य के वाहक हैं। और इसके छात्र? वे सचमुच बहुत प्यारे हैं; वे अपने समय के बेचैन पर उजले बच्चे हैं, जो मान-सम्मान की भाषा अब भी समझते हैं, जो उपलब्धि को केवल काग़ज़ पर नहीं, संबंध में बदल देना चाहते हैं। उसे दीर्घकालीन स्मृति बनाना चाहते हैं। इसलिए इस पूरे प्रसंग को कठोरता से नहीं, करुणा और परिपक्वता से पढ़ा जाना चाहिए। आख़िर आप देखिए कुछ छात्र कितनी बेहतरीन जगहों और कितनी अच्छी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। वे अख़बारों के फ्रंट पेज तक तैयार करते हैं। कोई कहीं है कोई कहीं। वे उपलब्धियाँ हैं। विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ बाँटने की जगह नहीं होते; वह मनुष्यता के लहजे गढ़ने की जगह भी होते हैं। और जहाँ मनुष्यता बची हुई हो, वहाँ संवाद की संभावना कभी समाप्त नहीं होती। जो लोग दीक्षांत समारोह को छोड़कर तत्काल चले गए, उन्हें जानना चाहिए कि दीक्षांत का अर्थ क्या है‌? दीक्षांत यानी भारतीय ज्ञान परंपरा में वह अवभृथ यज्ञ, जो ब्रह्मचर्य के उपरांत गुरु के पास वर्षों की साधना के उपरांत दीक्षा के समय इसलिए अनिवार्य रूप से किया है कि उसमें हर शिष्य की शिक्षा में रह गई त्रुटि, दोष और उसके अंतिम परिष्कार होते हैं। किए जाते हैं। यानी हर शिष्य के बौद्धिक गुणों को एक्सीलेंस देने का समय है यह। इस यज्ञ का ब्रह्मा यानी यज्ञ जिसकी देखरेख में हो रहा है, वह संपन्नता के आख़िरी क्षण तक उठकर जा ही नहीं सकता। ऐसा करने पर वह नरक का भागी होगा। मुझ पर भरोसा न हो तो "शब्दकल्पद्रुम", "अमरकोश" और जाने कितने ही ब्राह्मणग्रंथों में झांका जा सकता है। आप भारतीय ज्ञान परंपरा का बहाना बनाकर सिर्फ़ नाम बदलकर नहीं बच सकते। आप अगर नाम बदल रहे हैं तो उसके मूल अर्थ और उसकी कर्मपीठिका तक तो जाना ही होगा। आप शादियों में घंटों यों ही बिता देते हैं। विधानसभा में जाने कैसे-कैसे विधायकों की कैसी-कैसी हरकतों को झेल लेते हैं; लेकिन विद्यार्थी आपको सेलिब्रिटी मानकर आपके हाथों से सम्मानित होना चाहते हैं और आप इस दुर्लभ प्रेम को अधूरा ही छोड़े जा रहे हैं। आप कैसे अभागे मनुष्य हैं। यह बदली हुई पीढ़ी है, जो आपका सम्मान करती है। पुरानी विद्यार्थी पीढ़ी होती तो वह किसी नेता के हाथों सम्मानित होने में शायद अपमानित महसूस करती! इस भावना को समझा जाना चाहिए। और जिस बात पर तूफान उठा हुआ है, अगर उसे भी कुछ समझने की कोशिश करें तो हमें अंतत: हंसी ही आएगी। मुझे फ़ैज़ साहब का वह शेर याद आ रहा है, जिसमें उन्होंने ऐसी ही किसी बात की गांठ खोली थी : वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है तो सारा इस्माइल ने कहा था : "इतनी बेइज़्ज़ती के बाद इज़्ज़त देने के लिए शुक्रिया!" सारा इस्माइल का यह वाक्य अपने भीतर एक गहरी, काँपती हुई मानवीय संवेदना की अपेक्षा रखता है। इसे केवल तन्क़ीद की तरह पढ़ना शायद उसके सबसे कोमल अर्थ को खो देना होगा। इसकी एक सहृदय व्याख्या यह हो सकती है कि कभी-कभी मनुष्य का हृदय, आहत होने के बाद भी, अपने भीतर कृतज्ञता का एक छोटा-सा दीप बचाकर रखता है। जैसे बहुत तेज़ आँधी के बाद भी किसी खिड़की के कोने में रखा दिया पूरी तरह बुझता नहीं, बस लौ थोड़ी नीली पड़ जाती है। इस वाक्य में शिकायत है, पर उसके भीतर संवाद की आख़िरी इच्छा भी है। यह ऐसा नहीं कहता कि सब कुछ समाप्त हो गया; अपितु यह कहता है कि जो टूटा, खंडित हुआ, उसके बाद भी यदि सम्मान का एक कण या एक लम्हा बचा है तो उसे मैं पहचानती हूँ। यह एक आहत आत्मा का उच्छवास है, पर साथ ही एक सुसंस्कृत आत्मा का भी, जो अपमान की राख में से भी आदर का एक अक्षर चुन लेती है। कितनी अद्भुत बात है कि एक युवा लड़की अपने सबसे दु:खी क्षण में भी पूरी तरह क्रूर नहीं होती; वह धन्यवाद की भाषा बचाए रखती है, मानो अपने ही टूटे हुए व्यक्तित्व को यह याद दिला रहा हो कि विनम्रता पर किसी एक घटना का अधिकार नहीं। यह पंक्ति उस गुलाब की तरह है, जिसे किसी ने बहुत रूखे हाथों से छुआ हो, फिर भी वह अपने भीतर सुगंध का अंतिम अधिकार नहीं छोड़ता। इसमें आत्मसम्मान है; क्योंकि वह अपमान को नाम देकर सामने रखती है; और इसमें उदारता भी है, क्योंकि वह सम्मान के क्षण को नकारती नहीं। यानी यह पंक्ति पराजय या अपमान की नहीं, संवेदना की परिपक्वता की पंक्ति है। यह कहती है: आपने मुझे दु:ख दिया, यह मैं भूली नहीं; पर तुमने यदि अंततः सम्मान दिया तो उसे भी मैं देखने की शालीनता रखती हूँ। लेकिन किसी के लबों से गुलाब जलते हैं तो कृपया बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते रहना ठीक नहीं है। और शायद सबसे सुंदर अर्थ यही है कि यह वाक्य मनुष्य की उस दुर्लभ क्षमता को उजागर करता है, जिसमें वह पीड़ा को भी भाषा की गरिमा में बदल देता है। यह क्रोध का पत्थर नहीं, पीड़ा का चमकता हुआ दर्प और दर्पण है, जिसमें सामने वाला भी दिखता है और बोलने वाले की आत्मा भी। यही इसकी सकारात्मकता है। कि टूटकर भी भद्दा न होना, दु:खी होकर भी भाषा को सलीका देना और अपमान के इतिहास में भी सम्मान के एक छोटे-से क्षण को दर्ज़ कर लेना। उसका तात्पर्य अपमान करना होता तो वह वहीं "मुझे नहीं चाहिए, ऐसे लोगों से डिग्री" जैसा कुछ भी बोलकर अपमानित कर सकती थी। यही बात तो जैसे कविता करती है कि घाव को नकारती नहीं, पर उसे इतना सुंदर बना देती है कि वह केवल घाव न रह जाए, एक गहन जीवनानुभव बन जाए। और अंत में मुंडकोपनिषद् की इस बात को समझने का प्रयास करें : अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ 8 ॥ अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः । यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागा- तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ 9 ॥ अर्थात् : अविद्या के बीच रहने वाले और अपने को ही बड़ा बुद्धिमान समझने वाले वे मूढ़ मनुष्य वस्तुतः उस अन्धे के समान हैं, जिसे दूसरा अन्धा व्यक्ति मार्ग दिखाने का दावा करता हुआ कहीं भी लिये फिरता है। वे चलते बहुत हैं, पर पहुँचते कहीं नहीं; बोलते बहुत हैं, पर जानते कुछ नहीं; और अपने ही भ्रमों की धूल में पीड़ित होकर दिशाओं-दिशाओं भटकते रहते हैं। कबीर ने इसे ही तो अंधे अंधा ठेलिया, दोऊ कूप पड़ंत बताया था। ऐसे लोगों का आत्मविश्वास प्रकाश नहीं, अज्ञान का आवरण होता है। इसीलिए जहाँ विनम्रता के प्रति आदर नहीं, वहाँ विद्या भी नहीं; और जहाँ तत्त्वदृष्टि नहीं, वहाँ पाण्डित्य भी अंततः भटकन का ही एक दूसरा नाम बन जाता है। बहुधा अविद्या के अंधकार में रहनेवाले वे विपरीत-बुद्धि लोग यज्ञ के अल्पसमय से ही 'हम कृतार्थ हो गये हैं' इस प्रकार अभिमान किया करते हैं। क्योंकि कर्मठ और सुविज्ञ लोगों को कर्म के रागानुराग के कारण तत्त्व का ज्ञान नहीं होता, इसलिये वे दुःखार्त्त होकर यज्ञ की मूल प्राप्ति से च्युत हो जाते हैं!

