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Delhi, India Katılım Aralık 2019
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दिल्ली के गांधीनगर ट्रैफिक सर्कल में भ्रष्टाचार का “लाइव डेमो” आज फिर देखने को मिला—कृष्णानगर रेड लाइट के ठीक पास। दृश्य कुछ यूँ था मानो कानून ने खुद ही अपना ठेका किसी प्राइवेट ठेकेदार को दे दिया हो। एक ओर अवैध ई-रिक्शा, जो नियमों के अनुसार पूर्णतः प्रतिबंधित हैं, सड़क पर बेखौफ दौड़ रहे थे… और दूसरी ओर एक “अज्ञात निजी व्यक्ति” ट्रैफिक पुलिस के साथ खड़ा होकर उनकी आईडी चेक करने की महान जिम्मेदारी निभा रहा था। अब सवाल यह है कि यह “आईडी चेकिंग” थी या “इनकम कलेक्शन ड्राइव”? जब हमने सीधे कैमरे और माइक के साथ पूछा—“भाई साहब, आप किस अधिकार से चेकिंग कर रहे हैं?”—तो जवाब आया, “हम पुलिस स्टाफ की मदद कर रहे हैं।” वाह! क्या शानदार व्यवस्था है—जहाँ कानून लागू करने की जिम्मेदारी अब आउटसोर्स हो चुकी है, और ‘मदद’ के नाम पर अधिकार भी बाँट दिए गए हैं। यदि वास्तव में कोई अधिकृत आदेश था, तो कार्रवाई अवैध ई-रिक्शाओं पर होनी चाहिए थी, न कि उनकी आईडी देखकर “सिस्टम” को संतुष्ट करने का नाटक। या फिर यह मान लिया जाए कि यहाँ नियमों का पालन नहीं, बल्कि “व्यवस्था” का पालन हो रहा है? यह पूरा घटनाक्रम हमारे कैमरे में रिकॉर्ड है—स्पष्ट, सटीक और बिना किसी एडिट के। अब कुछ सीधे और असहज सवाल— क्या दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने प्राइवेट व्यक्तियों को अधिकार दे दिए हैं? यदि हाँ, तो आदेश की कॉपी सार्वजनिक क्यों नहीं? यदि नहीं, तो यह खुला खेल किसके संरक्षण में चल रहा है? सूचित किया जाता है कि इस पूरे मामले पर जल्द ही आरटीआई दायर कर विस्तृत जानकारी मांगी जाएगी—जिसमें आदेश, जिम्मेदार अधिकारी, और इस “मदद” की वैधानिक स्थिति का खुलासा अनिवार्य होगा। अब फैसला अधिकारियों को करना है— या तो व्यवस्था सुधरेगी, या फिर सच्चाई कागजों से निकलकर जनता के सामने आएगी। #DelhiTrafficPolice #GandhiNagar #KrishnaNagar #CorruptionExposed #RTI @dtptraffic @DelhiPolice @TIGandhinagar @LtGovDelhi @CMODelhi @gupta_rekha @HMOIndia @MLJ_GoI @CrimeBranchDP @cbic_india @dgovcbic @cbi @CBIHeadquarters
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Prerna Ek Disha Foundation
Prerna Ek Disha Foundation@Prerna_Ek_Disha·
🚨 MEGA CORRUPTION EXPOSED IN MCD South Zone! 🚨 दिल्ली के देवली में कृषि भूमि पर खुलेआम बन रहा कंक्रीट का जंगल, पर्यावरण की सरेआम हो रही हत्या और भ्रष्ट अधिकारी भर रहे हैं अपनी जेबें! 🌳❌ ​खसरा नंबर 136, Union Bank of India के सामने, देवली (नई दिल्ली) में 3 बीघा 11 बिस्वा कृषि भूमि पर बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण बदस्तूर जारी है। DPCC और CPCB के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, सिस्टम कैसे खोखला हो चुका है, यह उसका जीता-जागता उदाहरण है! ​⚠️ DPCC द्वारा Complaint ID - TW 21-24434 पर कार्रवाई के लिए कहने के बावजूद @DCSOUTHZONE द्वारा शिकायतकर्ताओं को पूरी तरह से गुमराह किया जा रहा है। DC South Zone का दावा है कि उन्होंने 08 संपत्तियों (Files: 389/UC/B-II/SZ/2025, 390/UC/B-II/SZ/2025, 391/UC/B-II/SZ/2025, 51/UC/B-II/SZ/2025, 52/UC/B-II/SZ/2025, 67/UC/B-II/SZ/2025, 68/UC/B-II/SZ/2025, 69/UC/B-II/SZ/2025, 78/UC/B-II/SZ/2025) को बुक किया है। दावा यह भी है कि 18.09.2026, 05.02.2026, 06.02.2026 और 12.03.2026 को Demolition की कार्रवाई की गई और Delhi Police को DMC Act 1957 की धारा 344(2) के तहत काम रोकने के लिए पत्र भेजा गया है। ​🛑 यह पूरी तरह से भ्रामक और झूठा है! आज भी साइट पर अवैध भवन निर्माण बेरोकटोक चल रहा है। अगर MCD South Zone ने काम रोकने के लिए @DelhiPolice को पत्र लिखा है, तो आज तक काम क्यों नहीं रुका? जवाब साफ है - मिलीभगत! ​💸 हकीकत यह है कि MCD South Zone के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों (EE Sanjiv Mudgal, SS Chauhan) ने इस अवैध निर्माण को संरक्षण देने के लिए करोड़ों रुपये की भारी रिश्वत ली है। रिश्वत का पैसा इतना बड़ा है कि कार्रवाई करने में अधिकारियों के हाथ कांप रहे हैं। इसका सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत यह है कि विभाग ने डर और बौखलाहट में आकर, इस अवैध निर्माण से रिश्वत वसूलने वाले #Junior_Engineer #Sachin_Chaudhary का गुपचुप तरीके से कहीं और #Transfer कर दिया है। यह Transfer साफ दर्शाता है कि पूरा विभाग डरा और सहमा हुआ है और अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है। ​🌍☠️ भ्रष्टाचार से परे, यह दिल्ली के पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है। एक उपजाऊ कृषि भूमि को कंक्रीट के बंजर जंगल में तब्दील किया जा रहा है: ​ 🔹दिन-रात चल रहे निर्माण से उड़ने वाली धूल और सीमेंट के कण आसपास की हवा को जहरीला बना रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों का सांस लेना दूभर हो गया है। ​ 🔹कृषि भूमि खत्म होने से हरियाली नष्ट हो रही है, जो दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर के लिए एक 'ऑक्सीजन चैंबर' का काम करती थी। ​ 🔹निर्माण कार्यों में अवैध तरीके से लाखों लीटर #Groundwater खींचा जा रहा है, जिससे वाटर लेवल तेजी से गिर रहा है। यहाँ @CAQM_Official और पर्यावरण संरक्षण नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ​⚖️ सरकार और उच्च अधिकारियों से सीधा सवाल और मांग: 1️⃣ MCD South Zone के भ्रष्ट अधिकारियों और Junior Engineer Sachin Chaudhary की तुरंत Vigilance जांच हो। 2️⃣ कृषि भूमि पर हो रहे इस अवैध निर्माण को तुरंत सील कर पूर्ण रूप से Demolish किया जाए। 3️⃣ @DelhiPolice अपनी जिम्मेदारी निभाए और DMC Act के तहत तुरंत प्रभाव से काम रुकवाए। 4️⃣ पर्यावरण को पहुंचाए गए नुकसान की भरपाई के लिए बिल्डरों और दोषी अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाया जाए। ​यह समय जागने का है! हम अपने पर्यावरण को चंद भ्रष्ट अधिकारियों के लालच की भेंट नहीं चढ़ने दे सकते। ​@MCD_Delhi @CPCB_OFFICIAL @DPCC_Pollution @CAQM_Official @DelhiPolice @LtGovDelhi @CMODelhi @MoEFCC#DelhiPollution #MCDCorruption #IllegalConstruction #SaveEnvironment #Devli #DelhiPolice #CPCB #DPCC #ZeroTolerance
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“संगीन धाराओं का मुकदमा ‘सेटिंग’ की भेंट? बुलंदशहर में जांच पर उठे गंभीर सवाल, निष्पक्षता पर गहराया संदेह” “संगीन धाराओं वाला मुकदमा और उसका अंजाम ठंडे बस्ते में?”—बुलंदशहर जनपद में दर्ज एक आपराधिक प्रकरण ने न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर शासन स्तर पर महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर इस प्रकार के मामलों में जांच की कार्यशैली और उसके निष्कर्षों ने आमजन के विश्वास को झकझोरने का कार्य किया है। प्रस्तुत मामला थाना कोतवाली देहात, बुलंदशहर में दर्ज मुकदमा संख्या 0742/2025 से संबंधित है, जिसमें भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराएं 318(4), 351(3) तथा आर्म्स एक्ट 1959 की धारा 3 एवं 27 के अंतर्गत आरोप स्थापित किए गए थे। पीड़ित पक्ष का स्पष्ट आरोप है कि उन्होंने जांच अधिकारी को सभी आवश्यक साक्ष्य एवं तथ्य प्रस्तुत किए, जिनसे यह संकेत मिलता था कि आरोपितों की गतिविधियां सामान्य अपराध की श्रेणी से आगे बढ़कर संगठित आपराधिक स्वरूप धारण कर चुकी थीं। तथापि, इन तथ्यों की गहन विवेचना करने के बजाय मामले में जल्दबाजी में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई, जिससे संपूर्ण जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इस संदर्भ में जांच अधिकारी इंस्पेक्टर देवेंद्र सिंह की कार्यप्रणाली विशेष रूप से प्रश्नों के घेरे में है, क्योंकि आरोप यह है कि मामले की तह तक जाने के बजाय उसे शीघ्र निष्पादन की दिशा में मोड़ दिया गया। मुख्य अभियुक्त अज़नान खान से संबंधित जो तथ्य स्थानीय स्तर पर चर्चा में हैं, वे भी इस प्रकरण को और अधिक गंभीर बनाते हैं। आरोप है कि अभियुक्त स्वयं को विशेष टास्क फोर्स (STF) से संबद्ध बताकर प्रभाव स्थापित करने का प्रयास करता रहा है तथा नाम-पट्टिकाओं एवं सार्वजनिक व्यवहार के माध्यम से एक प्रकार की आधिकारिक छवि प्रस्तुत करता है। यदि यह तथ्य सत्य के निकट भी है, तो यह न केवल भ्रामक है बल्कि विधिक दृष्टि से भी अत्यंत आपत्तिजनक स्थिति उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त, अभियुक्त के पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, जिनमें आपराधिक इतिहास, भूमाफिया गतिविधियां तथा वंचित वर्गों की भूमि पर अवैध कब्जे जैसे मुद्दे शामिल हैं। स्थिति को और अधिक संवेदनशील बनाने वाला पहलू यह भी है कि क्षेत्र में यह चर्चा प्रचलित है कि अभियुक्त स्वयं को कुख्यात अपराधी अतीक अहमद के परिवार से जुड़ा बताता है। यद्यपि इस प्रकार के दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, तथापि ऐसे कथनों का सामाजिक प्रभाव निस्संदेह भय और दबाव का वातावरण उत्पन्न करता है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या जांच प्रक्रिया किसी प्रकार के प्रभाव या दबाव से प्रभावित हुई, अथवा यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है। कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि यदि संगीन धाराओं से जुड़े मामलों में भी जांच की निष्पक्षता संदिग्ध प्रतीत हो, तो यह केवल एक प्रकरण का विषय नहीं रह जाता, बल्कि संपूर्ण विधि-व्यवस्था की विश्वसनीयता पर आघात करता है। अतः इस मामले में पारदर्शी पुनः जांच, जिम्मेदारी का निर्धारण तथा तथ्यों का सार्वजनिक परीक्षण अत्यंत आवश्यक प्रतीत होता है। अंततः यह स्पष्ट किया जाता है कि इस प्रकरण के संदर्भ में शीघ्र ही सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर जांच प्रक्रिया, साक्ष्यों के मूल्यांकन तथा अंतिम रिपोर्ट के आधारों पर विस्तृत जानकारी प्राप्त की जाएगी। प्रशासन से अपेक्षा है कि वह इस विषय को गंभीरता से लेते हुए तथ्यों को स्पष्ट करेगा, अन्यथा यह मामला भी समय के साथ अन्य अनेक विवादों की भांति अनुत्तरित प्रश्नों के बीच दबकर रह जाएगा। @myogioffice @myogiadityanath @Uppolice @dgpup @ANINewsUP @AshwiniUpadhyay @KumaarSaagar @sagarmalik1985 @OpIndia_in @OpIndia_com @OpIndia_tv @OpIndia_G @SudarshanNewsTV @SureshChavhanke @SudarshanNewsUp @SudarshanNewsDL @HinduITCell @the_hindu @THexplains @VHPDigital @VHPInNews @vhporg @vhpitcell @VHPSocialMedia @Rssorg12
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🎤🎤 ब्रेकिंग या ‘मैनेजिंग’? 🎤🎤 “संगीन धाराओं वाला मुकदमा… और अंजाम ‘ठंडे बस्ते’ में?”बुलंदशहर में न्याय नहीं, नैरेटिव लिखा जा रहा है — और पीड़ित की आवाज़ को फाइलों के नीचे दबाया जा रहा है। जहां एक ओर मंचों पर महिला सुरक्षा के नारे गूंजते हैं, वहीं ज़मीनी हकीकत में सिस्टम की खामोशी और कार्रवाई की सुस्ती चीख-चीख कर कुछ और ही कहानी बयान कर रही है। सवाल ये नहीं कि अपराध हुआ या नहीं — सवाल ये है कि सच को कितना कुशलता से ‘संभाला’ गया। 📌 थाना कोतवाली देहात, बुलंदशहर📌 मुकदमा संख्या: 0742/2025📌 धाराएं: 318(4), 351(3) BNS एवं Arms Act 3/27 कागज़ों में यह केस गंभीर अपराधों की श्रेणी में आता है। लेकिन व्यवहार में?लगता है जैसे किसी ने ‘गंभीरता’ शब्द को ही केस डायरी से डिलीट कर दिया हो। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि👉 सबूत दिए गए👉 बयान दिए गए👉 संगठित आपराधिक गतिविधियों के संकेत दिए गए और बदले में क्या मिला?👉 जल्दबाजी में अंतिम रिपोर्ट👉 जांच का शॉर्टकट संस्करण👉 न्याय की जगह निष्कर्ष पहले, जांच बाद में अब आते हैं कहानी के सबसे दिलचस्प किरदार पर —जांच अधिकारी इंस्पेक्टर देवेंद्र सिंह कानून कहता है: “जांच निष्पक्ष होनी चाहिए”व्यवहार कहता है: “जांच सुविधानुसार भी हो सकती है” क्या यह महज़ लापरवाही है?या फिर प्रभाव, दबाव और ‘सेटिंग’ का साइलेंट कोलैबरेशन? और उधर, मुख्य अभियुक्त अज़नान खान का स्व-निर्मित प्रभावशाली प्रोफाइल —📌 खुद को STF से जुड़ा बताना📌 नाम प्लेट पर पदों की ‘क्रिएटिव राइटिंग’📌 और क्षेत्र में ‘पहचान’ का आक्रामक प्रदर्शन तो सवाल उठना लाज़िमी है —👉 यह वैध अधिकार है या इम्प्रेशन मैनेजमेंट का लोकल स्टार्टअप?👉 STF का नाम — सर्विस या सिर्फ़ ‘स्टेटस सिंबल’? इतना ही नहीं,परिवार के आपराधिक इतिहास, भूमाफिया जैसे गंभीर आरोप,और गरीब व दलितों की जमीन हड़पने के कथित मामलों के बीचजांच का यह ‘नरम रुख’ —कानून के सामने खड़े कई असहज प्रश्नों को जन्म देता है। और फिर आता है सबसे सनसनीखेज दावा —👉 खुद को कुख्यात अपराधी Atiq Ahmed के परिवार से जोड़ने की चर्चा अब यह सच है या ‘ब्रांडिंग’?लेकिन इतना तय है — डर और दबदबा पैदा करने का प्रयास साफ़ दिखता है। 📣 कानूनी विशेषज्ञों की राय भी सीधी है:“यदि संगीन मामलों में भी जांच की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाए,तो यह केवल एक केस नहीं — पूरी व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिन्ह है।” 🔴 अब सवाल प्रशासन से:👉 क्या यह मामला भी ‘फाइल क्लोज़र’ की भेंट चढ़ेगा?👉 या फिर सच में पुनः निष्पक्ष जांच होगी?👉 क्या जवाबदेही तय होगी — या फिर जिम्मेदारी भी ‘डाइवर्ट’ कर दी जाएगी? ⚖️ चेतावनी नहीं, अधिकार है:इस पूरे प्रकरण में बहुत जल्द RTI दायर कर👉 जांच प्रक्रिया👉 साक्ष्यों का मूल्यांकन👉 अंतिम रिपोर्ट के आधार सभी बिंदुओं पर आधिकारिक जवाब तलब किया जाएगा। अब फाइलें बोलेंगी… या फिर खामोशी ही सबसे बड़ा बयान बनेगी —यह आने वाला समय तय करेगा। ⏳ @myogioffice @myogiadityanath @Uppolice @dgpup @ANINewsUP @AshwiniUpadhyay @KumaarSaagar @sagarmalik1985 @OpIndia_in @OpIndia_com @OpIndia_tv @OpIndia_G @SudarshanNewsTV @SureshChavhanke @SudarshanNewsUp @SudarshanNewsDL @HinduITCell @the_hindu @THexplains @VHPDigital @VHPInNews @vhporg @vhpitcell @VHPSocialMedia @RSSorg

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🎤🎤 ब्रेकिंग या ‘मैनेजिंग’? 🎤🎤 “संगीन धाराओं वाला मुकदमा… और अंजाम ‘ठंडे बस्ते’ में?”बुलंदशहर में न्याय नहीं, नैरेटिव लिखा जा रहा है — और पीड़ित की आवाज़ को फाइलों के नीचे दबाया जा रहा है। जहां एक ओर मंचों पर महिला सुरक्षा के नारे गूंजते हैं, वहीं ज़मीनी हकीकत में सिस्टम की खामोशी और कार्रवाई की सुस्ती चीख-चीख कर कुछ और ही कहानी बयान कर रही है। सवाल ये नहीं कि अपराध हुआ या नहीं — सवाल ये है कि सच को कितना कुशलता से ‘संभाला’ गया। 📌 थाना कोतवाली देहात, बुलंदशहर📌 मुकदमा संख्या: 0742/2025📌 धाराएं: 318(4), 351(3) BNS एवं Arms Act 3/27 कागज़ों में यह केस गंभीर अपराधों की श्रेणी में आता है। लेकिन व्यवहार में?लगता है जैसे किसी ने ‘गंभीरता’ शब्द को ही केस डायरी से डिलीट कर दिया हो। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि👉 सबूत दिए गए👉 बयान दिए गए👉 संगठित आपराधिक गतिविधियों के संकेत दिए गए और बदले में क्या मिला?👉 जल्दबाजी में अंतिम रिपोर्ट👉 जांच का शॉर्टकट संस्करण👉 न्याय की जगह निष्कर्ष पहले, जांच बाद में अब आते हैं कहानी के सबसे दिलचस्प किरदार पर —जांच अधिकारी इंस्पेक्टर देवेंद्र सिंह कानून कहता है: “जांच निष्पक्ष होनी चाहिए”व्यवहार कहता है: “जांच सुविधानुसार भी हो सकती है” क्या यह महज़ लापरवाही है?या फिर प्रभाव, दबाव और ‘सेटिंग’ का साइलेंट कोलैबरेशन? और उधर, मुख्य अभियुक्त अज़नान खान का स्व-निर्मित प्रभावशाली प्रोफाइल —📌 खुद को STF से जुड़ा बताना📌 नाम प्लेट पर पदों की ‘क्रिएटिव राइटिंग’📌 और क्षेत्र में ‘पहचान’ का आक्रामक प्रदर्शन तो सवाल उठना लाज़िमी है —👉 यह वैध अधिकार है या इम्प्रेशन मैनेजमेंट का लोकल स्टार्टअप?👉 STF का नाम — सर्विस या सिर्फ़ ‘स्टेटस सिंबल’? इतना ही नहीं,परिवार के आपराधिक इतिहास, भूमाफिया जैसे गंभीर आरोप,और गरीब व दलितों की जमीन हड़पने के कथित मामलों के बीचजांच का यह ‘नरम रुख’ —कानून के सामने खड़े कई असहज प्रश्नों को जन्म देता है। और फिर आता है सबसे सनसनीखेज दावा —👉 खुद को कुख्यात अपराधी Atiq Ahmed के परिवार से जोड़ने की चर्चा अब यह सच है या ‘ब्रांडिंग’?लेकिन इतना तय है — डर और दबदबा पैदा करने का प्रयास साफ़ दिखता है। 📣 कानूनी विशेषज्ञों की राय भी सीधी है:“यदि संगीन मामलों में भी जांच की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाए,तो यह केवल एक केस नहीं — पूरी व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिन्ह है।” 🔴 अब सवाल प्रशासन से:👉 क्या यह मामला भी ‘फाइल क्लोज़र’ की भेंट चढ़ेगा?👉 या फिर सच में पुनः निष्पक्ष जांच होगी?👉 क्या जवाबदेही तय होगी — या फिर जिम्मेदारी भी ‘डाइवर्ट’ कर दी जाएगी? ⚖️ चेतावनी नहीं, अधिकार है:इस पूरे प्रकरण में बहुत जल्द RTI दायर कर👉 जांच प्रक्रिया👉 साक्ष्यों का मूल्यांकन👉 अंतिम रिपोर्ट के आधार सभी बिंदुओं पर आधिकारिक जवाब तलब किया जाएगा। अब फाइलें बोलेंगी… या फिर खामोशी ही सबसे बड़ा बयान बनेगी —यह आने वाला समय तय करेगा। ⏳ @myogioffice @myogiadityanath @Uppolice @dgpup @ANINewsUP @AshwiniUpadhyay @KumaarSaagar @sagarmalik1985 @OpIndia_in @OpIndia_com @OpIndia_tv @OpIndia_G @SudarshanNewsTV @SureshChavhanke @SudarshanNewsUp @SudarshanNewsDL @HinduITCell @the_hindu @THexplains @VHPDigital @VHPInNews @vhporg @vhpitcell @VHPSocialMedia @RSSorg
