Ankita Sharma

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@ankidurg

IPS| SP Rajnandgaon. Servant for the Civil otherwise a LawEnforcementOfficer.वीर भोग्या वसुंधरा🇮🇳भारत ♥️ Positivity|Inspiration|Happiness|Dreamer|Books|🖋️

Chhattisgarh, India Katılım Nisan 2010
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Ankita Sharma
Ankita Sharma@ankidurg·
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम् 🌸
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
देवभूमि उत्तराखण्ड के हरिद्वार स्थित होटल गॉडविन में FICCI FLO – Uttarakhand Chapter द्वारा आयोजित “आज की नारी शक्ति” विषयक विशेष कार्यक्रम में श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, जूनापीठाधीश्वर, आचार्यमहामण्डलेश्वर, अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” मुख्य अतिथि के रूप में पधारे। इस अवसर पर अपने ओजस्वी, प्रेरक एवं सारगर्भित उद्बोधन में पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा कि “नारी सृष्टि की प्रथम अभिव्यक्ति और समकालीन शक्ति का सजीव प्रतीक है।” उन्होंने अपने वक्तव्य “उथल-पुथल से उत्कर्ष तक : वैश्विक परिवर्तन के दौर में महिला नेतृत्व के लिए आध्यात्मिक रणनीतियाँ” के माध्यम से कहा कि आज का विश्व तीव्र परिवर्तन, अनिश्चितता और बहुआयामी चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। विज्ञान, तकनीक और आर्थिक प्रगति ने जीवन को सुविधाजनक तो बनाया है, किन्तु मनुष्य के भीतर मानसिक अशान्ति, मूल्य-संकट और संवादहीनता को भी बढ़ाया है। ऐसे समय में नेतृत्व केवल प्रशासनिक दक्षता का विषय नहीं रह जाता, बल्कि वह आंतरिक संतुलन, नैतिक स्पष्टता, करुणा, धैर्य और दूरदृष्टि का प्रश्न बन जाता है। इसी संदर्भ में महिला नेतृत्व एक सामाजिक आवश्यकता मात्र नहीं, बल्कि एक सभ्यतामूलक शक्ति के रूप में उभरता है। पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा कि भारतीय चिंतन में नारी को शक्ति, संवेदना, सृजन, धारण-शक्ति और संतुलन की जीवित अभिव्यक्ति माना गया है। नारी केवल परिवार या समाज की इकाई नहीं, बल्कि जीवन को संस्कार, दिशा और उद्देश्य देने वाली शक्ति है। वैदिक वाङ्मय का “त्वं स्त्री” उद्घोष इस सत्य का साक्षी है कि सृष्टि की मूल चेतना स्त्री स्वरूप में ही प्रतिष्ठित है। प्रकृति की कोमलता, ऊर्जा, संरक्षण और सृजनशीलता, नारी के दिव्य स्वरूप का ही विस्तार है। उन्होंने कहा कि आज की नारी अनेक स्तरों पर संघर्ष करते हुए घर और कार्यक्षेत्र, परम्परा और आधुनिकता, उत्तरदायित्व और आत्मसिद्धि के मध्य संतुलन स्थापित कर रही है। ऐसे समय में केवल कौशल, पद या संसाधन पर्याप्त नहीं; आवश्यक है आध्यात्मिक आधार, जो नेतृत्व को भीतर से स्थिरता प्रदान करे। आध्यात्मिकता का अर्थ बाह्य आडम्बर नहीं, बल्कि अपने भीतर के सत्य, मूल्यों और उद्देश्य से जुड़ना है। वही नेतृत्व स्थायी होता है, जो संकट में घबराहट नहीं, स्थिरता दे; विभाजन में टकराव नहीं, संवाद दे; और अंधकार में केवल आलोचना नहीं, दिशा दे। महिला नेतृत्व के लिए उन्होंने कुछ मूलभूत आध्यात्मिक रणनीतियों का उल्लेख किया आत्मबोध, मानसिक संतुलन, करुणा, धैर्य, मूल्याधारित निर्णय, सहयोग की संस्कृति तथा सुनने और सार्थक बोलने की साधना। उन्होंने कहा कि आत्मबोध नारी को यह स्मरण कराता है कि वह केवल भूमिका निभाने वाली सत्ता नहीं, बल्कि परिवर्तन की