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Daniel Foubert 🇵🇱🇫🇷
Trump thinks he can solve a clash of ancient civilisations that started more than 2500 years ago. The Israelis are Mesopotamians, and the Iranians are Indo-Europeans. Abraham is explicitly from Ur of the Chaldees, which is in southern Iraq, near modern Basra. There is no meaningful genetic discontinuity between the people of ancient Mesopotamia and the people who became Canaanites who became Israelites. Hebrew is a Semitic language. The Semitic language family originated in Mesopotamia and the Arabian Peninsula. Hebrew, Aramaic, Akkadian, Arabic, Babylonian — all branches of the same tree. Hebrew and Babylonian Akkadian are cousin languages the way Spanish and Italian are cousins. They share root words, grammatical structures, and conceptual vocabulary going back thousands of years before the Bible was written. The foundational myths of Judaism — creation, the flood, paradise, the first man, the tower — all have direct Mesopotamian predecessors that are older. The ethical and legal framework — the covenant structure, the law codes — mirrors Mesopotamian forms. The calendar is Babylonian. The alphabet is Aramaic-Mesopotamian. The very concept of recording sacred history in written texts is a Mesopotamian invention. El — the chief god of the early Israelites and the root of the word Elohim, one of the Hebrew names for God — was a Canaanite/Mesopotamian deity. The word Israel itself contains El. The angels, the cosmic hierarchy, the idea of a divine council — all have deep Mesopotamian roots. Early Israelite religion before the exile looks very much like a local variant of broader Mesopotamian religious culture, with Yahweh gradually absorbing the attributes of El, Baal and others into a single deity. "Iran" comes directly from "Aryana" — land of the Aryans. The Iranians were Indo-European, not Semitic. This is the foundational distinction. Where the Semitic world — Sumerians absorbed by Akkadians, Babylonians, Canaanites, Jews, Arabs — emerged from the Fertile Crescent and Arabian Peninsula, the Iranians came from somewhere completely different. The Iranian peoples were part of the great Indo-European migration — a population that originated on the Pontic Steppe, the grasslands north of the Black Sea and Caspian Sea, in what is now Ukraine, southern Russia and Kazakhstan. Around 2000–1500 BC these steppe peoples began expanding in all directions on horseback, carrying their languages with them. One branch went west and became the Greeks, Romans, Celts, Germans, Slavs. Another branch went south and east and split into two streams — one into India becoming the Vedic civilization, one into Iran becoming the Persians and Medes. Old Persian, Sanskrit, Greek, Latin and all their descendants are branches of the same tree. The word for father in Persian is "pedar," in Latin "pater," in Greek "patér," in Sanskrit "pitár," in English "father." The word for god in Persian is related to the Sanskrit "deva." The Iranian god Mithra appears in Roman religion as Mithras and possibly echoes in the Vedic Mitra. These are not coincidences — they reflect a common origin perhaps 5,000 years ago on the Eurasian steppe. The two main Iranian tribes that entered history were the Medes in the northwest and the Persians in the south. The Medes formed the first Iranian empire around 700 BC, destroying the Assyrian Empire — the superpower of its day — in alliance with the Babylonians. Then the Persians under Cyrus the Great overthrew the Medes in 550 BC and built the Achaemenid Empire. In 651 AD the Sassanid Persian Empire — the last great pre-Islamic Persian dynasty — was destroyed by the Arab Muslim armies in one of the fastest conquests in history. Iran was Islamicized. Arabic became the language of religion and high culture. Yet something remarkable happened — unlike Egypt, like North Africa, like the Levant, which gradually became Arabized in language and identity, Iran kept its language. Persian survived. Within two centuries Iranians were writing sophisticated poetry, philosophy and science in Persian — using the Arabic script but their own language. The Persian cultural identity proved resilient enough to absorb Islam without being dissolved by it. The Persian literary renaissance of the 9th-10th centuries produced figures like Ferdowsi, whose Shahnameh — Book of Kings — deliberately reconstructed pre-Islamic Persian identity and mythology. It was a conscious act of cultural preservation remarkably similar to what the Jewish scribes did with the Torah in Babylon. A conquered people writing their way back into existence. So you have two civilizational streams that met in the Middle East: The Semitic stream — out of Arabia and the Fertile Crescent, producing Sumerians, Akkadians, Babylonians, Canaanites, Jews, Arabs. Urban, agricultural, text-centered from very early, building civilization in river valleys. The Indo-European Iranian stream — out of the Eurasian steppe, mounted, pastoral, bringing a completely different cosmology, a dualistic theology, a warrior aristocratic culture that then learned to govern sedentary civilizations from the Semitic world. Modern Iranians are the descendants of that Indo-European Iranian stream, heavily mixed with the pre-existing Elamite and Semitic populations of the region, then further shaped by Arab Islamic conquest. Genetically they are distinct from Arabs — closer to South Asians and Europeans than to Semitic Arabs in certain markers, reflecting that ancient steppe origin. Linguistically Persian is closer to English than it is to Arabic — both are Indo-European, while Arabic is Semitic. Which makes the current conflict between Iran and Israel — between the heirs of the Indo-European Iranian world and the heirs of the Semitic Mesopotamian-Canaanite world — in some sense a resumption of the oldest cultural fault line in the Middle East. The same two civilizational streams that first encountered each other when Cyrus walked into Babylon in 539 BC, when he freed the Jews and sent them home. Except then they were allies. And the Iranian was the liberator of the Semite. History has a very dark sense of humor.