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“देश में LPG कमी की नहीं, ‘कम-तौल महामारी’ चल रही है!” M/s Shekhawat Indane Gas Service, 25 Foota Road, Chand Bagh, Delhi-110094 Refill Order (DBC): CX11222143/7000000015009268 Consumer: संजय कुमार गुप्ता Address: B-421/B, गली नं., हॉस्पिटल वाली गली, अरविंद मोहल्ला, घोंडा, नॉर्थ ईस्ट दिल्ली – 110094 Category: Domestic / Ambedkar Basti Cylinder: 14.2 Kg (HSN: 27111900) 👉 जमीनी हकीकत: घर पर सिलेंडर आता है — तौला जाता है — कम निकलता है शिकायत की जाती है — दोबारा सिलेंडर आता है — 👉 वह भी 2–3 किलो कम! क्या अब LPG सिलेंडर भी “डाइट पैक” में आने लगे हैं? या फिर जनता को “वजन घटाने की स्कीम” में जबरन शामिल किया जा रहा है? यह सिर्फ लापरवाही नहीं — यह संगठित उपभोक्ता शोषण, आवश्यक वस्तु में हेराफेरी, और साफ-साफ कालाबाजारी की बू है। जब देश महामारी से जूझ चुका है, अब आम आदमी को रसोई की महामारी में धकेला जा रहा है— जहाँ 14.2 Kg सिर्फ कागज पर है, जमीन पर नहीं! 📢 सवाल सीधे हैं: क्या डिलीवरी से पहले सिलेंडर की चेकिंग होती है? क्या एजेंसी जानबूझकर कम गैस सप्लाई कर रही है? क्या यह एक isolated case है या पूरा नेटवर्क? ⚖️ यह मामला Consumer Protection Act और Legal Metrology Laws के सीधे उल्लंघन का प्रतीत होता है। 📌 चेतावनी: यदि तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो 👉 संबंधित विभागों में RTI दाखिल कर पूरी सप्लाई चेन की जांच कराई जाएगी 👉 और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करवाई जाएगी 🎥 वीडियो साक्ष्य के साथ यह ट्वीट किया जा रहा है— अब देखना यह है कि प्रशासन जागता है या “कम तौल” की तरह अपनी जिम्मेदारी भी हल्की कर देता है। #LPGScam #ConsumerRights #Delhi #IndaneGas #LegalAction #RTI @PetroleumMin @IOCDelhiIDO @indane_gas @indanegasonline @indanews @CMODelhi @HMOIndia @AmitShah @PMOIndia @narendramodi @LtGovDelhi @dm_northeast @DMNorthEast1 @CellDelhi @DelhiPolice @indanelpg2016
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🚨 छत पर गैरकानूनी तरीके से चल रहे गुम्बद कैफे का महाघोटाला: लूट का लाइसेंसधारी अड्डा! 🚨 जमिया मस्जिद के इस "कैफे" ने 17/3/26 को Red Bull (MRP ₹125) को ₹345/पीस में तिगुना ठग लिया—सर्विस चार्ज का जबरन 10% लेवी (₹507) + GST की दोगुनी लूट जोड़कर बिल ₹5856 का काला जादू कर दिया! CCPA गाइडलाइंस को नाक पर रगड़ रहे ये उद्योगपति-टट्टू। लीगल नोटिस ठोंक दिया—15 दिन में रिफंड और मानसिक प्रताड़ना को कंपाउंड न हुआ तो कंज्यूमर कोर्ट से GST/मेट्रोलॉजी तक सबकी खैर नहीं! Hookah बार की गैरकानूनी सियापा—युवाओं को नशे का जाल—भी नंगा करेंगे सुनने में यहां तक आ रहा है कि बाहर से आने वाले सैलानी, जो यहां बस केवल घूमने आए हैं उनको ये बखूबी लूटते हैं। क्योंकि वो जानते हैं कि ये लीगल कार्रवाई क्या कर पाएंगे चेतावनी: भविष्य में RTI बौछार से जवाब तलब करेंगे—लाइसेंस की पोल खोलेंगे! कौन बचेगा इस लुटेरे के जाल से? @PIBConsumerFood @DelhiPolice @MCD_Delhi @gstcouncilindia @ConsumerAffairs @LtGovDelhi @DFS_India @jagograhakjago @FreedomConsumer @fssaiindia @DDMA_Delhi @DCPCentralDelhi @ShoDaryaganj @ndmaindia @indiaturistica @tourismgoi @tourismgoi1 @DTDCIndia @ajay_dtdc @incredibleindia @in_incredible @incredibleind2 @incind @incredible0 @DPIITGoI @makemytrip @yatraofficial @TCILimited @EaseMyTrip @IRCTCofficial @Tripadvisor @bookingcom @Airbnb @Expedia #IllegalBilling #ServiceChargeBan #ConsumerRights #HookahBanDelhi #BoycottGumbadCafe #RedBullScam
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विषय: “होम डिलीवरी” से “ब्लैक डिलीवरी” तक — एक सिलेंडर, दो व्यवस्थाएँ, और उपभोक्ता का अपमान जय मा इंडियन सर्विसेज, ब्रह्मपुरी मेन रोड — जहाँ आम उपभोक्ता के लिए “नो स्टॉक / स्वयं उठान”, और चुनिंदा उपभोक्ताओं के लिए “डोर-टू-डोर प्राथमिकता सेवा” का अद्भुत संतुलन कायम है। सरकारी नीति कहती है—एलपीजी एक Essential Commodity है, और उसका वितरण पारदर्शी, निष्पक्ष एवं प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए। लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही कथा लिख रही है—एक ऐसी कथा, जिसमें घरेलू उपभोक्ता प्रतीक्षा सूची में खड़ा है, और व्यावसायिक हितधारक दरवाज़े पर सेवा प्राप्त कर रहे हैं। स्थिति अब केवल “होम डिलीवरी न होने” तक सीमित नहीं रही— बल्कि यह गंभीर संदेह उत्पन्न करती है कि— क्या घरेलू सिलेंडर की आपूर्ति को जानबूझकर रोका जा रहा है, ताकि वही गैस “ब्लैक” चैनल या व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं—होटल, रेस्टोरेंट, होम-शेफ नेटवर्क—को प्राथमिकता से पहुँचाई जा सके? यह प्रश्न यूँ ही नहीं उठता। जब एक ओर आम उपभोक्ता को कहा जाता है— “गोदाम से खुद उठा लीजिए,” और दूसरी ओर, वही एजेंसी निरंतर “विशेष ग्राहकों” के यहाँ सिलेंडर पहुँचाती रहती है— तो यह संयोग नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित पक्षपात प्रतीत होता है। वाह! यह वितरण तंत्र नहीं, मानो रिश्तेदारी प्रबंधन योजना हो— जहाँ नियम नहीं, पहचान और लाभ प्राथमिकता तय करते हैं। प्रश्न अब और भी तीखा हो जाता है— क्या यह मान लिया जाए कि— - घरेलू उपभोक्ता “कम प्राथमिकता” वर्ग में आता है? - और व्यावसायिक उपभोग (चाहे वैध हो या संदिग्ध) “विशेषाधिकार” श्रेणी में? यदि हाँ, तो कृपया इसे नीति में स्पष्ट रूप से लिख दिया जाए— ताकि उपभोक्ता भ्रम में न रहे, और “समान वितरण” का मिथक समाप्त हो। अन्यथा, यह पूरा प्रकरण निम्नलिखित गंभीर आरोपों की ओर संकेत करता है— - आवश्यक वस्तु का दुरुपयोग एवं विचलन (diversion) - आपूर्ति में कृत्रिम अभाव (artificial scarcity) - और उपभोक्ता अधिकारों का संगठित उल्लंघन ⚖️ चेतावनी (Notice of Intent): यदि इस विषय पर तत्काल पारदर्शी स्पष्टीकरण एवं सुधारात्मक कार्यवाही नहीं की गई, तो इस पूरे प्रकरण पर विस्तृत RTI आवेदन दायर कर निम्नलिखित बिंदुओं पर जवाब तलब किया जाएगा— - घरेलू बनाम व्यावसायिक आपूर्ति का दैनिक/मासिक रिकॉर्ड - संबंधित एजेंसी द्वारा वितरित सिलेंडरों का उपभोक्ता-वार विवरण - “नो स्टॉक” या “स्वयं उठान” के निर्देश का आधिकारिक आधार - निरीक्षण एवं निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका और कार्यवाही - ब्लैक मार्केटिंग/डाइवर्जन की शिकायतों पर अब तक की गई कार्रवाई और आवश्यक हुआ तो सक्षम प्राधिकरणों के समक्ष विधिक कार्यवाही भी प्रारंभ की जाएगी। अंत में: यदि व्यवस्था का सिद्धांत यही है कि— “आम उपभोक्ता प्रतीक्षा करे, और विशेष वर्ग प्राथमिकता पाए,” तो कृपया इस असमानता को भी नीति का हिस्सा घोषित कर दीजिए— ताकि न्याय और समानता जैसे शब्द केवल भाषणों तक सीमित न रहें। — एक जागरूक उपभोक्ता (अधिवक्ता), जो अब यह समझ चुका है कि गैस केवल रसोई नहीं, व्यवस्था की नीयत भी उजागर करती है। @indane_gas @IOCDelhiIDO @indanegasonline @IOCL_NAO @Karnal_AO_IOCL @PMOIndia @HMOIndia @CMODelhi @gupta_rekha @narendramodi @PetroleumMin