स्रष्टा है। ध्यान, मौन, प्रार्थना, स्वाध्याय और आत्मसंवाद जैसे अभ्यास नेतृत्व को स्पष्टता और स्थिरता प्रदान करते हैं। करुणा कमजोरी नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो न्याय को मानवता से जोड़ती है। धैर्य और दीर्घदृष्टि स्थायी सृजन के आधार हैं, जबकि सत्य, पारदर्शिता, सह-अस्तित्व और उत्तरदायित्व नेतृत्व को मूल्यनिष्ठ बनाते हैं। पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति ने नारी को माता, अर्धांगिनी, संगिनी, बहन, धर्मपत्नी और गृहलक्ष्मी जैसे पावन रूपों में प्रतिष्ठित कर उसके गौरव को नमन किया है। जब-जब अधर्म और अराजकता ने मर्यादाओं का अतिक्रमण किया, तब-तब नारी ने दुर्गा, काली और चण्डिका के रूप में प्रकट होकर धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। इससे स्पष्ट है कि नारी केवल ममता और करुणा की प्रतिमूर्ति ही नहीं, बल्कि समय आने पर अदम्य शक्ति और संरक्षण की दिव्य धुरी भी है। अपने उद्बोधन के अंत में पूज्य आचार्यश्री जी ने कहा कि उथल-पुथल से उत्कर्ष की यात्रा बाहर से नहीं, भीतर से आरम्भ होती है। जब नारी अपने भीतर की शक्ति को पहचानती है, तब वह केवल अपना जीवन नहीं बदलती, बल्कि युग की दिशा बदलने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि नारी को केवल अवसर ही नहीं, बल्कि सम्मान, समान अधिकार, नैतिक स्वायत्तता और आध्यात्मिक सशक्तता भी प्रदान की जाए, ताकि वह अपने पूर्ण सामर्थ्य के साथ समाज, संस्कृति और राष्ट्र के निर्माण में और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सके। इस अवसर पर संस्था की अध्यक्ष आदरणीया श्रीमती तृप्ति बहल जी, पूर्व-अध्यक्ष आदरणीया डॉ. कोमल बत्रा जी सहित अनेक प्रबुद्ध एवं लब्ध-प्रतिष्ठित नारी शक्तियाँ उपस्थित रहीं। @ficci_india @FICCIFLO #FICCIFLO #uttrakhand #Womenempowerment #महिला_सशक्तिकरण @rashtrapatibhvn
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
विश्व धरोहर दिवस केवल एक औपचारिक स्मरण का दिवस नहीं है, अपितु यह मानव सभ्यता की उस सामूहिक चेतना का उत्सव है, जिसमें इतिहास, संस्कृति, कला, स्थापत्य, परंपरा और मानवीय प्रतिभा के अनगिन रूप सुरक्षित हैं। यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि हमारी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरें केवल पत्थरों, शिलालेखों, स्मारकों, मंदिरों, किलों, पुरास्थलों अथवा प्राचीन अवशेषों का समूह नहीं हैं, बल्कि वे हमारे पूर्वजों के ज्ञान, साधना, सृजनशीलता, आस्था और जीवन-दृष्टि की जीवंत अभिव्यक्तियाँ हैं। इन धरोहरों में एक राष्ट्र की आत्मा बोलती है, उसकी स्मृतियाँ सांस लेती हैं, और उसकी अस्मिता प्रकाशमान होती है। भारत जैसे प्राचीन और बहुसांस्कृतिक देश में धरोहरों का महत्व और भी अधिक गहन हो जाता है। यहाँ की धरोहरें केवल इतिहास का परिचय नहीं देतीं, बल्कि वे हमारी सभ्यता की निरंतरता का भी प्रमाण हैं। अजन्ता-एलोरा की गुफाएँ, काशी का आध्यात्मिक वैभव, खजुराहो की कलात्मक उत्कृष्टता, हमारे मन्दिरों की स्थापत्य भव्यता, कोणार्क मन्दिर की शाश्वत सौंदर्य-दृष्टि, राजस्थान के दुर्गों का पराक्रम, दक्षिण भारत के मंदिरों की दिव्यता ये सभी धरोहरें इस बात की साक्षी हैं कि भारत की सांस्कृतिक यात्रा कितनी व्यापक, गहन और गौरवपूर्ण रही है। ये स्मारक केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए प्रेरणा और भविष्य के लिए दिशा हैं। विश्व