Daniel Foubert 🇵🇱🇫🇷 tweet media
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RajeshJoshi
RajeshJoshi@RajeshJoshi·
@TheTribhuvan एक बुनियादी बात शायद आपके ध्यान से उतर गई। भारतीय जनता पार्टी को पश्चिम बंगाल में पाँव धरने की जगह ममता बनर्जी ने ही दी थी। उस वक्त वो वाममोर्चे की सरकार को उखाड़ने में जुटी थीं। पंचायत चुनाव में ममता ने भाजपा से अंदरख़ाने साँठगाँठ की थी। पेड़ बबूल का बोया, अब आम खाना चाहती हैं।
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Tribhuvan_Official
Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
ममता बैनर्जी : ओ स्त्री, कितना विचित्र है ये देश! एक अकेली औरत और सामने तूफ़ानी ताक़तें! एक तरफ़ दुनिया भर के वामपंथी, आरएसएस का विशालकाय धनबल और जनबल, समूची काँग्रेस और न जाने कौन-कौन...! भारत की समस्त धनशक्तियाँ, आरएसएस के अगणित आनुषंगिक और आनुवंशिक प्रकल्प और उनके गल्पकार, धर्म शक्तियां और अधर्मशक्तियाँ, वामदलों के सहस्रों समर्थक बौद्धिक वीर और काँग्रेस के ज़मीनी-हवाई संगठन सबके सब की एक साझा शत्रु! लेकिन 150 रुपए वाली साधारण हवाई चप्पल और चालीस साल तक 350 रुपए वाली वही धनेखाली हैंडलूम की नीले बॉर्डर वाली श्वेत धवल बंगाली सूती साड़ी में लोहा लेती यह रणचंडी अद्भुत है! शायद भारत भूमि और सादगी में गाँधी की असली बेटी यही है, जो वटवृक्षों की पराक्रमी शक्तियों को अपने तृण से कंपकंपाए है! सादगी में गाँधी की बेटी तो क्रोध में मानो किसी फ़िल्म के एंग्रीयंग मैन की बड़ी बहन, जो महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करते सपा सांसद दारोगाप्रसाद सरोज को स्पीकर बालयोगी के पॉडियम के पास से वेल में होते हुए कॉलर पकड़कर बाहर घसीट ले जाती हैं। महिलाओं के प्रति अनादर दर्शाते सपा सांसद दारोगाप्रसाद सरोज ममता को लात मारने की हिमाकत करता है तो वे जवाब में ऐसा घूंसा जड़ती हैं कि सरोज चौकड़ी भूल जाता है। भारतीय संसदीय इतिहास की यह सबसे चर्चित झड़प थी। यह घटना उनकी फ्रायरब्रांड छवि को हमेशा के लिए स्थापित कर गई। “दीदी दादा बनकर सड़क पर कोलकाता में ही नहीं, दिल्ली तक में और सदन तक में डराती हैं!” और इस बार तो वे डराने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गईं। यह जो कविताएँ रचती है। यह जो हर रात अपनी माँ के बगल में सोती रही हैं। ये नहीं कि ख़ुद सत्ता के वैभवशाली केंद्रीय राजमहल में रहें और साल में एक दिन माँ के साथ फ़ोटो ट्वीट करें। सच्चा मातृ प्रेम, लेकिन किसी भी तरह का प्रपंच नहीं। सादगी भरे घर के फ़ोटो तक नहीं करने देतीं। वह जो वैभव और धनबल के अश्लील प्रचार से सुदूर है। और वह जो कहीं भी दौड़ लेती है! जो दस-दस बीस-बीस किलोमीटर पैदल चलकर भी थकती नहीं और हर रोज़ ट्रेड मील पर दौड़ती हैं। तीन बार लगातार मुख्यमंत्री रहने और चौथी बार की तैयारी में होने के बावजूद वह आज भी छोटे से पुरानी टाइलों वाले छत के घर में रहती हैं, जहाँ न एसी है और न लग्ज़री फ़र्नीचर। कोलकाता के टॉली नाला के पास कालीघाट इलाके में भारी बारिश या हाईटाइड में सड़क और घरों में पानी भर जाता है तो ममता ख़ुद ईंटें या पत्थर बिछाकर अंदर-बाहर आती जाती हैं। छह जुलाई 2000 को जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपनी रेल मंत्री की माँ गायत्री देवी से मिलने उनके घर गए थे तो वे इस घर को देखकर अवाक़ रह गए थे और उनका कंठ रुंध गया था। मैं भी जब बंगाल चुनाव कवरेज के लिए गया था तो उस घर तक जाकर आया था। सचमुच वह घर ही कह रहा था कि सत्ता ने ममता के भीतर प्रवेश नहीं किया और ममता सत्ता के अंदर नहीं गईं। ममता! जो दुःसाहस का सच्चा प्रतीक है। वह जो लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे उस असाधारण नेता की कार के बोनट पर 1975 में उस समय तांडव दिखा सकती है, जब उनकी लोकप्रियता पूरे देश में नभ को स्पर्श कर रही है! जयप्रकाश नारायण की सफ़ेद एंबेसडर कार धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स और युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का काफ़िला उन्हें रोकने की कोशिश करता है; लेकिन ममता तेजी से आगे बढ़कर कार के बोनट पर चढ़ती हैं और डांस करने लगती हैं। यह उनके पॉलिटिकल कॅरियर का सम्मोहक ट्रेलर था। आज वे जयप्रकाश नारायण को अपन आदर्श मानती हैं और आपातकाल की यादें दिलाकर काँग्रेस और भाजपा के ख़िलाफ़ लोगों को एकजुट करती हैं। लेकिन उनके उस कदम ने दिखाया था कि प्रोटेस्ट और प्रतिरोध उनकी रगों में बहते लहू में खनकता है। ममता, वह जो माइकेल मधुसूदन दत्त, कवींद्र रवींद्र और काज़ी नज़रुल इस्लाम को धारण करती है। वह जो महाश्वेता का आशीर्वाद पाती है। काँग्रेस में प्रणव मुखर्जी से लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट जैसे कितने ही सशक्त और जनप्रिय नेता अपमान के घूँट पीकर अच्छे अवसर की बाट जोहते रहते हैं। हम वसुंधरा राजे जैसी राजसी ठसक और निर्भीक नेता को बेबस कर दिए जाने की कहानियों को देखते-सुनते और महसूस करते हैं। लेकिन ममता ने कांग्रेस हाईकमान के शक्ति केंद्र को ठोकर मारकर उस वामपंथी शासन सत्ता के धुर्रे बिखेर दिए, जो 38 साल से सिकंदर की तरह सिर ताने गर्वोन्नत थी। राजस्थान में एक बार सचिन पायलट के सामने और एक बार वसुंधरा राजे के सामने इसी अवसर