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विषय: “होम डिलीवरी” का सरकारी दर्शन बनाम ज़मीनी सच्चाई — एक सिलेंडर की यात्रा, उपभोक्ता की परीक्षा जय मा इंडियन सर्विसेज, ब्रह्मपुरी मेन रोड — नाम में “सेवा”, काम में “स्वयंसेवा” का अद्भुत संगम। सरकार की नीतियाँ कहती हैं कि एलपीजी एक Essential Commodity है, और “होम डिलीवरी” उपभोक्ता का अधिकार है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह अधिकार एक दार्शनिक अवधारणा बन चुका है—कागज़ों में जीवित, ज़मीन पर विलुप्त। स्थिति यह है कि गैस बुकिंग विधिवत की जाती है, संदेश भी समय पर प्राप्त हो जाता है—मानो व्यवस्था ने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया हो। इसके बाद शुरू होता है “मौन-साधना” का अध्याय: एजेंसी फोन नहीं उठाती, जवाबदेही शून्य, और अंततः उपभोक्ता को आदेश मिलता है— “आप स्वयं यमुना विहार स्थित गोदाम से सिलेंडर उठा लीजिए।” वाह! “होम डिलीवरी” का यह नवाचार निश्चित ही नीति-निर्माताओं के लिए शोध का विषय होना चाहिए—जहाँ उपभोक्ता ही डिलीवरी बॉय बन जाता है। प्रश्न यह है: क्या एक सामान्य घरेलू उपभोक्ता, चाहे वह अधिवक्ता ही क्यों न हो, अपना कार्य-व्यवसाय छोड़कर शहर के किसी कोने में स्थित गोदाम से सिलेंडर ढोने जाएगा? या फिर यह मान लिया जाए कि अब नागरिक सुविधाएँ नहीं, बल्कि स्व-सेवा योजनाएँ लागू हो चुकी हैं? और जब एजेंसी में “प्रदीप” नामक व्यक्ति से संपर्क होता है, तो उत्तरदायित्व का स्तर और भी स्पष्ट हो जाता है— लहजा ऐसा, मानो उपभोक्ता कोई याचक हो, अधिकार नहीं, एहसान मांग रहा हो। यह स्थिति केवल एक उपभोक्ता की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का आईना है जहाँ— नियम पुस्तकों में सजाए जाते हैं, अधिकार भाषणों में गिनाए जाते हैं, और ज़मीन पर उपभोक्ता को “स्वयं प्रबंध” का पाठ पढ़ाया जाता है। स्पष्ट किया जाता है कि यदि यह व्यवस्था की नई परिभाषा है, तो इसे औपचारिक रूप से अधिसूचित किया जाए—ताकि “होम डिलीवरी” शब्द को शब्दकोश से हटाकर “गोदाम से स्वयं उठान योजना” घोषित किया जा सके। अन्यथा, यह सीधा-सीधा उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन, सेवा में कमी (deficiency in service) और नियामकीय दिशानिर्देशों की अवहेलना प्रतीत होता है। ⚖️ चेतावनी (Notice of Intent): यदि शीघ्र ही इस विषय पर संतोषजनक स्पष्टीकरण एवं सेवा सुधार नहीं किया गया, तो इस प्रकरण में विस्तृत RTI आवेदन दायर कर निम्नलिखित बिंदुओं पर जवाब तलब किया जाएगा— होम डिलीवरी के संबंध में लागू नियम एवं उनका पालन संबंधित एजेंसी की जवाबदेही कॉल न उठाने एवं उपभोक्ता को गोदाम भेजने की वैधानिकता संबंधित अधिकारियों की निगरानी एवं कार्यवाही का विवरण और आवश्यकता पड़ने पर विधिक कार्यवाही के विकल्प भी सुरक्षित रखे जाते हैं। अंत में: यदि “सेवा” का अर्थ उपभोक्ता को स्वयं श्रमिक बना देना है, तो कृपया शब्दों की इस विडंबना को भी आधिकारिक मान्यता दे दीजिए। — एक जागरूक उपभोक्ता (अधिवक्ता), जो अभी भी यह समझने का प्रयास कर रहा है कि उसका घर कहाँ समाप्त होता है और एजेंसी का गोदाम कहाँ से शुरू होता है। @indane_gas @IOCDelhiIDO @indanegasonline @IOCL_NAO @Karnal_AO_IOCL @PMOIndia @HMOIndia @CMODelhi @gupta_rekha @narendramodi @PetroleumMin

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विषय: “होम डिलीवरी” का सरकारी दर्शन बनाम ज़मीनी सच्चाई — एक सिलेंडर की यात्रा, उपभोक्ता की परीक्षा जय मा इंडियन सर्विसेज, ब्रह्मपुरी मेन रोड — नाम में “सेवा”, काम में “स्वयंसेवा” का अद्भुत संगम। सरकार की नीतियाँ कहती हैं कि एलपीजी एक Essential Commodity है, और “होम डिलीवरी” उपभोक्ता का अधिकार है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह अधिकार एक दार्शनिक अवधारणा बन चुका है—कागज़ों में जीवित, ज़मीन पर विलुप्त। स्थिति यह है कि गैस बुकिंग विधिवत की जाती है, संदेश भी समय पर प्राप्त हो जाता है—मानो व्यवस्था ने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया हो। इसके बाद शुरू होता है “मौन-साधना” का अध्याय: एजेंसी फोन नहीं उठाती, जवाबदेही शून्य, और अंततः उपभोक्ता को आदेश मिलता है— “आप स्वयं यमुना विहार स्थित गोदाम से सिलेंडर उठा लीजिए।” वाह! “होम डिलीवरी” का यह नवाचार निश्चित ही नीति-निर्माताओं के लिए शोध का विषय होना चाहिए—जहाँ उपभोक्ता ही डिलीवरी बॉय बन जाता है। प्रश्न यह है: क्या एक सामान्य घरेलू उपभोक्ता, चाहे वह अधिवक्ता ही क्यों न हो, अपना कार्य-व्यवसाय छोड़कर शहर के किसी कोने में स्थित गोदाम से सिलेंडर ढोने जाएगा? या फिर यह मान लिया जाए कि अब नागरिक सुविधाएँ नहीं, बल्कि स्व-सेवा योजनाएँ लागू हो चुकी हैं? और जब एजेंसी में “प्रदीप” नामक व्यक्ति से संपर्क होता है, तो उत्तरदायित्व का स्तर और भी स्पष्ट हो जाता है— लहजा ऐसा, मानो उपभोक्ता कोई याचक हो, अधिकार नहीं, एहसान मांग रहा हो। यह स्थिति केवल एक उपभोक्ता की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का आईना है जहाँ— नियम पुस्तकों में सजाए जाते हैं, अधिकार भाषणों में गिनाए जाते हैं, और ज़मीन पर उपभोक्ता को “स्वयं प्रबंध” का पाठ पढ़ाया जाता है। स्पष्ट किया जाता है कि यदि यह व्यवस्था की नई परिभाषा है, तो इसे औपचारिक रूप से अधिसूचित किया जाए—ताकि “होम डिलीवरी” शब्द को शब्दकोश से हटाकर “गोदाम से स्वयं उठान योजना” घोषित किया जा सके। अन्यथा, यह सीधा-सीधा उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन, सेवा में कमी (deficiency in service) और नियामकीय दिशानिर्देशों की अवहेलना प्रतीत होता है। ⚖️ चेतावनी (Notice of Intent): यदि शीघ्र ही इस विषय पर संतोषजनक स्पष्टीकरण एवं सेवा सुधार नहीं किया गया, तो इस प्रकरण में विस्तृत RTI आवेदन दायर कर निम्नलिखित बिंदुओं पर जवाब तलब किया जाएगा— होम डिलीवरी के संबंध में लागू नियम एवं उनका पालन संबंधित एजेंसी की जवाबदेही कॉल न उठाने एवं उपभोक्ता को गोदाम भेजने की वैधानिकता संबंधित अधिकारियों की निगरानी एवं कार्यवाही का विवरण और आवश्यकता पड़ने पर विधिक कार्यवाही के विकल्प भी सुरक्षित रखे जाते हैं। अंत में: यदि “सेवा” का अर्थ उपभोक्ता को स्वयं श्रमिक बना देना है, तो कृपया शब्दों की इस विडंबना को भी आधिकारिक मान्यता दे दीजिए। — एक जागरूक उपभोक्ता (अधिवक्ता), जो अभी भी यह समझने का प्रयास कर रहा है कि उसका घर कहाँ समाप्त होता है और एजेंसी का गोदाम कहाँ से शुरू होता है। @indane_gas @IOCDelhiIDO @indanegasonline @IOCL_NAO @Karnal_AO_IOCL @PMOIndia @HMOIndia @CMODelhi @gupta_rekha @narendramodi @PetroleumMin
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जगप्रवेश अस्पताल एवं उस्मानपुर थाना परिसर के बाहर “अनौपचारिक जजिया टैक्स पार्किंग” — कानून व्यवस्था पर खुली चुनौती दिल्ली के उत्तर-पूर्वी जिले के सब-डिवीजन सीलमपुर, थाना उस्मानपुर के अधिकार क्षेत्र में स्थित जगप्रवेश अस्पताल के मुख्य द्वार और थाना परिसर के बाहर इन दिनों एक अत्यंत विचित्र और चिंताजनक व्यवस्था फल-फूल रही है। कागज़ों में यह सड़क भले ही PWD (Public Works Department) की हो, किंतु जमीनी हकीकत यह प्रतीत कराती है कि इस मार्ग पर प्रशासनिक अधिकार नहीं बल्कि स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति “आशु” का अनौपचारिक राजतंत्र स्थापित हो चुका है। बताया जा रहा है कि इस तथाकथित “राज्य” के संरक्षक के रूप में बीट ऑफिसर हेड कॉन्स्टेबल सचिन पूरी तत्परता से अपनी भूमिका निभा रहे हैं। स्थानीय लोगों के बीच खुलेआम यह चर्चा सुनने में आती है कि उक्त हेड कॉन्स्टेबल का कथन है — “शिकायत जहाँ करनी है कर लो, चाहे Chief Justice of India तक कर दो, ऊपर से संरक्षण प्राप्त है, मेरा बाल भी बाँका नहीं होगा।” यदि यह कथन असत्य है तो पुलिस विभाग को तत्काल इसका खंडन करना चाहिए, और यदि सत्य है तो यह न केवल कानून के शासन पर सीधी चुनौती है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी एक अत्यंत कटाक्षपूर्ण टिप्पणी बन जाता है। स्थिति इतनी विचित्र हो चुकी है कि जगप्रवेश अस्पताल आने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों को पहले इस “अनौपचारिक जजिया टैक्स पार्किंग” की अदायगी करनी पड़ती है, तभी उन्हें अस्पताल के भीतर प्रवेश का रास्ता मिलता है। अर्थात् बीमारी का इलाज बाद में, पहले “पार्किंग कर” की औपचारिकता पूर्ण करनी आवश्यक प्रतीत होती है। इसी प्रकार, यदि कोई पीड़ित व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर उस्मानपुर थाना पहुँचना चाहता है, तो मानो उसे पहले इस अस्थायी कर-प्रणाली के समक्ष नतमस्तक होकर शुल्क अदा करना पड़ता है। इसके बाद ही वह न्याय की गुहार लगाने के लिए थाने के भीतर प्रवेश कर सकता है—और उसकी शिकायत सुनी जाएगी या नहीं, यह तो एक अलग ही अध्याय है। यदि यह व्यवस्था वास्तव में वैध है, तो दिल्ली प्रशासन को तत्काल स्पष्ट करना चाहिए कि: क्या PWD सड़क पर निजी व्यक्तियों द्वारा पार्किंग शुल्क वसूलने का कोई वैधानिक लाइसेंस जारी किया गया है? क्या इस कथित पार्किंग संचालन के लिए MCD, DDA, PWD या किसी अन्य प्राधिकरण की अनुमति प्राप्त है? क्या स्थानीय पुलिस को इस गतिविधि की जानकारी है, अथवा यह सब कुछ उनकी “सुरक्षात्मक दृष्टि” के समक्ष ही संचालित हो रहा है? यदि उपरोक्त में से किसी भी प्रश्न का उत्तर “नहीं” है, तो यह संपूर्ण व्यवस्था न केवल अवैध वसूली (Extortion) की श्रेणी में आती है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था के प्रति सार्वजनिक विश्वास को भी गंभीर रूप से आहत करती है। इस