Dr Ramkailash Gurjar Bundi

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Dr Ramkailash Gurjar Bundi

@dr_ramkailash

Eye Care specialist & AI Researcher at SCEH Delhi, Ex-PostDoc Retina Fellow @CaseyEye, Portland,USA. Alumni of Unipg Italy, LVPEI & AIIMS Delhi.🇮🇳⏭🇮🇹⏭🇺🇸

New Delhi, India Katılım Mayıs 2019
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Dr Ramkailash Gurjar Bundi
Dr Ramkailash Gurjar Bundi@dr_ramkailash·
मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि जगदीशधाम देववाणी गुर्जर पत्रिका ने अपने मासिक संस्करण में मेरे और मेरी यात्रा के बारे में बताया है। मैं इस सम्मान के लिए देववाणी गुर्जर पत्रिका का आभारी हूं। @VijaySBainsla @GurjarBoysPage @GurjarsOfIndia1 @docvjg @gurjarwomaniya @GurjarConnect
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Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
असम का सबक: राजस्थान कांग्रेस को अब नेतृत्व की धुंध खत्म करनी होगी असम की हार को कांग्रेस अगर केवल एक राज्य की पराजय मानकर आगे बढ़ गई तो वह राजस्थान में भी वही ग़लती दोहराएगी। असम दरअसल कांग्रेस के लिए एक चुनावी रिपोर्ट-कार्ड नहीं, एक राजनीतिक चेतावनी है। कांग्रेस ने असम में 26 मई 2025 को गौरव गोगोई को असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया और 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह संकेत दिया कि पार्टी चुनावी कमान उनके नेतृत्व में लड़ेगी। इससे पहले भूपेन कुमार बोरा 24 जुलाई 2021 से 26 मई 2025 तक प्रदेश अध्यक्ष रहे थे। मुद्दा यह नहीं है कि गौरव गोगोई को अध्यक्ष बनाना सही था या ग़लत। मुद्दा यह है कि इतने कठिन चुनाव से मात्र एक वर्ष पहले नेतृत्व बदलना, संगठन को पूरी तरह नए ढाँचे में ढालने के लिए पर्याप्त समय नहीं देता। असम में भाजपा के पास सत्ता, संसाधन, स्थानीय संगठन और चुनावी मशीनरी की ठोस बढ़त थी। कांग्रेस ने चेहरा तो तय किया, पर क्या उस चेहरे के पीछे पर्याप्त समय, अनुशासन, आंतरिक एकजुटता और बूथ-स्तर की संरचना खड़ी हो पाई? यही बड़ा प्रश्न है। राजस्थान कांग्रेस को इसीलिए असम से सीखना चाहिए। यहाँ भी अगर प्रदेश नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता, अटकलें और खेमेबाज़ी चलती रही तो 2028 का चुनाव शुरू होने से पहले ही आधा हार लिया जाएगा। कांग्रेस हाईकमान को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि चुनाव किस अध्यक्ष और किस टीम के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। चाहे कमान सचिन पायलट को दी जाए, चाहे मौजूदा अध्यक्ष डोटासरा के पास ही रखी जाए, चाहे कोई तीसरा नाम आए; फैसला अभी होना चाहिए। ये पंक्तियाँ किसी को हटाने या किसी को बैठाने की पैरवी नहीं कर रहीं; यह पोस्ट केवल कह रही है कि जो भी तय करना है, समय रहते तय करिए। राजनीति में अस्पष्टता सबसे महँगी मुद्रा होती है। कांग्रेस की यह वर्षों पुरानी मुद्रा है, जो उसकी राजनीतिक अर्थव्यव्था और चुनावी कारोबार के लिए घातक सिद्ध हुई है। अगर मौजूदा अध्यक्ष डोटासरा को ही आगे रखना है तो यह आधिकारिक रूप से कहिए कि 2028 का चुनाव इन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इससे उनके विरोधियों के दैनिक कयास बंद होंगे और संगठन को दिशा मिलेगी। यह कहना इसलिए ज़रूरी है; क्योंकि उन्हें बहुत लंबा समय हो गया है। और अगर बदलाव करना