ने दरवाज़े पर आकर दस्तक दी थी; लेकिन वे चूक गए। ममता ने बताया था कि किसी तरह एक तृण से विशालकाय तरुवर को उखाड़ा जा सकता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक कॉलेज छात्रा, जिसके पिता की मृत्यु 17 साल की उम्र में हो जाती है और वह कभी स्टेनोग्राफर, कभी प्राइमरी स्कूल टीचर, कभी प्राइवेट ट्यूटर और शायद कुछ बार सेल्स गर्ल तक का काम करके अपनी और अपने घर की ज़रूरतें पूरी करके साबित करती हैं कि इस देश के लोकतंत्र में बिना काॅरपोरेट घरानों, बिना धर्मांधता या जातिवाद फैलाए अपने साहस से ही कितना कुछ किया जा सकता है। ममता सेल्फ मेड की मिसाल हैं। बाप का पैसा तो क्या ही होता, बाप ही नहीं। कोई राजनीतिक विरासत नहीं। आरएसएस जैसा कोई विशालकाय बूढ़ा धर्मध्वजी संगठन नहीं। कम्युनिज्म जैसी कोई विचारधारा की पीठिका नहीं। लेकिन कांग्रेस के भीतर से निकली एक तेजस्वी लड़की ने इतनी पुरानी पार्टी को हाशिए से बाहर कर दिया। मुझे अख़बारों में छपी वे पुरानी ख़बरें याद आती हैं, जब ममता काँग्रेस में थीं और शायद 1996 में सोमेन मित्र को पश्चिम बंगाल पीसीसी का अध्यक्ष बनाया गया था तो ममता यूथ काँग्रेस की अध्यक्ष थीं । उन्होंने केंद्र के इस फ़ैसले का खुलकर विरोध किया और कहा कि जिस सोमेन मित्र को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया है, वो कांग्रेस का मित्र नहीं, शत्रु है और सच कहो तो तरबूज़ है तरबूज़। बाहर से हरा, लेकिन भीतर से लाल। वे सार्वजनिक रूप से सोमेन मित्र को तरबूज़ कहकर चिढ़ाती थीं। कल्पना कीजिए कि क्या किसी प्रदेश में ऐसा युवक काँग्रेस नेता होगा, जो हाईकमान के अभी-अभी बनाए पीसीसी प्रेजिडेंट को इस तरह हड़काए! क्या इस हिसाब से काँग्रेस की युवा पीढ़ी के आज के नेता फंगस खाए हुए नहीं हैं? क्या ममता बैनर्जी कांग्रेस में रहतीं तो आज देश को इस शीर्ष दल का बेहतरीन नेतृत्व नहीं दे रही होतीं? लेकिन एक परिवारवाद के भीतर ही राष्ट्रीय नेतृत्व तलाश करने वाले संगठन में ऐसी कोई संभावना प्रतीत नहीं होती। और ममता ने अपने दमखम को इस तरह सशक्त किया है कि उसे उखाड़ने के लिए वह भाजपा लगी हुई है, जो आज तक कभी अपने पांवों पर खड़ी नहीं हो सकी। जो एक छद्म राष्ट्रवाद, झूठी देशभक्ति और भारतीय सनातन धर्म के एक कृत-विकृत स्वरूप को लकर चल रहे संगठन के कंधों पर किसी अपंग सत्तालिप्सु बुढ़िया की तरह सवार है! यह बहुत बड़ा सवाल है कि इतने प्रभामंडल वाले नेताओं के बावजूद भाजपा उस बालपहलवान की तरह है, जो पहलवान की पिता के कंधों पर चढ़कर हमजोलियों से मुकाबला करता है। संघ से विलग और एक स्वतंत्र राजनीतिक दल के रूप में भाजपा कदाचित् कांग्रेस से कहीं अच्छी साबित हो सकती थी; लेकिन उसके नेताओं में कभी यह साहस और आत्मबल दिखा ही नहीं कि वे संघ की धर्मध्वजी सोच से अलग होकर एकात्म मानववाद और गांधीवादी समाजवाद के राजनीतिक आदर्श पर चल सकें। यह मैं नहीं कह रहा, भाजपा के संविधान में है। वामदल चाहते तो अपने आपको समय की लय पर बदल सकते थे; लेकिन वे अभी भी पुरुषवर्चस्ववादी नौकरशाहना संगठन की जड़ता को प्राप्त कर चुके हैं, जो अपने ही दल के भीतर काम कर रही संघर्षशील और तेजस्वी राजनीतिक महिलाओं को मंच तक पर बिठाना शान के ख़िलाफ़ समझते हैं। यह तो मैंने अभी कल ही देखा। काँग्रेस चाहती तो हालात परिवर्तित करना नामुमकिन नहीं था। लेकिन ममता ने साबित किया कि कई बार तिनका (तृणमूल) ही वटवृक्षों पर भारी साबित हुआ करता है, ख़ासकर तब जब नेतृत्व इस तरह की अग्निमय नेता के पास हो। मैं किसी दल का प्रशंसक नहीं हूँ। ममता बैनर्जी या उनकी तृणमूल का भी नहीं। क्योंकि मेरी निगाह में आज की समूची राजनीति और उस समस्त विचारधाराएं अप्रासंगिक हो चुकी हैं। समूची दुनिया एक नई करवट लेने जा रही है। आज सत्तावादियों और कॉरपोरेट दस्युदलों ने पृथिवी को एक भयावह संकट में धकेल दिया है! इस दुनिया के खलनायक ट्रंप ने कल ही कहा है कि ईरान के बाद अब उसके सबसे अधिक निशाने पर कोई एक शत्रु है तो वे लोकतांत्रिक लोग हैं। हालांकि इस बेशर्म नेता ने इस शब्द से पहले रेडिकल लगाकर लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की है। राष्ट्र-राज्य पूरी दुनिया में सड़ गया है। संप्रभुताओं की बेले सूख गई हैं। न्याय की समस्त पीठें सिर के बल खड़ी होकर अन्याय के पक्ष में फैसले दे रही हैं। एक मध्ययुगीन गुंडागर्दी से मानव समाज को हांकने की कोशिशें हो रही हैं। लेकिन मुझे लगता है कि जिस तरह पौ फटने से पहले का अंधेरा होता है, उसी तरह का एक डरावना दृश्य हमारे सामने है। मीडिया सत्ता के राज सिंहासन पर आसीन बूढ़े और अश्लील शासकों के सामने कामुकता के गान करने में जुटा है। विधायिका स्वर्णपुरी की दैत्यनगरी में परिवर्तित हो गई है। लोक आंदोलन करता है, लेकिन लोकतंत्र के मंदिर की देहरी पर साष्टांग दंडवत होने का प्रहसन रचता शीर्ष सत्ताधीश उन्हें कंटीले तारों से घेर देता है! न्याय का सबसे बड़ा देवता अपने आंगन की एक देवी से बलात्कार करता है। वह चीखती है तो न्याय करने भी स्वयं बैठ जाता है। देश की सिट्‌टीपिट्‌टी गुम हो जाती है। वह बोलता तक नहीं। मानो महाभारत में द्रोपदी के चीरहरण का दृश्य एक बार पुन: दुहराया जा रहा है। और तो और, वही सत्ता के केंद्रीय कक्ष में प्रवेश पा जाता है। हमारे धार्मिक नेता कहते हैं कि