विषय में यह भी स्पष्ट रूप से अवगत कराया जाता है कि यदि संबंधित विभागों द्वारा शीघ्र एवं पारदर्शी कार्रवाई नहीं की जाती, तो सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के अंतर्गत विस्तृत प्रश्नावली दायर कर निम्न बिंदुओं पर आधिकारिक अभिलेखों के माध्यम से जवाब तलब किया जाएगा— जिनमें इस सड़क की स्वामित्व स्थिति, पार्किंग लाइसेंस, राजस्व अभिलेख, पुलिस की ड्यूटी-रजिस्टर प्रविष्टियाँ, तथा इस कथित वसूली से संबंधित सभी प्रशासनिक रिकॉर्ड सम्मिलित होंगे। अंततः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि दिल्ली जैसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में, एक सरकारी अस्पताल और पुलिस थाने के ठीक बाहर यदि “जजिया टैक्स” जैसी अनौपचारिक व्यवस्था चल रही है, तो कानून का वास्तविक संरक्षक कौन है — प्रशासन या स्थानीय प्रभावशाली तत्व? उम्मीद है कि संबंधित अधिकारी इस पूरे प्रकरण को गंभीरता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के साथ देखेंगे, अन्यथा आने वाले समय में यह मामला न केवल RTI के माध्यम से बल्कि विधिक एवं जनहित मंचों पर भी उठाया जाएगा। @dtptraffic @DelhiPolice @CellDelhi @LtGovDelhi @CMODelhi @gupta_rekha @DelhiPwd @official_dda @DCPNEastDelhi @DCPNEastDelhi @acpb4ned @cbic_india @CBIHeadquarters @TIbhajanpura
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दिल्ली के उत्तर-पूर्वी ज़िले की सौ फुटा रोड — दुर्गापुरी से मौजपुर तक, और खासतौर पर शिव मंदिर से मौजपुर के बीच का इलाक़ा अब किसी सड़क से ज़्यादा “सरकारी संरक्षण प्राप्त अतिक्रमण प्रदर्शनी” जैसा प्रतीत होता है। वर्षों से लगातार शिकायतें दर्ज कराई जा रही हैं, परंतु इन शिकायतों का असर प्रशासन पर वैसा ही पड़ता है जैसा किसी हाथी पर मच्छर के बैठने का — फर्क नाम मात्र का भी नहीं। यह कहना भी शायद शिकायतों का अपमान होगा कि वे “जू के बराबर” असर करती हैं, क्योंकि जू कम से कम रेंगती तो है; यहाँ तो शिकायतें फाइलों में दफ़न होकर दम तोड़ देती हैं। शिव मंदिर से मौजपुर तक का इलाक़ा प्रशासनिक निष्क्रियता का जीवंत स्मारक बन चुका है। तस्वीर में स्पष्ट दिखाई देने वाली दुकान — “हिमांशु ऑटोमोबाइल” — जो कथित तौर पर सामान की दुकान है, परंतु व्यवहार में मानो पूरी सड़क की ज़मींदारी उसी के नाम लिख दी गई हो। पाँच फुट की दुकान, दस फुट का फुटपाथ और लगभग बीस फुट की सड़क — तीनों को मिलाकर निजी जागीर बना लेना यहाँ शायद व्यापारिक कौशल नहीं बल्कि “प्रशासनिक आशीर्वाद” की उपलब्धि माना जाता है। और यह दृश्य कोई अपवाद नहीं है। आसपास की अनेक दुकानें भी उसी आत्मविश्वास और निर्भीकता से सड़क और फुटपाथ पर क़ब्ज़ा जमाए हुए हैं, मानो कानून नामक संस्था छुट्टी पर हो और शासन-प्रशासन दर्शक दीर्घा में बैठकर इस अवैध विस्तार को तालियाँ बजाकर देख रहा हो। जब इस विषय पर दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के टीआई साहब और एसीपी साहब से बातचीत की जाती है, तो एक अत्यंत संवेदनशील और बार-बार दोहराया जाने वाला तर्क सामने आता है — “स्टाफ की कमी”। अचरज की बात यह है कि यही सीमित स्टाफ रोज़ सड़क पर बड़ी तत्परता से मौजूद रहता है। गिद्ध-सी पैनी निगाहों से वे यह बख़ूबी पहचान लेते हैं कि किसने नो-इंच का हेलमेट नहीं पहना, किस मोटरसाइकिल चालक ने जूते की जगह चप्पल पहन ली, और किसे तुरंत चालान की पवित्र प्रक्रिया से गुज़रना चाहिए। इन सतर्क निगाहों को सड़कों पर रेंगती ट्रैफिक, फुटपाथों पर फैला अतिक्रमण और सार्वजनिक स्थानों पर फलता-फूलता अवैध व्यापार शायद दिखाई नहीं देता। इन मामलों में “स्टाफ की कमी” अचानक अत्यंत गंभीर समस्या बन जाती है। कारण आम जनता भली-भांति समझती है — जब जेब में गर्माहट बढ़ जाती है, तो जिम्मेदारी अक्सर ठंडे बस्ते में चली जाती है। प्रश्न सीधा है — प्रशासन आखिर कब जागेगा? कब सुनेगा? और कब आम जनता इन सड़कों पर चल पाएगी? चलना तो शायद अभी दूर की बात है; फिलहाल तो कम से कम इतना कर दीजिए कि लोग इन सड़कों पर रेंग ही सकें। यह भी स्पष्ट कर दिया जाता है कि यदि इस विषय पर शीघ्र और प्रभावी कार्यवाही नहीं होती, तो आने वाले समय में विस्तृत सूचना मांगते हुए संबंधित विभागों के विरुद्ध सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के अंतर्गत औपचारिक आवेदन प्रस्तुत किया जाएगा। उस स्थिति में यह पूछा जाएगा कि इस क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने के लिए अब तक कितनी शिकायतें प्राप्त हुईं, किन अधिकारियों की जिम्मेदारी निर्धारित थी, क्या कार्रवाई की गई और यदि नहीं की गई तो उसके लिए उत्तरदायी कौन है। जनता की सड़कों को निजी जागीर बनने देने की यह परंपरा अब अधिक समय तक बिना जवाबदेही के नहीं चल पाएगी। सुनने में आ रहा है कि एसडीएम महोदय आए थे फोटोग्राफी रीलबाजी हुई थी, लेकिन क्या वह रीलबाजी प्रिंटआउट निकल कर फाइलों में लग भी पाएंगी और वे फाइलें आगे कार्रवाई के लिए बढ़ेंगी।बड़ा ही सोच का और शोध का विषय है।कारण क्या है कि हिस्सेदारी सबके पास जा रही है और जिम्मेदारी खत्म होती जा रही है @dtptraffic @DelhiPolice @MCD_Delhi @DPCC_Pollution @CPCB_OFFICIAL @dm_northeast @CellDelhi @cvoindia @DelhiPwd
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दिल्ली के उत्तर-पूर्व क्षेत्र के में घोंङा विधानसभा के गढ़ी मेंडू गांव में लगभग 9,000+ वर्गमीटर से अधिक DDA/ Horticulture / Forest Department सरकारी भूमि पर चल रहा तथाकथित “Illegal Parking” दर असल कानून, नियम और प्रशासन—तीनों का सामूहिक मज़ाक प्रतीत होता है। बिना किसी वैध टेंडर, अनुमति, NOC या भूमि उपयोग परिवर्तन के यह अवैध पार्किंग न केवल खुलेआम सरकारी जमीन पर फल-फूल रही है, बल्कि ङग्गामारी बसों का अघोषित अड्डा बनकर ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और सार्वजनिक सुरक्षा के साथ खुली खिलवाड़ कर रही है। दिलचस्प यह है कि इतनी विशाल अवैध गतिविधि वर्षों से सबकी आंखों के सामने चल रही है—फिर भी संबंधित विभागों की “चमत्कारिक अनदेखी” जारी है। यदि यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं है, तो फिर इसे क्या कहा जाए—यह प्रश्न अब सार्वजनिक रूप से पूछा जाना आवश्यक हो गया है। अतः संबंधित विभाग तत्काल कार्रवाई करें—अन्यथा RTI के माध्यम से सभी फाइलें, टेंडर रिकॉर्ड, जिम्मेदार अधिकारियों के नाम और अब तक की कार्रवाई का पूरा हिसाब सार्वजनिक रूप से तलब किया जाएगा। यदि कानून लागू नहीं किया गया, तो अगला मंच न्यायालय होगा—जहाँ यह पूछा जाएगा कि गढ़ी मेंढु में कानून अनुपस्थित क्यों है। @CMODelhi @gupta_rekha @official_dda @NGTribunal @DPCC_Pollution @CPCB_OFFICIAL @MCD_Delhi @SBM_MCD @mcdhorti @DelhiGovDigital @moefcc @EnvironmentPib @sicom_moefcc @Moefccpcindia @MoEFCC_Ashok_Kr @moefccpc81347 @dtptraffic @TIbhajanpura @TIKhajurikhas @DelhiPolice @CPDelhi @ACPBhajanpura @shobhajanpura @DCPNEastDelhi
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🎤 “Notice Culture 2026” — या #P_Pop_Culture_Tour_2026 का प्रशासनिक प्रहसन? गायक @geetandimachine के #P_Pop_Culture_Tour_2026 के अंतर्गत शनिवार को प्रस्तावित कंसर्ट पर #Cenral_Zone के धुरंधर #DHO ने नियमों के उल्लंघन का शंखनाद करते हुए नोटिस जारी किया है—और साथ ही कार्यक्रम रोकने की चेतावनी भी। नोटिस का सार यह है कि आयोजन बिना अनिवार्य अनुमति के किया जा रहा है। साथ ही यह आरोप भी कि जिस श्रेणी के अंतर्गत #Open_Space में अस्थायी #HTL लिया गया है, वह वैध नहीं है। ऊपर से ठोस कचरा प्रबंधन नियमों का सख्ती से पालन करने का निर्देश—मानो अचानक पर्यावरण-धर्म की प्राप्ति हो गई हो। 🎟 “मुफ़्त पास सिद्धांत” — प्रशासनिक आक्रोश का नया अध्याय? सूत्रों की मानें तो निगम के कई धुरंधरों को आयोजन के मुफ्त पास नहीं मिले। और इसी असंतोष ने नोटिस का रूप ले लिया। हालाँकि इन आरोपों के समर्थन में कोई दस्तावेज़ी तथ्य सार्वजनिक नहीं है— परंतु जनचर्चा का यह व्यंग्यात्मक सिद्धांत प्रशासनिक टाइमिंग पर प्रश्नचिन्ह अवश्य लगाता है। 📂 चयनात्मक सख्ती का इतिहास? यह भी प्रमाणित चर्चा में है कि नोटिस देने वाले #DHO पर पूर्व में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर “चयनात्मक मेहरबानी” के आरोप लगे हैं। कुछ महीने पहले #Kotla_Mubarakpur के #Haldiram प्रकरण में कथित तौर पर रिश्वत लेकर समय पर कार्रवाई न करने का मामला इसका उदाहरण बताया जाता है। यदि यह असत्य है—तो तत्काल सार्वजनिक खंडन प्रस्तुत हो। यदि सत्य है—तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर आघात है। 