
गंभीर।
एक बार मैंने अपने चचेरे बड़े भाई से कहा कि कुंबले भारत में होने वाले मैचों में सबसे ज़्यादा विकेट लेता है।
उनका हंसते हुए जवाब था कि वो गेंदबाजी भी तो सबसे ज़्यादा करता है।
जब दिन भर गेंदबाजी वही करता है तो विकेट भी तो उसी को ही मिलेंगे।
वर्तमान बंगाल चुनाव पर मेरा यही कहना है।
और डंके की चोट पर कहना है।
बंगाल में भाजपा की जीत नहीं हुई।
दरअसल ये ममता की हार है।
जीत हार दोनों चीजें अलग अलग होती हैं
जीत सकारात्मक चीज है, हार नकारात्मक।
खुद सोचें कि जब ममता के खिलाफ सिर्फ और सिर्फ भाजपा ही थी।
ममता की सनकपूर्ण सांप्रदायिक गुंडागर्दी युक्त तानाशाही से उकताई जनता को ममता को सबक सिखाना ही था तो उसके लिये ये मायने नहीं रखता था कि ममता के विपक्ष में कौन है।
जो था, जो ममता को हरा सकता था,उसी को वोट देना था उसे।
और यहां भाजपा थी।
भाजपा की इसलिए तारीफ की जा सकती है कि 2011 के बाद भाजपा ने ममता के विरुद्ध खुद को इकलौता विपक्ष स्थापित किया।
ममता का कोई कैडर नहीं था। ये वामपंथी गुंडे थे जो सीपीएम, सीपीआई के पतन के बाद ममता की पार्टी में स्थापित हो गये। और उस वामपंथी विचारधारा के विरोधी कांग्रेसी भाजपा में जुड़ गये।
भाजपा ने ममता के विरोध में खुद को इकलौता विपक्ष स्थापित किया, इसके लिए वहां के लोकल कार्यकर्ताओं का समर्पण भी मायने रखता है।
जब केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधीन चुनाव हुए और बंगाली दुर्बल असहाय व्यक्ति को ये दिखा कि इस बार गुंडागर्दी नहीं है। चुनाव आयोग की धौंस है और भाजपा गंभीरता से ममता के विरोध में है (जो पहले शायद नहीं दिखता था) तब उस दुर्बल और डरी हुई जनता ने एकजुट होकर ममता के विरोध में वोट डाला जो जनता हाल में बांग्लादेश में हुई इस्लामिक क्रांति से भयाक्रांत थी और उस इस्लामिक क्रांति को तृणमूल और उसके समर्थकों के समर्थन को देख और ज्यादा डर चुकी थी।
मामला अभी नहीं तो कभी नहीं वाला था।
येस ऑर नो वाला था। और जनता ने ममता को बिग नो दिया।
बंगाल में ममता को हारना ही था इस बार।
और भाजपा को जीतना ही।
भले सुनील बंसल होते या लक्षिमकांत बाजपेई।
चाहे भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन होते या जे पी नड्डा।
मैं यहीं हूं और इसे बुकमार्क कर लें।
इन्ही सुनील बंसल को यूपी भाजपा का प्रभारी बना के भेज दिया जाए और यूपी भाजपा 200 का आंकड़ा पार कर ले जाये तो बड़ी नहीं बहुत बड़ी बात होगी।
यही पन्ना प्रमुख, यही अमित शाह यही।
ये सब तमिलनाडु में और केरल में भी तो थे, नहीं थे क्या?
मेरी नजर में सबसे बड़ी जीत हेमंत बिस्वा सरमा की थी जो पांच साल बाद भी पूर्ण बहुमत से जीता और अभी हुए विधान सभा चुनाव वाले राज्यों में इकलौता मुख्यमंत्री था जो फिर से पूर्ण बहुमत से जीता।
बाकी दो दबंग मुख्यमंत्री स्टालिन और ममता तो अपनी विधायकी की सीट तक नहीं बचा पाये।
और हां, न घोड़ा दूर है न मैदान दूर।
इन्हीं सुनील बंसल का यूपी चुनावों में इंतजार रहेगा मुझे।
बुकमार्क जरूर करना।
यूपी चुनावों के बाद मुझे ट्रोल करने में बहुत काम आयेगा।
मेरी नजर में सबसे बड़ी जीत हेमंत विश्व सरमा की थी।
रॉक स्टार

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