राममंदिर ने सहस्रों युगों की साधना पूरी कर ली है; लेकिन हम देखते हैं कि उस मंदिर के प्रबंधक रावण से भी बुरा आचरण करने वाले साजायाफ़्ता पाखंडी का साष्टांग स्वागत करते हैं। यह प्रकरण न्याय, धर्म और सामाजिक सरोकारों और मानवीय मर्यादाओं के समस्त सिद्धांतों को तिरोहित कर देता है। और न्याय देखिए कि सत्ता से ब्लैकमेल होकर वह आठ लाख 69 हजार साल पहले हुए राम के प्रमाणों को तो मान लेता है और 1992 की घटनाएं मानो उसके लिए किसी अंतरिक्ष लोक की घटनाएं थीं! एक स्त्री न्याय के द्वार जाती है तो उस बलात्कार पीड़िता से न्याय का शीर्ष देवता मानो पूछता है, ओ सीता-तुम रावण से शादी करोगी??? ओ द्रोपदी, तुम्हारा क्या ख़याल है कि तुम दु:शासन की अर्धांगिनी बनोगी़??? और न्याय का यह हाल है कि एक उच्च पीठ पर बैठी न्याय की एक देवी एक अश्रु विगलित और क्षत विक्षत आत्मा से कहती है, अभी त्वचा से त्वचा ही कहाँ स्पर्श हुई है! उफ! अब शायद वह दुर्दिन आना शेष है, जब कोई न्याय पीठ किसी बलात्कार पीड़िता से कहेगी : कंडोम पहनकर हुआ है। यह तो बलात्कार माना ही नहीं जा सकता!!! कितना डरावना है माहौल! कितना पैशाचिक है इस लोकतंत्र का चेहरा!!! थाने से लेकर न्याय की प्रमुख पीठ तक दुर्गंध ही दुर्गांध! सड़ांध ही सड़ांध!!! और इस वातावरण में ममता बैनर्जी के प्रति क्या ममता नहीं उमड़ेगी? पश्चिम बंगाल में सारे वामपंथियों, काँग्रेस के नेताओं और संघ वालों ने इस भारत ललना पर ऐसे चौतरफा हमला बोल दिया है जैसे वहां 1958 के फूल बाग का रणक्षेत्र पुनर्जीवित हो गया हो! मानो, लंबी दाढ़ी वाले ह्यूरोज़ ने ब्रिगेडियर स्टुअर्ट, ब्रिगेडियर जनरल नेपियर, कैप्टन एबट, लेफ्टीनेंट नीव, लेफ्टनेंट हरकोर्ट, स्टुअर्ट, कैप्टन लाइट फुट, कैप्टन रीच जैसे झांसी की रानी पर टूट पड़े हों। जैसे झांसी की रानी चार दिन तक न स्वयं सोती है और न उसका घोड़ा राजरत्न सोता है। महाश्वेता देवी के प्रसिद्ध उपन्यास 'झांसी की रानी' को मैंने स्कूल के दिनों में पढ़ा था और आज मुझे उसके आख़िरी पन्ने याद आ रहे हैं। और ऐसा लग रहा है, जैसे 1857 फिर सामने है। एक झांसी की रानी है। और देशी-विदेशी शक्तियां कैसे इस ललना पर टूटी पड़ रही हैं। महाश्वेता भी आज होतीं तो ममता के साथ होतीं, वे कम्युनिस्टों के खिलाफ जाकर ममता के पक्ष में मुखर रहीं; लेकिन अब चारों तरफ कोई महाश्वेता नहीं है। बस ममता ही है। वही महाकाली और वही महाचंडी है! शत्रु दल में उसके प्रति जो भय है, वह साफ़ दिखाई दे रहा है! विपुल धन और अतुल वैभव के सामने उसकी सादगी कितनी सम्मोहक है। देशवासी जिस समय क्षुद्र स्वार्थों से व्याकुल हैं, जिस काल में धर्मोन्माद की दुंदुभी बज रही है। जिस समय संत जन से लेकर अंत जन तक भारतीयता के सच्चे अर्थों को भूल गए हैं, उस समय एक स्त्री की क्या शक्ति हो सकती है, उसका सच्चा रूप ममता बैनर्जी के रूप में सामने है। ये हार भी गई, जिसकी आशंका बहुत क्षीण है लेकिन तो भी 'ख़ूब लड़ी मरदानी' की तरह अपराजेय रहेगी और जीत गई तो अविवेकी बल निस्तेज और नत शीश होगा ही! वैसे तो यह देश सुबह से शाम तक स्त्री महिमा का गायन करता है, लेकिन सच में तो यहां की न्याय पालिका, यहां की विधायिका, यहां की कार्यपालिका और यहां का मीडिया और जन लोक.....सबके सब पूरी ताक़त से स्त्रियों के विरोध में जुट पड़ते हैं। फिर भले वह न्याय के मुख्य देवता हाथों इज्जत लुटवाने के बावजूद न्याय से वंचिता हो, अपने देश को छोड़कर आई सोनिया हो, वह शासन सत्ता के अहंकारों पर वज्र प्रहार करने वाली सोशल मीडिया की जागरूक और सचेतन महिलाएं हों, वह दिशा रवि हो या वह बरखा दत्त हो, वह कविता हो या अरुणा-अरुंधती, वह वसुंधरा राजे हो या फिर ममता बैनर्जी...वह विवेकहीन लोक का प्रहार झेलती ही है। यह देश जो देवियों की पूजा करता है, लेकिन आचरण में एकदम विपरीत व्यवहार करता है! महाश्वेता के शब्दों में कहूं तो : सत्य है सैलुकस, कितना विचित्र है ये देश!!! (डिस्क्लेमर नहीं, ऐक्नॉलेजमें : इस ट्वीट में बहुत सी बातें आपको ममता का प्रशस्तिगान और बहुत सी बातें आपको कुछ दलों की नाहक़ निंदा लगेंगी। लेकिन सच में ये सब प्रश्न हैं, ताकि हम सब एक सुचिंतित बहस कर सकें और कुछ सारतत्व निकले। इसलिए इसे किसी के भी पक्ष या प्रतिपक्ष में न माना जाए। हर पक्ष इस पूरी सीरीज में बहस के लिए आमंत्रित है ताकि मैं और हम सब सीख सकें।) @MamataOfficial @AITCofficial #GhoshToBanerjee
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RajeshJoshi
RajeshJoshi@RajeshJoshi·
@TheTribhuvan आपके इन आलेखों को संभाल कर रख लेना चाहिये, काहे से कि इतनी ठोस जानकारी इतनी थोड़ी सी जगह में समा गई है। धन्यवाद।
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Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