🏛 औकात बनाम अधिकार और यह भी जन-विश्वास में स्थापित है कि @MCD_Delhi का कोई अधिकारी इतनी प्रशासनिक हैसियत नहीं रखता कि वैध प्रक्रिया से चल रहे बड़े सांस्कृतिक आयोजन को एकतरफा रद्द कर दे। लोकतंत्र में अनुमति-प्रक्रिया कानून से चलती है, व्यक्तिगत नाराज़गी से नहीं। ⚖ सार्वजनिक चेतावनी (Pre-RTI Intimation) यदि नोटिस विधिसम्मत है— तो कृपया निम्न बिंदुओं पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण जारी करें: कथित अनुमति-अभाव का स्पष्ट दस्तावेज़ी आधार। #Open_Space में #HTL की श्रेणी को अवैध घोषित करने का विधिक प्रावधान। ठोस कचरा प्रबंधन नियमों के उल्लंघन का विशिष्ट विवरण। #Kotla_Mubarakpur #Haldiram प्रकरण में की गई कार्रवाई का रिकॉर्ड। क्या समान परिस्थितियों में अन्य आयोजनों को भी समान कठोरता से रोका गया? अन्यथा, आगामी समय में विधिवत RTI आवेदन प्रस्तुत कर संपूर्ण अभिलेख तलब किए जाएंगे। और यदि आवश्यक हुआ, तो संवैधानिक व वैधानिक उपचार हेतु उच्चतर प्राधिकरणों से हस्तक्षेप की मांग भी की जाएगी। 🔥 अंतिम शब्द — संवैधानिक ललकार लोकतांत्रिक शासन में “नोटिस” प्रशासनिक औज़ार है, उगाही का औज़ार नहीं। यदि कार्यक्रम में वास्तविक अवैधता है— बस की है तो बंद कर के दिखाइए। परंतु “काले नोटिस” के माध्यम से पैसा उगाहने की प्रवृत्ति त्याग दीजिए। संविधान की शपथ लेने के बाद प्रशासनिक दुरुपयोग करना, जन-विश्वास के साथ किया गया सार्वजनिक विश्वासघात है— और यही इस पूरे प्रकरण की सबसे भयंकर, असंवैधानिक गाली है। @PMOIndia @HMOIndia @DoPTGoI @LtGovDelhi @DCCNZMCD जनता देख रही है। और अगला कदम—सूचना का अधिकार।
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🏢 Omaxe Chowk की पार्किंग — या “राजस्व-रहस्य” का नया अध्याय? चांदनी चौक की ऐतिहासिक गलियों के बीच खड़ा Omaxe Chowk सिर्फ एक मॉल नहीं, बल्कि “राजस्व-शास्त्र” का जीवंत प्रयोगशाला प्रतीत होता है। करीब 2500 वाहनों की मल्टी लेवल पार्किंग—शर्त स्पष्ट, अनुबंध पारदर्शी, और समय-सीमा तय: दिसंबर 2025 में पार्किंग का चार्ज @MCD_Delhi की #RP_Cell को सौंपा जाना था। लेकिन जनाब, नियम किताबों में अच्छे लगते हैं; ज़मीन पर तो “व्यवस्था” का अपना संविधान चलता है! 📌 शर्तें क्या थीं? पार्किंग निर्माण व संचालन बिल्डर करेगा। पांच वर्ष पश्चात, दिसंबर 2025 में संचालन का अधिकार #RP_Cell को। पार्किंग शुल्क लेने की जिम्मेदारी #RP_Cell की। अब प्रश्न यह है—जब जिम्मेदारी तय थी, तो जिम्मेदार कहाँ गायब हो गए? 💰 25-30 लाख महीना — या “मासिक मौन-व्रत”? जानकारों का कहना है कि इस पार्किंग से निगम को प्रति माह 25-30 लाख रुपये की आय संभव है। परंतु जब “आय” का दरवाज़ा खुलता है, तो “काली कमाई” की खिड़कियाँ भी सक्रिय हो जाती हैं—ऐसा जन-चर्चा का स्वर है। सूत्रों के अनुसार #RP_Cell में #ADC होकर भी बतौर मुखिया तैनात #Rajiv_Kumar और अधीक्षक #SanjeyGusain ने इस पार्किंग का चार्ज न लेने का अद्भुत प्रशासनिक कौशल दिखाया है। क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है? या फिर “राजस्व-त्याग” का कोई आध्यात्मिक प्रयोग? 🏛 पंचायत तक पहुँचा मामला कहानी पंचायत तक पहुँची। मामला साफ़ था— निगम का लाभ सुनिश्चित होता तो बिल्डर का करोड़ों का खेल प्रभावित होता, और “लुटेरों” की मासिक कमाई पर विराम लग जाता। तो सवाल सीधा है— निगम का फायदा हो या दिवालियापन, किसे फर्क पड़ता है? जब तक “व्यक्तिगत लाभ” का पहिया घूम रहा है, सार्वजनिक हित का पहिया जाम ही सही! 🎭 निलंबन क्यों नहीं? चर्चा है कि चौधरी ने कथित भ्रष्ट ADC को निलंबित करने या पद से हटाने के बजाय “खाने-कमाने की खुली छूट” प्रदान कर दी। यदि यह असत्य है—तो खंडन प्रस्तुत हो। यदि सत्य है—तो यह प्रशासनिक नैतिकता का खुला अपमान है। और विडंबना देखिए— जिस खिलाड़ी ADC की चर्चा है, वह निगम में #Rajya_Sabha से #Import बताया जाता है, और #RRRules के अनुसार इस पद के लिए अर्हता भी संदिग्ध बताई जाती है। फिर भी वही महाशय #RP_Cell के साथ-साथ #Advertisement जैसे कमाऊ विभाग के भी मुखिया! अयोग्यता और अधिकार का यह गठजोड़ प्रशासनिक विज्ञान में नया अध्याय है। 🧠 मामला-ए-हमजात? जन-चर्चा कहती है— जब मामला #मामला_ए_हमजात का हो, तो चौधरी आँखें बंद कर “चिंतन” में लीन हो जाते हैं। चिंतन इतना गहरा कि राजस्व का शोर भी सुनाई नहीं देता। ⚖ सार्वजनिक चेतावनी यह लेख मात्र व्यंग्य नहीं—सार्वजनिक हित में प्रश्न है। यदि उपरोक्त तथ्यों में कोई त्रुटि है, तो संबंधित अधिकारी स्पष्टीकरण जारी करें। अन्यथा, आने वाले समय में विधिवत RTI आवेदन प्रस्तुत कर निम्न बिंदुओं पर जवाब तलब किया जाएगा: 1. पार्किंग हस्तांतरण की वास्तविक स्थिति। 2. दिसंबर 2025 के बाद राजस्व का लेखा-जोखा। 3. #RP_Cell द्वारा चार्ज न लेने के लिखित आदेश। 4. संबंधित अधिकारियों की नियुक्ति की वैधानिकता (#RRRules के तहत)। 5. #Advertisement विभाग का अतिरिक्त प्रभार किस आधार पर दिया गया। पारदर्शिता यदि प्रशासन का सिद्धांत है, तो सूचना उसका परीक्षण है। @PMOIndia @HMOIndia @DoPTGoI @CVCIndia @LtGovDelhi जनता प्रश्न पूछ रही है। और लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध नहीं—अधिकार है। अब देखना यह है— यह पार्किंग “सार्वजनिक सुविधा” बनती है या “निजी सुविधा केंद्र” ही बनी रहती है।
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क्या दिल्ली में अपराध अब “मुआवज़ा मॉडल” पर चलेंगे? रात 11:25 बजे। परिवार कार में। पीछे से जानबूझकर टक्कर। गाड़ी के शीशे तोड़े गए। भाई पर हमला। और सबसे भयावह — 9 वर्ष के बच्चे को गाड़ी से खींचने का प्रयास। PCR कॉल 11:35 और 11:36 PM पर की गई। वीडियो साक्ष्य उपलब्ध है। अब सुनिए “सिस्टम” का प्रस्ताव — “हम आपका नुकसान दिला देंगे।” अर्थात, यदि वाहन तोड़ा गया है तो उसकी भरपाई कर दी जाएगी। यदि बच्चे को भयभीत किया गया है, तो उसे शायद “समझा” दिया जाएगा। यदि अपराध हुआ है, तो उसे “सेटल” कर दिया जाएगा। प्रश्न यह है — क्या दिल्ली की सड़कों पर अब आपराधिक कृत्य “कंपाउंडेबल पैकेज” में उपलब्ध हैं? क्या एक नाबालिग को उसकी अभिरक्षा से अलग करने का प्रयास भी मुआवज़े की रसीद के नीचे दबाया जा सकता है? यदि आज एक अपराधी रात में हमला करे और अगले दिन कुछ रुपये देकर छूट जाए — तो कल दिल्ली के बाकी बच्चों की सुरक्षा का ठेका किसके पास है? कानून का मूल सिद्धांत है — अपराध राज्य के विरुद्ध होता है, केवल व्यक्ति के विरुद्ध नहीं। यह कोई निजी लेन-देन नहीं है कि गाड़ी की मरम्मत हो गई तो अपराध समाप्त। यह विधि-व्यवस्था की परीक्षा है। यदि FIR दर्ज करने के स्थान पर “नुकसान दिला देंगे” की सलाह दी जाती है, तो यह केवल निष्क्रियता नहीं — यह न्याय प्रक्रिया के मूल ढांचे को कमज़ोर करने का संकेत है। इस पूरे प्रकरण को विधिवत 173(3) के अंतर्गत वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में लाया गया है। CCTV संरक्षण की मांग की गई है। वीडियो साक्ष्य उपलब्ध हैं। और अब स्पष्ट चेतावनी — 🔎 आगामी चरण में RTI दायर की जाएगी, जिसमें पूछा जाएगा: FIR दर्ज क्यों नहीं की गई? किस अधिकारी ने क्या निर्णय लिया? PCR कॉल की डेली डायरी एंट्री क्या है? CCTV फुटेज सुरक्षित क्यों/क्यों नहीं किया गया? “नुकसान दिलाने” का प्रस्ताव किस विधिक प्रावधान के अंतर्गत दिया गया? यदि उत्तर विधिसम्मत नहीं हुए, तो सक्षम न्यायालय का दरवाज़ा खुला है। यह केवल एक परिवार का प्रश्न नहीं — यह दिल्ली के हर उस अभिभावक का प्रश्न है जो अपने बच्चे के साथ रात में घर लौटता है और यह मानकर चलता है कि कानून उसके साथ है। कानून कोई बीमा पॉलिसी नहीं है कि प्रीमियम देकर क्लेम निपटा दिया जाए। कानून दायित्व है — और दायित्व से पलायन लोकतंत्र में दर्ज होता है। यह पोस्ट रिकॉर्ड के लिए है। और रिकॉर्ड कभी मिटता नहीं। #ChildSafety #RuleOfLaw #Delhi @DelhiPolice @CPDelhi @DCPEastDelhi @CrimeBranchDP @CellDelhi @CRYINDIA @SavetheChildren @DCPCR