है तो उसे भी अंतिम वर्ष तक मत टालिए। क्योंकि कांग्रेस को पिछली सरकार के समय अपनी लुटी हुई जनादेश की पूंजी को लौटाने के लिए भी श्रम करना है। उसे ध्यान रखना चाहिए कि आखिरी समय का प्रयोग अक्सर संगठन को ऊर्जा नहीं, अव्यवस्था देता है। राजस्थान में कांग्रेस के पास नेतृत्व की कमी नहीं है; समस्या नेतृत्व की अधिकता और स्पष्टता की कमी है। सचिन पायलट का जनाधार है, अशोक गहलोत का अनुभव है, मौजूदा संगठन-नेतृत्व यानी जूली-डोटासरा की अपनी पकड़ है और कई क्षेत्रीय नेता अपने-अपने प्रभावक्षेत्र रखते हैं। लेकिन यही संपत्ति तब संकट बन जाती है जब सब अपने-अपने घेरे में चलें और केंद्रीय नेतृत्व केवल संतुलनकारी धुंध फैलाता रहे। इसलिए अनिवार्य शर्त यह है कि जो भी अध्यक्ष हो, बाकी सभी प्रमुख नेता ईमानदारी से उसके साथ खड़े हों। अगर इनमें से कोई एक भी खिसका, निष्क्रिय हुआ या भीतर से सहयोग रोक गया तो राजस्थान में असम जैसी स्थिति बनते देर नहीं लगेगी। क्योंकि हालात कांग्रेस के लिए पहले ही बदतर हैं। भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस को पहले अपने संदेहों को हराना होगा। इसलिए कांग्रेस के राजनीतिक हित में फै़सला अब से एक महीने के भीतर हो जाना चाहिए। 2028 दूर नहीं है। संगठन, टिकट, अभियान, सामाजिक गठबंधन और बूथ-व्यवस्था आदि सबको समय चाहिए। वरना कांग्रेस के लिए 2028 का चुनाव सचमुच “20 और 28” के भीतर सिमट जाएगा। हाँ, हाँ। यही। और बीस तरह की खींचतान और अट्ठाईस तरह की सफ़ाइयाँ। याद रखिए कि भाजपा की सरकार कैसी भी चले, वह राजस्थान का चुनाव भी असम और बंगाल की ही तरह लड़ेगी। वह अतीत से सबक लेती है और पिछली कमज़ोरियों को दूर करके आगे बढ़ती है।
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Tribhuvan_Official@TheTribhuvan·
सचिन पायलट का नाम और कुछ चेहरों की उड़ी हुई रंगत क्या आपने किसी पार्टी के भीतर ऐसे लोग भी देखे हैं कि अपनी ही पार्टी का कोई नेता बाहर जाकर जोरदार काम करके आए, मेहनत करे, जिलों में धूल फांके, प्रत्याशियों के लिए सभाएं करे, रोड शो करे, डोर-टू-डोर अभियान में उतरे और जब उसके हिस्से थोड़ी-सी प्रशंसा आए तो अपनी पार्टी की जीत पर गर्व करने के बजाय उसी व्यक्ति को नाम लेकर कोसने लगें? राजनीति में विरोधी दल के हमले समझ में आते हैं। सत्ता और विपक्ष की लड़ाई भी समझ में आती है। लेकिन अपने ही घर की दीवारों पर कील ठोककर फिर यह शिकायत करना कि छत टेढ़ी क्यों है, यह केवल राजनीति नहीं, यह कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन है। केरल में कांग्रेस की अभूतपूर्व बढ़त की चर्चा हो रही है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक था कि पार्टी के लोग इस मेहनत को सामूहिक उपलब्धि की तरह पेश करते। लेकिन कुछ खेमों में जैसे ही सचिन पायलट का नाम आया, चेहरों पर वही पुरानी असहजता लौट आई। किसी ने पायलट का नाम भी नहीं लिया तो उस पर पायलट के नाम से ट्विटर के फर्जी हैंड्स से तंज कसने की भरमार। और सब जानते हैं कि इन्हें वही लोग चलाते हैं, जिनके जिम्मे इस महान् पार्टी ने पार्टी को पार्टी बनाने का काम सौंप रखा है! पायलट का नाम उनके लिए केवल एक नेता का नाम नहीं, एक हल्की-सी दस्तक है, जिसके पड़ते ही बंद कमरों के भीतर रखे कुछ काठ के बक्से टीन की तरह खड़खड़ाने लगते हैं। मंच पर यह नाम लिया जाए तो तालियां बजती हैं, लेकिन कुछ राजनीतिक कोनों में कुर्सियों की पीठ अचानक सीधी हो जाती है और