आइए, आज जानें पश्चिम बंगाल के चौथे सीएम अजॉय कुमार मुखर्जी के बारे में। इससे पहले हम जान चुके हैं तीन मुख्यमंत्रियों के बारे में, जिनके लिंक अंत में दिए गए हैं। +++ पश्चिम बंगाल के चौथे सीएम अजॉय कुमार मुखर्जी थे। अजॉय मुखर्जी पश्चिम बंगाल के उन मुख्यमंत्रियों में थे, जिन्हें आम तौर पर सिर्फ़ 1967 के यूनाइटेड फ्रंट, नक्सलबाड़ी के उथल-पुथल भरे समय या कुछ छोटे और अस्थिर कार्यकालों के सहारे याद किया जाता है। ⧭ लेकिन डॉ. बिधान चंद्र रॉय, ज्योति बसु, सिद्धार्थ शंकर रे या ममता बैनर्जी जैसे अधिक चर्चित मुख्यमंत्रियों की लंबी और अधिक दृश्यमान राजनीतिक छवियों के बीच अजॉय मुखर्जी का व्यक्तित्व एक बिल्कुल अलग रोशनी में खड़ा दिखाई देता है। ख़ासकर नैतिक आग्रह, स्वतंत्रता-संग्राम की तपिश, वैचारिक जटिलता और सत्ता से अधिक सिद्धांत को महत्व देने वाली राजनीति की रोशनी में। ⧭ यह हैरानीजनक है कि अजॉय कुमार मुखर्जी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री तो तीन बार बने यानी 1967 में, फिर 1969-70 में और एक बार फिर 1971 में; लेकिन उनके कार्यकाल बहुत ही छोटे रहे। उनका एक कार्यकाल तो महज 265 दिन का, एक एक साल और 22 दिन का और तीसरा सिर्फ़ 88 दिन का। लेकिन उनके इन छोटे-छोटे कार्यकालों की ऐतिहासिक अनुगूंज असाधारण रूप से बड़ी है। ⧭ अजॉय कुमार मुखर्जी की कहानी कोलकाता के सत्ता-गलियारों से नहीं, तमलुक की उस मिट्टी से शुरू होती है, जहाँ राष्ट्रवाद सिर्फ़ भाषण नहीं, जोखिम था। 1901 में तमलुक में जन्मे अजॉय मुखर्जी स्वामी विवेकानंद के विचारों से गहरे प्रभावित थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे ताम्रलिप्त जातीय सरकार के प्रमुख निर्माताओं में रहे। इसे आप थोड़ा ध्यान से पढ़िए। दो कारणों से। एक तो शब्द से भ्रमित न होने के लिए और दूसरे सरकार के गठन के तरीके से। सरकार थी ताम्रलिप्त जातीय सरकार। यहाँ जातीय का मतलब राष्ट्रीय है, जातिगत नहीं। असल में जातीय शब्द राष्ट्रीय का पर्याय है और आजकल कास्टिस्ट या जातिवाद के सिलसिले में यह ग़लत चल निकला है। राष्ट़्रीय शब्द बहुत बाद का है। अगर इतिहास को देखें तो राष्ट्रीय कम और जातीय अधिक प्रयुक्त होता रहा है। इसी का दूसरा पर्यायवाची शब्द क़ौम है। लेकिन उसे भी अपने मानक अर्थ से बहुत गिरा दिया गया है। +++ ख़ैर, सावधानी की दूसरी वजह ये कि ताम्रलिप्त जातीय सरकार ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में एक समांतर सरकार थी। ऐसी समांतर सरकार जो 17 दिसंबर 1942 से 1944 तक बाकायदा ब्रिटिश राज के भीतर एक वैकल्पिक भारतीय शासन की तरह चली। यह ब्रिटिशर्स के कतई भरोसे न थी। इस सरकार के पास अपनी न्याय-व्यवस्था, अपनी पुलिस, अपना राजस्व तंत्र, अपना राहत कार्य, अपनी शिक्षा-संबंधी पहल और अपना ही सशस्त्र और अर्धसैनिक ढाँचा था। ‘बिद्युत बाहिनी’ और महिला संगठन ‘भगिनी सेना’ इसी संघर्षधारा का हिस्सा थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का यह एक अलग ही तरह का अध्याय था; लेकिन जानें क्यों इसे बहुत अच्छी तरह नहीं पढ़ाया जाता। समकालीन विवरणों में अजॉय मुखर्जी को उसके वित्तीय दायित्वों से जुड़ा नेता बताया गया है और बाद में वे उसके ‘सर्बाधिनायक’ भी बने। यह वही प्रतिरोध-भूमि थी, जिसमें मातंगिनी हाज़रा जैसी शहादतें दर्ज़ थीं। अंततः गांधीजी के निर्देश और हस्तक्षेप पर 1944 में इस समांतर सत्ता का समापन किया गया। ⧭ स्वतंत्रता के बाद भी अजॉय कुमार मुखर्जी सहज कांग्रेसी ढाँचे में समा जाने वाले नेता नहीं थे। 1966-67 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर बांग्ला काँग्रेस बनाई, और यही कदम पश्चिम बंगाल में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के निर्माण की बुनियाद बना। वे शुरू से ही कांग्रेस में, ख़ासकर बंगाल काँग्रेस के भीतर एक लेफ़्ट फ्रंट थे। उनके साथ प्रणव मुखर्जी, सिद्धार्थ शंकर रॉय, अब्दुल ग़नी खाँ चौधरी, आभा मैती, सुशीलकुमार धारा सहित अनेक युवा थे, जिन्होंने बंगाल काँग्रेस के पुराने कंजर्वेटिव ईलीट सिंडीकेट के ख़िलाफ़ 1966 में विद्रोह कर दिया था। 1967 के चुनाव में उन्होंने अरामबाग सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र सेन जैसे महानायक को पराजित किया। इस जीत की भी एक अनूठी कहानी है। इस समय तक अजॉय मुखर्जी 67 साल के हो चुके थे। उनसे प्रभावित एक छात्र नेता नारायण चंद्र घोष थे। घोष जैसे स्थानीय छात्र नेता की भूमिका का उल्लेख बेहद अहम है और इस छात्र नेता ने 1968 की बाढ़ के समय अरामबाग और घाटाल के प्रभावित इलाकों में अजॉय मुखर्जी काे नाव से घूम-घूमकर लोगों के बीच जाना सुनिश्चित किया। यह उनकी जन-राजनीति की सबसे जीवित छवियों में से एक है। अजॉय उन नेताओं में थे, जिनकी धमनियाँ महानगर से अधिक ग्राम्य परिवेश में आते ही अधिक खून प्रवाहित करने लगती थीं। ⧭ अजॉय कुमार मुखर्जी के पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल की सबसे विस्फोटक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि नक्सलबाड़ी थी। मार्च 1967 में उनकी सरकार बनी और उसी समय के भीतर नक्सलबाड़ी विद्रोह ने बंगाल की राजनीति को भीतर तक हिला दिया। उस दौर में कोलकाता, खासकर कॉलेज स्ट्रीट की दीवारों पर “मर्डरर अजॉय मुखर्जी मस्ट रिज़ाइन!” जैसे पोस्टर चिपकाए गए। यह दृश्य केवल राजनीतिक विरोध नहीं था। यह उस युग की उग्र वैचारिक दरारों का सार्वजनिक लेखा-जोखा था, जिसमें मुख्यमंत्री स्वयं निशाने पर थे। अजॉय मुखर्जी का नाम इसीलिए सिर्फ़ प्रशासनिक पद से नहीं, उस तनावपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ से भी जुड़ता है, जहाँ बंगाल का लोकतंत्र, वाम राजनीति, किसान असंतोष और राज्य-हिंसा एक-दूसरे में उलझ रहे थे। लेकिन अजॉय मुखर्जी को सबसे असाधारण बनाता है 1969-70 