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दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय में #Dy_Director_Sports के पद पर विराजमान एक “विशेष प्रतिभाशाली खिलाड़ी” कार्यरत हैं — मैदान खेल का हो या राजस्व रिकॉर्ड का, गोल करने की कला में अद्वितीय! #S_Sunil नामक इस अधिकारी पर सैंकड़ों करोड़ रुपये मूल्य की शत्रु संपत्ति को राजस्व अभिलेखों में एक निजी व्यक्ति के नाम चढ़ाने का गंभीर आरोप रहा है। यह कोई चाय–पान की चर्चा नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज वह कथा है जिसे पढ़कर प्रशासनिक नैतिकता स्वयं शर्मसार हो जाए। केवल आरोप ही नहीं — बल्कि दिल्ली सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा द्वारा मुकदमा भी दर्ज किया गया। FIR 01/2020, #PS_ACB के अनुसार, राजौरी गार्डन के तत्कालीन तहसीलदार #S_Sunil के विरुद्ध दर्ज प्रकरण में स्पष्ट आरोप था कि वर्ष 2010 में म्यूटेशन संख्या 5780 के माध्यम से खालिद नामक व्यक्ति को नूर खान का उत्तराधिकारी दर्शाते हुए नाम दर्ज किया गया। जबकि तथ्य यह है कि नूर खान वर्ष 1947 में विभाजन के दौरान पाकिस्तान चला गया था। उसकी भूमि हिस्सेदारी (गांव तिहाड़, दिल्ली) को सरकार ने खाता खतौनी संख्या 53/33 के अंतर्गत अवार्ड संख्या 1794, 1869 एवं 1916 के माध्यम से कस्टोडियन (डीडीए) में विधिवत निहित कर दिया था। अर्थात — संपत्ति पहले ही राज्य के अधिकार में स्थापित थी। किन्तु प्रशासनिक “कुशलता” का यह अनुपम उदाहरण देखिए कि @official_dda के अधीन 584 बीघा 9 बिस्वा कस्टोडियन भूमि को मोहम्मद खालिद के नाम स्थानांतरित/म्यूटेट कर दिया गया। इतिहास की धूल झाड़कर वंशावली गढ़ने की यह कला साधारण नहीं होती। और जब मोहम्मद खालिद का निधन हुआ, तो वर्ष 2014 में म्यूटेशन संख्या 5785 के माध्यम से वही भूमि तारिक एवं मोहम्मद आसिफ (पुत्र मोहम्मद खालिद) के नाम म्यूटेट कर दी गई — मानो सरकारी अभिलेख निजी वसीयत के परिशिष्ट हों। आरोप यह भी है कि एस. सुनील ने अपने पद, प्रभाव एवं अधिकार का उपयोग करते हुए अवैध साधनों और भ्रष्ट आचरण के माध्यम से अपनी आय से अधिक संपत्ति अर्जित की। यदि यह सत्य है, तो यह केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं — बल्कि राजकीय विश्वास के साथ प्रत्यक्ष विश्वासघात है। और सबसे विस्मयकारी तथ्य यह है कि वर्ष 2023 तक @RevenueDept को सात बार पत्र प्रेषित कर अभियोजन स्वीकृति हेतु आग्रह किया गया, परन्तु कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। क्या मौन ही अब शासन की आधिकारिक भाषा है? या फाइलों की गति भी किसी “खेल नीति” के अंतर्गत नियंत्रित है? @PMOIndia @HMOIndia @LtGovDelhi @CMODelhi @ashishsood_bjp @dir_ed @Dir_Education यह प्रश्न केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहाँ शत्रु संपत्ति भी “कौशलपूर्ण खेल” का उपकरण बन जाती है। यदि आरोप असत्य हैं, तो सार्वजनिक रूप से खंडन हो। यदि सत्य हैं, तो कठोर दंड हो। अन्यथा, पारदर्शिता के संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत शीघ्र ही सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत विस्तृत आरटीआई आवेदन दायर कर निम्न बिंदुओं पर जवाब तलब किया जाएगा — अभियोजन स्वीकृति पर निर्णय की स्थिति संबंधित फाइल नोटिंग्स जांच की प्रगति रिपोर्ट कस्टोडियन भूमि के वर्तमान अभिलेखीय स्थिति यह स्पष्ट चेतावनी है कि सार्वजनिक संपत्ति पर किसी भी प्रकार की अनियमितता को “खेल भावना” का नाम देकर अनदेखा नहीं किया जाएगा। कानून की आंखों पर पट्टी न्याय के लिए होती है, संरक्षण के लिए नहीं। अब निर्णय व्यवस्था को करना है — यह प्रकरण “फाइलों में सुरक्षित” रहेगा या इतिहास में उदाहरण बनेगा।
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🏥 Institute of Human Behaviour and Allied Sciences (IHBAS), दिल्ली 🛑 ईहबास में ‘पारदर्शिता’ का प्रेस-नोट और ज़मीन पर पसरा हुआ सच: जहाँ वेतन की रसीद है, पर अधिकारों की रसीद ग़ायब है। (सूत्र: संस्थान के भीतर से प्राप्त तथ्यात्मक इनपुट) ईहबास में कार्यरत सुरक्षा गार्ड सुनील पाल—सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक संरचना का जीवित प्रश्नचिह्न—जो वर्षों तक ड्यूटी करता रहा, पर ESI, PF, बोनस और वैधानिक सुरक्षा से वंचित रहा। अगर उसे ESI की वास्तविक सुविधा मिली होती, तो वह किसी उच्च स्तरीय अस्पताल में समुचित उपचार करा सकता था। शायद उसका पैर न कटता। शायद वह आज “अपंग” की श्रेणी में धकेला न जाता। और शायद—उसकी मां अपने बेटे की टूटी देह और टूटी व्यवस्था का आघात सह पाती। लेकिन यहाँ ‘शायद’ ही नीति है, और ‘अगर’ ही प्रशासन। उसकी माँ 18 तारीख़ को इस असह्य पीड़ा में संसार छोड़ गईं। एक पैर की कीमत एक मां का जीवन बन गई—और संस्थान अब भी प्रेस-टूर और सफ़ाई-अभियान के फोटो फ्रेम में व्यस्त है। 🎭 “हम ठेका प्रथा नहीं चलाते” — तो फिर कानून किसके लिए चलता है? कथित रूप से यह दावा किया जाता है कि “सैलरी हम सीधे देते हैं।” बहुत सुंदर। पर प्रश्न यह है: 👉 यदि सीधी सैलरी दी जा रही है, तो ESI-PF की वैधानिक अनिवार्यता कहाँ जमा है? 👉 यदि कर्मचारी आपके नियंत्रण में हैं, तो पहचान पत्र RTI के बाद ही क्यों बनते हैं? 👉 यूनिफॉर्म, सर्दियों के जूते, जैकेट—क्या ये ‘अनुकंपा’ हैं या ‘अधिकार’? कानून कहता है: काम लिया है तो सामाजिक सुरक्षा देनी ही होगी। संविधान कहता है: राज्यसत्ता जवाबदेह है। पर यहाँ जवाबदेही का स्थान ‘रसूख’ ने ले लिया है 🏛️ “हमारी पहुंच संघ और बीजेपी तक है” — क्या यह प्रशासनिक तर्क है या भय की पटकथा? सूत्र बताते हैं कि कर्मचारियों को यह कहकर डराया जाता है कि “हमारे संघ और बीजेपी में लिंक हैं”; कभी स्वयं को उच्च राजनीतिक नेतृत्व का ‘विशेष’ बताया जाता है; और जो आवाज़ उठाए—उसके विरुद्ध कमेटियाँ बिठा दी जाती हैं। यदि यह सत्य है, तो यह केवल श्रम-अधिकारों का उल्लंघन नहीं— बल्कि संस्थागत भय-प्रबंधन (Institutional Intimidation) का संगठित रूप है। लोकतंत्र में ‘लिंक’ कानून से ऊपर नहीं होते। और यदि किसी को लगता है कि होते हैं— तो RTI, दस्तावेज़ और न्यायिक परीक्षण उसका भ्रम तोड़ने के लिए पर्याप्त हैं। ⚖️ यह भावनात्मक अपील नहीं — औपचारिक विधिक प्रस्तावना है आगामी समय में निम्न बिंदुओं पर RTI आवेदन दाख़िल कर दस्तावेज़ी जवाब तलब किया जाएगा: 1. पिछले चार वर्षों में सुरक्षा कर्मियों के ESI-PF अंशदान का विवरण 2. वेतन भुगतान की प्रकृति — कर्मचारी/ठेका/संविदा स्थिति 3. बोनस, ग्रेच्युटी और अन्य वैधानिक लाभों का रिकॉर्ड 4. यूनिफॉर्म, आई-कार्ड और सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति का लिखित प्रमाण 5. हटाए गए कर्मचारियों के विरुद्ध बैठाई गई कथित कमेटियों की कार्यवाही प्रतिलिपि यह धमकी नहीं— संविधान प्रदत्त सूचना-अधिकार का विधिसम्मत उपयोग है। 🔥 अंतिम प्रश्न जब पैर कटते हैं, तो प्रेस नोट नहीं, जिम्मेदारियाँ कटनी चाहिए। जब माँएँ शोक में मरती हैं, तो पद नहीं—संवेदनहीनता हटनी चाहिए। और जब संस्थान के भीतर भय का वातावरण बनता है, तो निदेशक की कुर्सी ‘स्थायित्व’ नहीं, ‘जवाबदेही’ का विषय बनती है। सुनील पाल को संस्थान में वैकल्पिक रोजगार की औपचारिक गारंटी दी जानी चाहिए— ताकि उसका परिवार भरण-पोषण के लिए दया का मोहताज न रहे। और सरकार को यह स्पष्ट करना होगा— क्या ईहबास निदेशक पद की रिक्ति को रद्द कर देना ही समाधान है, या फिर एक स्वतंत्र जांच और प्रशासनिक परीक्षण अधिक उपयुक्त होगा? 📌 यह पोस्टर नहीं — दस्तावेज़ी प्रक्रिया की प्रस्तावना है। 📌 यह शोर नहीं — सार्वजनिक हित में दर्ज प्रारंभिक आपत्ति है। 📌 और यह अंत नहीं — जवाब आने तक प्रारंभ है। — पत्रकारिता जनहित में, जवाबदेही संविधान के नाम @LtGovDelhi | @CMODelhi | @ArvindKejriwal | @AtishiAAP | @MoHFW_INDIA | @itsshahnavaz | @SecretaryHealthDelhi @DelhiIhbas @RDA_IHBAS @IHBASSARAHI @MoHFW_INDIA @WHO @health @WHOSEARO @gupta_rekha @CMODelhi @PMOIndia