चेहरों पर मुस्कान का सरकारी लेप चढ़ जाता है। सवाल यह नहीं कि पायलट अकेले जीत दिला लाए। कोई भी गंभीर व्यक्ति राजनीति को इतना सरलीकृत नहीं करता। सवाल यह है कि जब एक नेता वरिष्ठ पर्यवेक्षक के रूप में 55 से अधिक प्रत्याशियों के लिए प्रचार करता है, 14 में से 10 जिलों में जाता है, एक दिन में पांच-छह कार्यक्रम करता है, सभाओं, दौरों, रोड शो और जनसंपर्क में पसीना बहाता है तो अपनी ही पार्टी के लोग उसकी मेहनत को स्वीकार करने में इतने कंजूस क्यों हो जाते हैं? पायलट की प्रभावशीलता से पार्टी के कुछ खास खेमों में मचने वाली खलबली का असली रहस्य है। पायलट राजनीति में उस किस्म की उपस्थिति हैं जिसे केवल पदों, प्रेसनोटों और बंद कमरों की बैठकों से काटा नहीं जा सकता। उनके पास भीड़ खींचने की क्षमता है, युवा आकर्षण है, जमीन से संवाद है और वह बेचैन ऊर्जा है जो ठहरी हुई राजनीति को असहज करती है। जिन लोगों ने राजनीति को दरी, माइक, माल्यार्पण, किसी ख़ास नेता नाम के पेड़ के सहारे बेल की तरह लिपटकर रहना और बयानबाजी करते रहने का स्थायी कारोबार समझ लिया है, उनके लिए ऐसा नेता हमेशा असुविधाजनक संभावना रहेगा। कटाक्ष यह है कि एकता का भाषण देने वाले लोग अक्सर किसी लोकप्रिय चेहरे का नाम आते ही सबसे पहले विचलित हो जाते हैं। एकता उनके लिए तभी तक पवित्र है, जब तक तालियां उनके मंच की दिशा में बजें। जनाधार तभी तक सम्माननीय है, जब तक वह किसी और के पक्ष में दिखाई न दे। युवा ऊर्जा तभी तक स्वीकार्य है, जब तक वह फोटो में पीछे खड़ी रहे। दरअसल सचिन पायलट का नाम राजस्थान कांग्रेस के भीतर एक आईना है। इस आईने में कुछ चेहरों को अपना वास्तविक आकार दिखने लगता है। उन्हें डर लगता है कि कहीं यह सवाल न उठ जाए कि जनता किसे सुनना चाहती है और किसे केवल सहना पड़ता है। अपनी ही पार्टी की उपलब्धि पर गर्व करने के बजाय अपने ही नेता की लोकप्रियता से चिढ़ जाना राजनीतिक परिपक्वता नहीं, राजनीतिक असुरक्षा है। और असुरक्षा जब बयान बनकर बाहर आती है, तो वह विरोधी को नहीं, अपने ही दल को कमजोर करती है। कांग्रेस को अगर सचमुच आगे बढ़ना है, तो उसे मेहनत करने वालों की पीठ थपथपानी होगी, न कि हर चमकते चेहरे पर कालिख खोजनी होगी। जबकि राजनीति का सच ये है कि इस तरह की बेचैनी और बेहाली में जीने वालों के लिए भी पर्याप्त जगह है। कई बार तो वे लोग बहुत ऊँचे तक भी पहुंचे हैं; क्योंकि खरे का भ्रम पैदा करके चलने वाले खोटे सिक्कों वाली अर्थव्यवस्था का नाम ही राजनीति है। इन लोगों को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि संगठन किसी एक खेमे की बपौती नहीं होता। यह भाजपा को देखकर समझा जा सकता है। लेकिन सही तो ये है कि किसी सामान्य व्यक्ति के हाथ संगठन की कमान आती है तो उसे पद की ऊँचाई नहीं, व्यवहार की परिपक्वता बचाती है। उसे बहुत संजीदा, सबको साथ लेकर चलने वाला और उदार हृदय होना पड़ता है। अपनी सरपरस्ती में कुत्सा फैलाने वाले मरजीवड़ों का दस्ता किसी नेता को मजबूत नहीं करता, उलटे उसे छोटा, असुरक्षित और संकीर्ण साबित करता है। अपनी ही पार्टी के लोकप्रिय चेहरों से जलने के बजाय उन्हें जोड़िए। जाने इन लोगों को यह ख़याल कब आएगा कि कांग्रेस को विरोधियों से लड़ना है, अपने ही लोगों को काटना नहीं।
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Sachin Pilot
Sachin Pilot@SachinPilot·
समृद्ध हो राजस्थान, प्रदेशवासियों की हो तरक्की, हो सबकी मनोकामनाएं पूरी। भीलवाड़ा में मिली आत्मीयता और सम्मान के लिए सभी का हृदय से धन्यवाद 🙏