धरोहर दिवस हमें यह भी सिखाता है कि धरोहरों का संरक्षण केवल सरकारों या संस्थाओं का दायित्व नहीं, बल्कि यह समाज के प्रत्येक सजग नागरिक का सांस्कृतिक कर्तव्य है। यदि धरोहरें नष्ट होती हैं, तो केवल इमारतें नहीं टूटतीं, अपितु इतिहास की चेतना, परंपरा की पहचान और राष्ट्र की आत्मगौरव भावना भी आहत होती है। आधुनिकता के वेग, शहरीकरण, उपेक्षा, प्रदूषण और अज्ञानवश होने वाले विनाश के बीच यह आवश्यक है कि हम धरोहरों को केवल दर्शनीय स्थल न मानें, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में श्रद्धा और उत्तरदायित्व से देखें। धरोहरों का संरक्षण केवल उनके भौतिक स्वरूप को बचाना नहीं है; यह उनकी आत्मा, उनके संदेश और उनके सांस्कृतिक संदर्भ को सुरक्षित रखना भी है। जब हम किसी प्राचीन मंदिर, स्मारक, शिल्पकृति, लोककला, भाषा, लिपि या परंपरा की रक्षा करते हैं, तब वस्तुतः हम अपनी जड़ों को सींचते हैं। जिस समाज का अपनी धरोहरों से संबंध जीवित रहता है, वही समाज आत्मविश्वास, सांस्कृतिक गरिमा और सभ्यतागत निरंतरता के साथ आगे बढ़ता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम नई पीढ़ी को अपनी अमूल्य धरोहर के प्रति संवेदनशील बनाएं। उन्हें यह बताया जाए कि धरोहरें केवल पर्यटन का विषय नहीं, बल्कि पहचान, प्रेरणा और उत्तराधिकार का विषय हैं। विद्यालयों, परिवारों और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर यह संस्कार देना होगा कि जो राष्ट्र अपनी धरोहरों का सम्मान करता है, वही इतिहास में दीर्घकाल तक सम्मानित रहता है। विश्व धरोहर दिवस के इस पावन अवसर पर आइए, हम सब यह संकल्प लें कि अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन और सम्मान में सक्रिय भूमिका निभाएँगे। हम उन्हें केवल अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि भविष्य की अमूल्य निधि मानेंगे। यही हमारा सनातन संस्कृति-सभ्यता के प्रति सच्चा सम्मान समर्पण और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारा सबसे मूल्यवान उपहार भी। #विश्व_धरोहर_दिवस #worldheritageday #AvdheshanandG_Quotes
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ANI
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#WATCH | Chhattisgarh | Rajnandgaon Police, deployed on Navratri duty, performed Aarti and offered prayers at the Maa Bamleshwari Temple after completing their duty on the ninth day of the Chaitra Navratri. (27.03) (Visuals Source: SP Rajnandgaon Ankita Sharma)
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Swami Avdheshanand
Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
घोषा गोधा विश्ववारा, अपालोपनिषन्निषत। ब्रह्मजाया जुहूर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादितिः ॥ इन्द्राणी चेन्द्रमाता च सरमा रोमशोर्वशी। लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शश्वती ॥ श्रीर्लाक्षा सार्पराज्ञी वाक्श्रद्धा मेधा च दक्षिणा। रात्री सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरिताः ॥ कीट से लेकर परम्-पुरुष “ब्रह्म” तक को अपने उदर में धारण करने वाली नारी सृष्टि की प्रथम समर्थ-कृति, ईश्वरीय करुणा-कोमलता, पवित्रता-वात्सल्य व औदार्य की साकार अभिव्यक्ति है। नारी केवल एक जैविक सत्ता नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन की आधारशिला है। वह जीवन की उत्पत्ति, संवर्धन और संरक्षण की दिव्य शक्ति है। भारतीय दर्शन में नारी को शक्ति, प्रकृति और सृजन की अधिष्ठात्री माना गया है। यही कारण है कि हमारे शास्त्रों में नारी को केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और बौद्धिक श्रेष्ठता के प्रतिमान के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वैदिक युग में नारी ज्ञान और साधना की ऊँचाइयों पर प्रतिष्ठित थी । ऋग्वेद में घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, लोपामुद्रा, रोमशा, सरमा, सावित्री आदि अनेक ऋषिकाओं का उल्लेख मिलता है, वे “मंत्र दृष्टा” जिन्होंने वेदों के मंत्रों का दर्शन किया और ब्रह्मविद्या की परंपरा को समृद्ध किया। उन्हें “ब्रह्मवादिनी” कहा गया अर्थात् वे स्त्रियाँ जो ब्रह्म के सत्य का चिंतन, मनन और प्रतिपादन करती थीं। यह भारतीय संस्कृति की उदात्त दृष्टि को प्रकट करता है कि यहाँ नारी को ज्ञान, साधना और नेतृत्व के क्षेत्र में समान अवसर प्राप्त था। भारत में नारी केवल परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक ,धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों की प्रखर संवाहिका भी है। वह माँ के रूप में जीवन को संस्कारित करती है, गुरु के रूप में ज्ञान देती है और शक्ति के रूप में समाज को दिशा प्रदान करती है। सीता की धैर्यशीलता, गार्गी और मैत्रेयी की दार्शनिक प्रतिभा, अनसूया की तपश्चर्या और सावित्री की अटूट निष्ठा ये सभी उदाहरण भारतीय नारी के बहुआयामी व्यक्तित्व को उजागर करते हैं। वर्तमान समय में नारी सम्मान, स्वाभिमान, सशक्तिकरण और उसकी अस्मिता की रक्षा के लिए स्त्री-विमर्श के विविध विषयों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने और समझने की आवश्यकता है। आधुनिक विमर्श प्रायः अधिकारों की दृष्टि से नारी को देखता है, परंतु भारतीय चिंतन में नारी केवल अधिकारों की पात्र नहीं, बल्कि सृष्टि की सह-निर्मात्री और संस्कृति की संवाहिका है। अतः आवश्यक है कि हम नारी को केवल पारिवारिक सामाजिक या आर्थिक इकाई के रूप में न देखें, बल्कि उसके आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक आयामों को भी समझें। आज आधुनिक भारत में भी नारी अपनी प्रतिभा, परिश्रम और संकल्प के द्वारा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही है। विज्ञान, शिक्षा, राजनीति, साहित्य, आध्यात्मिकता और सामाजिक सेवा सभी क्षेत्रों में महिलाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि भारतीय नारी की शक्ति और क्षमता अनंत है। वैदिक मंत्रदृष्टा ऋषिकाओं से लेकर आधुनिक भारत की सामर्थ्यवान मातृसत्ता तक, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में नारी का योगदान अतुलनीय रहा है। वह केवल जीवन की जननी ही नहीं, बल्कि संस्कृति की संरक्षिका और भविष्य की निर्माता भी है। अतः यह हमारा दायित्व है कि हम नारी के सम्मान, सुरक्षा और स्वाभिमान को सुनिश्चित करें तथा उसके ज्ञान, प्रतिभा और नेतृत्व को समाज के विकास में पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित करें।अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ! @rashtrapatibhvn #InternationalWomensDay #Womenempowerment #नारी_सशक्तिकरण #AvdheshanandG_Quotes
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Vijay sharma
Vijay sharma@vijaysharmacg·
सज्जनों के मन में सम्मान दुर्जन लोगो के मन में भय - यही पुलिस का कर्तव्य है!