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🛑 **ईहबास में ‘पाक-सफाई’ का नाटक और ज़मीनी हक़ीक़त: गार्ड्स बिना ESI-PF, बिना यूनिफॉर्म — तीन साल से अधिकार निर्वस्त्र** (सूत्र: ईहबास के भीतर से प्राप्त जानकारी) ईहबास में तैनात एक गार्ड रमेश पाल—नाम भर नहीं, बल्कि उस सिस्टम का प्रतीक—जो पिछले तीन वर्षों से बिना ESI, PF, पहचान पत्र, यूनिफॉर्म, सर्दियों के जूते और जैकेट के ड्यूटी निभा रहा है। सूत्रों के अनुसार, यह स्थिति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि कई गार्ड्स और अटेंडेंट्स की साझा पीड़ा है। यहां विडंबना देखिए— ईहबास के डायरेक्टर R.K. धमीजा कथित तौर पर यह दर्शाते हैं कि “यहां ठेका प्रथा नहीं चलती, हम खुद सैलरी देते हैं”। पर सवाल सीधा और कानूनी है: 👉 अगर सैलरी दी जा रही है, तो ESI-PF जैसी मूलभूत वैधानिक सुविधाएं क्यों नहीं? 👉 आई-कार्ड, यूनिफॉर्म और सर्दियों के सुरक्षा साधन ‘दया’ नहीं, अधिकार हैं—फिर इनसे वंचित क्यों? सूत्र बताते हैं कि RTI दाख़िल होने के बाद अचानक आई-कार्ड बनवाए गए—यानी अधिकार तब तक अदृश्य, जब तक सवाल दिखाई न दे। यह किस तरह का प्रशासन है, जहां RTI के डर से काग़ज़ जिंदा होते हैं और उससे पहले कर्मचारी बेनाम रहते हैं? और आरोप यहीं नहीं रुकते। सूत्रों के अनुसार, कर्मचारियों को यह कहकर धमकाया जाता है कि “संघ और बीजेपी में हमारी पहुंच है”; आस-पास के बीजेपी नेताओं के राउंड लगवाकर रिपोर्ट्स चमकाई जाती हैं; और कहा जाता है कि संघ के प्रचारक भी इस पूरी कवायद में सहयोगी भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि यह दावा भी सामने आता है कि “आज बीजेपी सरकार को संघ ही चला रहा है”— यदि ऐसा है, तो सवाल और भी गंभीर हो जाता है: 👉 क्या संवैधानिक अधिकारों से ऊपर ‘रसूख’ खड़ा कर दिया गया है? गार्ड्स और अटेंडेंट्स बताते हैं कि यूनिफॉर्म तक नहीं दी जाती, सर्दियों में सुरक्षा साधन दूर की बात है। कानून कहता है—काम है तो अधिकार हैं; लेकिन यहां अधिकारों को पोस्टर और प्रेस-टूर के नीचे दबा दिया गया है। --- ⚠️ कानूनी चेतावनी (सार्वजनिक हित में): आने वाले समय में इस पूरे मामले पर RTI दाख़िल कर जवाब तलब किया जाएगा— ESI-PF जमा न होने के रिकॉर्ड वेतन भुगतान की प्रकृति ठेका/नॉन-ठेका दावों की सच्चाई यूनिफॉर्म, आई-कार्ड और सुरक्षा उपकरणों की आपूर्ति का विवरण यह धमकी नहीं, बल्कि कानून का औपचारिक स्मरण है। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं—और जवाब देना मजबूरी है। ईहबास में ‘पाक-सफाई’ के दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच का यह फासला अब सिर्फ व्यंग्य नहीं, बल्कि दस्तावेज़ों के तराज़ू पर तौला जाएगा। 📸 तस्वीरें चेतावनी हैं — यह कोई पोस्टर नहीं, सिस्टम की नाकामी का खून-सना सबूत है। यह वही गार्ड है, जो ESI-PF जैसी वैधानिक सुविधाओं से वंचित रहा; हादसे के बाद आज इलाज भी अपने ही पैसों से, उधार और मजबूरी में करा रहा है। अगर अधिकार समय पर मिले होते, तो शायद यह खून सड़क पर नहीं, अस्पताल में रुकता। — पत्रकारिता जनहित में, जवाबदेही संविधान के नाम @LtGovDelhi | @CMODelhi | @ArvindKejriwal | @AtishiAAP | @MoHFW_INDIA | @itsshahnavaz | @SecretaryHealthDelhi @DelhiIhbas @RDA_IHBAS @IHBASSARAHI @MoHFW_INDIA @WHO @health @WHOSEARO @gupta_rekha @CMODelhi @PMOIndia

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उत्तर-पूर्वी ज़िले में ईमानदारी शायद अवकाश पर है! उत्तर-पूर्वी जिले की सब-रजिस्ट्रार शाहदरा ने महज़ चंद हफ्तों में करोड़ों की ‘आर्थिक फसल’ काट ली। और विडंबना देखिए — सारे प्रमाण सरकारी रिकॉर्ड में विधिवत सुरक्षित हैं। काग़ज़ बोल रहे हैं, रजिस्टर गवाही दे रहे हैं, लेकिन @dm_northeast की प्रशासनिक चेतना जैसे संज्ञाहीन हो चुकी है! कारण क्या है? या तो अक्षमता चरम पर है… या फिर कहावत सटीक बैठती है — “चोर की दाढ़ी में तिनका!” सूत्रों के अनुसार, जैसे ही डीएम #Ajay_Kumar को इस घपले की जानकारी मिली, उसके ठीक अगले ही दिन #SR_Parul_Gupta ने #Abhishek, #Ravi, #Vishal और #Nirmal गिरोह के संकेत पर फिर से करोड़ों का ‘कारोबार’ कर डाला। और ज़िलाधिकारी? मौन। पूर्ण मौन। प्रश्न यह है — क्या यह मौन प्रशासनिक विवशता है या साझेदारी की सुविधा? आरोप अत्यंत गंभीर हैं — कहा जा रहा है कि इस वसूली का मासिक “आदर-राशि” लाखों में सीधे #DM तक पहुँचती है। यदि यह असत्य है, तो जांच का आदेश क्यों नहीं? यदि सत्य है, तो प्रशासनिक शपथ का क्या हुआ? जब जवाब तलब करने हेतु संपर्क किया जाता है, तो फ़ोन तक नहीं उठाया जाता। क्यों? क्या शब्द साथ छोड़ चुके हैं? या स्पष्टीकरण की संरचना अभी मुख्यालय से स्वीकृत नहीं हुई? सूत्रों का कहना है कि यह पूरा तंत्र मुख्यालय से संचालित होता है और ‘कौशिक’ नामक एजेंट इस गठजोड़ का समन्वयक है। मंडलीय आयुक्त की भूमिका भी प्रश्नों के घेरे में है। आश्चर्य यह कि आज तक न कोई निष्पक्ष जाँच, न कोई दंडात्मक कार्रवाई। क्या यह मान लिया जाए कि व्यवस्था के शीर्ष स्तर तक तार जुड़े हुए हैं? कहीं मुख्य सचिव और सरकार तक यह संरक्षण-तंत्र विस्तारित तो नहीं? क्योंकि यदि व्यवस्था में एक भी अधिकारी निष्पक्ष और निर्भीक हो, तो किसी भी वसूलीबाज का टिक पाना असंभव है। यह स्पष्ट किया जाता है कि यदि त्वरित, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच प्रारंभ नहीं की जाती, तो शीघ्र ही विस्तृत तथ्यों सहित सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आरटीआई आवेदन दायर कर प्रत्येक स्तर पर जवाब तलब किया जाएगा। रिकॉर्ड से उत्तर निकलेगा — और तब मौन भी दस्तावेज़ी साक्ष्य बन जाएगा। @PMOIndia @HMOIndia @CVCIndia @LtGovDelhi @CMODelhi @gupta_rekha @divisionalcomm3 @RevenueDeptDel अब यह केवल आरोपों का मामला नहीं है — यह प्रशासनिक नैतिकता की अग्निपरीक्षा है। देखना यह है कि सच सामने लाने का साहस पहले कौन करता है — रिकॉर्ड… या व्यवस्था?
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दिल्ली ट्रैफिक पुलिस भी संज्ञान ले @dtptraffic
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एक दोपहिया वाहन पर नंबर प्लेट के पीछे खुलेआम “Taliban Mafia Link” लिखकर सार्वजनिक सड़क पर प्रदर्शन… और प्रशासन मौन दर्शक? क्या अब आतंकवादी संगठनों के नाम भी सड़क संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं? उत्तरी-पूर्वी जिला, सीलमपुर/जाफराबाद थाना क्षेत्र से संबंधित है। वीडियो एवं वाहन विवरण विधिवत संलग्न किए गए हैं। प्रश्न सीधा है — क्या यह महज़ दिखावा है या गंभीर आपराधिक संकेत? क्या यह Motor Vehicles Act, IPC की धाराओं तथा Unlawful Activities (Prevention) Act के दायरे में परीक्षण योग्य विषय नहीं है? यदि किसी नागरिक द्वारा आतंकवादी संगठन के नाम का सार्वजनिक उपयोग किया जाए, तो क्या पुलिस की यह संवैधानिक एवं वैधानिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि तत्काल संज्ञान लेकर जाँच करे? या फिर कानून केवल कागज़ों तक सीमित है? इस प्रकरण पर विधिक कार्यवाही न होने की स्थिति में, संबंधित थाना एवं जिला प्रशासन से सूचना प्राप्त करने हेतु RTI अधिनियम, 2005 के अंतर्गत विस्तृत सूचना माँगी जाएगी — जिसमें यह पूछा जाएगा: अब तक क्या कार्रवाई की गई? FIR दर्ज हुई या नहीं? यदि नहीं, तो किस आधार पर? संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी क्या निर्धारित की गई? लोकतंत्र में कानून का शासन होना चाहिए, न कि प्रतीकों का तमाशा। अब देखना यह है कि प्रशासन सोया रहता है… या जागकर उदाहरण प्रस्तुत करता है। (वीडियो एवं वाहन विवरण संलग्न) @DelhiPolice @CPDelhi @DCPNEastDelhi @ACPBhajanpura @unfilted33203 @CrimeBranchDP @CellDelhi @HinduITCell @BajrangDalOrg @VHPDigital @VHPANews @the_hindu @pachauri_hindu @sagarmalik1985 @KumaarSaagar @SudarshanNewsTV @SureshChavhanke

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एक दोपहिया वाहन पर नंबर प्लेट के पीछे खुलेआम “Taliban Mafia Link” लिखकर सार्वजनिक सड़क पर प्रदर्शन… और प्रशासन मौन दर्शक? क्या अब आतंकवादी संगठनों के नाम भी सड़क संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं? उत्तरी-पूर्वी जिला, सीलमपुर/जाफराबाद थाना क्षेत्र से संबंधित है। वीडियो एवं वाहन विवरण विधिवत संलग्न किए गए हैं। प्रश्न सीधा है — क्या यह महज़ दिखावा है या गंभीर आपराधिक संकेत? क्या यह Motor Vehicles Act, IPC की धाराओं तथा Unlawful Activities (Prevention) Act के दायरे में परीक्षण योग्य विषय नहीं है? यदि किसी नागरिक द्वारा आतंकवादी संगठन के नाम का सार्वजनिक उपयोग किया जाए, तो क्या पुलिस की यह संवैधानिक एवं वैधानिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि तत्काल संज्ञान लेकर जाँच करे? या फिर कानून केवल कागज़ों तक सीमित है? इस प्रकरण पर विधिक कार्यवाही न होने की स्थिति में, संबंधित थाना एवं जिला प्रशासन से सूचना प्राप्त करने हेतु RTI अधिनियम, 2005 के अंतर्गत विस्तृत सूचना माँगी जाएगी — जिसमें यह पूछा जाएगा: अब तक क्या कार्रवाई की गई? FIR दर्ज हुई या नहीं? यदि नहीं, तो किस आधार पर? संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी क्या निर्धारित की गई? लोकतंत्र में कानून का शासन होना चाहिए, न कि प्रतीकों का तमाशा। अब देखना यह है कि प्रशासन सोया रहता है… या जागकर उदाहरण प्रस्तुत करता है। (वीडियो एवं वाहन विवरण संलग्न) @DelhiPolice @CPDelhi @DCPNEastDelhi @ACPBhajanpura @unfilted33203 @CrimeBranchDP @CellDelhi @HinduITCell @BajrangDalOrg @VHPDigital @VHPANews @the_hindu @pachauri_hindu @sagarmalik1985 @KumaarSaagar @SudarshanNewsTV @SureshChavhanke
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