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LP Pant
LP Pant@pantlp·
मां!
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डीडी न्यूज़
#NewsPunch | बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम बना चिंता का कारण आज के समय में छोटे बच्चों में मोबाइल, टैबलेट और टीवी का बढ़ता उपयोग गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, कम उम्र में अत्यधिक स्क्रीन एक्सपोजर बच्चों के दिमागी विकास को प्रभावित कर सकता है। AIIMS आधारित रिसर्च में यह सामने आया है कि 18 महीने से कम उम्र के बच्चों में स्क्रीन टाइम से ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) का खतरा बढ़ सकता है, जिसके लक्षण आमतौर पर 3 साल की उम्र तक दिखाई देने लगते हैं। डॉक्टरों की सलाह है कि बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित रखा जाए, खाने के समय स्क्रीन से दूर रखा जाए और उन्हें आउटडोर खेल, बातचीत और किताबों की ओर प्रेरित किया जाए। पूरा कार्यक्रम देखें : youtu.be/lQ6WfSzjBdo @AnchorKritika #NewsPunchOnDD #ChildHealth #ScreenTime #AIIMSStudy #AutismAwareness
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Vatsala Singh
Vatsala Singh@_vatsalasingh·
बैंक वाले आपको ये कभी नहीं बताएंगे FD से ज्यादा रिटर्न डाकघर की 5 योजनाओं में मिलता है...
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Vatsala Singh
Vatsala Singh@_vatsalasingh·
अचानक हार्ट अटैक आने पर 7 रुपये की ये सबसें सस्ती किट अपने जेब, पर्स, घर, दुकान, और कार्यालय की अपनी दराज में हमेशां अपने पास रखें, क्योंकि ये देखने में आ रहा है कि आजकल अचानक और पहली बार आ रहे हार्ट अटेक में लोगों को अस्पताल पहुंचने तक का समय भी नहीं मिलता,और जान चली जाती है
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𝗩𝗲𝗱𝗮𝗰𝗵𝗮𝗿𝘆𝗮
रुकिए...सुबह की ये 1 आदत आपकी पूरी हेल्थ बदल सकती है
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UPSC & PCS NOTES
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ANI
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#WATCH | Delhi: (Head, Department of Pediatric Neurology, AIIMS, Prof. Shefali Gulati says, "A lot of research has been done regarding autism spectrum disorder and screen time. It was seen that autism was more prevalent among 3-year-old children who had more screen time at the age of 1 in proven studies... According to the guidelines of the ministry, children who are below 18 months should not be given screen time."
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ANI
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#WATCH | Delhi: On a study conducted at AIIMS that children under 2 years of age who watch too much mobile phone can develop autism, Head of the Department of Pediatric Neurology, AIIMS, Professor Shefali Gulati, says, "Humanistic approach is very important in life... Every child has an equal right to a dignified life... These children are also very important for us... You should go to a pediatric neurologist or a developmental paediatrician if there are symptoms of autism in a child..."