का वह प्रसंग, जिसे भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की विचित्रतम घटनाओं में गिना जा सकता है। दिसंबर 1969 में उन्होंने कर्ज़न पार्क, यानी राइटर्स बिल्डिंग के सामने अपनी ही यूनाइटेड फ्रंट सरकार के विरुद्ध सार्वजनिक सत्याग्रह और भूख हड़ताल की। पश्चिम बंगाल विधानसभा के अभिलेखों में दर्ज़ है कि उन्होंने अपनी ही सरकार को “बार्बरस” और “अनसिविलाइज़्ड” कहा था। मुझे यह तथ्य बहुत सुपुष्ट तो नहीं मिला; लेकिन उनकी संभवत: एक माँग यह थी कि इस गठबंधन में माकपा का प्रतिनिधित्व कर रहे उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री ज्योति बसु को बाहर करो। यह सिर्फ़ गठबंधन का मतभेद नहीं था; यह उस मुख्यमंत्री का नैतिक विद्रोह था, जो अपने ही शासन के भीतर फैलती हिंसा, अव्यवस्था और राजनीतिक जड़ता से विचलित हो उठा था। अंततः मार्च 1970 में उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया और यह स्वीकार करते हुए दिया कि ऐसी परिस्थितियों में सरकार चलाना और हिंसा रोकना लगभग असंभव हो गया है। और इस तरह काँग्रेस से अलग होकर बनी बांग्ला काँग्रेस अंतत: काँग्रेस में ही समाहित होकर विलोपित हो गई; लेकिन उसका एक खंड बिप्लवी बांग्ला काँग्रेस के रूप में मौजूद रहा, जिसके नेता सुकुमार रॉय थे और हल और हथौड़े का चुनाव निशान लेकर अपना परचम फहराते रहे। वे बाद में वाम गठबंधन में चले गए। ⧭ अजॉय मुखर्जी का निजी और पारिवारिक जीवन भी उतना ही दिलचस्प था, जितना उनका सार्वजनिक जीवन। वे स्वयं कांग्रेस और बाद में बांग्ला कांग्रेस की धारा के नेता रहे, जबकि उनके भाई बिश्वनाथ मुखर्जी और भाभी गीता मुखर्जी कम्युनिस्ट राजनीति से जुड़े थे। उनकी भतीजी कल्याणी का विवाह मोहन कुमारमंगलम से हुआ और वे रंगराजन कुमारमंगलम तथा ललिता कुमारमंगलम की माता थीं। यानी एक ही परिवार में भारतीय राजनीति की परस्पर विरोधी विचारधाराएँ साथ-साथ सांस ले रही थीं। यह एक संयुक्त परिवार था। एक साथ रहना और दो अलग-अलग विचारों को मानना। अजॉय मुखर्जी के भाई बिश्वनाथ मुखर्जी तो क़माल थे ही, सात बार विधायक और सात बार सांसद रहीं उनकी भाभी गीता मुखर्जी तो संसद में तेतीस प्रतिशत आरक्षण का विचार लेकर आने वाली पहली महिला नेता थीं। इसीलिए उन्हें ड्राफ़्ट कमेटी ने पूरा बिल लिखने को कहा और उन्होंने उसे लिखा। इसलिए अगर देश में महिला आरक्षण लागू होगा तो उसके लिए नरेंद्र मोदी या भाजपा सरकार अथवा काँग्रेस नहीं, सच में देखा जाए तो यह उपलब्धि गीता मुखर्जी की होगी। इतने लंबे कार्यकाल में गीता मुखर्जी सदैव ही महिलाओं और वंचितों के लिए संघर्षरत रहीं। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर की महिला अधिकारवादी नेता थीं। ⧭ लेकिन आजकल अगर अनाम से मान लिए गए बिश्वनाथ मुखर्जी के बारे में मैं एक तथ्य और बता दूँ तो छद्म राष्ट्रवादियों के छल का एक और आवरण उतर जाएगा। 1938 में जिस समय बिश्वनाथ मुखर्जी पढ़ने के लिए कोलकाता विश्वविद्यालय गए तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि वहाँ यूनियन जैक लहराता है और उसके आगे हर छात्र को सिर झुकाना और सैल्यूट करना होता है। लेकिन पहले ही दिन 21-22 साल के युवक बिश्वनाथ मुखर्जी ने यूनियन जैक के सामने सैल्यूट करने से साफ़ मना कर दिया। इस पर विश्वविद्यालय के 38 वर्षीय युवा कुलपति पर मानो वज्रपात हो गया और उन्होंने उनके विश्वविद्यालय प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। बिश्वनाथ मुखर्जी ने इस पर कुलपति के ख़िलाफ़ इतना विशाल और प्रभावशाली आंदोलन किया कि कुलपति ने कुछ दिन के बाद अंतत: समर्पण कर दिया। ये कुलपति कोई और नहीं, भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी थे, जो कोलकाता विश्वविद्यालय में आठ अगस्त 1934 से 8 अगस्त 1938 तक वाइस चांसलर रहे थे। ⧭ और 1971 में अजॉय मुखर्जी अपने कुछ निकट सहयोगियों के साथ कांग्रेस (आर) में शामिल हुए और अपने पुराने साथी सुशील धारा से अलग हो गए। उनके साथ तब एक युवा नेता प्रणव मुखर्जी भी थे। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अजॉय मुखर्जी को केंद्र में मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया, किंतु उन्होंने उम्र और स्वास्थ्य का हवाला देकर उसे अस्वीकार कर दिया और कहा कि मेरे बजाय आप प्रणब मुखर्जी को ले लें। इंदिरा गांधी ने उनकी बात मानी और सब जानते हैं कि इसके बाद प्रणव बाबू का राष्ट्रीय मंत्री-जीवन आगे चलकर भारतीय राजनीति के सबसे महत्त्वपूर्ण अध्यायों में गिना गया। हालांकि प्रणव मुखर्जी के बारे में उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी की लिखी पुस्तक "माई फ़ादर" में इस तथ्य को एकदम गोल कर दिया गया है कि इंदिरा गांधी की कैबिनेट में अजॉय मुखर्जी की सिफ़ारिश के कारण लिया गया था। अलबत्ता, शर्मिष्ठा ने जो लिखा है, ऐसे लिखा है, जैसे उनकी पिता की प्रतिभा को देखकर इंदिरा गाँधी ने उन्हें कैबिनेट में लिया। यह दो राय नहीं प्रणव प्रतिभाशाली तो थे ही। एक तो वे बोलते बहुत अच्छा थे और दूसरे वे संसद में सुबह से कार्यवाही समाप्त होने तक मौजूद रहते थे। लेकिन अजॉय मुखर्जी ने हाँ कर दी होती तो कदाचित उन्हें मंत्री बनने के लिए अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ती और वह अवसर चूक जाता। हम जानते हैं कि भारतीय राजनीति में द्वेष की दूर्वा याद रहती है और आगे बढ़ाने की आशाओं के अंकुर फूट नहीं पाते। ⧭ हम जब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं तो अजॉय मुखर्जी के तीनों मुख्यमंत्री कार्यकाल छोटे और अस्थिर रहे, पर उनकी नैतिक छवि असाधारण रूप से स्थिर रही। 