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Lalluram News
Lalluram News@lalluram_cg·
ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन इंडिया को सक्ती पुलिस ने जारी किया नोटिस, पूछा- ''क्यों न आपको सह-आरोपी बनाया जाए'' #sakti #Police #AmazonIndia #notice lalluram.com/sakti-police-i…
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Saktipolice
Saktipolice@Saktipolice·
एशियन वर्ल्ड स्कूल बाराद्वार के बच्चो द्वारा रक्षाबंधन के पूर्व थाना बाराद्वार के अधिकारी एवं कर्मचारियों से मुलाकात कर बांधी गयी राखी ।
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Nagraj devanda💎
Nagraj devanda💎@NagrajDevanda·
मैंने उसको जब जब देखा लोहा देखा लोहे जैसा तपता देखा गलते देखा ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसे चलते देखा @ankidurg जन्मदिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं दीदी 🎂 (Inspiration ❤️)
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Saktipolice
Saktipolice@Saktipolice·
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Swami Avdheshanand@AvdheshanandG·
“हिमालय की गोद में शिक्षा का दिव्य प्रकाश” ! श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ, अनन्तश्रीविभूषित, आचार्यमहामण्डलेश्वर, पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य प्रभुश्री” की करुणा, दूरदृष्टि और दिव्य संकल्प से प्रेरित “स्वामी अवधेशानंद पब्लिक स्कूल”, उत्तराखंड के चंपावत ज़िले “चोरा ख्याली” बिरगुल में, 6,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित, उन सुदूर पर्वतीय गाँवों के बच्चों के लिए ज्ञान, आशा और आत्मनिर्भरता का स्तंभ बन चुका है। जहाँ कभी स्कूल एक कल्पना थी, वहाँ अब यह विद्यालय जीवन की नई भोर का केंद्र बन गया है। यह केवल पाठ्यक्रम ही नहीं पढ़ाता, यह बच्चों को संस्कार, आत्मबल, और राष्ट्रनिर्माण की भावना से भी सिंचित करता है। यह एक शिक्षा-यज्ञ है, जहाँ हर बालक एक जीवनदीप बन रहा है। आचार्यमहामण्डलेश्वर, पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य प्रभुश्री” के अनेकों पारमार्थिक प्रकल्पों में यह विद्यालय उन ग्राम्य बच्चों के लिए वरदान है, जिनकी पहुँच कभी न ज्ञान तक थी, न अवसर तक। आइए, हम सब इस पुण्य अनुष्ठान में सहभागी बनें।आपका छोटा-सा सहयोग किसी जीवन में आशा की किरण और किसी भविष्य की दिशा बन सकता है। “शिक्षा ही श्रेष्ठ दान है।” “A Beacon of Education in the Lap of the Himalayas” Inspired by the compassion and vision of Acharya Mahamandaleshwar, Srimat Paramhans Swami Avdheshanand Giri Ji Maharaj — “Pujya Prabhushri”, Swami Avdheshanand Public School stands tall at 6,000 feet in Chora Khyalī, Birgul, Champawat (Uttarakhand), bringing light, hope, and self-reliance to children of remote Himalayan villages. Where once education was a distant dream, this school is now a cradle of knowledge and values- nurturing not only minds but also hearts and futures. Each child here is being shaped into a torchbearer of tomorrow. Let us be part of this noble mission. Your small support can ignite a lifetime of change. “Education is the highest form of service.” #AvdheshanandG_Quotes #SwamiAvdheshanandPublicSchool #freeeducation @pushkardhami @LtGenGurmit @PMOIndia
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