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Dr Dheer singh Dhabhai
Dr Dheer singh Dhabhai@Dheersdhabhai·
जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं, वहाँ माँ का प्रेम बोलता है। इस दुनिया में जहाँ स्वार्थ अपने चरम पर दिखता है, वहीं यह दृश्य याद दिलाता है कि अभी भी कुछ ऐसा है जो निर्विकार और निष्काम है— माँ का वात्सल्य। वह अपने अस्तित्व को पीछे रख देती है, और बच्चे को आगे— जैसे उसका जीवन ही अब उसी में बसता हो। यह दृश्य भीतर कहीं गहराई तक हिला देता है, क्योंकि यह हमें हमारी जड़ों की याद दिलाता है— वह संस्कृति, जहाँ प्रेम त्याग नहीं, बल्कि स्वाभाविक विस्तार है। माँ सिर्फ जन्म नहीं देती, वह अपने प्रेम से जीवन को अर्थ देती है— और यही ममता, इस कठोर समय में भी, मानवता की सबसे कोमल और सबसे सशक्त सच्चाई बनी हुई है। डॉ धीर सिंह धाभाई #जबलपुरहादसा #ममता #जबलपुरक्रूजहादस #बरगीडैम
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Dr. B L Bairwa MS, FACS
Dr. B L Bairwa MS, FACS@Lap_surgeon·
बच्चों को मोबाइल फ़ोन से दूर रखें।🙏
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डीडी न्यूज़
स्क्रीन टाइम से बढ़ रहा खतरा! नई दिल्ली स्थित एम्स के अध्ययन में बड़ा खु़लासा, 1 साल से कम उम्र के बच्चों में अधिक स्क्रीन टाइम का संबंध 3 साल की उम्र में ऑटिज़्म के बढ़े जोखिम से पाया गया है 👉18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखें #AIIMS #ScreenTime #AutismAwareness #ChildHealth #ParentingTips #DigitalParenting #DrShefaliGulati @MoHFW_INDIA @Nitendradd
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Dr Jitendra Singh
Dr Jitendra Singh@DrJitendraSingh·
Received a warm welcome mid-air from our dear friend and esteemed senior, Shri Rajiv Pratap Rudy, when he was piloting the Indigo flight from Jammu to Delhi. Moments like these reflect the warmth of camaraderie beyond public life—truly memorable. ✈️ @RajivPratapRudy
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Gurudev Sri Sri Ravi Shankar
किसी अपने को खोने के दुःख से कैसे बाहर निकलें?
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𝗩𝗲𝗱𝗮𝗰𝗵𝗮𝗿𝘆𝗮
घर बनाने से पहले ये 5 फॉर्मूले याद कर लो वरना लूट जाओगे...
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Census India 2027
Census India 2027@CensusIndia2027·
घर बैठे जनगणना करना अब आसान है। सेल्फ एन्यूमरेशन से आपका समय भी बचेगा और प्रक्रिया भी तेज़ होगी। बस एक आईडी, एक कन्फर्मेशन… और काम मिनटों में पूरा। आज ही सेल्फ एन्यूमरेट करें और जनगणना से जुड़ें। Census is now easier than ever. With Self Enumeration, you save time and complete the process in minutes. Just verify your ID, confirm your details… and you’re done. Don’t miss out, Complete your Self Enumeration today and be part of the Census. #Census2027 #जनगणना2027
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The Lallantop
The Lallantop@TheLallantop·
खूब पानी पीने के बाद भी बार-बार लग रही प्यास? ये वजहें ज़िम्मेदार #Sehat #LtSehat
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Aarav Choudhary
Aarav Choudhary@AaravChoudharyX·
UP के व्यक्ति ने ताजमाल जैसा घर अपनी पत्नी के लिए बनवाया अंदर आँगन मे भैंस की छाप छपवा रखी है कारण --- भैंस का दुध बेचकर यहा तक पहुंचे है
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