1977 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। यह इस बात का संकेत भी था कि भारतीय सार्वजनिक जीवन में उनका योगदान केवल सत्ता की अवधि से नहीं, स्वतंत्रता-संग्राम, जनप्रतिबद्धता और राजनीतिक चरित्र से मापा गया। 27 मई 1986 को कलकत्ता में उनका निधन हुआ। उनके पीछे कोई विराट शासकीय स्थापत्य, कोई लंबे शासन का दंभ या कोई चकाचौंध भरी विरासत नहीं छूटी; छूटी तो एक दुर्लभ मिसाल कि राजनीति कभी-कभी पद से बड़ी, दल से बड़ी और स्वयं सरकार से भी बड़ी नैतिक जिम्मेदारी का नाम हो सकती है। हालांकि उनके शासकीय काल के नाम पर एक बहुत बड़ा धब्बा है, जिसमें मुक्ति दशक के जाने कितने ही तरुण नायकों का संहार हुआ। उन नायकों का जिनकी पलकों पर समानता, न्याय और निर्धन की समृद्धि के सपने जुड़े थे और जिन्होंने अपने विचारों से पूरे मध्यम वर्ग को झकझोर डाला था। उन हालात पर इस देश की महान् लेखक महाश्वेता देवी ने एक अतुलनीय उपन्यास रचा : "1084वें की माँ!" ⧭ ⧭ ⧭ कल हम जानेंगे सिद्धार्थ शंकर रे के बारे में। इससे पहले की कड़ियाँ 1. x.com/TheTribhuvan/s… 2. x.com/TheTribhuvan/s… 3. x.com/TheTribhuvan/s… #BengalElections #BengalCMSeries #पूर्व_सीएम #पूर्व_मुख्यमंत्री #AjoyMukharjee #BidhanChandraRoy #चिकित्सक_मुख्यमंत्री #DoctorCM #NationalDoctorsDay #ModernBengal #बंगाल_के_निर्माता #BengalHistory #WestBengalPolitics #CMToRemember #भारत_रत्न #DoctorsDayLegacy #BengalLeaders #ElectionSeason #BanglaPolitics #इतिहास_से_चुनाव_तक #GhoshToBanerjee #BengalElectionWithTribhuvan @TMC_Supporters @AITCofficial @MamataOfficial #BiswanathMukharjee #GeetaMukharjee
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@TheTribhuvan क्यों रक्तचाप ऊर्ध्वगामी करवा रहे हैं @TheTribhuvan जी! 😂😂😂
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Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
अभी मैं हिन्दी के एक सुविख्यात लेखक की एक बड़ी अच्छी कृति पढ़ रहा था। इसमें कुमार गंधर्व को चार प्रख्यात साहित्यकारों के सामने “तानपुरा” बजाते देखकर मैं “पुरा-पुरा” अवाक् हो गया। एक बड़े ज्वालामुखी पंडित की बिहारी पर भावार्थ प्रकाशिका टीका पढ़ी तो उसमें “सौंदर्यता” यत्र-तत्र बिखरी पड़ी थी। “निरोग” तो एक महामारी है और इस नाम से एक पत्रिका तक धाम किए बैठी है। हमारे यहाँ जयपुर में “ध्रुपद” “ध्रुवपद” को प्राप्त कर चुका है। भाषा में चतुर्दिक इतनी निंदा फैली हुई है कि “चुनीदा” रेख़्ता तक में “चुनिंदा” होकर मस्त है। समूचे देश में वसंत का सीज़ेरियन प्रसव जन्म से एक महीना पूर्व ही शिशिर में कर दिया जाता है।“ख़ुलासा” संक्षिप्त करना था; लेकिन “विस्तार से बताने में” इतना विक्षिप्त हो गया कि दिलासा ही दे सकते हैं। कुछ शब्द तो ऐसे हैं कि “वबाल” को सही बताओ तो “बवाल” काटते हैं लोग। बेचारे “सविता” का जाने कबसे कविता की तुकबंदी में ही जेंडर चेंज़ हो गया। “शीराज़ा” इंडिया टुडे के फ्रंट पेज पर “शिराजा” बनकर बिखर रहा था। हमने देखा कि जेएलएफ में “टोम्ब ऑफ़ सेंड” सुन-सुनकर “टूम” वहीं रेत-समाधि को प्राप्त हो गया। बड़े-बड़े विद्या-विनाशी पंडित वेदों में श्लोकों का ज़िक्र करते हैं तो “ऋचाएँ” मंत्रबिद्ध होकर करुण पुकार करने लगती हैं! सबको पता है कि कुरआन में “आयत” होती है; लेकिन सबके सब “हयातुल्ला” के चक्कर में भाषा की हया को तिरोहित कर “अयातुल्ला” पर बम गिरा रहे हैं और आयतुल्ला साब जाने किस जगह अपने नाम के प्रारम्भिक हिज्जों को गड़बड़ा देने पर अधिक दुःखी हैं। हमारे यहाँ कितने ही साधु-संन्यासी “गिरि” थे; लेकिन बेचारे “गिरी” हुई अवस्था को प्राप्त कर चुके हैं। यह विद्वानों और विदुषियों में सम्यक् बोध है कि “धर्मध्वजी” पाखंडी को कहते हैं; लेकिन अभी हमने देखा कि एक पूरा का पूरा राजनीतिक कुल ही “धर्मध्वजी” होकर गर्व से “धर्मध्वजा” फहरा रहा था और मूर्खता तालियाँ बजाकर लहालोट थी! तो इतना कुछ हो रहा हो तो साहित्य अकादमी “आत्मिय”ता क्यों नहीं दर्शा सकती? @drsureshpant
सुरेश पंत sureshpant@drsureshpant

किसी साहित्य अकादमी से भाषा की शुचिता की भी अपेक्षा की जा सकती है। अब यह अकादमी अपने "आत्मिय" जनों को बुला रही है, तो क्या कहा जा सकता है! एमपी अजब है...!

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RajeshJoshi
RajeshJoshi@RajeshJoshi·
James Petras: The Radical Scholar the World Chose to Ignore. His unforgiving writings on the politics of #NGOs exposed the cunning behind the idea of creating a buffer between the people and the State using Marxist jargons: m.thewire.in/article/books/… via @thewire_In
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RajeshJoshi
RajeshJoshi@RajeshJoshi·
Very strong signs of desperation. Very very strong signs!!
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